फरवरी 2026: उत्तर प्रदेश की राजनीति और धर्म जगत में इन दिनों एक ऐसा तूफान उठा है, जिसने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। एक तरफ हैं ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती (Swami Avimukteshwaranand Saraswati), जो सनातन धर्म के सर्वोच्च धर्मगुरुओं में से एक माने जाते हैं। और दूसरी तरफ है पॉक्सो (POCSO) एक्ट जैसी गंभीर धाराओं में दर्ज हुई एक एफआईआर (FIR)। लेकिन इस पूरे विवाद के केंद्र में एक ऐसा नाम सामने आया है जिसने इस मामले को ‘संत बनाम संत’ और ‘धर्म बनाम राजनीति’ की एक जटिल कहानी में बदल दिया है। यह नाम है—आशुतोष पांडे (Ashutosh Pandey), जिन्हें आशुतोष महाराज या आशुतोष ब्रह्मचारी के नाम से भी जाना जाता है।
प्रयागराज की एक विशेष पॉक्सो कोर्ट के आदेश के बाद जब झूंसी थाने में शंकराचार्य और उनके शिष्यों के खिलाफ एफआईआर दर्ज हुई, तो हर कोई यह जानने को बेताब हो गया कि आखिर देश के इतने बड़े संत पर आरोप लगाने वाला यह शख्स कौन है? जब आशुतोष पांडे की पृष्ठभूमि खंगाली गई, तो जो खुलासे हुए वे न केवल हैरान करने वाले हैं, बल्कि पूरी न्याय व्यवस्था और धर्म की आड़ में चल रहे खेल पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं।
1. विवाद की शुरुआत: प्रयागराज कोर्ट का आदेश और आधी रात को FIR
फरवरी 2026 के अंतिम सप्ताह में उत्तर प्रदेश के प्रयागराज से एक ऐसी खबर आई जिसने धार्मिक गलियारों में भूचाल ला दिया। प्रयागराज की विशेष पॉक्सो कोर्ट के जज विनोद कुमार चौरसिया ने एक याचिका पर सुनवाई करते हुए झूंसी थाने की पुलिस को निर्देश दिया कि वह ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती और उनके प्रमुख शिष्य मुकुंदानंद ब्रह्मचारी सहित अन्य के खिलाफ तत्काल प्रभाव से एफआईआर दर्ज करे।
आरोपों की गंभीरता
यह आदेश शाकुंभरी पीठाधीश्वर आशुतोष ब्रह्मचारी महाराज द्वारा धारा 173(4) के तहत दायर की गई एक शिकायत के आधार पर दिया गया। शिकायतकर्ता का आरोप है कि 13 जनवरी 2025 से 15 फरवरी 2026 के बीच शंकराचार्य के आश्रम (विशेषकर प्रयागराज माघ मेले के दौरान) में नाबालिग बच्चों (बटुकों) का यौन उत्पीड़न किया गया। आरोप यह भी है कि पुलिस ने शुरुआत में इस मामले में केस दर्ज करने से इनकार कर दिया था, जिसके बाद शिकायतकर्ता ने 28 जनवरी को अदालत का दरवाजा खटखटाया। कोर्ट में एक सीडी (CD) भी साक्ष्य के तौर पर पेश की गई, और वीडियोग्राफी के जरिए दो कथित नाबालिग पीड़ितों के बयान भी दर्ज कराए गए।
एफआईआर (FIR) का ब्यौरा
अदालत के सख्त आदेश के बाद, शनिवार रात लगभग 11:30 बजे झूंसी पुलिस स्टेशन में भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धारा 351(3) और यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (POCSO) अधिनियम, 2012 की धारा 3, 4(2), 6, 16, 17 और 51 के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया गया। अब पुलिस इस मामले में इलेक्ट्रॉनिक, डिजिटल और फॉरेंसिक सबूतों की जांच कर रही है।
लेकिन जैसे ही यह खबर मीडिया में आई, शंकराचार्य के समर्थकों और उनके लीगल सेल ने पलटवार करते हुए सीधा हमला शिकायतकर्ता यानी ‘आशुतोष पांडे’ पर कर दिया।

2. आशुतोष पांडे उर्फ आशुतोष महाराज आखिर कौन है? (Who is Ashutosh Pandey?)
