भारत का हृदय स्थल कहा जाने वाला बिहार केवल अपने गौरवशाली इतिहास, नालंदा जैसे विश्वविद्यालयों या बौद्ध धर्म के उद्गम स्थल के लिए ही नहीं जाना जाता, बल्कि यह राज्य अपनी सदियों पुरानी, समृद्ध और विविध लोक कलाओं (Folk Arts) का भी एक जीता-जागता संग्रहालय है। मधुबनी पेंटिंग (Madhubani Painting) और मंजूषा कला (Manjusha Art) के बारे में तो दुनिया जानती है, लेकिन बिहार के पटना की गलियों में एक ऐसी कला छिपी है, जिसका इतिहास 800 साल से भी अधिक पुराना है। यह कला है—टिकुली आर्ट (Tikuli Art)।
यह एक ऐसी अनूठी और विस्मयकारी कला है जिसमें कैनवास पर रंगों के साथ-साथ सुहाग की निशानी मानी जाने वाली छोटी-छोटी बिंदियों (Bindis) का प्रयोग करके देवी-देवताओं, रामायण-महाभारत के प्रसंगों और ग्रामीण जीवन के दृश्यों को उकेरा जाता है। कभी मुगल बादशाहों और राजघरानों की चहेती रही यह कला समय के थपेड़ों और औद्योगीकरण (Industrialization) के कारण विलुप्त होने के कगार पर पहुंच गई थी। लेकिन, कुछ कला-साधकों और बिहार सरकार के अथक प्रयासों से आज टिकुली आर्ट (Tikuli Art) अपने पुनर्जन्म (Revival) के दौर से गुजर रही है और राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपनी चमक बिखेर रही है।
1. ‘टिकुली’ शब्द की उत्पत्ति और इसका 800 साल पुराना इतिहास (The Ancient Origins)
‘टिकुली’ (Tikuli) एक स्थानीय और ठेठ बिहारी शब्द है, जिसका अर्थ है ‘बिंदी’ (Bindi)—वह गोल और चमकदार चिह्न जिसे भारतीय महिलाएं, विशेषकर सुहागिनें, अपने माथे के बीचों-बीच सजाती हैं। बिंदी केवल एक श्रृंगार नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति में तीसरे नेत्र (Third Eye) और सौभाग्य का प्रतीक मानी जाती है। इसी बिंदी के इर्द-गिर्द बुनी गई कला को टिकुली आर्ट (Tikuli Art) कहा जाता है।
प्राचीन काल में टिकुली का निर्माण: आजकल बाजार में मिलने वाली टिकुली (बिंदी) आमतौर पर प्लास्टिक, मखमल या स्टिकर वाली होती है। लेकिन, 800 साल पहले जब इस कला का जन्म हुआ था, तब टिकुली बनाने की प्रक्रिया एक जटिल और बहुमूल्य कला हुआ करती थी।
- ग्लास ब्लोइंग तकनीक: प्राचीन पटना (पाटलिपुत्र) के कारीगर पिघले हुए कांच (Melted Glass) को फूंक मार-मार कर (Glass blowing) अत्यंत पतले गुब्बारों (Balloons) का आकार देते थे।
- सोने का वर्क और नक्काशी: इसके बाद, इन कांच के गुब्बारों पर शुद्ध सोने (Pure Gold) या चांदी का वर्क (Gold leaf/foil) चढ़ाया जाता था। फिर, बांस की पतली सींक या किसी नुकीले औजार से इन पर देवी-देवताओं, फूल-पत्तियों या ज्यामितीय आकृतियों की बारीक नक्काशी की जाती थी।
- कटाई: अंत में, इन्हें अत्यंत सावधानी से छोटे-छोटे गोल या अंडाकार टुकड़ों में काट लिया जाता था। यही थीं उस जमाने की ‘शाही टिकुलियां’।
यह कला इतनी बारीक और महंगी थी कि मुगल काल और बाद में ब्रिटिश राज के दौरान, पटना की बनी ये टिकुलियां पूरे भारत के राजघरानों, रानियों और अमीर जमींदार घरानों की महिलाओं के श्रृंगार का एक अभिन्न और विलासितापूर्ण हिस्सा बन गई थीं।

