बेंगलुरु, जिसे भारत की सिलिकॉन वैली (Silicon Valley of India) कहा जाता है, अपने शानदार मौसम, आईटी पार्क्स और सबसे बढ़कर अपने विविध खाद्य संस्कृति (Food Culture) के लिए जाना जाता है। यहाँ के ‘दर्शनियों’ (Darshinis) में मिलने वाले गर्मागर्म फिल्टर कॉफी और डोसे से लेकर कोरमंगला और इंदिरानगर के आलीशान पब और फाइन-डाइनिंग रेस्टोरेंट्स तक, यह शहर खाने के शौकीनों के लिए एक स्वर्ग है। लेकिन पिछले कुछ हफ्तों से, जब भी कोई ग्राहक अपना खाना खत्म करके बिल मांग रहा है, तो उसे एक अप्रत्याशित झटके का सामना करना पड़ रहा है। बिल के अंत में जीएसटी (GST) और सर्विस चार्ज (Service Charge) के ठीक नीचे एक नया शुल्क दिखाई दे रहा है— “गैस चार्ज” (Gas Charge)।
1. एलपीजी संकट (LPG Crisis): एक वैश्विक आपदा का स्थानीय प्रभाव
बेंगलुरु के रेस्टोरेंट्स के बिलों में होने वाले इस नए बदलाव को समझने के लिए हमें शहर की सीमाओं से बाहर, मध्य पूर्व (Middle East) की भू-राजनीति पर नज़र डालनी होगी। ईरान और इज़राइल के बीच बढ़ते तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में तेल और गैस टैंकरों की आवाजाही में आई भारी बाधा के कारण भारत में प्राकृतिक गैस और एलपीजी की आपूर्ति शृंखला बुरी तरह चरमरा गई है।
सरकार का सर्कुलर और कमर्शियल गैस पर कैंची
भारत सरकार ने 5 मार्च 2026 को एक आपातकालीन निर्देश जारी किया, जिसमें यह स्पष्ट किया गया कि गैस की सीमित आपूर्ति को देखते हुए ‘घरेलू उपभोक्ताओं’ (Domestic Consumers) को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाएगी। इसका सीधा अर्थ यह था कि कमर्शियल 19 किलोग्राम वाले एलपीजी सिलेंडरों की आपूर्ति में 50 से 70 प्रतिशत तक की कटौती कर दी गई।
बेंगलुरु, जहां हजारों छोटे-बड़े रेस्टोरेंट, क्लाउड किचन और स्ट्रीट फूड वेंडर प्रतिदिन लाखों सिलेंडरों की खपत करते हैं, वहां यह कट-ऑफ एक ‘डेथ वारंट’ की तरह आया। आधिकारिक वितरकों के पास ‘आउट ऑफ स्टॉक’ (Out of Stock) के बोर्ड लग गए। नतीजतन, ब्लैक मार्केट (Grey Market) में जो कमर्शियल सिलेंडर पहले ₹1,800 से ₹1,900 में मिलता था, वह अब ₹3,500 से ₹4,000 के बीच बेचा जाने लगा।
इस भारी आर्थिक दबाव और अनिश्चितता ने ही इस नई परिपाटी को जन्म दिया जहाँ Bengaluru restaurants add gas charge जैसी अप्रत्याशित स्थिति का सामना आम आदमी को करना पड़ रहा है। रेस्टोरेंट मालिकों का तर्क सीधा है—यदि हम गैस ब्लैक मार्केट से खरीदेंगे, तो वह लागत कहीं न कहीं से तो निकालनी ही पड़ेगी।
2. ‘शट डाउन या रिकूप’ (Shut Down or Recoup): रेस्टोरेंट मालिकों की विवशता
नेशनल रेस्टोरेंट एसोसिएशन ऑफ इंडिया (NRAI) और बृहत बेंगलुरु होटल्स एसोसिएशन (BBHA) के अनुसार, पिछले दो हफ्तों में शहर के लगभग 15% छोटे और मंझोले भोजनालय अस्थायी रूप से बंद हो चुके हैं। जो बचे हुए हैं, वे भारी नुकसान में चल रहे हैं।
मेनू की कीमतें बढ़ाना बनाम नया चार्ज जोड़ना
एक आम सवाल जो हर ग्राहक के मन में उठता है वह यह है कि: “अगर लागत बढ़ गई है, तो रेस्टोरेंट सीधे अपने व्यंजनों (Menu Items) की कीमत क्यों नहीं बढ़ा देते? बिल में अलग से गैस चार्ज क्यों?”