जैसे-जैसे मामले की परतें खुल रही हैं, आशुतोष पांडे का नाम विवादों के केंद्र में आता जा रहा है। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने सीधे तौर पर मीडिया (ANI) से बात करते हुए कहा कि आरोप लगाने वाला व्यक्ति कोई सच्चा संत नहीं, बल्कि एक आदतन अपराधी और पुलिस का ‘हिस्ट्रीशीटर’ (History-sheeter) है।
शामली का निवासी और ‘हिस्ट्रीशीट संख्या 76A’
आशुतोष पांडे, जिसका असली या पुराना नाम अश्विनी शर्मा भी बताया जाता है, मूल रूप से पश्चिमी उत्तर प्रदेश के शामली जिले के कांधला थाना क्षेत्र का रहने वाला है। एक समय था जब यह व्यक्ति अपराध की दुनिया का एक जाना-माना नाम था। मीडिया रिपोर्ट्स और पुलिस रिकॉर्ड्स के अनुसार, आशुतोष पांडे की कांधला थाने में बाकायदा एक हिस्ट्रीशीट खुली हुई है, जिसका नंबर 76A है।
एक संत के वेश में घूमने वाले इस शख्स का आपराधिक इतिहास इतना लंबा है कि किसी भी आम नागरिक को अचरज में डाल दे। पुलिस की फाइलों में दर्ज रिकॉर्ड बताते हैं कि आशुतोष पांडे कोई मामूली शिकायतकर्ता नहीं है, बल्कि उसके खिलाफ गंभीर धाराओं में कई आपराधिक मामले दर्ज हैं।
3. हिस्ट्रीशीटर का दाग: 21 मुकदमों की पूरी कुंडली
यह जानना बेहद जरूरी है कि जिस व्यक्ति की गवाही और शिकायत पर देश के एक शंकराचार्य के खिलाफ पॉक्सो जैसी संगीन धारा लगाई गई है, उस व्यक्ति का अपना चरित्र और इतिहास कैसा है। खोजी पत्रकारों (जैसे द रेड माइक के सौरभ शुक्ला) और पुलिस सूत्रों द्वारा जो ‘कुंडली’ सामने लाई गई है, वह चौंकाने वाली है।
आशुतोष पांडे उर्फ आशुतोष महाराज पर कुल 21 आपराधिक मुकदमे दर्ज हैं। ये मुकदमे केवल शामली तक सीमित नहीं हैं, बल्कि लखनऊ और गोंडा जैसे उत्तर प्रदेश के अन्य जिलों में भी फैले हुए हैं। आइए इन मुकदमों की प्रकृति पर एक नज़र डालते हैं:
- गुंडा एक्ट (Goonda Act): आशुतोष पर समाज में दहशत फैलाने और आदतन अपराध करने के चलते गुंडा एक्ट लगाया जा चुका है।
- गैंगस्टर एक्ट (Gangster Act): संगठित अपराध में संलिप्तता के कारण इसके खिलाफ गैंगस्टर एक्ट की कार्रवाई भी हो चुकी है।
- गोवध अधिनियम (Cow Slaughter Act): सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जो व्यक्ति आज ‘सनातन धर्म’ और ‘ब्रह्मचारियों’ की रक्षा का दावा कर रहा है, उस पर अतीत में गो तस्करी और गोवध अधिनियम के तहत भी मामले दर्ज पाए गए हैं। एक स्वयंभू संत के लिए इससे बड़ा विरोधाभास क्या हो सकता है?
