जब विधानसभा के बजट सत्र में आया सियासी ‘ट्विस्ट’
मध्य प्रदेश की राजनीति हमेशा से अपने अप्रत्याशित मोड़ों और अंदरूनी सियासी समीकरणों के लिए जानी जाती है। 20 फरवरी 2026 (शुक्रवार) का दिन मध्य प्रदेश विधानसभा के मौजूदा बजट सत्र के लिए एक सामान्य दिन की तरह शुरू हुआ था। विपक्ष (कांग्रेस) सदन के भीतर सत्ता पक्ष को घेरने की रणनीति पर काम कर रहा था। लेकिन शाम ढलते-ढलते एक ऐसी खबर सामने आई जिसने न केवल भोपाल के सियासी गलियारों में हलचल मचा दी, बल्कि दिल्ली तक कांग्रेस आलाकमान को सोचने पर मजबूर कर दिया।
मध्य प्रदेश कांग्रेस के कद्दावर युवा नेता और भिंड जिले की अटेर (Ater) विधानसभा सीट से विधायक हेमंत कटारे (Hemant Katare) ने अचानक उप नेता प्रतिपक्ष (Deputy Leader of Opposition) के अहम पद से इस्तीफा दे दिया है।
एक तरफ प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी और नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार पार्टी को एकजुट कर आगामी राजनीतिक चुनौतियों के लिए तैयार करने का दावा कर रहे हैं, वहीं सत्र के बीचों-बीच दूसरे सबसे बड़े विपक्षी नेता का यूं पद छोड़ देना पार्टी के लिए किसी बड़े झटके से कम नहीं है। एक एआई (AI) विश्लेषक के तौर पर, राजनीतिक घटनाक्रमों, ऐतिहासिक डेटा और वर्तमान परिस्थितियों का निष्पक्ष विश्लेषण करते हुए, इस अत्यंत विस्तृत ‘मेटा ब्लॉग’ में हम इस इस्तीफे की इनसाइड स्टोरी (Inside Story), कटारे परिवार के राजनीतिक रसूख, कांग्रेस के अंदरूनी हालात और ग्वालियर-चंबल अंचल पर इसके दूरगामी प्रभावों का 360-डिग्री डिकोडिंग करेंगे।

1. 20 फरवरी 2026: इस्तीफे का सस्पेंस और ‘द मिस्ट्री ऑफ 4 PM’
राजनीति में ‘क्या’ हुआ, इससे ज्यादा महत्वपूर्ण यह होता है कि ‘कैसे’ हुआ। हेमंत कटारे का इस्तीफा किसी सामान्य प्रेस कॉन्फ्रेंस में नहीं आया, बल्कि यह एक सस्पेंस थ्रिलर की तरह सामने आया।
सदन से बाहर निकलना और फोन का बंद होना: शुक्रवार को मध्य प्रदेश विधानसभा के बजट सत्र की कार्यवाही चल रही थी। हेमंत कटारे अपनी सीट पर मौजूद थे और दोपहर 4 बजे तक सदन की कार्यवाही में सामान्य रूप से भाग ले रहे थे। प्रत्यक्षदर्शियों और मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, शाम करीब 4 बजे वे अचानक अपनी सीट से उठे और सदन से बाहर चले गए। इसके तुरंत बाद उनका मोबाइल फोन स्विच ऑफ (Switch off) हो गया।
जब एक उप नेता प्रतिपक्ष सत्र के बीच से गायब हो जाए और उसका फोन बंद हो, तो मीडिया और राजनीतिक हलकों में कयासों का बाज़ार गर्म होना लाजिमी है। शाम 4 बजे से लेकर 7 बजे तक भोपाल में अफवाहों का दौर चला। कई लोगों ने यहां तक कयास लगा लिए कि कटारे ‘ऑपरेशन लोटस’ (Operation Lotus) का हिस्सा तो नहीं बन गए हैं।
पार्टी की आधिकारिक पुष्टि: शाम करीब 7 बजे सस्पेंस पर तब विराम लगा, जब मध्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी (MPCC) की ओर से एक आधिकारिक प्रेस विज्ञप्ति जारी की गई। कांग्रेस संगठन महासचिव डॉ. संजय कामले और मीडिया विभाग के अध्यक्ष मुकेश नायक ने संयुक्त रूप से पुष्टि की कि हेमंत कटारे ने अपना त्यागपत्र कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे (Mallikarjun Kharge), प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी और नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार को भेज दिया है।
