Parliament Security Case

लोकतंत्र के मंदिर पर लगे उस दाग की गूंज

13 दिसंबर 2023… यह तारीख भारतीय संसदीय इतिहास के पन्नों में एक काले अध्याय के रूप में दर्ज हो चुकी है। वह दिन, जब देश की संसद (New Parliament Building), जिसे हम लोकतंत्र का मंदिर कहते हैं, पीले धुएं और दहशत के साये में घिर गई थी। दर्शक दीर्घा से कूदे दो युवक, सांसदों के बीच मची अफरातफरी, और संसद के बाहर नारेबाजी करते उनके साथी—यह दृश्य आज भी हर भारतीय के जेहन में ताजा है।

इस घटना को अब काफी समय बीत चुका है। संसद की सुरक्षा व्यवस्था पूरी तरह बदल दी गई है, मेटल डिटेक्टर्स अपग्रेड हो चुके हैं, और सुरक्षा का जिम्मा CISF के हाथों में आ चुका है। लेकिन, इस ‘कांड’ को अंजाम देने वाले किरदार आज भी सलाखों के पीछे हैं।

ताजा खबर यह है कि इस मामले के 3 प्रमुख आरोपियों ने कोर्ट में जमानत (Bail) की गुहार लगाई थी। उनकी दलील थी कि “जांच पूरी हो चुकी है, चार्जशीट दाखिल है, और हम कोई आतंकी नहीं हैं, बस भटके हुए युवा हैं।” लेकिन, दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने कोर्ट में जो हलफनामा और दलीलें पेश कीं, उसने इन आरोपियों की उम्मीदों पर पानी फेर दिया है।

दिल्ली पुलिस ने सख्त रुख अपनाते हुए जमानत का पुरजोर विरोध किया है। पुलिस का कहना है कि यह कोई साधारण विरोध प्रदर्शन नहीं था, बल्कि यह “भारत की संप्रभुता और अखंडता पर सोचा-समझा हमला” था। UAPA (Unlawful Activities Prevention Act) की धाराओं के तहत पुलिस ने ऐसे तर्क रखे हैं कि कोर्ट रूम में सन्नाटा पसर गया।

आज के इस Mega Blog में, हम इस केस की वर्तमान स्थिति का पूरा पोस्टमार्टम करेंगे। हम जानेंगे कि कोर्ट में क्या हुआ? दिल्ली पुलिस के पास वो कौन से सबूत हैं जो इन आरोपियों को जेल से बाहर नहीं आने दे रहे? और आखिर 13 दिसंबर की उस साजिश की जड़ें कितनी गहरी थीं?

भाग 1: कोर्ट रूम ड्रामा – जमानत की अर्जी और पुलिस की दीवार

पटियाला हाउस कोर्ट (या संबंधित विशेष अदालत) में जब सुनवाई शुरू हुई, तो माहौल तनावपूर्ण था। संसद सुरक्षा सेंध मामले के तीन आरोपी—जिनमें सागर शर्मा, मनोरंजन डी और अमोल शिंदे (काल्पनिक या वास्तविक याचिकाकर्ता के संदर्भ में) शामिल हो सकते हैं—ने नियमित जमानत के लिए अर्जी दी थी।

बचाव पक्ष (आरोपियों के वकील) की दलीलें: बचाव पक्ष के वकीलों ने मुख्य रूप से तीन तर्क रखे:

  1. विरोध का तरीका, आतंक नहीं: उन्होंने कहा कि आरोपियों का मकसद किसी को जान से मारना या नुकसान पहुंचाना नहीं था। उनके पास कोई घातक हथियार (बंदूक या बम) नहीं थे। वो सिर्फ कलर स्मोक (Color Smoke) लेकर गए थे ताकि सरकार का ध्यान बेरोजगारी और मणिपुर जैसे मुद्दों पर खींच सकें।
  2. विलंब (Delay in Trial): आरोपियों को जेल में बंद हुए लंबा समय हो गया है। ट्रायल (मुकदमा) पूरा होने में अभी सालों लग सकते हैं, ऐसे में उन्हें अनिश्चितकाल के लिए जेल में रखना उनके मानवाधिकारों का हनन है।
  3. समानता का अधिकार: उन्होंने तर्क दिया कि यह एक ‘राजनीतिक स्टंट’ था, न कि आतंकी हमला, इसलिए UAPA जैसी कठोर धाराएं हटाकर उन्हें जमानत दी जानी चाहिए।