- धोखाधड़ी और जमीन कब्जाना (Fraud and Land Grabbing): इसके आपराधिक रिकॉर्ड में जमीनों पर अवैध कब्जा करना और लोगों के साथ वित्तीय धोखाधड़ी करने के मामले भी शामिल हैं।
- आईटी एक्ट (IT Act): साइबर अपराध और फर्जी दस्तावेज या लेटर पैड बनाने जैसे मामलों में भी आशुतोष का नाम सामने आया है।
- 25 हजार का इनाम: एक समय ऐसा भी था जब आशुतोष पांडे उत्तर प्रदेश पुलिस का वांटेड अपराधी था और उसकी गिरफ्तारी पर 25,000 रुपये का इनाम घोषित किया गया था।
- ब्लैकमेलिंग का इतिहास: आरोप यह भी है कि यह व्यक्ति महिलाओं का इस्तेमाल करके लोगों को झूठे मुकदमों में फंसाने और उन्हें ब्लैकमेल करने का एक लंबा इतिहास रखता है। शाहजहांपुर से आए एक व्यक्ति ने तो सरेआम यह बयान दिया है कि आशुतोष महाराज ने उसे भी स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद पर अपनी नाबालिग बेटी के साथ यौन उत्पीड़न का झूठा आरोप लगाने के लिए भारी भरकम पैसे का प्रलोभन दिया था।
अब सवाल यह उठता है कि ऐसा व्यक्ति, जिसके दामन पर इतने दाग हैं, वह अचानक ‘शाकुंभरी पीठाधीश्वर’ कैसे बन गया और उसे इतने बड़े स्तर पर कानूनी और व्यवस्थागत समर्थन कैसे मिल रहा है?
4. ‘भगवा बनाम भगवा’: धर्म और राजनीति का घातक कॉकटेल
इस पूरे प्रकरण को केवल एक कानूनी मामले के तौर पर देखना एक बड़ी भूल होगी। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह उत्तर प्रदेश में चल रहे ‘सफ्रॉन वर्सेस सफ्रॉन’ (भगवा बनाम भगवा) युद्ध का चरम बिंदु है। एक तरफ राज्य की सत्ता पर काबिज मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ हैं, जो खुद गोरक्षपीठ के पीठाधीश्वर हैं, और दूसरी तरफ सनातन धर्म के सर्वोच्च पद पर बैठे शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद हैं।

माघ मेले से शुरू हुआ टकराव
विवाद की असली जड़ प्रयागराज में चल रहे माघ मेले (2025-26) में तलाशी जा सकती है। हाल ही के हफ्तों में, स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और स्थानीय प्रशासन के बीच कई बार तीखी नोकझोंक हुई।
- मौनी अमावस्या का स्नान: शंकराचार्य ने आरोप लगाया था कि प्रशासन ने उन्हें मौनी अमावस्या के पवित्र अवसर पर पालकी में बैठकर त्रिवेणी संगम तक जाने से रोका। उन्हें पैदल जाने के लिए मजबूर किया गया। जब उन्होंने इसका विरोध किया तो पुलिस ने उनके शिष्यों के साथ धक्का-मुक्की की।
- शिविर के बाहर धरना: प्रशासन के रवैये से नाराज होकर शंकराचार्य अपने शिविर के बाहर धरने पर बैठ गए थे। उन्होंने खुलकर योगी सरकार और प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए।
‘आई लव बुलडोजर बाबा’ के नारे और शिविर में घुसपैठ
24 जनवरी 2026 की शाम को हालात तब और बिगड़ गए जब अविमुक्तेश्वरानंद के शिविर में 8-10 असामाजिक तत्व लाठी-डंडों के साथ जबरन घुस गए। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, इन लोगों ने आक्रामक नारेबाजी की, जिसमें ‘आई लव बुलडोजर बाबा’ और ‘योगी जिंदाबाद’ जैसे नारे शामिल थे। यह स्पष्ट रूप से सत्ता पक्ष से जुड़े कट्टरपंथी समूहों द्वारा एक डराने-धमकाने का कृत्य था।