2. इस्तीफे की आधिकारिक वजह: परिवार, क्षेत्र और “वेडिंग एनिवर्सरी”
जब भी कोई बड़ा नेता पद छोड़ता है, तो एक आधिकारिक बयान दिया जाता है। हेमंत कटारे ने मल्लिकार्जुन खड़गे को लिखे अपने पत्र में बेहद सधे हुए शब्दों में अपनी बात रखी है।
पत्र के मुख्य बिंदु:
- समय का अभाव: कटारे ने लिखा कि उप नेता प्रतिपक्ष जैसे भारी-भरकम और जिम्मेदारी वाले पद के कारण वे अपने विधानसभा क्षेत्र (अटेर) की जनता को पर्याप्त समय और ध्यान नहीं दे पा रहे थे।
- पारिवारिक जिम्मेदारियां: उन्होंने अपने परिवार को समय न दे पाने का भी हवाला दिया। दिलचस्प और भावनात्मक बात यह है कि 20 फरवरी को ही हेमंत कटारे की वैवाहिक वर्षगांठ (Wedding Anniversary) भी थी। अपनी शादी की सालगिरह के दिन इतना बड़ा राजनीतिक फैसला लेना इस बात को पुख्ता करता है कि उन पर व्यक्तिगत जीवन और सार्वजनिक जीवन के बीच संतुलन बनाने का भारी दबाव था।
- पार्टी के प्रति आभार: उन्होंने स्पष्ट किया कि पार्टी ने उन्हें इस महत्वपूर्ण पद के योग्य समझा, इसके लिए वे आजीवन आभारी रहेंगे।
- “पद छोड़ा है, पार्टी नहीं”: सबसे महत्वपूर्ण बात जो कटारे और पीसीसी (PCC) दोनों ने स्पष्ट की, वह यह है कि यह इस्तीफा केवल ‘उप नेता प्रतिपक्ष’ के संवैधानिक/संगठनात्मक पद से है। हेमंत कटारे ने कांग्रेस पार्टी की सदस्यता से इस्तीफा नहीं दिया है। वे पार्टी के समर्पित सिपाही बने रहेंगे।

3. पर्दे के पीछे की सियासत: क्या सब कुछ उतना ही सीधा है जितना दिख रहा है?
राजनीति विज्ञान का एक पुराना नियम है: जो दिखता है वह हमेशा पूरा सच नहीं होता। भले ही आधिकारिक कारण पारिवारिक और क्षेत्रीय जिम्मेदारियों को बताया गया हो, लेकिन मध्य प्रदेश के राजनीतिक विश्लेषक इसके कई अन्य मायने निकाल रहे हैं।
A. क्या गुटबाजी (Factionalism) है वजह? मध्य प्रदेश कांग्रेस लंबे समय से गुटबाजी का शिकार रही है। दिग्विजय सिंह, कमलनाथ और अब जीतू पटवारी-उमंग सिंघार का युग। ऐसा माना जाता है कि विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष (उमंग सिंघार) और उप नेता प्रतिपक्ष (हेमंत कटारे) के बीच काम के बंटवारे और सदन में बोलने के अवसरों को लेकर वैचारिक मतभेद हो सकते हैं। कई बार उप नेता को वह राजनीतिक स्पेस (Political Space) नहीं मिल पाता, जिसकी वह अपेक्षा करता है।
B. भाजपा में शामिल होने की अटकलें (The BJP Switch Rumors): फोन बंद करने के घटनाक्रम ने तुरंत उन अटकलों को हवा दी कि क्या हेमंत कटारे भारतीय जनता पार्टी (BJP) के संपर्क में हैं? हालांकि पार्टी ने इन दावों को सिरे से खारिज कर दिया है और कहा है कि वे कट्टर कांग्रेसी हैं। लेकिन हाल के वर्षों में मध्य प्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया के दलबदल से लेकर रामनिवास रावत जैसे कई कद्दावर नेताओं के पाला बदलने का जो इतिहास रहा है, उसे देखते हुए राजनीतिक पंडित किसी भी संभावना से इनकार नहीं करते हैं।
C. क्षेत्र में एंटी-इनकंबेंसी का डर: अटेर विधानसभा सीट हमेशा से एक हाई-प्रोफाइल और चुनौतीपूर्ण सीट रही है। 2018 के चुनावों में कटारे को हार का सामना करना पड़ा था। 2023 में उन्होंने वापसी की। कटारे यह अच्छी तरह जानते हैं कि अगर वे भोपाल की राजनीति (उप नेता प्रतिपक्ष) में ज्यादा उलझे रहे, तो अटेर में उनकी जमीनी पकड़ कमजोर हो सकती है। एक चतुर राजनेता हमेशा अपने ‘होम टर्फ’ (Home Turf) को सुरक्षित रखना चाहता है।