2. पतन का अंधकार: जब मशीनें कला को निगलने लगीं (The Decline and Industrial Impact)
हर हस्तकला (Handicraft) को कभी न कभी मशीनीकरण (Mechanization) के क्रूर प्रहार का सामना करना पड़ता है। 19वीं सदी के अंत और 20वीं सदी की शुरुआत में टिकुली आर्ट (Tikuli Art) के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ।
पतन के मुख्य कारण:
- मशीनी बिंदियों का आगमन: जब भारत में औद्योगीकरण (Industrial Revolution) ने दस्तक दी, तो सस्ती, मशीनों से बनी, स्टिकर वाली और प्लास्टिक की बिंदियां बाजार में छा गईं।
- लागत और समय: हस्तनिर्मित टिकुली (सोने के वर्क वाली) बनाना बहुत ही महंगा और समय लेने वाला काम था। इसके विपरीत, मशीनी बिंदियां कुछ ही पैसों में और हर रंग-डिजाइन में उपलब्ध होने लगीं।
- कारीगरों का पलायन: राजघरानों का पतन होने से इस कला को मिलने वाला शाही संरक्षण (Royal Patronage) छिन गया। मांग घटने से कारीगर भुखमरी की कगार पर आ गए और उन्होंने आजीविका के लिए अन्य छोटे-मोटे पेशे अपना लिए।
देखते ही देखते, पटना की जिस ‘टिकुली गली’ में कभी सैकड़ों कारीगर दिन-रात काम करते थे, वहां सन्नाटा पसर गया और यह 800 साल पुरानी समृद्ध कला लगभग 50 वर्षों तक इतिहास के पन्नों में कहीं खो गई।
3. पुनर्जन्म: राख से उठी एक कला और पद्म श्री उपेन्द्र महारथी का योगदान (The Renaissance of Tikuli Art)
कहा जाता है कि सच्ची कला कभी मरती नहीं, वह बस सोने चली जाती है और किसी पारखी की नजर का इंतजार करती है। टिकुली आर्ट (Tikuli Art) के लिए वह पारखी नजर बनकर आए भारत के महान चित्रकार और शिल्पकार, पद्म श्री उपेन्द्र महारथी (Padma Shri Upendra Maharathi)।
उपेन्द्र महारथी का विजन (1950 का दशक): जापान की यात्रा के दौरान उपेन्द्र महारथी जी ने वहां के कलाकारों को लकड़ी (Wood) और ‘इनेमल पेंट’ (Enamel Paint) का उपयोग करके चमकदार और टिकाऊ कलाकृतियां बनाते हुए देखा। उन्होंने सोचा कि क्यों न इस जापानी तकनीक का इस्तेमाल करके बिहार की विलुप्त हो चुकी टिकुली कला को पुनर्जीवित किया जाए!
परिवर्तन (The Transformation):
- माध्यम बदला: उन्होंने कांच और सोने के वर्क की जगह ‘हार्डबोर्ड’ (Hardboard) या ‘एमडीएफ बोर्ड’ (MDF Board) का प्रयोग शुरू किया, जो सस्ता, टिकाऊ और आसानी से उपलब्ध था।
- रंगों का जादु: उन्होंने इन बोर्ड्स पर चमकदार ‘इनेमल पेंट’ (Enamel Paint) का उपयोग किया, जो सूखने के बाद कांच जैसी चमक देता था।
- बिंदी का नया अवतार: अब टिकुली को महिलाओं के माथे से निकालकर, एक बड़े कैनवास (पेंटिंग, ट्रे, कोस्टर, वॉल हैंगिंग) पर सजावट और कलाकारी के माध्यम के रूप में स्थापित किया गया।
इस प्रकार, 1954 के आसपास, उपेन्द्र महारथी के प्रयासों से टिकुली कला का एक नया, अधिक व्यावहारिक (Practical) और व्यावसायिक (Commercial) स्वरूप सामने आया, जिसे आज हम आधुनिक टिकुली आर्ट (Tikuli Art) के रूप में जानते हैं।
4. निर्माण प्रक्रिया: कैसे छोटी-छोटी बिंदियों से बनती है एक उत्कृष्ट पेंटिंग (The Intricate Process)
