देश के सबसे प्रतिष्ठित और प्रीमियम मीडिया शिक्षण संस्थान, भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC – Indian Institute of Mass Communication) में इन दिनों एक नया और बड़ा प्रशासनिक विवाद खड़ा हो गया है। अकादमिक और पत्रकारिता के स्तर पर अपनी खास पहचान रखने वाले इस संस्थान का एक आंतरिक भाषाई मतभेद अब कानूनी लड़ाई में बदल चुका है।
IIMC का यह बहुचर्चित हिंदी-उर्दू विवाद (Hindi-Urdu Dispute) अब देश की राजधानी की सबसे बड़ी अदालत, यानी दिल्ली हाई कोर्ट (Delhi High Court) की दहलीज पर पहुंच गया है। प्रवेश परीक्षा (Entrance Exam), भाषा नीति और कोर्स के संचालन को लेकर छात्रों और प्रशासन के बीच लंबे समय से चल रही खींचतान के बाद कुछ छात्रों ने अदालत का दरवाजा खटखटाया है। आइए विस्तार से समझते हैं कि आखिर यह पूरा विवाद क्या है, छात्रों की शिकायतें क्या हैं और दिल्ली हाई कोर्ट में दायर याचिका में क्या मांगें की गई हैं।
विवाद की असली जड़ क्या है? (The Core Issue)
IIMC में पत्रकारिता के विभिन्न पीजी डिप्लोमा (PG Diploma) कोर्सेज संचालित किए जाते हैं, जिनमें हिंदी पत्रकारिता (Hindi Journalism) और उर्दू पत्रकारिता (Urdu Journalism) दोनों शामिल हैं। यह विवाद मुख्य रूप से चालू शैक्षणिक सत्र (Academic Session) की प्रवेश प्रक्रिया और कुछ प्रशासनिक नियमों में किए गए बदलावों को लेकर शुरू हुआ है।
याचिकाकर्ताओं और छात्रों के अनुसार, विवाद के मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:

- प्रवेश परीक्षा के माध्यम में असमानता: छात्रों का आरोप है कि प्रवेश परीक्षा के दौरान प्रश्नों के अनुवाद और भाषा के चयन में निष्पक्षता नहीं बरती गई। हिंदी और उर्दू माध्यम के छात्रों के बीच मूल्यांकन (Evaluation) के मानकों में कथित तौर पर विसंगतियां देखी गईं।
- कोर्स के संसाधनों में भेदभाव: कुछ छात्रों और संकाय सदस्यों (Faculty) का दावा है कि उर्दू पत्रकारिता कोर्स को मिलने वाले संसाधन, इंफ्रास्ट्रक्चर और फैकल्टी सपोर्ट, हिंदी या अंग्रेजी विभाग के मुकाबले काफी कम हैं, जिससे छात्रों के भविष्य पर असर पड़ रहा है।
- भाषा नीति को लेकर मतभेद: संस्थान की आंतरिक भाषा नीति और क्षेत्रीय भाषाओं के पत्रकारिता कोर्सेज के प्रति प्रशासन के रवैये को लेकर छात्रों में असंतोष है। छात्रों का कहना है कि दोनों ही ऐतिहासिक भारतीय भाषाएं हैं और दोनों को समान अवसर व सम्मान मिलना चाहिए।
दिल्ली हाई कोर्ट में याचिका: छात्रों ने क्या की मांग?
जब संस्थान के स्तर पर शिकायतों का निवारण नहीं हुआ, तो प्रभावित छात्रों के एक समूह ने दिल्ली हाई कोर्ट में एक जनहित याचिका (PIL) और रिट याचिका दायर कर दी।

