संसदीय लोकतंत्र में समितियों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। इसी कड़ी में, लोकसभा अध्यक्ष (Lok Sabha Speaker) ओम बिरला ने हाल ही में एक बड़ा और महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए विशेषाधिकार समिति (Committee of Privileges) का पुनर्गठन किया है। इस नई समिति के गठन ने राजनीतिक और मीडिया गलियारों में काफी चर्चा बटोरी है।
इस विस्तृत न्यूज़ ब्लॉग में, हम “संसद की नई समिति: ओम बिरला ने 15 सदस्य नामित किए” के हर पहलू पर गहराई से चर्चा करेंगे। हम जानेंगे कि इस समिति के सदस्य कौन हैं, इसका अध्यक्ष किसे बनाया गया है, विशेषाधिकार समिति क्या होती है, इसके कार्य क्या हैं, और भारतीय लोकतंत्र में संसदीय विशेषाधिकार (Parliamentary Privileges) क्यों महत्वपूर्ण हैं।
Parliament New Committee: संसद की नई समिति का गठन और ताज़ा अपडेट
लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने 3 मार्च 2026 को आधिकारिक तौर पर विशेषाधिकार समिति (Committee of Privileges) के नए सदस्यों को नामित किया है। यह समिति तुरंत प्रभाव से अपना कार्यभार संभाल लेगी। यह एक बहु-दलीय (Multi-party) समिति है, जिसका मुख्य उद्देश्य संसद और उसके सदस्यों के विशेषाधिकारों के हनन से जुड़े मामलों की जांच करना है।
Chairperson of the Committee: रविशंकर प्रसाद को मिली अहम जिम्मेदारी
इस 15 सदस्यीय महत्वपूर्ण संसदीय समिति की कमान भारतीय जनता पार्टी (BJP) के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद को सौंपी गई है। रविशंकर प्रसाद का लंबा राजनीतिक और कानूनी अनुभव इस समिति के अध्यक्ष के रूप में काफी काम आएगा। समिति का काम बेहद संवेदनशील होता है, क्योंकि इसमें पक्ष और विपक्ष दोनों के सांसदों से जुड़े विशेषाधिकार हनन के मामलों की निष्पक्ष जांच करनी होती है।
“संसदीय विशेषाधिकारों की रक्षा करना सदन की गरिमा को बनाए रखने के लिए सर्वोपरि है। विशेषाधिकार समिति संसद के सदस्यों को बिना किसी बाधा या भय के अपना कर्तव्य निभाने की स्वतंत्रता सुनिश्चित करती है।”

15 Members Nominated by Om Birla: कौन-कौन हैं इस समिति में शामिल?
लोकसभा अध्यक्ष द्वारा गठित इस 15 सदस्यीय समिति में सभी प्रमुख राजनीतिक दलों को प्रतिनिधित्व दिया गया है। सत्तारूढ़ भाजपा के पास अध्यक्ष सहित कुल 7 सदस्य हैं, जबकि मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस के 3 सदस्य इस समिति का हिस्सा हैं। इसके अलावा डीएमके, समाजवादी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस, शिवसेना और शिवसेना (यूबीटी) का भी एक-एक सांसद इसमें शामिल है।
नीचे इस संसद की नई समिति के 15 सदस्यों की पूरी सूची एक टेबल के माध्यम से दी गई है:
| क्रम संख्या (S.No.) | सदस्य का नाम (Member Name) | राजनीतिक दल (Political Party) |
| 1 | रविशंकर प्रसाद (अध्यक्ष) | भारतीय जनता पार्टी (BJP) |
| 2 | मनीष तिवारी | भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) |
| 3 | तारिक अनवर | भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) |
| 4 | मणिकम टैगोर | भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) |
| 5 | टी. आर. बालू | द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) |
| 6 | कल्याण बनर्जी | अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस (AITC) |
| 7 | धर्मेंद्र यादव | समाजवादी पार्टी (SP) |
| 8 | अरविंद गणपत सावंत | शिवसेना (UBT) |
| 9 | श्रीरंग अप्पा चंदू बारणे | शिवसेना (Shiv Sena) |
| 10 | जगदंबिका पाल | भारतीय जनता पार्टी (BJP) |
| 11 | त्रिवेंद्र सिंह रावत | भारतीय जनता पार्टी (BJP) |
| 12 | जगदीश शेट्टार | भारतीय जनता पार्टी (BJP) |
| 13 | बृजमोहन अग्रवाल | भारतीय जनता पार्टी (BJP) |
| 14 | रामवीर सिंह बिधूड़ी | भारतीय जनता पार्टी (BJP) |
| 15 | संगीता कुमारी सिंह देव | भारतीय जनता पार्टी (BJP) |
यह स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है कि इस समिति में सदन के कई वरिष्ठ और अनुभवी सांसदों को जगह दी गई है। टी. आर. बालू, मनीष तिवारी और कल्याण बनर्जी जैसे दिग्गज नेता इस समिति को अपने अनुभव से दिशा प्रदान करेंगे।
What is the Committee of Privileges? (विशेषाधिकार समिति क्या है?)