आज की तारीख में टिकुली आर्ट (Tikuli Art) को बनाना किसी ध्यान (Meditation) या तपस्या से कम नहीं है। यह एक अत्यंत श्रमसाध्य और बहु-चरणीय (Multi-step) प्रक्रिया है, जिसमें एक छोटी सी पेंटिंग बनाने में भी कई दिन लग सकते हैं।
आइए, एक विशेषज्ञ के नजरिए से इस पूरी प्रक्रिया (EEAT Analysis) को समझते हैं:

चरण 1: बेस (Base) तैयार करना
- सबसे पहले, एमडीएफ बोर्ड (MDF Board) या हार्डबोर्ड को मनचाहे आकार (जैसे गोल, चौकोर, ट्रे या कोस्टर) में काटा जाता है।
- इस बोर्ड पर रेगमाल (Sandpaper) घिसकर उसे बिल्कुल चिकना बनाया जाता है।
- इसके बाद, इस पर इनेमल पेंट (आमतौर पर डार्क रंग जैसे काला, मैरून या गहरा नीला) के 4 से 5 कोट (Coats) लगाए जाते हैं।
- सबसे महत्वपूर्ण बात: हर कोट लगाने के बाद उसे पूरी तरह सूखने दिया जाता है और फिर से रेगमाल से घिसा जाता है। यह प्रक्रिया तब तक दोहराई जाती है जब तक कि बोर्ड की सतह शीशे की तरह चमकदार और एकदम चिकनी (Glossy and Flawless) न हो जाए।
चरण 2: रूपरेखा (Outlining) और डिजाइनिंग
- बोर्ड तैयार होने के बाद, कलाकार सफेद रंग (White Enamel Paint) और ‘जीरो नंबर’ (000 Number) के अत्यंत बारीक ब्रश का उपयोग करके चित्र की रूपरेखा (Outline) उकेरता है।
- ये चित्र आमतौर पर भगवान कृष्ण की रासलीला, छठ पूजा, राम-सीता विवाह, या बिहार के ग्रामीण जनजीवन से प्रेरित होते हैं।
चरण 3: रंगों और बिंदियों का जादू (The Tikuli Application)
- यह इस कला की आत्मा है। रूपरेखा तैयार होने के बाद, चित्रों में चमकदार और जीवंत (Vibrant) इनेमल रंग भरे जाते हैं। रंग (लाल, पीला, हरा) बहुत सावधानी से लगाए जाते हैं ताकि वे आउटलाइन के बाहर न फैलें।
- अब सबसे खास काम शुरू होता है। पेंटिंग के बॉर्डर, आभूषणों, या डिजाइन के खाली हिस्सों को सजाने के लिए बाजार में मिलने वाली साधारण, लेकिन रंग-बिरंगी और छोटी-छोटी बिंदियों (Bindis) का उपयोग किया जाता है।
- एक-एक बिंदी को चिमटी (Tweezers) की मदद से उठाकर अत्यंत सटीकता और ज्यामितीय क्रम (Geometrical pattern) में चिपकाया जाता है। एक बड़ी पेंटिंग में हजारों बिंदियां लग सकती हैं।
चरण 4: फिनिशिंग टच (The Final Gloss)
- जब पूरी पेंटिंग और बिंदियां लग जाती हैं और रंग सूख जाता है, तो इसके ऊपर स्पष्ट वार्निश (Clear Varnish) या पारदर्शी इनेमल का एक कोट लगाया जाता है।
- यह कोट न केवल बिंदियों और रंगों को सील (Seal) कर देता है, बल्कि पेंटिंग को एक ऐसी अद्भुत चमक (Shine) देता है कि वह कांच पर बनी हुई प्रतीत होती है।
- इसके बाद पेंटिंग पानी से खराब नहीं होती (Water-resistant) और सालों-साल तक वैसी ही चमकती रहती है।
5. टिकुली कला की विषय-वस्तु और प्रमुख मोटिफ (Themes and Motifs)
कोई भी लोक कला उस क्षेत्र की संस्कृति और मान्यताओं का दर्पण होती है। टिकुली आर्ट (Tikuli Art) में भी बिहार की माटी की खुशबू और वहां की आध्यात्मिक जड़ें गहराई तक समाई हुई हैं।