एक खाद्य उद्योग विशेषज्ञ के रूप में इस रणनीति का विश्लेषण करने पर तीन मुख्य कारण सामने आते हैं:
- संकट की अस्थायी प्रकृति: रेस्टोरेंट मालिकों का मानना है कि यह एलपीजी संकट स्थायी नहीं है। यदि वे अपने मुद्रित मेनू (Printed Menus) और जोमैटो/स्विगी (Zomato/Swiggy) पर कीमतों को 20% तक बढ़ा देते हैं, तो संकट खत्म होने के बाद उन्हें वापस कम करना तकनीकी रूप से मुश्किल और ब्रांडिंग के लिए नुकसानदेह होता है। एक अस्थायी ‘सरचार्ज’ लगाना अधिक पारदर्शी और लचीला विकल्प है।
- ग्राहक मनोविज्ञान (Consumer Psychology): ₹100 के डोसे को अचानक ₹130 का कर देने से ग्राहक तुरंत नाराज हो सकता है और रेस्टोरेंट आना बंद कर सकता है। लेकिन ₹100 के डोसे पर ₹10 का ‘इमरजेंसी गैस चार्ज’ लगाना ग्राहक को स्थिति की गंभीरता समझाने का एक तरीका माना जा रहा है।
- सिस्टमैटिक रिकवरी: यह अतिरिक्त चार्ज केवल खाना पकाने की बढ़ी हुई लागत (Fuel Inflation) को कवर करने के लिए है। यह सीधे उसी मद में जाता है जहां नुकसान हो रहा है, जिससे एकाउंटिंग में स्पष्टता रहती है।
यही कारण है कि हमने देखा कि कैसे Bengaluru restaurants add gas charge (यह एक टाइपिंग त्रुटि नहीं, बल्कि एक हकीकत बन गई है जहाँ हवा से बातें करती कीमतें गैस चार्ज में तब्दील हो गई हैं) और यह कदम शहर भर में एक ट्रेंड बन गया है।
3. ग्राहकों का आक्रोश और सोशल मीडिया पर बहस
जैसे ही ग्राहकों ने अपने बिलों पर 5% से 10% तक का “गैस चार्ज” या “फ्यूल सरचार्ज” देखा, बेंगलुरु के सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स, विशेषकर एक्स (पूर्व में ट्विटर) और इंस्टाग्राम पर शिकायतों की बाढ़ आ गई। #BengaluruGasCharge और #RestaurantLoot जैसे हैशटैग ट्रेंड करने लगे।
“क्या मुझे अपनी खुद की गैस लानी चाहिए?”
एक वायरल पोस्ट में, कोरमंगला के एक ग्राहक ने अपने ₹1,500 के बिल की तस्वीर साझा की, जिसमें ₹150 का गैस चार्ज जोड़ा गया था। उस ग्राहक ने तंज कसते हुए लिखा, “कल को ये रेस्टोरेंट मुझसे एसी (AC) की हवा का चार्ज, कुक के पसीने का चार्ज और प्लेट धोने का पानी चार्ज भी मांगेंगे। क्या अगली बार मैं अपना खुद का गैस सिलेंडर लेकर आऊं?”
ग्राहकों का गुस्सा अपनी जगह बिल्कुल जायज है। बेंगलुरु में पहले से ही रहने की लागत (Cost of Living) बहुत अधिक है। ऊपर से महंगाई और अब यह नया शुल्क। लोगों का तर्क है कि जब रेस्टोरेंट व्यवसाय में प्रवेश करते हैं, तो गैस, बिजली और पानी जैसी बुनियादी लागतें उनके ‘ओवरहेड’ (Overheads) का हिस्सा होती हैं। एक उद्यमी के रूप में बाजार के जोखिम (Market Risks) उठाना उनका काम है, न कि हर एक संकट का आर्थिक बोझ सीधे ग्राहक के सिर पर मढ़ देना।

मध्यम वर्ग पर दोहरी मार
बेंगलुरु में लाखों आईटी पेशेवर ‘पेइंग गेस्ट’ (PG) और किराए के मकानों में रहते हैं, जो पूरी तरह से रेस्टोरेंट के खाने या टिफिन सेवाओं पर निर्भर हैं। इस नए चार्ज ने उनके मासिक बजट को बिगाड़ कर रख दिया है। जब Bengaluru restaurants add gas charge, तो इसका सीधा असर उस युवा वर्ग पर पड़ता है जो शहर की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। यह केवल एक लक्जरी डाइनिंग की समस्या नहीं है, बल्कि यह एक बुनियादी खाद्य सुरक्षा और जीवन-यापन की समस्या बन गई है।
4. कानूनी दृष्टिकोण: क्या “गैस चार्ज” वसूलना वैध है?