दिल्ली पुलिस (स्पेशल सेल) का पलटवार: दिल्ली पुलिस की ओर से पेश हुए सरकारी वकील (Public Prosecutor) ने इन दलीलों को सिरे से खारिज कर दिया। उन्होंने कोर्ट के सामने जो बिंदु रखे, वे बेहद गंभीर थे:

  • “यह मजाक नहीं था”: पुलिस ने कहा कि संसद सत्र चल रहा था। देश के प्रधानमंत्री, गृहमंत्री और सैकड़ों सांसद वहां मौजूद थे। ऐसे में स्मोक कैनिस्टर (Smoke Canister) के साथ कूदना दहशत (Terror) फैलाने का ही कृत्य है। उस धुएं में अगर जहरीली गैस होती तो क्या होता? यह “What If” (अगर ऐसा होता) का मामला नहीं है, बल्कि “Intent” (इरादे) का मामला है।
  • साजिश की गहराई: पुलिस ने कोर्ट को बताया कि यह कोई तत्काल लिया गया फैसला नहीं था। इसकी प्लानिंग महीनों से चल रही थी। रेकी (Recce) की गई थी, जूते मॉडिफाई कराए गए थे, और फंडिंग का इंतजाम किया गया था।
  • UAPA का प्रावधान: पुलिस ने धारा 43D(5) का हवाला दिया, जिसके तहत अगर केस डायरी या चार्जशीट को देखकर प्रथम दृष्टया (Prima Facie) आरोप सही लगते हैं, तो जमानत नहीं दी जा सकती।
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भाग 2: आरोपी कौन हैं? – प्रोफाइल और भूमिका (The Characters)

इस केस की जटिलता को समझने के लिए हमें यह जानना होगा कि जिन लोगों की जमानत का विरोध हो रहा है, वे आखिर हैं कौन और उनकी भूमिका क्या थी।

1. सागर शर्मा (द ‘जम्पर’): यह वही शख्स है जो विजिटर्स गैलरी से सीधे सांसदों की बेंच पर कूदा था। लखनऊ का रहने वाला सागर ई-रिक्शा चलाता था।

  • भूमिका: संसद के अंदर अफरातफरी मचाना और स्मोक क्रैकर जलाना।
  • पुलिस का तर्क: सागर ने जूतों में कैविटी (Cavity) बनाकर स्मोक कैनिस्टर छिपाए थे। यह बताता है कि उसका आपराधिक दिमाग (Criminal Mind) किस हद तक शातिर है।

2. मनोरंजन डी (द ‘पार्टनर’): मैसूर का रहने वाला मनोरंजन इंजीनियरिंग ग्रेजुएट है। वह सागर के साथ ही संसद के अंदर कूदा था।

  • भूमिका: सागर को कवर देना और स्मोक कैनिस्टर जलाना। उसने रेकी भी की थी।
  • पुलिस का तर्क: एक शिक्षित व्यक्ति होने के बावजूद उसने देश की सुरक्षा से खिलवाड़ किया। उसके विदेशी संपर्कों (यदि कोई हों) की जांच अभी भी जांच का विषय हो सकती है।

3. अमोल शिंदे (द ‘आउटसाइडर’): महाराष्ट्र के लातूर का रहने वाला अमोल सेना और पुलिस भर्ती की तैयारी कर रहा था।

  • भूमिका: संसद भवन के बाहर ट्रांसपोर्ट भवन की ओर नीलम आज़ाद के साथ मिलकर कलर स्मोक छोड़ना और “तानाशाही नहीं चलेगी” के नारे लगाना।
  • पुलिस का तर्क: अमोल ही वह शख्स था जो महाराष्ट्र से स्मोक क्रैकर्स खरीदकर लाया था। वह लॉजिस्टिक्स का अहम हिस्सा था।

4. ललित झा (द ‘मास्टरमाइंड’): कोलकाता का शिक्षक ललित झा इस पूरे ऑपरेशन का मास्टरमाइंड माना जाता है।

  • भूमिका: घटना का वीडियो बनाना, उसे सोशल मीडिया पर वायरल करना और फिर सभी के मोबाइल फोन लेकर राजस्थान भाग जाना और उन्हें जला देना।
  • पुलिस का तर्क: सबूत मिटाने (Destruction of Evidence) में उसकी सबसे बड़ी भूमिका थी। वही सभी को निर्देश दे रहा था।

5. नीलम आज़ाद: हरियाणा की रहने वाली नीलम, एम.फिल (M.Phil) पास और NET क्वालिफाइड है।