शंकराचार्य ने इस घटना के बाद चेतावनी दी थी कि अगर उनके शिविर की सुरक्षा से खिलवाड़ हुआ तो इसके गंभीर परिणाम होंगे। उन्होंने शिविर के आसपास सीसीटीवी कैमरे लगवाए और आरोप लगाया कि उनके शिविर में अवैध हथियार होने और आय से अधिक संपत्ति रखने की झूठी अफवाहें फैलाई जा रही हैं।
5. स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का पलटवार: “यह एक संगठित कॉकटेल प्रहार है”
जब पॉक्सो कोर्ट के आदेश की खबर सामने आई, तो स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने ज़रा भी विचलित हुए बिना इस पूरे घटनाक्रम को एक ‘सुनियोजित साजिश’ करार दिया। उन्होंने मीडिया से बातचीत में अपने ऊपर लगे सभी आरोपों को ‘मनगढ़ंत’ (Fabricated) बताया।
सनातन धर्म को अपनों से ही खतरा
शंकराचार्य ने एक बहुत ही मार्मिक और गहरा बयान दिया। उन्होंने कहा, “हमारे ऊपर जो आरोप लगाया गया है, वह एक ऐसे व्यक्ति के शिष्य द्वारा लगाया गया है जो खुद को ‘जगद्गुरु’ कहता है। इसका क्या मतलब है? इसका सीधा सा अर्थ यह है कि सनातन धर्म को किसी बाहरी व्यक्ति से कोई खतरा नहीं है, बल्कि भीतर बैठे ये वही लोग हैं जो हिंदू धर्म को नष्ट करना चाहते हैं, जो शंकराचार्य नामक संस्था को खत्म करना चाहते हैं।”
कानूनी पक्ष और बचाव
शंकराचार्य की लीगल टीम ने अदालत को पहले ही सूचित कर दिया था कि शिकायतकर्ता आशुतोष पांडे का पुराना आपराधिक इतिहास है और वह ब्लैकमेलिंग के उद्देश्य से झूठे केस दर्ज कराने का आदी है। स्वामी जी ने स्पष्ट किया कि “अदालत की अपनी प्रक्रिया होती है। अदालत ने शिकायत दर्ज कर ली है और वे इसकी जांच करेंगे। हमने अदालत को बता दिया है कि यह मामला पूरी तरह से फर्जी है। जिस आशुतोष नामक व्यक्ति ने शिकायत की है, वह शामली जिले के कांधला थाने का हिस्ट्रीशीटर है। कई लोग खुद इसके शिकार हुए हैं और बताते हैं कि इस व्यक्ति ने उन पर भी झूठे मुकदमे दर्ज कराए हैं।”
उनका यह भी कहना है कि इस पूरे मामले में उनके चरित्र हनन (Character Assassination) का प्रयास किया जा रहा है। उनके शिष्यों को डराया जा रहा है, और यह सब इसलिए हो रहा है क्योंकि वह सत्ता के सामने झुकने को तैयार नहीं हैं।
6. रामभद्राचार्य के शिष्य का एंगल: संतों के बीच की कलह
इस पूरे विवाद में एक और नाम बड़ी प्रमुखता से उभर कर सामने आ रहा है—स्वामी रामभद्राचार्य। आशुतोष पांडे, जिसने यह एफआईआर दर्ज कराई है, खुद को ‘श्री कृष्ण जन्मभूमि मुक्ति निर्माण ट्रस्ट’ से जुड़ा बताता है और वह स्वामी रामभद्राचार्य का करीबी शिष्य माना जाता है।
रामभद्राचार्य और योगी सरकार की निकटता
यह किसी से छिपा नहीं है कि स्वामी रामभद्राचार्य की केंद्र की बीजेपी सरकार और उत्तर प्रदेश की योगी सरकार से काफी निकटता है। राम मंदिर आंदोलन से लेकर हाल के कई राजनीतिक-धार्मिक मुद्दों पर वे सरकार के पक्ष में खड़े नज़र आए हैं। दूसरी ओर, स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद शुरुआत से ही अपने स्वतंत्र और बेबाक बयानों के लिए जाने जाते हैं। चाहे वह राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा के मुहूर्त का मुद्दा हो या ‘संविधान बनाम शास्त्र’ की बहस, उन्होंने कभी भी राजनीतिक दबाव में आकर अपने धार्मिक विचारों से समझौता नहीं किया।
