Amravati Municipal Election

महाराष्ट्र की राजनीति में अमरावती (Amravati) हमेशा से एक केंद्र बिंदु रहा है, लेकिन आज यह जिला एक ऐसे सियासी भूचाल का गवाह बन रहा है जिसने भारतीय जनता पार्टी (BJP) के शीर्ष नेतृत्व की नींद उड़ा दी है। अमरावती नगर निगम चुनाव (Amravati Municipal Corporation Election 2026) के लिए टिकट बंटवारे को लेकर असंतोष इतना बढ़ गया है कि पार्टी के वफादार कार्यकर्ताओं ने खुला विद्रोह कर दिया है।

ताजा ब्रेकिंग न्यूज़ के अनुसार, अमरावती में 22 प्रमुख बीजेपी उम्मीदवारों और पदाधिकारियों ने सामूहिक रूप से बगावत कर दी है। इन बागियों का निशाना पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व नहीं, बल्कि अमरावती की पूर्व सांसद और फायरब्रैंड नेता नवनीत राणा (Navneet Rana) और उनके पति विधायक रवि राणा हैं।

आरोप है कि नवनीत राणा ने बीजेपी के निष्ठावान कार्यकर्ताओं की अनदेखी करके अपने निजी समर्थकों और ‘युवा स्वाभिमान पार्टी’ के कार्यकर्ताओं को बीजेपी के चुनाव चिन्ह (कमल) पर टिकट दिलवाए हैं। इस “पैराशूट लैंडिंग” से नाराज होकर स्थानीय बीजेपी कैडर ने अब आर-पार की लड़ाई का ऐलान कर दिया है।

भाग 1: बगावत का बिगुल – आखिर क्या हुआ अमरावती में?

अमरावती नगर निगम चुनाव बीजेपी के लिए प्रतिष्ठा का सवाल है। विदर्भ क्षेत्र में अपनी पकड़ मजबूत रखने के लिए यह चुनाव जीतना अनिवार्य है। लेकिन नामांकन वापसी के आखिरी दिनों में जो ड्रामा हुआ, उसने पार्टी की अनुशासन वाली छवि को तार-तार कर दिया है।

22 बागियों का सामूहिक इस्तीफा?

बीजेपी के जिला कार्यालय पर कल भारी हंगामा हुआ। शहर के अलग-अलग वार्डों से टिकट की दावेदारी कर रहे 22 वरिष्ठ कार्यकर्ताओं ने आरोप लगाया कि “पार्टी ने हमें धोखा दिया है।”

  • इन नेताओं का कहना है कि उन्होंने दशकों से पार्टी के लिए दरी उठाई, झंडे लगाए और बूथ मैनेजमेंट किया।
  • लेकिन जब टिकट देने की बारी आई, तो नवनीत राणा और रवि राणा की सिफारिश पर बाहरी लोगों को टिकट दे दिया गया।
  • नाराज नेताओं ने चेतावनी दी है कि वे अब निर्दलीय (Independent) चुनाव लड़ेंगे और बीजेपी के आधिकारिक उम्मीदवारों को हराएंगे।
Amravati Municipal Election

“कमल हमारा, उम्मीदवार राणा का?”

बागियों का सबसे बड़ा आरोप यह है कि अमरावती में बीजेपी का ‘कमल’ निशान हाईजैक हो गया है। एक नाराज बागी उम्मीदवार ने मीडिया से कहा:

“हम मोदी जी और फडणवीस जी के सिपाही हैं, लेकिन हम राणा दंपति के गुलाम नहीं हैं। टिकट उन्हें मिले हैं जो कल तक हमारे खिलाफ काम करते थे, बस इसलिए क्योंकि वे राणा के करीबी हैं। हम यह अन्याय नहीं सहेंगे।”

भाग 2: विवाद के केंद्र में नवनीत राणा – ‘किंगमेकर’ या ‘मुसीबत’?