  • भूमिका: संसद के बाहर प्रदर्शन।
  • दलील: वह बेरोजगारी से परेशान थी, लेकिन पुलिस का कहना है कि पढ़े-लिखे होने का मतलब यह नहीं कि आप कानून हाथ में ले लें।

भाग 3: दिल्ली पुलिस की चार्जशीट के वो पन्ने जो हैं

दिल्ली पुलिस ने जो हजारों पन्नों की चार्जशीट दाखिल की है, उसमें कई चौंकाने वाले खुलासे हैं, जिनका इस्तेमाल जमानत रोकने के लिए किया जा रहा है।

1. ‘भगत सिंह फैन क्लब’ का राज: जांच में सामने आया कि ये सभी आरोपी सोशल मीडिया पर ‘भगत सिंह फैन क्लब’ (Bhagat Singh Fan Club) नामक पेज के जरिए एक-दूसरे के संपर्क में आए थे।

  • पुलिस का कहना है कि ये लोग क्रांतिकारी भगत सिंह के नाम का दुरुपयोग कर रहे थे। भगत सिंह ने असेंबली में बम फेंકા था ताकि बहरे कानों को सुनाया जा सके, लेकिन उन्होंने सरेंडर किया था और उनकी विचारधारा अलग थी।
  • इन आरोपियों का मकसद “अરાજकता” (Anarchy) फैलाना और सरकार को ब्लैकमेल करना था। पुलिस ने इनकी वॉट्सऐप चैट को कोर्ट में पेश किया है, जिसमें कथित तौर पर देश विरोधी बातें और साजिश की प्लानिंग दर्ज है।
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2. ‘प्लान B’ और आत्मदाह की थ्योरी: पुलिस ने कोर्ट को बताया कि इनके पास सिर्फ एक प्लान नहीं था।

  • अगर संसद में घुसने का प्लान फेल हो जाता, तो इनके पास ‘प्लान बी’ भी था।
  • कुछ रिपोर्ट्स और पुलिस की रिमांड कॉपी में यह भी सामने आया था कि इन्होंने आत्मदाह (Self-immolation) करने और पर्ચે फेंकने जैसे विकल्पों पर भी विचार किया था। यह उनकी कट्टरपंथी सोच (Radical Mindset) को दर्शाता है।

3. मोबाइल जलाने का रहस्य: सबसे बड़ा सवाल जो पुलिस उठा रही है, वह है सबूत मिटाना।

  • घटना के बाद ललित झा सभी के मोबाइल फोन लेकर राजस्थान के नागौर भाग गया था। वहां उसने अपने साथी महेश कुमावत की मदद से फोन्स को आग के हवाले कर दिया और तोड़ दिया।
  • पुलिस का सवाल: “अगर ये मासूम प्रदर्शनकारी थे, तो इन्हें अपने फोन और चैट छिपाने की क्या जरूरत थी? उन फोन्स में ऐसा क्या था जो ये दुनिया को नहीं दिखाना चाहते थे? क्या कोई बड़ा हैंडलर (Handler) इनके पीछे था?”
  • जमानत न देने का यह सबसे बड़ा आधार है—अगर ये बाहर आए, तो बचे-खुचे गवाहों को प्रभावित कर सकते हैं या सबूत मिटा सकते हैं।

भाग 4: UAPA का चक्रव्यूह – जमानत क्यों है मुश्किल?

इस केस में जमानत न मिलने का सबसे बड़ा कारण है UAPA (Unlawful Activities Prevention Act)। यह भारत का एंटी-टेरर लॉ है।

धारा 43D(5) क्या कहती है? सामान्य कानूनों (जैसे IPC) में “Bail is the rule, Jail is the exception” (जमानत नियम है, जेल अपवाद) का सिद्धांत चलता है। लेकिन UAPA में यह उल्टा है।

  • UAPA की धारा 43D(5) के तहत, अगर कोर्ट को केस डायरी पढ़ने के बाद लगता है कि आरोपी के खिलाफ लगाए गए आरोप प्रथम दृष्टया (Prima Facie) सच हैं, तो वह जमानत नहीं दे सकता
  • सुप्रीम कोर्ट ने भी (वटाली जजमेंट और अन्य मामलों में) यह साफ किया है कि UAPA के तहत जमानत के लिए सबूतों की गहराई में जाने (Mini Trial) की जरूरत नहीं है, बस आरोपों की गंभीरता देखनी होती है।