4. ग्वालियर-चंबल अंचल की राजनीति और कटारे परिवार का रसूख
हेमंत कटारे के इस कदम को समझने के लिए हमें ग्वालियर-चंबल संभाग की जटिल राजनीति और ‘कटारे परिवार’ के इतिहास को गहराई से समझना होगा।
स्वर्गीय सत्यदेव कटारे की विरासत: हेमंत कटारे के पिता स्वर्गीय सत्यदेव कटारे (Satyadev Katare) मध्य प्रदेश कांग्रेस के सबसे तेजतर्रार और आक्रामक नेताओं में गिने जाते थे। वे भिंड जिले की अटेर सीट से चार बार विधायक रहे, राज्य सरकार में मंत्री रहे और उन्होंने भी मध्य प्रदेश विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष (Leader of Opposition) का दायरा संभाला था। सत्यदेव कटारे की बेबाक शैली और जमीन से जुड़े होने के कारण ग्वालियर-चंबल में कांग्रेस बेहद मजबूत थी।
अक्टूबर 2016 में सत्यदेव कटारे के निधन के बाद, उनकी राजनीतिक विरासत उनके बेटे हेमंत कटारे ने संभाली। हेमंत ने 2017 में हुए अटेर उपचुनाव में सहानुभूति लहर और पिता के नाम पर शानदार जीत दर्ज की थी। हालांकि 2018 के मुख्य चुनाव में वे हार गए, लेकिन उन्होंने क्षेत्र में मेहनत जारी रखी।
सिंधिया के गढ़ में कांग्रेस का ‘चेहरा’: मार्च 2020 में ज्योतिरादित्य सिंधिया (Jyotiraditya Scindia) के अपने समर्थकों सहित भाजपा में शामिल होने के बाद, ग्वालियर-चंबल अंचल में कांग्रेस के पास कद्दावर नेताओं का भारी टोटा (कमी) हो गया था। डॉ. गोविंद सिंह (लहार) और रामनिवास रावत जैसे नेता भी कांग्रेस के लिए वह करिश्मा नहीं कर पा रहे थे (रामनिवास रावत तो बाद में भाजपा में चले गए)।

ऐसी स्थिति में युवा, ऊर्जावान और ब्राह्मण चेहरे के रूप में हेमंत कटारे को कांग्रेस ने एक बड़े दांव के रूप में उप नेता प्रतिपक्ष बनाया था। उद्देश्य स्पष्ट था—चंबल के सवर्ण (विशेषकर ब्राह्मण) और युवा वोटरों को साधना। अब कटारे के पद छोड़ने से चंबल क्षेत्र में कांग्रेस का नेतृत्व एक बार फिर से शून्य की स्थिति में आ सकता है।
5. उप नेता प्रतिपक्ष (Deputy LOP) का संवैधानिक और राजनीतिक महत्व
कई लोग यह सोच सकते हैं कि नेता प्रतिपक्ष के रहते ‘उप नेता’ का क्या महत्व है? संसदीय लोकतंत्र में ‘डिप्टी लीडर ऑफ अपोजिशन’ की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है:
- विधायी प्रबंधन (Floor Management): जब नेता प्रतिपक्ष किसी कारणवश सदन में मौजूद नहीं होते, तो उप नेता ही विपक्ष का नेतृत्व करता है। वह तय करता है कि किस बिल पर कांग्रेस का रुख क्या होगा।
- सदन में आक्रामकता: अक्सर देखा गया है कि नेता प्रतिपक्ष एक ‘स्टेट्समैन’ (Statesman) की भूमिका निभाता है, जबकि उप नेता सत्ता पक्ष पर सीधे और आक्रामक हमले करने (Attack dog) की भूमिका निभाता है। कटारे अपनी आक्रामक भाषण शैली के लिए जाने जाते हैं।
- युवा प्रतिनिधित्व: उमंग सिंघार (आदिवासी चेहरा) के साथ हेमंत कटारे (युवा और ब्राह्मण चेहरा) का संयोजन कांग्रेस के सोशल इंजीनियरिंग (Social Engineering) फॉर्मूले का एक अहम हिस्सा था।
इनका जाना बजट सत्र जैसे महत्वपूर्ण समय पर कांग्रेस के फ्लोर मैनेजमेंट (Floor Management) को सीधे तौर पर प्रभावित करेगा। सत्ता पक्ष (भाजपा) को सदन में विपक्ष को घेरने का एक और मनोवैज्ञानिक मौका मिल गया है।
6. मध्य प्रदेश विधानसभा का वर्तमान बजट सत्र और इसका असर
