Modi Mission South

भारतीय राजनीति के मानचित्र पर यदि नजर दौड़ाई जाए, तो पिछले एक दशक में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने उत्तर, पश्चिम और पूर्वोत्तर भारत में अपनी एक अभेद्य पकड़ बना ली है। गुजरात से लेकर उत्तर प्रदेश तक, और असम से लेकर मध्य प्रदेश तक, ‘कमल’ का फूल लगातार खिलता रहा है। लेकिन, विंध्याचल के उस पार, यानी दक्षिण भारत का दुर्ग, बीजेपी के लिए आज भी एक ऐसी पहेली बना हुआ है जिसे पूरी तरह से सुलझाना बाकी है। अब, जब हम वर्ष 2026 में प्रवेश कर चुके हैं और केरल तथा तमिलनाडु में विधानसभा चुनावों की आहट सुनाई देने लगी है, बीजेपी ने अपने सबसे बड़े रणनीतिकार और सबसे लोकप्रिय चेहरे—प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी—के नेतृत्व में ‘Mission South’ का एक नया और आक्रामक अध्याय शुरू कर दिया है।

केरल और तमिलनाडु, ये दो राज्य न केवल सांस्कृतिक और भाषाई रूप से समृद्ध हैं, बल्कि राजनीतिक रूप से भी ये उत्तर भारत की राजनीति से एकदम अलग ध्रुव पर खड़े हैं। यहाँ की द्रविड़ राजनीति, भाषाई अस्मिता और क्षेत्रीय दलों का वर्चस्व बीजेपी के ‘हिंदुत्व और राष्ट्रवाद’ के मिश्रण के सामने एक मजबूत दीवार बनकर खड़ा रहा है। हालांकि, बीजेपी ने 2024 के लोकसभा चुनावों में केरल में अपना खाता खोलकर और तमिलनाडु में अपने वोट प्रतिशत में भारी इजाफा करके यह संकेत दे दिया था कि हवा का रुख बदल रहा है। लेकिन विधानसभा चुनाव एक अलग खेल होता है। यहाँ मुद्दे स्थानीय होते हैं और मुकाबला सीधा क्षेत्रीय क्षत्रपों से होता है।

इस विस्तृत विश्लेषण में, हम जानेंगे कि आखिर क्यों केरल और तमिलनाडु में बीजेपी की राह इतनी कठिन है, प्रधानमंत्री मोदी की वह कौन सी विशेष रणनीति है जिसके दम पर वे दक्षिण के द्वार खोलना चाहते हैं, और 2026 के विधानसभा चुनावों में ‘मोदी फैक्टर’ किस हद तक प्रभावी साबित हो सकता है।

दक्षिण का दुर्ग और बीजेपी की महत्वाकांक्षा

बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व को यह भली-भांति ज्ञात है कि यदि पार्टी को अखिल भारतीय स्वरूप में स्थापित होना है, तो उसे दक्षिण भारत में केवल उपस्थिति दर्ज कराने से आगे बढ़कर सत्ता का दावेदार बनना होगा। कर्नाटक में बीजेपी का आधार रहा है, और तेलंगाना में उसने अपनी उपस्थिति मजबूत की है, लेकिन केरल और तमिलनाडु ‘हार्ड नट्स’ (कठोर अखरोट) साबित हुए हैं।

‘Mission South’ केवल सीटों की गणित नहीं है; यह एक वैचारिक विस्तार की लड़ाई है। संघ परिवार (RSS) दशकों से इन राज्यों में जमीनी स्तर पर काम कर रहा है। केरल में आरएसएस की शाखाओं की संख्या देश में सबसे अधिक में से एक है, फिर भी यह चुनावी सफलता में पूरी तरह तब्दील नहीं हो पाया है। दूसरी ओर, तमिलनाडु में पेरियार की विचारधारा और द्रविड़ आंदोलन की जड़ें इतनी गहरी हैं कि वहां किसी भी ‘उत्तर भारतीय’ समझी जाने वाली पार्टी के लिए जगह बनाना लोहे के चने चबाने जैसा रहा है।

