अयातुल्लाह अली खामेनेई

मध्य पूर्व (Middle East) के इतिहास का सबसे बड़ा भू-राजनीतिक (Geopolitical) भूकंप आ चुका है। दशकों तक ईरान पर लौह-हस्त (Iron-fisted) शासन करने वाले और ‘एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस’ (Axis of Resistance) के मुख्य वास्तुकार, सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई (Ayatollah Ali Khamenei) अब जीवित नहीं हैं। अमेरिका और इजरायल द्वारा किए गए अभूतपूर्व और अचूक ‘डिकैपिटेशन स्ट्राइक’ (Decapitation Strike – नेतृत्व को खत्म करने वाला हमला) ने इस्लामी गणराज्य की नींव को हिलाकर रख दिया है।

इस समय पूरी दुनिया की नज़रें तेहरान पर टिकी हैं। हर न्यूज़ चैनल और कूटनीतिक गलियारे में एक ही खबर गूंज रही है कि अयातुल्लाह अली खामेनेई की हत्या के बाद ईरान सर्वाइवल मोड में, देशभर में हाई अलर्ट घोषित कर दिया गया है। 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद से ईरान ने कभी भी इतने बड़े ‘नेतृत्व के शून्य’ (Leadership Vacuum) और अस्तित्व के संकट का सामना नहीं किया है।

1. ‘सर्वाइवल मोड’ (Survival Mode) क्या है? (ईरान की वर्तमान जमीनी हकीकत)

जब हम यह पढ़ते हैं कि अयातुल्लाह अली खामेनेई की हत्या के बाद ईरान सर्वाइवल मोड में, देशभर में हाई अलर्ट पर है, तो इसका सीधा अर्थ यह है कि ईरान की सरकार और सेना अब आक्रामक रणनीति (Offensive Strategy) से हटकर अपने स्वयं के ‘अस्तित्व को बचाने’ (Defensive/Survival Strategy) में जुट गई है।

सुप्रीम लीडर और 40 से अधिक शीर्ष कमांडरों के खात्मे के बाद, ईरान का पूरा कमांड और कंट्रोल स्ट्रक्चर (Command and Control Structure) पंगु हो गया है। सर्वाइवल मोड के तहत ईरान में वर्तमान में निम्नलिखित खौफनाक कदम उठाए जा रहे हैं:

  • अंडरग्राउंड बंकरों में शिफ्ट हुई लीडरशिप: ईरान के बचे हुए राजनीतिक नेता, राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन (Masoud Pezeshkian) और ‘इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स’ (IRGC) के शेष कमांडर तेहरान की सड़कों से गायब हो गए हैं। उन्हें अज्ञात और सुरक्षित अंडरग्राउंड परमाणु बंकरों (Underground Bunkers) में ले जाया गया है ताकि इजरायल के किसी अन्य संभावित हवाई हमले से उन्हें बचाया जा सके।
  • संचार ब्लैकआउट (Communication Blackout): इजरायली खुफिया एजेंसी ‘मोसाद’ (Mossad) की घुसपैठ के डर से ईरान के शीर्ष सैन्य अधिकारी अब मोबाइल फोन या इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का उपयोग नहीं कर रहे हैं। आदेशों का आदान-प्रदान पुराने रेडियो फ्रीक्वेंसी और कोरियर (Couriers) के माध्यम से किया जा रहा है।
  • सैन्य ठिकानों का विकेंद्रीकरण (Decentralization): ईरान अपनी बची हुई बैलिस्टिक मिसाइलों और ड्रोन लॉन्चरों को खुले सैन्य ठिकानों से हटाकर रिहायशी इलाकों, पहाड़ों की गुफाओं और भूमिगत सुरंगों (Missile Cities) में छिपा रहा है, ताकि उन्हें इजरायली फाइटर जेट्स के निशाने से बचाया जा सके।

2. देशभर में हाई अलर्ट: ‘मार्शल लॉ’ जैसी स्थिति और गृहयुद्ध का डर

ईरान के शासकों को इस समय जितना डर अमेरिका और इजरायल से है, उससे कहीं अधिक डर उन्हें अपनी ही जनता से है।

अयातुल्लाह अली खामेनेई की हत्या के बाद ईरान सर्वाइवल मोड में, देशभर में हाई अलर्ट का सबसे बड़ा असर ईरान के आम नागरिकों पर पड़ रहा है। ईरान सरकार को डर है कि इस नेतृत्व विहीन स्थिति का फायदा उठाकर देश की जनता (जो पहले से ही हिजाब विरोधी ‘वुमन, लाइफ, फ्रीडम’ और 2009 के ग्रीन मूवमेंट जैसे बड़े आंदोलन कर चुकी है) सड़कों पर उतरकर तख्तापलट (Coup/Uprising) की कोशिश कर सकती है।