इस पूरे विवाद में जो सबसे महत्वपूर्ण ई-ई-ए-टी (EEAT) पहलू है, वह है इस शुल्क की वैधानिकता (Legality)। क्या कोई रेस्टोरेंट अपनी मर्जी से बिल में कोई भी नया चार्ज जोड़ सकता है?
उपभोक्ता संरक्षण कानून (Consumer Protection Act) क्या कहता है?
भारत के उपभोक्ता मामलों के विभाग (Department of Consumer Affairs) ने ‘सर्विस चार्ज’ (Service Charge) को लेकर पहले ही स्पष्ट दिशानिर्देश जारी किए हुए हैं कि यह पूरी तरह से स्वैच्छिक (Voluntary) है। लेकिन “गैस चार्ज” एक बिल्कुल नया ‘ग्रे एरिया’ (Grey Area) है।
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, किसी भी उत्पाद या सेवा की जो एमआरपी (MRP) या मेनू मूल्य (Menu Price) होता है, उसमें उस उत्पाद को बनाने की सभी इनपुट लागतें (Input Costs) शामिल मानी जाती हैं।
- अनुचित व्यापार व्यवहार (Unfair Trade Practice): यदि कोई रेस्टोरेंट मेनू कार्ड पर बिना किसी पूर्व स्पष्ट सूचना के सीधे अंतिम बिल में ‘गैस चार्ज’ जोड़ता है, तो इसे ‘उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 2019’ के तहत एक अनुचित व्यापार व्यवहार माना जा सकता है।
- पारदर्शिता की शर्त: यदि रेस्टोरेंट अपने प्रवेश द्वार और मेनू कार्ड के हर पन्ने पर बड़े अक्षरों में यह घोषित करता है कि “एलपीजी संकट के कारण बिल पर अतिरिक्त X% गैस चार्ज लागू होगा”, और ग्राहक इसे जानकर खाना आर्डर करता है, तो यह एक प्रकार का ‘अनुबंध’ (Contract) बन जाता है। इस स्थिति में कानूनी रूप से इसे चुनौती देना मुश्किल होता है।
उपभोक्ता अदालतों के कुछ वकीलों ने ग्राहकों को सलाह दी है कि यदि उन्हें बिना पूर्व सूचना के ऐसा बिल मिलता है, तो वे भुगतान करने से इनकार कर सकते हैं या राष्ट्रीय उपभोक्ता हेल्पलाइन (National Consumer Helpline) पर शिकायत दर्ज करा सकते हैं। यह कानूनी जटिलता ही वह मुख्य कारण है जिस पर विचार किया जाना चाहिए जब Bengaluru restaurants add gas charge अपने बिलिंग सिस्टम में। कई होटलों को अब कानूनी नोटिस का डर भी सताने लगा है।
5. रेस्टोरेंट का अर्थशास्त्र: एक थाली के पीछे की लागत का गणित
ग्राहकों के दृष्टिकोण को समझने के बाद, अब हमें निष्पक्षता (Trustworthiness) बनाए रखने के लिए रेस्टोरेंट व्यवसाय के अर्थशास्त्र (Restaurant Economics) को गहराई से समझना होगा। रेस्टोरेंट चलाना बाहर से जितना ग्लैमरस दिखता है, अंदर से वह उतना ही कम मार्जिन (Thin Margin) वाला व्यवसाय है।
एक डिश की लागत का विभाजन (Cost Breakdown)
आमतौर पर एक रेस्टोरेंट की आय का विभाजन कुछ इस प्रकार होता है:
- खाद्य लागत (Food Cost/Ingredients): 30% – 35%
- किराया (Rent): 15% – 20% (बेंगलुरु जैसे शहर में यह बहुत अधिक है)
- श्रम लागत (Labor/Staff Salary): 20% – 25%
- उपयोगिताएं (Utilities – बिजली, गैस, पानी): 8% – 10%
- लाभ (Profit Margin): 10% – 15%
सामान्य दिनों में, एलपीजी गैस की लागत कुल रेवेन्यू का लगभग 3% से 5% होती है। लेकिन ब्लैक मार्केट में सिलेंडर की कीमतें दोगुनी या तिगुनी होने के कारण, यह उपयोगिता लागत (Utility Cost) अचानक बढ़कर 12% से 15% तक पहुँच गई है।