लेकिन 2026 का परिदृश्य थोड़ा अलग है। प्रधानमंत्री मोदी ने खुद मोर्चा संभाल लिया है। यह अब केवल स्थानीय नेताओं के भरोसे लड़ी जाने वाली लड़ाई नहीं रही। पीएम मोदी का बार-बार दक्षिण का दौरा करना, वहां के मंदिरों में पूजा-अर्चना करना, तमिल संस्कृति और साहित्य (जैसे तिरुक्कुरल) का सम्मान करना, और विकास कार्यों की सौगात देना—यह सब एक सुविचारित दीर्घकालिक रणनीति का हिस्सा है।

Modi Mission South

तमिलनाडु: द्रविड़ राजनीति के गढ़ में सेंधमारी की चुनौती

तमिलनाडु की राजनीति पिछले पांच दशकों से दो ध्रुवों—डीएमके (DMK) और एआईएडीएमके (AIADMK)—के बीच घूमती रही है। करुणानिधि और जयललिता के निधन के बाद वहां की राजनीति में एक शून्यता आई थी, जिसे भरने की कोशिश बीजेपी कर रही है।

1. अन्नामलाई फैक्टर और आक्रामक हिंदुत्व तमिलनाडु में बीजेपी की कमान के. अन्नामलाई के हाथों में है, जो एक पूर्व आईपीएस अधिकारी हैं। उनकी ‘एन मन्न, एन मक्कल’ (मेरी मिट्टी, मेरे लोग) यात्रा ने राज्य के कोने-कोने में बीजेपी की उपस्थिति दर्ज कराई है। अन्नामलाई ने डीएमके सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाते हुए आक्रामक तेवर अपनाए हैं। लेकिन चुनौती यह है कि तमिलनाडु की जनता भावनात्मक रूप से भाषा और तमिल अस्मिता के मुद्दों से जुड़ी है। बीजेपी को अक्सर ‘हिंदी थोपने वाली पार्टी’ के रूप में चित्रित किया जाता है। पीएम मोदी इस धारणा को तोड़ने के लिए ही ‘काशी तमिल संगमम’ और ‘सौराष्ट्र तमिल संगमम’ जैसे आयोजनों के जरिए उत्तर और दक्षिण के सांस्कृतिक मिलन पर जोर दे रहे हैं।

2. सनातन धर्म विवाद और बीजेपी का पलटवार पिछले कुछ वर्षों में तमिलनाडु में ‘सनातन धर्म’ को लेकर काफी विवाद हुआ। डीएमके नेताओं की टिप्पणियों ने बीजेपी को एक बड़ा हथियार दे दिया। प्रधानमंत्री मोदी ने इसे राष्ट्रीय स्तर पर उठाकर यह संदेश देने की कोशिश की है कि द्रविड़ पार्टियां भारतीय संस्कृति और परंपराओं की विरोधी हैं। बीजेपी की कोशिश है कि तमिलनाडु की धार्मिक जनता, जो मंदिरों और परंपराओं में गहरी आस्था रखती है, उसे डीएमके की नास्तिकतावादी राजनीति के खिलाफ खड़ा किया जाए।

3. गठबंधन की पहेली 2026 के विधानसभा चुनावों के लिए गठबंधन एक बड़ी चुनौती है। एआईएडीएमके के साथ बीजेपी के रिश्तों में खटास आ चुकी है। ऐसे में बीजेपी के पास दो रास्ते हैं—या तो वह छोटी पार्टियों के साथ मिलकर तीसरा मोर्चा बनाए या फिर अपनी ताकत इतनी बढ़ा ले कि एआईएडीएमके को वापस साथ आने पर मजबूर होना पड़े। पीएम मोदी की रैलियों का उद्देश्य बीजेपी के वोट शेयर को उस स्तर तक ले जाना है जहां वह ‘किंगमेकर’ की भूमिका निभा सके।