नवनीत राणा, जो अपनी तेजतर्रार बयानबाजी और ‘हनुमान चालीसा’ विवाद के लिए पूरे देश में मशहूर हैं, एक बार फिर विवादों के केंद्र में हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी के टिकट पर लड़ने (और हारने के बावजूद) उनका कद पार्टी में कम नहीं हुआ है।

राणा दंपति का प्रभाव

नवनीत राणा और उनके पति रवि राणा (जो बडनेरा से विधायक हैं) का अमरावती की स्थानीय राजनीति में अपना एक अलग वोट बैंक है। उनकी अपनी पार्टी ‘युवा स्वाभिमान पार्टी’ का अच्छा खासा कैडर है।

  • बीजेपी की रणनीति: बीजेपी को लगता है कि अमरावती में जीत हासिल करने के लिए राणा दंपति का साथ जरूरी है। इसीलिए निगम चुनाव में टिकट बंटवारे की कमान परोक्ष रूप से उन्हें सौंप दी गई।
  • टकराव का कारण: यही रणनीति स्थानीय ‘ओरिजिनल बीजेपी’ (Original BJP) नेताओं को रास नहीं आ रही। वे इसे “पार्टी का राणा-करण” मान रहे हैं।

नवनीत राणा पर विशिष्ट आरोप

बागियों ने नवनीत राणा पर निम्नलिखित गंभीर आरोप लगाए हैं:

  1. भाई-भतीजावाद: आरोप है कि जिन वार्डों में बीजेपी के मजबूत दावेदार थे, वहां राणा ने अपने रिश्तेदारों या निजी सहायकों को टिकट दिलवाया।
  2. पैसे का खेल: दबी जुबान में कुछ कार्यकर्ताओं ने टिकट बेचने (Ticket for Money) के भी गंभीर आरोप लगाए हैं, हालांकि इसकी कोई पुष्टि नहीं हुई है।
  3. पुराने कार्यकर्ताओं का अपमान: बागियों का कहना है कि चुनाव प्रचार समितियों में भी पुराने बीजेपी नेताओं को दरकिनार कर दिया गया है।

भाग 3: बीजेपी का ‘धर्मसंकट’ – निष्ठावान बनाम जिताऊ उम्मीदवार

इस बगावत ने बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष चंद्रशेखर बावनकुले और उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को मुश्किल में डाल दिया है। वे एक अजीब धर्मसंकट (Dilemma) में फंस गए हैं।

एक तरफ कुआं, दूसरी तरफ खाई

  • अगर राणा का साथ छोड़ते हैं: तो रवि राणा का गुट अलग हो सकता है, जिससे दलित और ओबीसी वोट बैंक का नुकसान होगा। अमरावती में राणा दंपति का ग्राउंड नेटवर्क बहुत मजबूत है।
  • अगर बागियों को नहीं मनाते: तो 22 वार्डों में बीजेपी का वोट कटेगा। निर्दलीय उम्मीदवार बीजेपी का ही वोट काटेंगे, जिससे कांग्रेस या एमवीए (महाविकास अघाड़ी) को सीधा फायदा होगा।

डैमेज कंट्रोल की कोशिशें

सूत्रों के मुताबिक, नागपुर (संघ मुख्यालय) से भी इस मामले में हस्तक्षेप किया गया है। देवेंद्र फडणवीस ने नाराज नेताओं को मनाने के लिए एक स्पेशल टीम अमरावती भेजी है। उन्हें बोर्ड, कमेटियों या भविष्य में अन्य पद देने का लालच दिया जा रहा है, लेकिन बागी इस बार “मान-सम्मान” की लड़ाई बताकर पीछे हटने को तैयार नहीं हैं।

भाग 4: अमरावती का सियासी गणित और जातिगत समीकरण

अमरावती की राजनीति को समझे बिना इस बगावत के असर को नहीं समझा जा सकता। यह विदर्भ का एक प्रमुख शहर है जहाँ दलित, मुस्लिम और ओबीसी मतदाता निर्णायक भूमिका में हैं।