‘बटुकों का सम्मान’ बनाम ‘राजनीतिक मोहरा’
शंकराचार्य के समर्थकों का आरोप है कि जिन ‘बटुकों’ (युवा शिष्यों) के यौन शोषण का आरोप लगाया जा रहा है, उन्हीं बटुकों को प्रशासन ने त्रिवेणी संगम जाते समय लाठियों से पीटा था और उनकी चोटी पकड़कर खींचा था। अब सत्ता पक्ष अपने बचाव के लिए और शंकराचार्य को नीचा दिखाने के लिए उन्हीं बटुकों का सहारा लेकर एक हिस्ट्रीशीटर के माध्यम से झूठा केस गढ़ रहा है। यह संत समाज को बांटने और एक विशेष विचारधारा को थोपने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।
7. अखिलेश यादव और विपक्ष की एंट्री (The Political Repercussions)
जब मामला इतना बड़ा हो और उसमें सीधा टकराव उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री से हो, तो विपक्ष भला कैसे शांत रह सकता है? समाजवादी पार्टी (Samajwadi Party) के प्रमुख अखिलेश यादव ने भी इस मुद्दे पर सरकार को घेरा है।
विपक्षी नेताओं और कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण समाज इस घटनाक्रम से खासा नाराज है। जिस तरह से एक प्रतिष्ठित ब्राह्मण धर्मगुरु (शंकराचार्य) के शिविर में घुसकर सत्ता समर्थित गुंडों ने हंगामा किया और फिर उन पर पॉक्सो जैसा घिनौना आरोप लगाया गया, उसने ‘अगड़े’ (Forward Castes) वोट बैंक में बेचैनी पैदा कर दी है। अखिलेश यादव ने अपने ‘पीडीए’ (PDA – पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले में अगड़ों और महिलाओं पर हो रहे अत्याचार को जोड़कर सरकार पर तीखा प्रहार किया है।
राजनीतिक गलियारों में यह भी चर्चा है कि इस विवाद के जरिए 2027 के विधानसभा चुनावों के लिए एक नई ‘धर्मयुद्ध’ की जमीन तैयार की जा रही है, जहां बीजेपी को अपने ही कोर हिंदुत्व वोट बैंक के भीतर बगावत का सामना करना पड़ सकता है।
8. ‘संविधान से ऊपर शास्त्र’ और प्रशासनिक फेरबदल
इस पूरे विवाद के बीच, एक और घटना ने लोगों का ध्यान खींचा। हाल ही में एक सिटी मजिस्ट्रेट (बरेली के अफसर) के अचानक कुर्सी छोड़ने और इस्तीफा देने की खबर सामने आई। सूत्रों का कहना है कि प्रशासन के भीतर भी कई अधिकारी इस ‘संतों की लड़ाई’ में मोहरा बनने से बच रहे हैं।
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का वह बयान, जिसमें उन्होंने कथित तौर पर कहा था कि धार्मिक मामलों में “संविधान से ऊपर शास्त्र” होते हैं, ने भी खूब सुर्खियां बटोरीं। यह बयान एक स्पष्ट संदेश था कि शंकराचार्य किसी भी राजनीतिक या प्रशासनिक दबाव को स्वीकार नहीं करेंगे जब बात सनातन धर्म की प्राचीन परंपराओं और नियमों की हो। उनके इसी अडिग रवैये ने उन्हें सत्ता के आंखों की किरकिरी बना दिया है।
9. न्याय व्यवस्था और फॉरेंसिक जांच: आगे क्या होगा?
अब जबकि एफआईआर दर्ज हो चुकी है, तो कानूनी तौर पर आगे की राह कैसी होगी?