केरल: विचारधाराओं का खूनी संघर्ष और विकास की उम्मीद

केरल की स्थिति तमिलनाडु से भिन्न है। यहाँ की जनसांख्यिकी (Demography) बीजेपी के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। राज्य में लगभग 45% आबादी अल्पसंख्यक समुदायों (मुस्लिम और ईसाई) की है। बीजेपी की कोर हिंदुत्व की राजनीति यहाँ एक सीमा के बाद आगे नहीं बढ़ पाती।

1. ईसाई समुदाय तक पहुंच: एक रणनीतिक बदलाव प्रधानमंत्री मोदी और बीजेपी के रणनीतिकारों ने यह समझ लिया है कि केरल में केवल हिंदू वोटों के एकीकरण से सत्ता नहीं मिल सकती। इसलिए, पिछले कुछ समय में बीजेपी ने ईसाई समुदाय तक अपनी पहुंच बढ़ाई है। पादरियों से मुलाकात, ईसाई शिक्षण संस्थानों के साथ संवाद और ‘स्नेह यात्रा’ जैसे कार्यक्रमों के जरिए पार्टी यह संदेश देने की कोशिश कर रही है कि वह अल्पसंख्यकों की विरोधी नहीं है। प्रधानमंत्री मोदी ने खुद वेटिकन में पोप से मुलाकात की थी, जिसका केरल के ईसाई समुदाय में सकारात्मक संदेश गया। 2024 में त्रिशूर से बीजेपी की जीत ने साबित किया कि ईसाइयों का एक वर्ग बीजेपी को वोट देने के लिए तैयार है।

2. एलडीएफ और यूडीएफ का विकल्प केरल की राजनीति दशकों से एलडीएफ (लेफ्ट) और यूडीएफ (कांग्रेस) के बीच झूलती रही है। जनता एक बार लेफ्ट को चुनती है, अगली बार कांग्रेस को। लेकिन पिछले कुछ सालों में पिनाराई विजयन की सरकार के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर (Anti-incumbency) और कांग्रेस के प्रति घटते विश्वास ने बीजेपी के लिए एक शून्य पैदा किया है। पीएम मोदी अपनी रैलियों में इसी बात पर जोर दे रहे हैं कि केरल के विकास के लिए ‘डबल इंजन’ की सरकार जरूरी है। वे बार-बार कहते हैं कि केरल के युवाओं को रोजगार के लिए बाहर जाना पड़ता है क्योंकि राज्य में उद्योगों के लिए अनुकूल माहौल नहीं है।

3. सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और सबरीमाला केरल में सबरीमाला मुद्दा बीजेपी के लिए एक भावनात्मक बिंदु रहा है। पार्टी खुद को अयप्पा भक्तों के रक्षक के रूप में पेश करती है। प्रधानमंत्री मोदी जब केरल जाते हैं, तो वे वहां के प्रसिद्ध मंदिरों (जैसे गुरुवायूर) में दर्शन करते हैं और पारंपरिक परिधान (मुंडू) पहनते हैं। यह प्रतीकात्मकता केरल के हिंदू मतदाताओं को यह एहसास दिलाने के लिए है कि मोदी उनकी संस्कृति का सम्मान करते हैं और वे ‘बाहरी’ नहीं हैं।

प्रधानमंत्री मोदी की रणनीति: ‘विकास भी, विरासत भी’

केरल और तमिलनाडु में बीजेपी की कठिन राह को आसान बनाने के लिए पीएम मोदी ने एक बहुआयामी रणनीति अपनाई है, जिसे ‘विकास भी, विरासत भी’ के मंत्र से समझा जा सकता है।