  • दलित वोट बैंक: नवनीत राणा (जो खुद को अनुसूचित जाति का बताती रही हैं, हालांकि यह भी विवाद का विषय रहा है) का दलित मतदाताओं, विशेषकर युवाओं में प्रभाव है।
  • ओबीसी और मराठा: स्थानीय बीजेपी कैडर में ओबीसी और मराठा समुदाय की पकड़ है। राणा को ज्यादा महत्व देने से ये समुदाय नाराज हो सकते हैं।
  • मुस्लिम फैक्टर: अमरावती में मुस्लिम आबादी भी अच्छी खासी है, जो परंपरागत रूप से कांग्रेस या AIMIM की तरफ झुकती है। बीजेपी की आपसी फूट का सीधा फायदा इन दलों को होगा।
Amravati Municipal Election

वार्डों का गणित

अमरावती नगर निगम में कुल सीटों में से अगर 22 सीटों पर बीजेपी के बागी खड़े हो जाते हैं, तो बहुमत का आंकड़ा छूना बीजेपी के लिए असंभव हो जाएगा। यह सीधा-सीधा मेयर पद को विपक्ष की झोली में डालने जैसा है।

भाग 5: विपक्ष की बाछें खिलीं – कांग्रेस और उद्धव गुट का वार

“घर का भेदी लंका ढाए” – यह कहावत अमरावती में चरितार्थ हो रही है। बीजेपी की इस अंदरूनी कलह से महाविकास अघाड़ी (MVA) में जश्न का माहौल है।

कांग्रेस की प्रतिक्रिया

अमरावती की विधायक और कांग्रेस नेता सुलभा खोडके (या यशोमति ठाकुर) ने इस पर तंज कसते हुए कहा:

“बीजेपी एक अनुशासित पार्टी होने का ढोंग करती है, लेकिन असल में वहां सत्ता की मलाई खाने के लिए लड़ाई चल रही है। नवनीत राणा ने बीजेपी को अंदर से खोखला कर दिया है। अमरावती की जनता देख रही है कि कैसे निष्ठावानों को कुचला जा रहा है।”

बच्चू कडू का फैक्टर

प्रहार जनशक्ति पार्टी के प्रमुख बच्चू कडू (Bachchu Kadu), जिनका अमरावती जिले में बड़ा प्रभाव है और जो राणा दंपति के कट्टर विरोधी माने जाते हैं, वे इस आग में घी डालने का काम कर रहे हैं। खबर है कि बच्चू कडू बीजेपी के इन बागी उम्मीदवारों को अपना समर्थन दे सकते हैं। अगर ऐसा हुआ, तो ‘बागी + प्रहार’ का समीकरण बीजेपी को तीसरे नंबर पर धकेल सकता है।

भाग 6: क्या यह महाराष्ट्र बीजेपी में बड़े विद्रोह की आहट है?

राजनीतिक विश्लेषक इसे केवल अमरावती तक सीमित घटना नहीं मान रहे। यह महाराष्ट्र बीजेपी के अंदर चल रहे बड़े असंतोष का एक लक्षण (Symptom) है।

‘इंपोर्टेड’ नेताओं से नाराजगी

पूरे महाराष्ट्र में बीजेपी के पुराने कार्यकर्ताओं में यह गुस्सा है कि पार्टी दूसरी पार्टियों (एनसीपी, शिवसेना-शिंदे, या निर्दलीय) से आए नेताओं को ज्यादा भाव दे रही है।

  • चाहे वह अजित पवार का साथ हो या अशोक चव्हाण जैसे नेताओं का।
  • जमीनी कार्यकर्ता, जिसने 2014 से पहले के कठिन दौर में पार्टी का काम किया, वह आज खुद को उपेक्षित महसूस कर रहा है।
  • अमरावती की घटना इस गुस्से का ‘विस्फोट’ है।

अगर अमरावती में बागियों को सफलता मिलती है, तो यह ट्रेंड नासिक, पुणे और औरंगाबाद (संभाजीनगर) के आगामी निगम चुनावों में भी देखने को मिल सकता है।