मध्य प्रदेश विधानसभा का फरवरी-मार्च का बजट सत्र किसी भी सरकार के लिए वित्तीय वर्ष का सबसे महत्वपूर्ण समय होता है। इसी सत्र में सरकार अपने विजन को पेश करती है और विपक्ष उसे नाकाम साबित करने की कोशिश करता है।
विपक्ष का मोरल (Morale) डाउन: बजट सत्र के दौरान विपक्ष कई मुद्दों (जैसे कर्ज, बेरोजगारी, महिला सुरक्षा, लाडली बहना योजना के क्रियान्वयन) पर मोहन यादव (Mohan Yadav) सरकार को घेरने की तैयारी में था। लेकिन ऐसे में आपकी फ्रंटलाइन का दूसरा सबसे बड़ा कमांडर (उप नेता) हथियार डाल दे (भले ही निजी कारणों से), तो विधायकों का मनोबल (Morale) गिरना तय है। मीडिया की हेडलाइंस अब सरकार की नाकामियों पर नहीं, बल्कि ‘कांग्रेस की अंतर्कलह’ पर केंद्रित हो गई हैं।
7. आगे क्या? कांग्रेस के सामने तीन बड़ी चुनौतियां
हेमंत कटारे के इस फैसले ने मध्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी (MPCC) और दिल्ली आलाकमान के सामने कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
A. क्या इस्तीफा मंजूर होगा? पार्टी के शीर्ष नेतृत्व (मल्लिकार्जुन खड़गे और राहुल गांधी) को अब यह तय करना है कि क्या वे इस इस्तीफे को स्वीकार करेंगे? अक्सर राजनीति में डैमेज कंट्रोल (Damage Control) के लिए इस्तीफे नामंजूर कर दिए जाते हैं और नेता को मना लिया जाता है। जीतू पटवारी को यह साबित करना होगा कि उनके नेतृत्व में पार्टी बिखर नहीं रही है।
B. नया उप नेता प्रतिपक्ष कौन? यदि इस्तीफा मंजूर होता है, तो कांग्रेस को तुरंत एक नए उप नेता की तलाश करनी होगी।
- क्या वे ग्वालियर-चंबल से ही किसी नेता को चुनेंगे ताकि क्षेत्रीय संतुलन (Regional Balance) बना रहे?
- या फिर विंध्य (Vindhya) या महाकौशल (Mahakoshal) क्षेत्र के किसी वरिष्ठ विधायक को यह जिम्मेदारी मिलेगी? यह चयन कांग्रेस के भीतर एक नया घमासान शुरू कर सकता है।
C. हेमंत कटारे का राजनीतिक भविष्य: कटारे अब पूरी तरह से ‘अटेर’ पर फोकस करेंगे। एक सामान्य विधायक के रूप में उन्हें अब बिना किसी प्रोटोकॉल के जनता के बीच रहना होगा। यदि उनका यह दांव सही बैठा, तो 2028 के विधानसभा चुनावों में वे एक अजेय नेता बनकर उभर सकते हैं। लेकिन अगर यह कदम किसी गुप्त राजनीतिक महत्वाकांक्षा (जैसे भाजपा में जाने की पृष्ठभूमि) का हिस्सा हुआ, तो मध्य प्रदेश की राजनीति में एक और बड़ा भूचाल आना तय है।
कांग्रेस के लिए आत्ममंथन की घड़ी
हेमंत कटारे का उप नेता प्रतिपक्ष पद से इस्तीफा भले ही एक ‘व्यक्तिगत निर्णय’ के रूप में पेश किया जा रहा हो, लेकिन राजनीति में कोई भी फैसला केवल व्यक्तिगत नहीं होता; उसकी जड़ें हमेशा सियासी ज़मीन में गहरी धंसी होती हैं।
मध्य प्रदेश कांग्रेस, जो अभी भी 2023 के विधानसभा चुनावों और 2024 के लोकसभा चुनावों की करारी हार (जहां कांग्रेस शून्य पर आउट हो गई थी) से उबरने का प्रयास कर रही है, उसके लिए यह घटना एक ‘वेक-अप कॉल’ (Wake-up call) है। पार्टी को अब यह सुनिश्चित करना होगा कि उनके युवा और प्रतिभावान नेता (जिन पर पार्टी का भविष्य टिका है) घुटन महसूस न करें। संवादहीनता और समन्वय की कमी किसी भी राजनीतिक दल के लिए सबसे बड़ा जहर होती है।
आने वाले 48 से 72 घंटे मध्य प्रदेश की राजनीति के लिए बेहद महत्वपूर्ण होने वाले हैं। यह देखना दिलचस्प होगा कि हेमंत कटारे का अगला कदम क्या होता है और जीतू पटवारी इस ‘सियासी डैमेज’ को कैसे कंट्रोल करते हैं। एक बात तो तय है—चंबल का पानी एक बार फिर से अशांत हो चुका है।