1. इंफ्रास्ट्रक्चर और विकास की गारंटी प्रधानमंत्री मोदी जानते हैं कि दक्षिण भारत की जनता शिक्षित और जागरूक है। वहां केवल भावनात्मक मुद्दों से काम नहीं चलेगा। इसलिए, केंद्र सरकार ने पिछले कुछ वर्षों में दक्षिण भारत में इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स की झड़ी लगा दी है। वंदे भारत ट्रेनों की शुरुआत, नए हवाई अड्डों का निर्माण, डिफेंस कॉरिडोर (तमिलनाडु में) और बंदरगाहों का आधुनिकीकरण—ये सब पीएम मोदी की ‘विकास की राजनीति’ के प्रमाण हैं। वे अपनी हर रैली में आंकड़ों के साथ यह बताते हैं कि केंद्र सरकार ने यूपीए सरकार की तुलना में दक्षिण को कितना अधिक फंड दिया है। यह उस नैरेटिव को काटने की कोशिश है जिसमें कहा जाता है कि केंद्र दक्षिण के साथ भेदभाव करता है।

2. तमिल अस्मिता का सम्मान: सेंगोल की स्थापना नई संसद भवन में ‘सेंगोल’ (राजदंड) की स्थापना पीएम मोदी का एक मास्टरस्ट्रोक था। यह चोल साम्राज्य की परंपरा से जुड़ा हुआ है। इसे संसद में स्थापित करके और तमिल अधीनम (संतों) को सम्मान देकर पीएम मोदी ने तमिल जनता के दिलों को छूने की कोशिश की। उन्होंने यह संदेश दिया कि तमिल संस्कृति केवल तमिलनाडु तक सीमित नहीं है, बल्कि वह भारत की राष्ट्रीय पहचान का हिस्सा है। यह डीएमके के उस प्रचार की काट थी जिसमें वे बीजेपी को तमिल विरोधी बताते हैं।

3. भ्रष्टाचार और परिवारवाद पर प्रहार चाहे तमिलनाडु में डीएमके हो या केरल में लेफ्ट और कांग्रेस, पीएम मोदी इन सभी पर भ्रष्टाचार और परिवारवाद का आरोप लगाते हैं। तमिलनाडु में ‘जी-स्क्वायर’ जैसे मुद्दों और मंत्री सेंथिल बालाजी की गिरफ्तारी को बीजेपी ने बड़ा मुद्दा बनाया है। केरल में सोना तस्करी घोटाला और सहकारी बैंकों में घोटाले को लेकर पीएम मोदी राज्य सरकार को घेरते हैं। वे जनता को यह समझाने की कोशिश कर रहे हैं कि ये पार्टियां केवल अपने परिवारों और कैडर का भला करती हैं, जबकि बीजेपी ‘सबका साथ, सबका विकास’ में विश्वास करती है।

4. स्थानीय नायकों को सम्मान बीजेपी ने दक्षिण भारत के उन स्वतंत्रता सेनानियों और ऐतिहासिक नायकों को राष्ट्रीय पटल पर लाया है जिन्हें पहले के इतिहास में कम जगह मिली थी। वी.ओ. चिदंबरम पिल्लई, रानी वेलु नचियार और पसलुमपोन मुथुरामलिंगम थेवर जैसे महापुरुषों की जयंतियों को मनाना बीजेपी की रणनीति का हिस्सा है। इससे वे स्थानीय समुदायों (जैसे थेवर समुदाय) के साथ भावनात्मक जुड़ाव बना रहे हैं।

2026 विधानसभा चुनाव: लिटमस टेस्ट

वर्ष 2026 बीजेपी के ‘Mission South’ के लिए एक लिटमस टेस्ट साबित होने वाला है। केरल और तमिलनाडु, दोनों जगह विधानसभा चुनाव होने हैं (तमिलनाडु में 2026 में ही संभावित हैं)। यह वह समय है जब पीएम मोदी की लोकप्रियता और अमित शाह की रणनीति की असली परीक्षा होगी।

कठिनाइयां अब भी बरकरार हैं:

  1. भाषा की दीवार: हिंदी पट्टी की पार्टी होने का ठप्पा अब भी बीजेपी के लिए एक बड़ी बाधा है। पीएम मोदी के भाषणों का अनुवाद करना पड़ता है, जिससे सीधा संवाद (Connect) कभी-कभी कमजोर हो जाता है। हालांकि, एआई (AI) तकनीक का इस्तेमाल करके अब भाषणों का रियल-टाइम अनुवाद तमिल और मलयालम में सुनाया जा रहा है, जो एक अनूठा प्रयोग है।
  2. काडर की कमजोरी: आरएसएस का नेटवर्क मजबूत होने के बावजूद, बूथ स्तर पर बीजेपी का काडर डीएमके या लेफ्ट के मुकाबले कमजोर है। चुनाव जीतने के लिए केवल हवा नहीं, बल्कि बूथ प्रबंधन भी जरूरी है।
  3. मजबूत क्षेत्रीय नेतृत्व का अभाव: तमिलनाडु में अन्नामलाई एक मजबूत चेहरा बनकर उभरे हैं, लेकिन केरल में बीजेपी के पास अभी भी पिनाराई विजयन या के. करुणाकरण जैसा कोई कद्दावर जननेता नहीं है जो पूरे राज्य में स्वीकार्य हो। सुरेश गोपी की जीत ने एक उम्मीद जगाई है, लेकिन उन्हें पूरे राज्य का नेता बनने में समय लगेगा।
  4. गठबंधन की अनुपस्थिति: तमिलनाडु में बिना एआईएडीएमके के और केरल में बिना किसी बड़े क्षेत्रीय दल के, बीजेपी को अकेले दम पर बड़ी सफलता मिलना गणितीय रूप से कठिन है। त्रिकोणीय मुकाबलों में अक्सर क्षेत्रीय दलों को ही फायदा होता है।
Modi Mission South

पीएम मोदी का व्यक्तिगत ‘टच’

पीएम मोदी की कार्यशैली रही है कि वे चुनौतियों को व्यक्तिगत रूप से स्वीकार करते हैं। दक्षिण भारत में उनकी बढ़ती रैलियां, रोड शो और जनसभाएं यह बताती हैं कि वे हार मानने वाले नहीं हैं।

  • वे जब इसरो (ISRO) के वैज्ञानिकों से मिलते हैं, तो दक्षिण के विज्ञान प्रेमियों को साधते हैं।
  • वे जब कांची कामकोटि पीठ या गुरुवायूर मंदिर जाते हैं, तो पारंपरिक हिंदुओं को साधते हैं।
  • वे जब मछुआरों (कच्चातिवु द्वीप मुद्दा) की बात करते हैं, तो तटीय वोट बैंक को साधते हैं।

पीएम मोदी ने ‘कच्चातिवु द्वीप’ के मुद्दे को उठाकर कांग्रेस और डीएमके दोनों को घेरा था। यह मुद्दा तमिलनाडु के मछुआरों के लिए भावनात्मक है। पीएम मोदी यह साबित करना चाहते हैं कि द्रविड़ पार्टियां केवल तमिल हितों की बात करती हैं, लेकिन असल में उन्होंने तमिल हितों के साथ समझौता किया है।

निष्कर्ष: राह कठिन है, लेकिन नामुमकिन नहीं

केरल और तमिलनाडु में बीजेपी के लिए राह निश्चित रूप से कठिन है। यह रातों-रात होने वाला परिवर्तन नहीं है। लेकिन पीएम मोदी के नेतृत्व में बीजेपी ने जो आक्रामकता और निरंतरता दिखाई है, वह अभूतपूर्व है। राजनीति में कोई भी किला अभेद्य नहीं होता। पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा में लेफ्ट के दशकों पुराने किले को ढहाकर बीजेपी ने यह साबित किया है कि वह धैर्य के साथ काम करती है और सही समय पर चोट करती है।