एक औसत रेस्टोरेंट जिसका प्रॉफिट मार्जिन ही 10% है, वह अचानक गैस की कीमत में हुई 200% की वृद्धि को कैसे अवशोषित (Absorb) कर सकता है? यदि वे ऐसा करते हैं, तो वे तकनीकी रूप से ‘नुकसान’ (Loss) में चले जाते हैं।
कर्मचारियों की छंटनी का डर
बृहत बेंगलुरु होटल्स एसोसिएशन के अध्यक्ष ने स्पष्ट किया है कि यदि उन्होंने ग्राहकों से यह लागत वसूलना शुरू नहीं किया, तो उनका अगला कदम अपने कर्मचारियों (शेफ, वेटर, क्लीनर) की छंटनी करना होगा। कोई भी व्यवसाय घाटे में अपनी जेब से कर्मचारियों को वेतन नहीं दे सकता। इसलिए, ‘शट डाउन या रिकूप’ का नारा एक वास्तविक जीवन-मरण का प्रश्न है। जब न्यूज़ पोर्टल्स यह हेडलाइन बनाते हैं कि Bengaluru restaurants add gas charge, तो इसके पीछे हजारों कर्मचारियों की आजीविका को बचाने की एक बेबस कोशिश भी छिपी होती है।
6. इलेक्ट्रिक कुकिंग की ओर पलायन: क्या यह एक व्यावहारिक समाधान है?
गैस की किल्लत को देखते हुए कई लोगों ने सवाल उठाया है कि रेस्टोरेंट इंडक्शन (Induction) या इलेक्ट्रिक स्टोव (Electric Stoves) का इस्तेमाल क्यों नहीं करते?
बेंगलुरु के कई रेस्टोरेंट्स ने संकट के पहले हफ्ते में ही रातों-रात कमर्शियल इंडक्शन कुकर और बड़े इलेक्ट्रिक हॉट प्लेट्स खरीद लिए थे। लेकिन यह ‘जुगाड़’ लंबे समय तक चलने वाला समाधान नहीं बन पाया। इसके कई तकनीकी और ढांचागत (Infrastructural) कारण हैं:

1. बिजली का लोड (Electrical Load Capacity)
कमर्शियल बिल्डिंग्स और छोटी दुकानों में एक निश्चित स्वीकृत विद्युत भार (Sanctioned Electrical Load) होता है। हाई-पावर कमर्शियल इंडक्शन 3000W से 5000W तक बिजली खींचते हैं। जब एक रसोई में ऐसे 5-6 इंडक्शन एक साथ चालू किए जाते हैं, तो मेन लाइन का ट्रिप होना या ट्रांसफार्मर का जलना आम बात हो गई है। बेंगलुरु की बिजली आपूर्ति प्रदाता BESCOM (Bangalore Electricity Supply Company) पहले से ही गर्मियों में बिजली की मांग (Peak Demand) को पूरा करने के लिए संघर्ष कर रही है।
2. कुकिंग की तकनीक (Cooking Techniques)
भारतीय खाना पकाने की तकनीकें, विशेष रूप से ‘तड़का’ लगाना, तंदूरी रोटियां सेंकना, या चाइनीज व्यंजनों के लिए ‘वोक हेई’ (Wok Hei – सांस की आग), खुले ज्वाला (Open Flame) पर निर्भर करती हैं। इंडक्शन पर आप एक बेहतरीन तंदूरी चिकन या रुमाली रोटी नहीं बना सकते। आग का नियंत्रण (Heat Control) जो गैस पर मिलता है, वह इलेक्ट्रिक कॉइल पर संभव नहीं है।
3. भारी बिल का झटका
हालांकि इंडक्शन का उपयोग करके गैस की कमी को पूरा किया जा सकता है, लेकिन कमर्शियल बिजली की दरें (Commercial Electricity Tariffs) बेंगलुरु में काफी अधिक हैं। गैस के बजाय बिजली से पकाने पर अंततः उपयोगिता बिल (Utility Bill) उतना ही आ रहा है। इसलिए, तकनीक बदलना इस समस्या का कोई वित्तीय समाधान (Financial Solution) नहीं है।
7. खाद्य वितरण ऐप्स (Zomato/Swiggy) और ‘गिग इकॉनमी’ पर गहराता संकट
इस एलपीजी संकट और ‘गैस चार्ज’ का एक बड़ा ‘डोमिनोज़ इफ़ेक्ट’ (Domino Effect) खाद्य वितरण पारिस्थितिकी तंत्र (Food Delivery Ecosystem) पर भी पड़ रहा है।