- धार्मिक प्रसंग (Mythological Themes): भगवान कृष्ण की गोपियों के साथ रासलीला, भगवान शिव और पार्वती का विवाह, रामायण के दृश्य, माता दुर्गा और भगवान गणेश की आकृतियां इस कला के सबसे लोकप्रिय विषय हैं।
- छठ पूजा का चित्रण (Chhath Puja): बिहार का सबसे महान और पवित्र त्योहार ‘छठ’ टिकुली कला का एक प्रमुख मोटिफ (Motif) है। सूप लिए हुए महिलाएं, उगते सूर्य को अर्घ्य देना और नदी के घाट के दृश्यों को बिंदियों की सजावट के साथ अत्यंत मनमोहक रूप में प्रस्तुत किया जाता है।
- ग्रामीण जीवन (Rural Life of Bihar): पनघट से पानी लाती हुई महिलाएं, धान काटते किसान, बैलगाड़ी, और ग्रामीण विवाह समारोह के दृश्य (पालकी, डोली) इस कला में जीवंत हो उठते हैं।
- प्रकृति और ज्यामिति (Nature and Geometry): मोर, तोते, हाथी, कमल के फूल, पेड़-पौधे और पारंपरिक भारतीय ज्यामितीय डिजाइन (मंडाला स्टाइल) का उपयोग पेंटिंग के बॉर्डर को सजाने और उसे भव्यता प्रदान करने के लिए बहुतायत में किया जाता है।
6. वर्तमान स्थिति और महिला सशक्तिकरण का माध्यम (Women Empowerment through Art)
आज, टिकुली आर्ट (Tikuli Art) केवल एक सजावटी वस्तु नहीं रह गई है; यह बिहार, विशेषकर पटना के आसपास के गांवों (जैसे दीघा, दानापुर) की सैकड़ों महिलाओं के लिए आजीविका और सशक्तिकरण (Empowerment) का एक बहुत बड़ा साधन बन गई है।
श्री अशोक कुमार बिस्वास (Ashok Kumar Biswas) का योगदान: उपेन्द्र महारथी जी के बाद, यदि किसी एक व्यक्ति ने इस कला को घर-घर तक पहुंचाने और अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने का बीड़ा उठाया है, तो वह हैं जाने-माने कलाकार अशोक कुमार बिस्वास (जिन्हें ‘टिकुली कला का पितामह’ भी कहा जाता है)। पिछले चार दशकों से अधिक समय से, उन्होंने हजारों महिलाओं को इस कला का निःशुल्क प्रशिक्षण दिया है।
- आर्थिक स्वतंत्रता: गांवों की जो महिलाएं पहले केवल घर के काम तक सीमित थीं, वे आज टिकुली कला सीखकर महीने के 5,000 से 15,000 रुपये तक कमा रही हैं। वे कोस्टर (Coasters), ट्रे (Trays), वॉल हैंगिंग, पेन स्टैंड और ज्वेलरी बॉक्स बनाकर देश-विदेश में बेच रही हैं।
- अंतरराष्ट्रीय पहचान: आज टिकुली कला की मांग अमेरिका, जापान, जर्मनी और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में भी होने लगी है। दिल्ली हाट, प्रगति मैदान के ट्रेड फेयर और सूरजकुंड मेला (Surajkund Mela) जैसे राष्ट्रीय हस्तशिल्प मेलों में टिकुली स्टॉल्स हमेशा आकर्षण का केंद्र होते हैं।
इस कला ने साबित कर दिया है कि जब परंपरा (Tradition) और व्यवसाय (Commerce) का सही तालमेल बैठता है, तो एक कला कैसे हजारों घरों का चूल्हा जला सकती है।
7. कला के समक्ष वर्तमान चुनौतियां और संरक्षण की आवश्यकता (Challenges and the Road Ahead
यद्यपि टिकुली कला ने अपने पतन के दौर से उबरकर एक सम्मानजनक मुकाम हासिल कर लिया है, फिर भी एक लोक कला के रूप में इसे आज भी कई गंभीर चुनौतियों (Critical Challenges) का सामना करना पड़ रहा है, जिनका ई-ई-ए-टी (EEAT) विश्लेषण करना आवश्यक है:
A. बाजार की समझ और मार्केटिंग की कमी: गांवों की महिलाएं बेहतरीन कलाकृतियां तो बना लेती हैं, लेकिन उनके पास ई-कॉमर्स (E-commerce) प्लेटफॉर्म्स (जैसे Amazon Karigar, Flipkart Samarth, Etsy) तक सीधी पहुंच या मार्केटिंग का ज्ञान नहीं है। अक्सर बिचौलिए (Middlemen) उनकी मेहनत का बड़ा मुनाफा खा जाते हैं।
B. सस्ते विकल्पों (Imitations) से प्रतिस्पर्धा: बाजार में मशीन से छपी (Screen-printed) या स्टिकर वाली नकली कलाकृतियां बहुत सस्ते दामों पर उपलब्ध हैं। एक आम खरीदार अक्सर असली हस्तनिर्मित (Handmade) और मशीन-निर्मित कला के बीच का अंतर और उसमें लगी मेहनत को नहीं समझ पाता और असली कलाकार को उसकी मेहनत की सही कीमत नहीं मिल पाती।
C. कच्चा माल और स्वास्थ्य संबंधी चिंताएं: इनेमल पेंट (Enamel Paint) और वार्निश में वाष्पशील कार्बनिक यौगिक (VOCs – Volatile Organic Compounds) होते हैं। लंबे समय तक बंद कमरों में इन पेंट्स के साथ काम करने से कलाकारों को श्वास (Respiratory) संबंधी या त्वचा की समस्याएं हो सकती हैं। सरकार और कला संस्थानों को कलाकारों के लिए सुरक्षित और इको-फ्रेंडली (Eco-friendly) पेंट्स या एक्रेलिक रंगों (Acrylics) के उपयोग को बढ़ावा देने के लिए अनुसंधान करना चाहिए।
D. जीआई टैग (GI Tag) की आवश्यकता: बिहार के मखाना (Makhana) और मधुबनी पेंटिंग को जिस तरह से ‘भौगोलिक संकेतक’ (Geographical Indication – GI Tag) मिला हुआ है, वैसी ही कानूनी सुरक्षा और ब्रांडिंग की सख्त जरूरत आज टिकुली कला को भी है। GI Tag मिलने से इस कला की प्रामाणिकता (Authenticity) बढ़ेगी और नकली उत्पादों पर रोक लगेगी।
टिकुली आर्ट (Tikuli Art) केवल लकड़ी और इनेमल पेंट पर चिपकाई गई कुछ बिंदियों का समूह नहीं है; यह 800 वर्षों के इतिहास, संस्कृति, पतन, संघर्ष और एक शानदार पुनरुत्थान की एक जीवंत दास्तान है। यह कला इस बात का प्रमाण है कि बिहार की माटी में कितना सौंदर्य और कलात्मक गहराई छिपी है।
उपेन्द्र महारथी और अशोक कुमार बिस्वास जैसे कला-साधकों के प्रयासों और ग्रामीण महिलाओं की अथक मेहनत ने इस कला को राख से निकालकर एक बार फिर से राष्ट्रीय पटल पर स्थापित कर दिया है।
अब जिम्मेदारी हमारी है। एक जागरूक नागरिक और कला-प्रेमी होने के नाते, जब भी हम अपने घर को सजाने या किसी को उपहार (Gift) देने के बारे में सोचें, तो फैक्ट्रियों में बनी प्लास्टिक की वस्तुओं के बजाय, इन हस्तनिर्मित टिकुली कलाकृतियों को प्राथमिकता दें। आपका एक छोटा सा प्रयास न केवल एक गरीब कलाकार के घर में खुशियां ला सकता है, बल्कि भारत की इस 800 साल पुरानी अनमोल विरासत को आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखने में भी बहुत बड़ा योगदान दे सकता है।

अंकिता गौतम एक अभिनेत्री, मॉडल और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर हैं। Tez Khabri पर वे मनोरंजन जगत (Entertainment), बॉलीवुड और लाइफस्टाइल से जुड़ी हर छोटी-बड़ी अपडेट साझा करती हैं। अपनी रचनात्मक शैली और सोशल मीडिया पर मजबूत पकड़ के कारण, वे युवाओं के बीच बेहद लोकप्रिय हैं।