‘Mission South’ केवल सत्ता प्राप्ति का मिशन नहीं है, यह भारत के राजनीतिक एकीकरण का मिशन है। बीजेपी चाहती है कि उसका झंडा कन्याकुमारी से लेकर कश्मीर तक लहराए। 2026 के विधानसभा चुनावों में भले ही बीजेपी सरकार न बना पाए (जो कि एक यथार्थवादी आकलन है), लेकिन अगर वह मुख्य विपक्ष की भूमिका में आ जाती है या गठबंधन सरकारों में निर्णायक भूमिका निभाती है, तो यह पीएम मोदी की बहुत बड़ी जीत होगी।

दक्षिण की जनता बदलाव चाहती है, लेकिन क्या वह बदलाव के रूप में बीजेपी को स्वीकार करेगी? यह सवाल भविष्य के गर्भ में है। लेकिन इतना तय है कि प्रधानमंत्री मोदी खुद मोर्चा संभाले हुए हैं, और जब सेनापति खुद मैदान में हो, तो लड़ाई दिलचस्प होनी तय है। बीजेपी ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है, अब फैसला जनता जनार्दन को करना है। क्या ‘कमल’ द्रविड़ भूमि और भगवान के अपने देश (God’s Own Country) में अपनी जड़ें जमा पाएगा? यह भारतीय लोकतंत्र की सबसे रोमांचक गाथाओं में से एक होगी।

सांस्कृतिक पुनर्जागरण और दक्षिण: मोदी का विजन

पीएम मोदी के ‘Mission South’ का एक महत्वपूर्ण पहलू सांस्कृतिक पुनर्जागरण है। वे जानते हैं कि दक्षिण भारत की आत्मा उसकी संस्कृति में बसती है। इसलिए, उन्होंने राजनीति को संस्कृति के साथ जोड़ा है। ‘काशी-तमिल संगमम’ इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। हजारों तमिल लोग काशी आए, वहां उन्होंने देखा कि कैसे काशी और कांची का संबंध सदियों पुराना है। इससे उत्तर और दक्षिण के बीच की जो मानसिक दूरी थी, वह कम हुई है।

केरल में, नारायण गुरु और अय्यंकली जैसे समाज सुधारकों के सम्मान में कार्यक्रम आयोजित करके बीजेपी ने यह संदेश दिया है कि वह केरल के सामाजिक ताने-बाने को समझती है। पीएम मोदी ने बार-बार कहा है कि बीजेपी केरल की जनसांख्यिकी को बदलने नहीं, बल्कि केरल को उसका खोया हुआ गौरव वापस दिलाने आई है।

महिला वोटर्स: साइलेंट गेमचेंजर

केरल और तमिलनाडु में महिलाएं पारंपरिक रूप से बहुत सक्रिय मतदाता रही हैं। पीएम मोदी की योजनाएं जैसे उज्ज्वला योजना, लखपति दीदी, और महिला आरक्षण बिल (नारी शक्ति वंदन अधिनियम) का प्रभाव दक्षिण की महिलाओं पर भी पड़ रहा है। केरल में ईसाई महिलाओं और तमिलनाडु में ग्रामीण महिलाओं के बीच पीएम मोदी की एक अलग छवि बनी है। अगर यह ‘साइलेंट वोटर’ वर्ग बीजेपी की तरफ मुड़ता है, तो सारे चुनावी समीकरण ध्वस्त हो सकते हैं।

सोशल इंजीनियरिंग: जातिगत समीकरणों को साधना

तमिलनाडु में बीजेपी गैर-ब्राह्मण जातियों, विशेषकर ओबीसी (OBC) और दलित समुदायों के बीच अपनी पैठ बना रही है। अन्नामलाई खुद ओबीसी समुदाय से आते हैं। देवेंद्र कुला वेल्लालर समुदाय की मांग को पूरा करना हो या अरुंथथियार समुदाय को आरक्षण में कोटा देना, बीजेपी सूक्ष्म स्तर पर सोशल इंजीनियरिंग कर रही है। केरल में, ईझावा समुदाय (जो परंपरागत रूप से लेफ्ट का वोट बैंक रहा है) और नायर समुदाय (एनएसएस) को एक साथ लाने की कोशिश की जा रही है। यह सोशल इंजीनियरिंग अगर सफल होती है, तो बीजेपी का वोट शेयर 20% के पार जा सकता है, जो सीटों में तब्दील होने के लिए जरूरी है।