- गिरफ्तारी की तलवार: चूंकि पॉक्सो एक्ट गैर-जमानती और बेहद सख्त कानून है, इसलिए सिद्धांततः पुलिस को तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार करना चाहिए। यही कारण है कि सोशल मीडिया पर “यूपी पुलिस अरेस्ट शंकराचार्य” (UP Police Arrest Shankaracharya) जैसी अटकलें तेज हो गई हैं और वाराणसी में भारी पुलिस बल की सुगबुगाहट की खबरें भी हैं।
- साक्ष्यों की जांच: अदालत ने स्पष्ट निर्देश दिया है कि जो सीडी (CD) या इलेक्ट्रॉनिक सबूत शिकायतकर्ता आशुतोष पांडे ने पेश किए हैं, उनकी सख्त फॉरेंसिक जांच (Forensic Verification) की जाए। अगर जांच में यह सीडी फर्जी या ‘डीपफेक’ (Deepfake) साबित होती है, तो यह पूरा मामला आशुतोष पांडे पर ही भारी पड़ सकता है।
- न्यायिक लड़ाई: स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की लीगल टीम इस एफआईआर को रद्द कराने (Quashing of FIR) के लिए सीधे उच्च न्यायालय (High Court) या सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) का रुख कर सकती है। उनका मुख्य आधार शिकायतकर्ता का आपराधिक इतिहास और मामले का ‘राजनीतिक दुर्भावना’ (Political Vendetta) से प्रेरित होना होगा।
10. गूगल न्यूज़ स्पेशल विश्लेषण: यह केस समाज के लिए क्यों चिंताजनक है?
2026 के इस दौर में, जहां सूचनाएं पलक झपकते ही सोशल मीडिया पर फैल जाती हैं, वहां इस तरह के विवाद समाज पर गहरा असर छोड़ते हैं।
- संस्थाओं पर विश्वास का संकट: जब एक व्यक्ति जिसके खिलाफ गोवध, गुंडा एक्ट और गैंगस्टर एक्ट जैसे 21 मामले दर्ज हों, वह रातों-रात ‘ब्रह्मचारी’ बनकर किसी शंकराचार्य पर केस कर दे और प्रशासन उस पर त्वरित कार्रवाई करे, तो आम जनता का न्याय व्यवस्था से विश्वास डगमगाता है।
- पॉक्सो एक्ट का दुरुपयोग: महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा के लिए बनाए गए कानूनों (जैसे दहेज प्रथा या पॉक्सो) का अक्सर बदला लेने या ब्लैकमेल करने के लिए दुरुपयोग होता रहा है। यदि यह आरोप झूठा साबित होता है, तो यह पॉक्सो एक्ट के दुरुपयोग का देश का सबसे बड़ा और ‘हाई-प्रोफाइल’ मामला बन जाएगा।
- संत समाज का पतन: आपसी ईर्ष्या और राजनीतिक संरक्षण पाने की होड़ में संतों का एक गुट दूसरे गुट को जिस तरह से निशाना बना रहा है, वह सनातन धर्म की छवि को वैश्विक स्तर पर धूमिल कर रहा है। ‘भगवा बनाम भगवा’ की इस लड़ाई में असली नुकसान हिंदू आस्था का हो रहा है।
सत्य की परीक्षा और धर्म का भविष्य
अविमुक्तेश्वरानंद बनाम आशुतोष पांडे का यह मामला अब केवल एक आपराधिक जांच तक सीमित नहीं रह गया है। यह भारत की वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था, न्यायपालिका की निष्पक्षता और धर्मगुरुओं की स्वायत्तता का एक ‘लिटमस टेस्ट’ बन गया है।
क्या सच में शंकराचार्य के आश्रम में कुछ गलत हो रहा था, या फिर यह एक हिस्ट्रीशीटर द्वारा रची गई एक खौफनाक साजिश है जिसे सत्ता के गलियारों से मौन समर्थन प्राप्त है? क्या आशुतोष पांडे केवल एक मुखौटा है और असली खिलाड़ी कोई और है? ये वो सवाल हैं जिनके जवाब आने वाले दिनों में जांच एजेंसियों और अदालतों को देश के सामने रखने होंगे।
लेकिन एक बात तो तय है—जब तक शामली के कांधला थाने की हिस्ट्रीशीट 76A का सच पूरी तरह से जनता के सामने नहीं आ जाता, तब तक इस ‘बलात्कार और ब्लैकमेल’ के खेल में किसी को भी क्लीन चिट देना जल्दबाजी होगी। 2026 का यह ‘धर्मयुद्ध’ अभी अपने पहले चरण में है, और इसकी गूंज आने वाले लंबे समय तक भारतीय राजनीति और समाज में सुनाई देती रहेगी।