भाग 7: नवनीत राणा का भविष्य

इस बगावत का सीधा असर नवनीत राणा के राजनीतिक भविष्य पर भी पड़ेगा।

  • अगर उनके द्वारा चुने गए उम्मीदवार जीतते हैं, तो उनका कद और बढ़ जाएगा और वे बीजेपी पर और हावी हो जाएंगी।
  • लेकिन अगर बीजेपी यह चुनाव हारती है, तो इसका पूरा ठीकरा नवनीत राणा के सिर फूटेगा। स्थानीय बीजेपी नेता, जो अभी दबे स्वर में विरोध कर रहे हैं, तब खुलकर उनके खिलाफ मोर्चा खोल देंगे। शायद बीजेपी को उनसे किनारा भी करना पड़ जाए।

यह चुनाव नवनीत राणा के लिए ‘लिटमस टेस्ट’ है।

भाग 8: बागियों की रणनीति – ‘नमो मंच’ का गठन?

खबर यह भी आ रही है कि ये 22 बागी उम्मीदवार एक अलग मंच बनाकर चुनाव लड़ सकते हैं। उन्होंने इसे ‘अमरावती स्वाभिमान मंच’ या ‘अटल विचार मंच’ जैसा नाम देने का विचार किया है। उनका प्रचार अभियान यह होगा: “हम असली बीजेपी हैं, हमें वोट दें ताकि हम पार्टी को हाईजैकर्स से बचा सकें।” वे अपने प्रचार बैनरों पर मोदी जी और अटल जी की तस्वीरें लगाएंगे, लेकिन चुनाव चिन्ह अलग होगा (जैसे कप-प्लेट, बल्ला, आदि)। यह रणनीति मतदाताओं को भ्रमित करने के लिए काफी है।

भाग 9: सोशल मीडिया वॉर

अमरावती के स्थानीय सोशल मीडिया ग्रुप्स (WhatsApp और Facebook) पर वार-पलटवार शुरू हो गया है।

  • राणा समर्थक: वे पोस्ट कर रहे हैं कि “जीतने की क्षमता (Winnability) ही टिकट का आधार है, और पुराने नेता अब थक चुके हैं।”
  • बागी समर्थक: वे “आयातित नेता हटाओ, बीजेपी बचाओ” (#SaveAmravatiBJP) जैसे हैशटैग ट्रेंड करा रहे हैं। वायरल ऑडियो क्लिप्स में कथित तौर पर राणा समर्थकों द्वारा धमकाने की बातें सामने आ रही हैं।

साख की लड़ाई

अमरावती नगर निगम का यह चुनाव अब सिर्फ एक निकाय चुनाव नहीं रहा, यह ‘वर्चस्व की लड़ाई’ (Battle of Supremacy) बन गया है।

एक तरफ नवनीत राणा हैं जो खुद को विदर्भ की सबसे बड़ी नेता के रूप में स्थापित करना चाहती हैं। दूसरी तरफ बीजेपी का वो मूल कैडर है जो अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है। और इन सबके बीच फंसा है बीजेपी का केंद्रीय नेतृत्व, जिसे “सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे” वाली रणनीति अपनानी पड़ रही है।

आने वाले 48 घंटे बेहद अहम हैं। क्या फडणवीस का जादू बागियों को मना पाएगा? या अमरावती बीजेपी के हाथ से निकलकर एक नई सियासी कहानी लिखेगा?

नतीजा जो भी हो, एक बात तय है – अमरावती में ‘कमल’ के अंदर कांटे उग आए हैं, और ये चुभन मुंबई से लेकर दिल्ली तक महसूस की जा रही है।

By Isha Patel

Isha Patel Tez Khabri के साथ जुड़ी एक समाचार रिपोर्टर हैं। वे भारत और राज्यों से जुड़ी ताज़ा, ब्रेकिंग और जनहित से संबंधित खबरों को कवर करती हैं। Isha Patel शिक्षा, प्रशासन, सामाजिक मुद्दों और स्थानीय घटनाओं पर सत्यापित व तथ्यात्मक रिपोर्टिंग करती हैं।

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