याचिका में की गई प्रमुख मांगें:
- निष्पक्ष जांच की मांग: प्रवेश परीक्षा की प्रक्रिया और अंकों के आवंटन (Marks Allocation) की जांच के लिए एक स्वतंत्र समिति का गठन किया जाए।
- समान अवसर सुनिश्चित करना: अदालत प्रशासन को यह निर्देश दे कि हिंदी और उर्दू दोनों ही कोर्सेज के छात्रों को प्लेसमेंट (Placement) और शैक्षणिक सामग्री के स्तर पर पूरी तरह समान अवसर दिए जाएं।
- प्रशासनिक दिशानिर्देश: भविष्य की प्रवेश परीक्षाओं के लिए एक पारदर्शी और त्रुटिहीन भाषा गाइडलाइन तैयार की जाए ताकि किसी भी छात्र के साथ उसकी भाषा के आधार पर कोई भेदभाव न हो।
एक नजर में: संस्थान का प्रोफाइल (IIMC at a Glance)
जो लोग इस संस्थान के महत्व को समझना चाहते हैं, उनके लिए नीचे दी गई तालिका से इसके प्रभाव का अंदाजा लगाया जा सकता है:
| पहलू (Aspects) | विवरण (Details) |
|---|---|
| संस्थान का नाम | भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC), नई दिल्ली (सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के अधीन)। |
| प्रतिष्ठा | भारत में पत्रकारिता और जनसंचार के लिए नंबर-1 रैंक वाला सरकारी संस्थान। |
| विवादित भाषा कोर्सेज | पीजी डिप्लोमा इन हिंदी जर्नलिज्म और पीजी डिप्लोमा इन उर्दू जर्नलिज्म। |
| मौजूदा कानूनी स्थिति | मामला दिल्ली हाई कोर्ट के समक्ष विचाराधीन है; अगली सुनवाई पर सबकी नजरें हैं। |
IIMC प्रशासन का क्या है पक्ष?
इस IIMC Hindi Urdu Dispute पर जब संस्थान के शीर्ष अधिकारियों से बात की गई, तो उन्होंने इन सभी आरोपों को पूरी तरह से खारिज कर दिया। प्रशासन का कहना है कि:
- IIMC एक स्वायत्त और राष्ट्रीय स्तर का संस्थान है जो सभी भाषाओं और संस्कृतियों का समान रूप से सम्मान करता है।
- प्रवेश परीक्षा पूरी तरह से योग्यता (Merit) और पारदर्शी राष्ट्रीय मानकों के आधार पर आयोजित की गई थी।
- किसी भी छात्र या पाठ्यक्रम के साथ कोई भेदभाव नहीं किया जा रहा है। कोर्ट के समक्ष संस्थान अपना विस्तृत और तथ्यात्मक जवाब (Affidavit) दाखिल करने के लिए पूरी तरह तैयार है।
मीडिया जगत और शिक्षा के लिए बड़ा सवाल
IIMC जैसे प्रतिष्ठित राष्ट्रीय संस्थान में इस तरह का भाषाई विवाद खड़ा होना बेहद चिंताजनक है। पत्रकारिता का मुख्य उद्देश्य ही समाज के हर वर्ग की आवाज को निष्पक्षता से उठाना है, और इसके लिए हर भाषा के पत्रकारों की समान आवश्यकता होती है। चाहे वह हिंदी हो, उर्दू हो या कोई अन्य क्षेत्रीय भाषा।
यह मामला अब दिल्ली हाई कोर्ट के पास है, इसलिए उम्मीद की जा रही है कि माननीय अदालत दोनों पक्षों के तर्कों को सुनने के बाद एक ऐसा न्यायसंगत फैसला सुनाएगी जो छात्रों के भविष्य की रक्षा करेगा और संस्थान की गरिमा को भी बनाए रखेगा। इस फैसले का असर आने वाले समय में देश के अन्य केंद्रीय विश्वविद्यालयों और मीडिया संस्थानों की भाषा नीतियों पर भी पड़ना तय है।

भावेश Tez Khabri के सह-संस्थापक और प्रबंध संपादक हैं। अभिनय के क्षेत्र में अपनी पहचान बनाने के बाद, अब वे पत्रकारिता के माध्यम से समाज में पारदर्शिता लाने का प्रयास कर रहे हैं। भावेश जी मुख्य रूप से राजनीति, क्राइम और शिक्षा से जुड़ी खबरों का नेतृत्व करते हैं और सुनिश्चित करते हैं कि हर खबर पूरी तरह से सत्यापित (Verified) हो।