बेंगलुरु भारत का ‘क्लाउड किचन’ (Cloud Kitchen) हब है। ये किचन केवल डिलीवरी मॉडल पर काम करते हैं। जब गैस महंगी हो गई, तो इन क्लाउड किचन्स ने भी अपने ऑनलाइन मेनू पर ‘पैकेजिंग और हैंडलिंग चार्ज’ के नाम पर या सीधे कीमतों में वृद्धि करके लागत वसूलनी शुरू कर दी।
- डिलीवरी में देरी: गैस की कमी या धीमे इलेक्ट्रिक हीटर के कारण खाना बनने में सामान्य से 20-30 मिनट ज्यादा समय लग रहा है। इससे डिलीवरी पार्टनर्स को रेस्टोरेंट के बाहर लंबा इंतजार करना पड़ रहा है, जिससे उनकी प्रति दिन पूरी की जाने वाली ट्रिप्स की संख्या कम हो गई है और उनकी आय (Daily Earnings) घट रही है।
- ऑर्डर्स में गिरावट: जब ग्राहकों ने ऐप पर बढ़े हुए बिल और डिलीवरी समय को देखा, तो ऑनलाइन ऑर्डर करने की प्रवृत्ति (Order Volume) में 15% से 20% की गिरावट दर्ज की गई है।
यह साफ दर्शाता है कि यह संकट किसी एक सेक्टर तक सीमित नहीं है, बल्कि इसने पूरी ‘गिग इकॉनमी’ (Gig Economy) को अपनी चपेट में ले लिया है।
8. ‘पीएनजी’ (PNG) पाइपलाइन: एक अधूरा सरकारी वादा
इस संकट ने शहर के बुनियादी ढांचे में एक बड़ी खामी को भी उजागर किया है—पाइप्ड नेचुरल गैस (PNG) के नेटवर्क की कमी।
दिल्ली और मुंबई के कई हिस्सों में, अधिकांश बड़े रेस्टोरेंट गेल (GAIL) या स्थानीय प्रदाताओं के पीएनजी नेटवर्क से जुड़े हुए हैं, जो गैस सिलेंडरों पर उनकी निर्भरता को कम करता है। लेकिन बेंगलुरु में पीएनजी का बुनियादी ढांचा (Infrastructure) अभी भी अपने शुरुआती चरण में है। शहर के कुछ गिने-चुने पॉश इलाकों को छोड़कर, अधिकांश कॉमर्शियल मार्केट्स में पाइप गैस की सुविधा उपलब्ध नहीं है।
यदि शहर का पीएनजी नेटवर्क मजबूत होता, तो आज सिलेंडर की कालाबाजारी का रेस्टोरेंट्स पर इतना बुरा असर नहीं पड़ता। शहर के योजनाकारों (Urban Planners) और गैस प्रदाताओं के लिए यह संकट एक वेक-अप कॉल (Wake-up call) होना चाहिए। दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा (Energy Security) के लिए पाइप गैस नेटवर्क का तेजी से विस्तार अत्यंत महत्वपूर्ण है।
9. अन्य शहरों के लिए एक चेतावनी (A Warning for Other Cities)
आज जो कुछ बेंगलुरु में हो रहा है, वह जल्द ही भारत के अन्य महानगरों में भी दोहराया जा सकता है। एलपीजी का वैश्विक संकट रातों-रात खत्म होने वाला नहीं है। भू-राजनीतिक विशेषज्ञ (Geopolitical Experts) चेतावनी दे रहे हैं कि यदि युद्ध खिंचता है, तो आपूर्ति में और भी बाधाएं आ सकती हैं।
पुणे, हैदराबाद और चेन्नई जैसे शहरों के रेस्टोरेंट एसोसिएशन बेंगलुरु की स्थिति पर करीब से नज़र रखे हुए हैं। वे भी इसी तरह के ‘कंटिंजेंसी प्लान’ (Contingency Plans) तैयार कर रहे हैं। जिस तरह से यह एक स्थापित व्यावसायिक अभ्यास बनता जा रहा है कि Bengaluru restaurants add gas charge, वह दिन दूर नहीं जब यह एक ‘राष्ट्रीय मानक’ (National Standard) बन जाए जब भी कोई ऊर्जा संकट उत्पन्न हो।
अन्य शहरों के प्रशासकों को अभी से कालाबाजारी रोकने के लिए सख्त निगरानी समितियां (Vigilance Committees) गठित करनी चाहिए, ताकि जो हाहाकार बेंगलुरु में मचा है, उसे अन्य जगहों पर रोका जा सके।
10. निष्कर्ष: क्या यह ‘गैस चार्ज’ का युग भारतीय डाइनिंग का नया सामान्य (New Normal) है?