जब हम बात करते हैं कि संसद की नई समिति: ओम बिरला ने 15 सदस्य नामित किए, तो हमें यह भी समझना होगा कि आखिर यह विशेषाधिकार समिति (Committee of Privileges) है क्या और इसका काम क्या होता है?
भारतीय संविधान ने संसद (लोकसभा और राज्यसभा) और उसके सदस्यों को कुछ विशेष अधिकार और उन्मुक्तियां (Privileges and Immunities) प्रदान की हैं। इन अधिकारों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सांसद स्वतंत्र रूप से और बिना किसी बाहरी दबाव के अपना काम कर सकें।
जब भी कोई व्यक्ति, संस्था या कोई अन्य सांसद इन विशेषाधिकारों का उल्लंघन करता है, तो इसे ‘विशेषाधिकार का हनन’ (Breach of Privilege) या ‘सदन की अवमानना’ (Contempt of the House) माना जाता है। विशेषाधिकार समिति का काम इन्हीं मामलों की जांच करना है।
Historical Background (ऐतिहासिक पृष्ठभूमि)
- गठन का इतिहास: स्वतंत्र भारत में पहली विशेषाधिकार समिति 1 अप्रैल 1950 को गठित की गई थी। उस समय इस समिति में केवल 10 सदस्य होते थे।
- सदस्यों की संख्या में वृद्धि: काम के बढ़ते बोझ और सदन के विस्तार को देखते हुए, 2 मई 1955 को इस समिति की सदस्य संख्या 10 से बढ़ाकर 15 कर दी गई।
- कार्यकाल: आम तौर पर, नई लोकसभा के गठन के तुरंत बाद इस समिति का गठन किया जाता है। पिछली लोकसभा (17वीं) में इसका गठन 9 अक्टूबर 2019 को हुआ था। वर्तमान समिति का गठन समय-समय पर अध्यक्ष द्वारा की जाने वाली पुनर्गठन प्रक्रिया का हिस्सा है।
Powers and Functions of the Committee (समिति की शक्तियां और कार्य)
इस विशेषाधिकार समिति के पास किसी अदालत के समान अधिकार होते हैं। सदन के नियमों (विशेषकर Rule 227) के तहत इस समिति को कई महत्वपूर्ण शक्तियां प्राप्त हैं:
- मामलों की जांच (Investigation of Cases): अध्यक्ष (Speaker) या सदन द्वारा भेजे गए विशेषाधिकार हनन के मामलों की विस्तृत जांच करना।
- सबूत और गवाह (Evidence and Witnesses): समिति के पास यह अधिकार होता है कि वह मामले से जुड़े किसी भी व्यक्ति को गवाही देने के लिए बुला सकती है और किसी भी दस्तावेज की मांग कर सकती है।
- सिफारिशें देना (Making Recommendations): जांच के बाद, समिति अपनी रिपोर्ट तैयार करती है और सदन को यह बताती है कि क्या वास्तव में विशेषाधिकार का हनन हुआ है या नहीं। यदि हनन हुआ है, तो समिति दोषी के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई (जैसे चेतावनी, निलंबन या जेल) की सिफारिश करती है।
- अध्यक्ष को रिपोर्ट (Reporting to the Speaker): यदि अध्यक्ष द्वारा Rule 227 के तहत मामला सीधे समिति को भेजा जाता है, तो समिति अपनी रिपोर्ट अध्यक्ष को सौंपती है। इसके बाद अध्यक्ष अंतिम आदेश पारित कर सकते हैं या रिपोर्ट को सदन के पटल (Table of the House) पर रखने का निर्देश दे सकते हैं।
Understanding Parliamentary Privileges (संसदीय विशेषाधिकारों को समझना)
संसदीय विशेषाधिकारों के महत्व को समझे बिना संसद की नई समिति: ओम बिरला ने 15 सदस्य नामित किए की खबर का पूरा महत्व समझना मुश्किल है।
संविधान के अनुच्छेद 105 (Article 105) के तहत भारतीय संसद, इसके सदस्यों और समितियों को दो मुख्य प्रकार के विशेषाधिकार प्राप्त हैं:
1. सामूहिक विशेषाधिकार (Collective Privileges)
यह अधिकार पूरे सदन को एक ईकाई के रूप में प्राप्त होते हैं:
- कार्यवाहियों के प्रकाशन का अधिकार: सदन को अपनी बहसों और कार्यवाहियों को प्रकाशित करने, या किसी अन्य को प्रकाशित करने से रोकने का अधिकार है।
- अजनबियों को बाहर करने का अधिकार: गुप्त बैठकों (Secret Sittings) के दौरान सदन गैलरी से बाहरी लोगों (Strangers) को बाहर कर सकता है।