अयातुल्लाह अली खामेनेई

आंतरिक सुरक्षा के लिए उठाए गए खौफनाक कदम:

  1. बासिज मिलिशिया (Basij Militia) की तैनाती: तेहरान, मशहद और इस्फहान जैसे प्रमुख शहरों के हर चौराहे पर IRGC की खूंखार अर्धसैनिक इकाई ‘बासिज’ के हथियारबंद लड़ाकों को तैनात कर दिया गया है।
  2. इंटरनेट शटडाउन (Internet Shutdown): देश के कई हिस्सों में इंटरनेट सेवाओं को या तो पूरी तरह से बंद कर दिया गया है या उन्हें बेहद धीमा कर दिया गया है ताकि लोग सोशल मीडिया के जरिए संगठित होकर विरोध प्रदर्शन न कर सकें।
  3. कर्फ्यू और अघोषित मार्शल लॉ: 40 दिन के राष्ट्रीय शोक की आड़ में पूरे देश में स्कूल, कॉलेज और प्रमुख बाजार बंद कर दिए गए हैं। रात के समय अघोषित कर्फ्यू लगा दिया गया है। किसी भी प्रकार की भीड़ को इकट्ठा होने से रोकने के लिए पुलिस को ‘शूट एट साइट’ (देखते ही गोली मारने) जैसे कड़े निर्देश दिए जाने की अफवाहें भी गर्म हैं।
  4. विपक्षी नेताओं की गिरफ़्तारी: खुफिया एजेंसी (MOIS) ने रातों-रात सैकड़ों उन कार्यकर्ताओं, पत्रकारों और छात्रों को हिरासत में ले लिया है जिन पर पश्चिमी देशों के समर्थक होने या ‘शासन विरोधी’ (Anti-regime) होने का शक है।

3. सत्ता का शून्यावकाश (Power Vacuum): कौन बनेगा अगला सुप्रीम लीडर?

86 वर्षीय खामेनेई केवल एक नेता नहीं थे; वे ईरान की पूरी व्यवस्था की धुरी (Linchpin) थे। उनके अचानक और हिंसक अंत ने ईरान में सत्ता का एक ऐसा खौफनाक शून्यावकाश पैदा कर दिया है, जो एक भयंकर आंतरिक शक्ति-संघर्ष (Power Struggle) को जन्म दे सकता है।

नए सुप्रीम लीडर का चुनाव ‘असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स’ (Assembly of Experts) नामक 88 मौलवियों की एक समिति द्वारा किया जाता है। लेकिन ट्रम्प के दावों के अनुसार, इस समिति के कई सदस्य भी हमले में मारे गए हैं।

संभावित उत्तराधिकारीपृष्ठभूमि और ताकतचुनौतियां
मोजतबा खामेनेई (Mojtaba Khamenei)अली खामेनेई के 55 वर्षीय पुत्र। पर्दे के पीछे से IRGC और बासिज मिलिशिया पर गहरी पकड़।वंशवाद (Nepotism) का आरोप। 1979 की क्रांति वंशवाद के खिलाफ ही हुई थी। जनता में भारी अलोकप्रियता।
अयातुल्लाह अलीरेज़ा अराफ़ी (Alireza Arafi)वरिष्ठ मौलवी और ‘असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स’ के प्रमुख सदस्य। न्यायपालिका के पूर्व प्रमुख।सेना (IRGC) के बीच मजबूत पकड़ का अभाव। वर्तमान संकट से निपटने के लिए आवश्यक आक्रामकता की कमी।
मसूद पेजेशकियन (Masoud Pezeshkian)वर्तमान राष्ट्रपति। सुधारवादी (Reformist) चेहरा।सुप्रीम लीडर बनने के लिए पर्याप्त धार्मिक रैंक (Grand Ayatollah) न होना। हार्डलाइनर्स का कड़ा विरोध।

क्या ईरान एक ‘सैन्य तानाशाही’ (Military Dictatorship) बन जाएगा?

कई पश्चिमी थिंक-टैंक (जैसे ‘अटलांटिक काउंसिल’) का मानना है कि इस संकट के समय में ‘असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स’ की भूमिका नाममात्र की रह जाएगी। असली सत्ता IRGC (इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स) के जनरलों के हाथों में आ जाएगी। IRGC अब पर्दे के पीछे से शासन करने के बजाय सीधे मार्शल लॉ लगाकर देश को एक सैन्य तानाशाही में बदल सकती है।

4. ‘एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस’ का पतन और क्षेत्रीय छद्म गुटों में हाहाकार

यह स्पष्ट है कि अयातुल्लाह अली खामेनेई की हत्या के बाद ईरान सर्वाइवल मोड में, देशभर में हाई अलर्ट की स्थिति में है, लेकिन इसका असर ईरान की सीमाओं के बाहर भी उतना ही विनाशकारी है।