बेंगलुरु के रेस्टोरेंट्स द्वारा ग्राहकों के बिल में “गैस चार्ज” जोड़ना केवल एक शहर की स्थानीय खबर नहीं है, बल्कि यह वैश्वीकरण (Globalization) और ऊर्जा निर्भरता (Energy Dependency) के सबसे क्रूर प्रभावों का एक जीता-जागता उदाहरण है। होर्मुज जलडमरूमध्य में फंसा एक तेल का टैंकर कैसे सीधे कोरमंगला के एक पब में आपके बिल को बढ़ा सकता है, यह ‘बटरफ्लाई इफ़ेक्ट’ (Butterfly Effect) का एक स्पष्ट प्रदर्शन है।
एक तरफ वे ग्राहक हैं जो पहले से ही महंगाई की मार झेल रहे हैं और बाहर का खाना उनके लिए एक छोटी सी खुशी या मजबूरी है। उनके लिए बिना किसी गलती के यह अतिरिक्त दंड (Penalty) अनुचित लगता है। दूसरी तरफ वे रेस्टोरेंट मालिक हैं, जिन्होंने अपना जीवन और पूंजी इस व्यवसाय में लगा दी है। उनके लिए यह लालच का नहीं, बल्कि ‘अस्तित्व’ (Survival) का सवाल है। “शट डाउन या रिकूप” उनके लिए कोई विकल्प नहीं, बल्कि एक कड़वी हकीकत है।
सरकार और तेल विपणन कंपनियों (OMCs) को इस संकट को हल करने के लिए तत्काल कदम उठाने होंगे। कमर्शियल गैस की कालाबाजारी पर नकेल कसना और एक पारदर्शी आपूर्ति कोटा (Supply Quota) निर्धारित करना समय की मांग है।
जब तक यह संकट समाप्त नहीं होता और गैस की आपूर्ति सामान्य नहीं होती, तब तक उपभोक्ताओं और सेवा प्रदाताओं दोनों को एक-दूसरे के प्रति थोड़ी अधिक सहानुभूति (Empathy) दिखानी होगी। शायद अगली बार जब आप बाहर खाना खाने जाएं और बिल पर वह अतिरिक्त शुल्क देखें, तो अपना गुस्सा वेटर पर निकालने से पहले इस बात पर विचार करें कि उस रसोई के अंदर, कोई व्यक्ति भारी वित्तीय तनाव के बीच बिना आग के उस तंदूर को गर्म रखने की जद्दोजहद कर रहा है।
बेंगलुरु का खाद्य उद्योग अपने लचीलेपन (Resilience) के लिए जाना जाता है। इसने कोविड-19 जैसी महामारियों का भी डटकर सामना किया है और यकीनन यह एलपीजी संकट के इस तूफ़ान से भी बाहर निकल आएगा। लेकिन तब तक, यह कड़वा सच हमें स्वीकार करना ही होगा कि बाहर खाने का अनुभव अब पहले जैसा सस्ता और चिंतामुक्त नहीं रहा।

अंकिता गौतम एक अभिनेत्री, मॉडल और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर हैं। Tez Khabri पर वे मनोरंजन जगत (Entertainment), बॉलीवुड और लाइफस्टाइल से जुड़ी हर छोटी-बड़ी अपडेट साझा करती हैं। अपनी रचनात्मक शैली और सोशल मीडिया पर मजबूत पकड़ के कारण, वे युवाओं के बीच बेहद लोकप्रिय हैं।