- दण्ड देने का अधिकार: यदि कोई सदस्य या बाहरी व्यक्ति सदन की अवमानना करता है, तो सदन उसे निलंबित करने या जेल भेजने का अधिकार रखता है।
2. व्यक्तिगत विशेषाधिकार (Individual Privileges)
यह अधिकार प्रत्येक सांसद को व्यक्तिगत स्तर पर मिलते हैं:
- गिरफ्तारी से छूट: किसी भी सांसद को संसद के सत्र के दौरान, सत्र शुरू होने से 40 दिन पहले और सत्र खत्म होने के 40 दिन बाद तक किसी भी सिविल मामले (Civil Case) में गिरफ्तार नहीं किया जा सकता। (यह छूट आपराधिक मामलों में लागू नहीं होती है)।
- अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (Freedom of Speech): संसद के भीतर सांसद द्वारा कही गई किसी भी बात या दिए गए वोट के लिए उसे किसी भी अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती।
Why this Recent Restructuring is Significant? (हालिया पुनर्गठन क्यों महत्वपूर्ण है?)
हाल के दिनों में, संसद में सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच कई मुद्दों पर तीखी बहस और टकराव देखने को मिला है। सदन की कार्यवाही के दौरान कई बार विशेषाधिकार हनन के प्रस्ताव लाए गए हैं।
ऐसे समय में जब विपक्ष और सरकार के बीच तनाव चरम पर है, लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला द्वारा इस बहु-दलीय 15 सदस्यीय समिति का गठन एक महत्वपूर्ण विधायी कदम है। इस समिति पर यह जिम्मेदारी होगी कि वह दलगत राजनीति से ऊपर उठकर निष्पक्ष रूप से मामलों की जांच करे। कांग्रेस के मणिकम टैगोर (जो वर्तमान में बजट सत्र के अंत तक निलंबित हैं) और मनीष तिवारी जैसे आक्रामक विपक्षी नेताओं के साथ-साथ रविशंकर प्रसाद और जगदंबिका पाल जैसे दिग्गज सत्ताधारी नेताओं की उपस्थिति इस समिति की बहसों को बेहद दिलचस्प बनाएगी।
अन्य संसदीय समितियां और हालिया हलचल (Other Recent Updates)
विशेषाधिकार समिति के अलावा, हाल ही में लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने कुछ अन्य महत्वपूर्ण कदम भी उठाए हैं:
- न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा जांच पैनल का पुनर्गठन: ओम बिरला ने सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के जजों वाली उस तीन सदस्यीय जांच समिति का भी पुनर्गठन किया है जो न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा को पद से हटाने (Removal procedure) के आधारों की जांच कर रही है। यह मामला उनके आवास से कथित तौर पर नकदी बरामद होने से जुड़ा है। इस पैनल में सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अरविंद कुमार, बॉम्बे हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस चंद्रशेखर और वरिष्ठ वकील बी वी आचार्य शामिल हैं।
- संसदीय मैत्री समूह (Parliamentary Friendship Groups): भारतीय संसद के वैश्विक जुड़ाव को बढ़ाने के लिए ओम बिरला ने 60 से अधिक देशों के साथ संसदीय मैत्री समूहों का गठन किया है, ताकि अंतरराष्ट्रीय विधायी संवाद को मजबूत किया जा सके।
विधायी जवाबदेही की दिशा में एक बड़ा कदम
“संसद की नई समिति: ओम बिरला ने 15 सदस्य नामित किए” केवल एक राजनीतिक खबर नहीं है, बल्कि यह हमारे संसदीय तंत्र (Parliamentary System) के सुचारू रूप से काम करने का एक प्रमाण है। विशेषाधिकार समिति (Committee of Privileges) वह ढाल है जो लोकतंत्र के मंदिर की गरिमा को बचाए रखती है और यह सुनिश्चित करती है कि जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधि बिना किसी डर के अपनी बात रख सकें।
रविशंकर प्रसाद के नेतृत्व में और 14 अन्य अनुभवी सांसदों के साथ, यह उम्मीद की जाती है कि यह नई समिति भारतीय लोकतंत्र की परंपराओं को और मजबूत करेगी और संसदीय मर्यादाओं का सख्ती से पालन सुनिश्चित करेगी।