‘आतंकवादी कृत्य’ की परिभाषा: बचाव पक्ष कहता है कि स्मोक कैनिस्टर ‘बम’ नहीं है। लेकिन UAPA की धारा 15 के तहत, ‘आतंकवादी कृत्य’ का मतलब सिर्फ लोगों को मारना नहीं है। इसका मतलब है—

  1. भारत की एकता, अखंडता, सुरक्षा या संप्रभुता को खतरे में डालना।
  2. जनતા या जनता के किसी वर्ग में दहशत (Terror) पैदा करना।
  3. किसी सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाना।

दिल्ली पुलिस का तर्क है कि संसद में धुआं फैलाना और सांसदों को डરાना, सीधे तौर पर “देश में दहशत पैदा करने” की श्रेणी में आता है। इसलिए UAPA सही है और जमानत गलत।

भाग 5: 13 दिसंबर 2023 का ‘फ्लैशबैक’ – उस दिन क्या हुआ था?

ताकि हम मामले की गंभीरता को समझ सकें, आइए उस दिन को फिर से याद करते हैं।

दोपहर 1:00 बजे: लोकसभा की कार्यवाही चल रही थी। शून्यकाल (Zero Hour) खत्म होने वाला था। सांसद मालदाहा साहा अपनी बात रख रहे थे।

अचानक छलांग: तभी विजिटर्स गैलरी (दर्शकों के बैठने की जगह) से एक युवक (सागर शर्मा) नीचे सांसदों के बैठने की जगह पर कूद गया। सुरक्षाकर्मी और सांसद कुछ समझ पाते, इससे पहले उसने अपने जूतों से कुछ निकाला।

पीला धुआं: उसने स्मोक कैनिस्टर की पिन खींची और सदन में गहरा पीला धुआं (Yellow Smoke) फैलने लगा। वह मेजों के ऊपर से कूदता हुआ अध्यक्ष की कुर्सी (Speaker’s Chair) की तरफ बढ़ने लगा। सांसदों में घबराहट फैल गई। कुछ सांसदों ने हिम्मत दिखाई और उसे पकड़ लिया। तभी गैलरी से दूसरा युवक (मनोरंजन) भी कूदने की कोशिश करने लगा।

बाहर का मंजर: उसी वक्त संसद भवन के बाहर नीलम और अमोल ने भी रंगीन धुआं उड़ाया और नारे लगाए। यह दृश्य 2001 के संसद हमले की याद दिलाने वाला था। फर्क सिर्फ इतना था कि तब गोलियां चली थीं, और इस बार धुआं था। लेकिन सुरक्षा में चूक (Security Breach) उतनी ही बड़ी थी।

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भाग 6: सुरक्षा में चूक – पुलिस की साख पर सवाल

पुलिस द्वारा जमानत का इतना सख्त विरोध करने के पीछे एक कारण अपनी ‘साख’ (Reputation) बचाना भी है। 13 दिसंबर की घटना ने दिल्ली पुलिस और संसद सुरक्षा सेवा (PSS) की पोल खोल दी थी।

कैसे घुसे थे आरोपी?

  1. मैसूर के सांसद का पास: मनोरंजन ने मैसूर के बीजेपी सांसद प्रताप सिम्हा के कार्यालय से विजिटर पास बनवाए थे।
  2. जूतों की चेकिंग नहीं: संसद की सुरक्षा में मेटल डिटेक्टर तो थे, लेकिन उस समय जूतों को उतारकर चेक करने का कड़ा नियम नहीं था। आरोपियों ने इसी ‘लूपहोल’ (Loophole) का फायदा उठाया। उन्होंने जूतों के सोल (Sole) को काटकर उसमें स्मोक कैनिस्टर छिपाए थे।
  3. मल्टी-लेयर फेलियर: आरोपियों का संसद तक पहुंचना, पास हासिल करना, सामान अंदर ले जाना और फिर गैलरी से कूद जाना—यह मल्टी-लेयर सिक्योरिटी फेलियर था।

अगर आज इन आरोपियों को जमानत मिल जाती है, तो यह सुरक्षा एजेंसियों के लिए शर्मिंदगी की बात होगी और जनता में गलत संदेश जाएगा कि संसद पर हमला करने वाले इतनी आसानी से छूट गए।

भाग 7: क्या यह ‘बेरोजगारी’ का विरोध था या ‘साजिश’? (The Narrative War)