मीडिया और डिजिटल वॉर

दक्षिण भारत में मीडिया की भूमिका बहुत सशक्त है। वहां के न्यूज चैनल्स और यूट्यूबर्स ओपिनियन बनाने में बड़ी भूमिका निभाते हैं। बीजेपी ने अपनी आईटी सेल और सोशल मीडिया टीम को दक्षिण की भाषाओं में सक्रिय कर दिया है। पीएम मोदी के भाषणों के छोटे-छोटे क्लिप्स, जिनमें वे दक्षिण के विकास की बात करते हैं, व्हाट्सएप के जरिए गांव-गांव तक पहुंचाए जा रहे हैं। विपक्ष के दुष्प्रचार का जवाब अब तथ्यों और आंकड़ों के साथ दिया जा रहा है।

अंततः

राजनीति संभावनाओं का खेल है। एक समय था जब त्रिपुरा में बीजेपी का वोट शेयर 2% से भी कम था, लेकिन आज वहां बीजेपी की सरकार है। केरल और तमिलनाडु में भी बीजेपी उसी “त्रिपुरा मॉडल” को दोहराना चाहती है—यानी निरंतर संघर्ष, संगठन का विस्तार और एक मजबूत नेतृत्व। पीएम मोदी का ‘Mission South’ एक मैराथन दौड़ है, स्प्रिंट नहीं। 2026 के चुनाव इस मैराथन का एक महत्वपूर्ण पड़ाव हैं। परिणाम चाहे जो भी हो, दक्षिण की राजनीति में अब बीजेपी को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। ‘मोदी का जादू’ उत्तर में तो सिर चढ़कर बोला है, अब देखना है कि नीलगिरी की पहाड़ियों और अरब सागर के तटों पर यह जादू किस तरह अपना असर दिखाता है।

मोदी के ‘Mission South’ के प्रमुख स्तंभ

इस ब्लॉग को और अधिक गहराई देने के लिए, आइए उन 5 प्रमुख स्तंभों पर संक्षेप में चर्चा करते हैं जिन पर पीएम मोदी का पूरा अभियान टिका हुआ है:

  1. सांस्कृतिक एकीकरण: उत्तर-दक्षिण के बीच की खाई को पाटना। सेंगोल, तमिल संगमम और स्थानीय भाषाओं का सम्मान इसके उदाहरण हैं।
  2. विकास का एजेंडा: भावनात्मक राजनीति के बजाय इंफ्रास्ट्रक्चर, स्टार्टअप्स और डिजिटल इंडिया के फायदों को दक्षिण के युवाओं तक पहुंचाना।
  3. भ्रष्टाचार मुक्त शासन: डीएमके और लेफ्ट सरकारों के भ्रष्टाचार को उजागर करना और बीजेपी के ‘गुड गवर्नेंस’ मॉडल को विकल्प के रूप में पेश करना।
  4. सबका साथ, सबका विकास: अल्पसंख्यकों, विशेषकर केरल के ईशाइयों के बीच के डर को दूर करना और उन्हें विकास यात्रा में शामिल करना।
  5. मजबूत नेतृत्व: क्षेत्रीय दलों के वंशवादी नेतृत्व के सामने पीएम मोदी का निर्णायक और मजबूत नेतृत्व।

इन पांचों उंगलियों को मिलाकर जो मुट्ठी बनती है, उसी से पीएम मोदी दक्षिण के बंद दरवाजे पर दस्तक दे रहे हैं। और जैसा कि इतिहास गवाह है, जब मोदी किसी मिशन पर निकलते हैं, तो वे उसे अंजाम तक पहुंचाकर ही दम लेते हैं। केरल और तमिलनाडु की कठिन राह शायद उतनी कठिन न रहे, जितनी आज दिखाई दे रही है।

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