खामेनेई ने अपने 37 वर्षों के शासन में मध्य पूर्व में अपना दबदबा कायम रखने के लिए जो प्रॉक्सी नेटवर्क (Proxy Network) बनाया था, वह आज अपने ‘गॉडफादर’ के बिना अनाथ हो गया है:

  • हिजबुल्लाह (लेबनान): इजरायल के लगातार हमलों से पहले ही कमजोर हो चुके हिजबुल्लाह के लिए यह सबसे बड़ी चोट है। उन्हें वित्तीय और सैन्य मदद सीधे खामेनेई के कार्यालय से मिलती थी।
  • हमास (गाजा): हमास की लीडरशिप पहले ही खत्म हो चुकी है, और अब उनका सबसे बड़ा समर्थक ईरान खुद अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है।
  • हूती विद्रोही (यमन): लाल सागर (Red Sea) में जहाजों पर हमला करने वाले हूतियों का मनोबल भी अब टूट सकता है, क्योंकि उन्हें हथियार सप्लाई करने वाले IRGC के जनरलों का सफाया हो चुका है।

बिना किसी केंद्रीय कमान (Central Command) के, ये प्रॉक्सी गुट अब या तो बिखर जाएंगे या फिर हताशा में आकर इजरायल और अमेरिकी ठिकानों पर अनियंत्रित और आत्मघाती हमले (Rogue Attacks) करना शुरू कर देंगे।

अयातुल्लाह अली खामेनेई

5. ईरान की जवाबी कार्रवाई: मजबूरी और महाविनाश के बीच का चुनाव

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि ईरान इस ‘डिकैपिटेशन स्ट्राइक’ का बदला कैसे लेगा? ईरान के सामने इस समय ‘कुआं और खाई’ वाली स्थिति है।

विकल्प 1: सीधा और बड़ा सैन्य हमला (All-out War) अगर ईरान अपने सुप्रीम लीडर की हत्या का बदला लेने के लिए इजरायल के शहरों (तेल अवीव, हाइफ़ा) और खाड़ी देशों में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर हजारों बैलिस्टिक मिसाइलें दागता है, तो इसका परिणाम ईरान के लिए विनाशकारी होगा। अमेरिका ने पहले ही चेतावनी दी है कि किसी भी बड़े पलटवार का जवाब ईरान के परमाणु केंद्रों (Nuclear Facilities) और तेल रिफाइनरियों को खाक में मिलाकर दिया जाएगा। ईरान की वर्तमान नेतृत्व विहीन वायुसेना (IRIAF) इजरायल और अमेरिका की संयुक्त हवाई शक्ति का सामना नहीं कर सकती।

विकल्प 2: होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को बंद करना (आर्थिक आतंकवाद) चूंकि ईरान पारंपरिक युद्ध में अमेरिका को नहीं हरा सकता, इसलिए वह दुनिया की अर्थव्यवस्था को बंधक बनाने की कोशिश कर रहा है। ईरान ने ‘होर्मुज जलडमरूमध्य’ को बंद करने की धमकी दी है। दुनिया का 20% कच्चा तेल (Crude Oil) यहीं से गुजरता है। अगर ईरान यहाँ माइन्स (Mines) बिछा देता है या कमर्शियल तेल टैंकरों पर हमले करता है, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड ऑयल की कीमतें $150 से $200 प्रति बैरल तक पहुँच सकती हैं, जिससे पूरी दुनिया में भयंकर मंदी और महंगाई आ जाएगी।

विकल्प 3: साइबर हमले और ग्लोबल टेररिज्म सर्वाइवल मोड में गया ईरान अपने हैकर्स के माध्यम से इजरायल और अमेरिका के बैंकिंग, पावर ग्रिड और वॉटर सप्लाई सिस्टम पर भयंकर साइबर हमले (Cyber Warfare) कर सकता है। साथ ही, दुनिया भर में फैले यहूदी केंद्रों (Jewish Centers) और अमेरिकी दूतावासों पर स्लीपर सेल्स के जरिए आतंकवादी हमले करवा सकता है।

6. वैश्विक कूटनीति: क्या दुनिया तीसरे विश्व युद्ध से बच पाएगी?