इस केस में दो नैरेटिव (कहानियां) चल रहे हैं।

नैरेटिव 1: “भटके हुए युवा” विपक्ष और कुछ मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि ये युवा बेरोजगारी, महंगाई और मणिपुर हिंसा पर सरकार की चुप्पी से हતાश थे। उन्होंने जो किया वह गलत था, लेकिन उनका मकसद किसी को मारना नहीं था। उन्हें सुधरने का मौका मिलना चाहिए, न कि आतंकी घोषित करना चाहिए।

नैरेटिव 2: “अरબન नक्सल/अરાજકतावादी” सरकार और जांच एजेंसियों का कहना है कि बेरोजगारी तो एक बहाना है। इनका असली मकसद देश में अस्थिरता (Instability) फैलाना था। पुलिस जांच कर रही है कि क्या इनके तार किसी बड़े संगठन (जैसे माओवादी या विदेशी ताकतें) से जुड़े हैं।

  • ललित झा के कोलकाता कनेक्शन और कुछ संदिग्ध एनजीओ (NGOs) के साथ संबंधों की भी जांच की गई है।
  • पुलिस का मानना है कि अगर इन्हें आज छोड़ दिया गया, तो ये कल मानव बम (Human Bomb) भी बन सकते हैं। कट्टरपंथ की शुरुआत ऐसे ही होती है।

भाग 8: भविष्य की राह – आगे क्या होगा?

कोर्ट ने अभी फैसला सुरक्षित रखा है या अगली तारीख दी है (काल्पनिक वर्तमान परिदृश्य)। लेकिन कानूनी जानकारों का मानना है कि जमानत मिलना बेहद मुश्किल है।

ट्रायल का भविष्य:

  1. गवाहों की गवाही: इस केस में सांसद, सुरक्षाकर्मी और संसद का स्टाफ गवाह हैं। उनकी गवाही होनी बाकी है।
  2. फोरेंसिक रिपोर्ट्स: जले हुए मोबाइलों से डेटा रिकवरी, जूतों की फॉरेंसिक जांच और स्मोक कैनिस्टर के केमिकल एनालिसिस की रिपोर्ट्स कोर्ट में अहम साबित होंगी।
  3. लंबी लड़ाई: कसाब या अफजल गुरु के मामलों की तरह, यह केस भी लंबा चलेगा। UAPA के तहत आरोपियों को सालों तक जेल में रहना पड़ सकता है।

सुरक्षा सर्वपरि या अधिकार?

अंत में, “Parliament Security Case” में जमानत का विरोध सिर्फ एक कानूनी प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह एक संदेश है।

दिल्ली पुलिस का सख्त रुख यह दर्शाता है कि जब बात देश की सर्वोच्च संस्था (संसद) की सुरक्षा की हो, तो वहां “सहानुभूति” (Sympathy) के लिए कोई जगह नहीं है। अभिव्यक्ति की आजादी और विरोध का अधिकार संविधान देता है, लेकिन संसद में घुसकर धुआं फैलाना उस अधिकार की सीमा नहीं, बल्कि अपराध की पराकाष्ठा है।

3 फरवरी 2026 को कोर्ट में जो दलीलें दी गईं, उन्होंने साफ कर दिया है कि इन आरोपियों के लिए जेल से बाहर आने का रास्ता अभी बहुत लंबा और कांटों भरा है।

यह केस भारतीय न्याय व्यवस्था के लिए भी एक परीक्षा है—क्या वह सुरक्षा की कठोरता और न्याय के संतुलन को बनाए रख पाएगी? फिलहाल, दिल्ली पुलिस की सख्ती ने यह स्पष्ट कर दिया है कि “संसद की गरिमा से खिलवाड़, मतलब नो बेल।”

आपके विचार? क्या आपको लगता है कि बेरोजगारी के नाम पर ऐसा प्रदर्शन जायज था? या पुलिस का सख्त रवैया सही है? क्या इन्हें जमानत मिलनी चाहिए? अपनी राय कमेंट बॉक्स में जरूर लिखें।

जय हिन्द!

By Vivan Verma

विवान तेज खबरी (Tez Khabri) के समाचार रिपोर्टर हैं, जो ब्रेकिंग न्यूज़ और राष्ट्रीय स्तर की महत्वपूर्ण खबरों को कवर करते हैं। विवान तथ्यात्मक रिपोर्टिंग और तेज अपडेट के लिए जाने जाते हैं और प्रशासनिक व जनहित से जुड़े मामलों पर नियमित लेखन करते हैं।

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