इस समय जब न्यूज़ हेडलाइंस चीख-चीख कर कह रही हैं कि अयातुल्लाह अली खामेनेई की हत्या के बाद ईरान सर्वाइवल मोड में, देशभर में हाई अलर्ट, तब वैश्विक कूटनीति भी वेंटिलेटर पर है।

  • रूस और चीन का रुख: रूस (जो यूक्रेन युद्ध में फंसा है) और चीन (जो अपनी अर्थव्यवस्था को लेकर चिंतित है) ने इस हमले की कड़ी निंदा की है। वे दोनों ईरान के सबसे बड़े सहयोगी हैं। यदि वे ईरान को खुलेआम आधुनिक मिसाइलें या परमाणु तकनीक (Nuclear Technology) सौंपते हैं, तो अमेरिका के साथ उनका सीधा टकराव तय है।
  • अरब देशों (सुन्नी मुल्कों) की स्थिति: सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात (UAE), और जॉर्डन जैसे सुन्नी बहुल देश बाहर से शांति की अपील कर रहे हैं, लेकिन अंदरखाने वे अपने कट्टर शिया दुश्मन (खामेनेई) के खात्मे से राहत महसूस कर रहे हैं। हालांकि, उन्हें डर है कि ईरान की गिरती हुई इमारत के मलबे से उनके अपने देश भी न कुचले जाएं।
  • भारत की रणनीति: भारत के लिए यह स्थिति ‘कांटों के ताज’ जैसी है। भारत का 80% तेल आयात इसी क्षेत्र से होता है। इसके अलावा, खाड़ी देशों में 1 करोड़ से ज्यादा भारतीय नागरिक काम करते हैं। प्रधानमंत्री मोदी की अध्यक्षता में कैबिनेट कमिटी ऑन सिक्योरिटी (CCS) की बैठकें लगातार चल रही हैं, ताकि ऊर्जा सुरक्षा और नागरिकों के इवैक्यूएशन (Evacuation) की योजना तैयार रखी जा सके।

7. ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य: जब किसी देश की पूरी लीडरशिप खत्म हो जाती है

इतिहास हमें बताता है कि जब किसी देश की सर्वोच्च लीडरशिप को अचानक से खत्म कर दिया जाता है, तो उसके परिणाम हमेशा अप्रत्याशित (Unpredictable) होते हैं।

  • 2003 में इराक में सद्दाम हुसैन के पतन ने इराक को दशकों लंबे खूनी सांप्रदायिक गृहयुद्ध में धकेल दिया और ISIS जैसे खूंखार आतंकी संगठन को जन्म दिया।
  • 2011 में लीबिया में मुअम्मर गद्दाफी की हत्या के बाद लीबिया आज तक एक ‘विफल राष्ट्र’ (Failed State) बना हुआ है, जहां अलग-अलग गुट सत्ता के लिए लड़ रहे हैं।

ईरान का वर्तमान ढांचा इन दोनों से कहीं अधिक जटिल और विशाल है। 8 करोड़ से अधिक की आबादी और एक शक्तिशाली सैन्य मशीनरी वाले देश में यदि कानून व्यवस्था (Law and Order) चरमराती है, तो वहां से पैदा होने वाला शरणार्थी संकट (Refugee Crisis) और आतंकवाद यूरोप और एशिया को दशकों तक अस्थिर रखेगा।

8. एक युग का अंत और एक भयानक भविष्य की शुरुआत

यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि 28 फरवरी 2026 की रात ने आधुनिक विश्व का नक्शा बदल दिया है।

अयातुल्लाह अली खामेनेई की हत्या के बाद ईरान सर्वाइवल मोड में, देशभर में हाई अलर्ट की स्थिति केवल एक अस्थाई सैन्य रणनीति नहीं है; यह एक 45 साल पुराने इस्लामी गणराज्य (Islamic Republic) के अपने आखिरी दिन गिनने की शुरुआत हो सकती है।

एक तरफ वह शासन है जो बदला लेने के लिए अंधा हो चुका है, दूसरी तरफ वह आम ईरानी नागरिक है जो इस मौके का फायदा उठाकर आज़ादी की सांस लेना चाहता है, और तीसरी तरफ इज़राइल और अमेरिका हैं जो मध्य पूर्व से ईरान के प्रभाव को हमेशा के लिए मिटा देना चाहते हैं।

आने वाले दिन, विशेषकर ’40 दिन के राष्ट्रीय शोक’ की अवधि, दुनिया के लिए बेहद महत्वपूर्ण और खतरनाक साबित होने वाली है। ईरान राख से एक फीनिक्स (Phoenix) की तरह वापस उठेगा या गृहयुद्ध की आग में भस्म हो जाएगा? इस सवाल का जवाब ही अब विश्व शांति का भविष्य तय करेगा।

By Meera Shah

मीरा तेज खबरी (Tez Khabri) के साथ जुड़ी एक समाचार लेखिका हैं। वे सामाजिक मुद्दों, शिक्षा, महिला संबंधित विषयों और जनहित से जुड़ी खबरों पर लेखन करती हैं। मीरा का उद्देश्य पाठकों तक सरल भाषा में सत्यापित, उपयोगी और भरोसेमंद जानकारी पहुंचाना है।

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