“जब एक बच्ची, जो खुद अभी खिलौनों से खेलने की उम्र में है, उसे मां बनने पर मजबूर किया जाए, तो यह समाज और कानून दोनों के लिए एक परीक्षा की घड़ी होती है।”
आज, 18 फरवरी 2026 को गुजरात हाईकोर्ट (Gujarat High Court) ने एक ऐसा फैसला सुनाया है जिसने एक बार फिर साबित कर दिया है कि भारतीय न्यायपालिका के लिए ‘पीड़ित का हित’ (Best Interest of the Victim) सर्वोपरि है। अदालत ने एक 13 वर्षीय रेप सर्वाइवर को उसकी 15 सप्ताह की गर्भावस्था को समाप्त करने की तत्काल अनुमति दे दी है।
यह मामला केवल कानूनी अनुमति का नहीं है; यह एक मासूम के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को बचाने, उसके भविष्य को सुरक्षित करने और उसे उस आघात से मुक्ति दिलाने का है, जो उसे एक जघन्य अपराध (बलात्कार) के कारण मिला।
अध्याय 1: मामला क्या था? (The Case Details)
यह घटना बेहद दुखद और विचलित करने वाली है। एक 13 वर्षीय नाबालिग लड़की, जो अभी अपनी किशोरावस्था की दहलीज पर ही थी, एक हवस के दरिंदे का शिकार बनी। भारतीय दंड संहिता (BNS/IPC) और पॉक्सो एक्ट (POCSO Act) के तहत मामला दर्ज किया गया था।
समस्या: जब तक परिवार को बच्ची की गर्भावस्था के बारे में पता चला, तब तक गर्भ 15 सप्ताह (Weeks) का हो चुका था। भारत में ‘मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी एक्ट’ (MTP Act) के तहत, नाबालिगों और विशेष श्रेणियों के लिए गर्भपात की अनुमति है, लेकिन जब मामला कोर्ट में जाता है, तो इसके कई कानूनी और चिकित्सकीय पहलू होते हैं।

याचिका (Petition): पीड़िता के पिता ने गुजरात हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। उनकी याचिका में स्पष्ट कहा गया था कि:
- बच्ची की उम्र (13 वर्ष) मां बनने के लिए शारीरिक रूप से उपयुक्त नहीं है।
- इस गर्भावस्था को जारी रखने से बच्ची को भारी मानसिक आघात (Mental Trauma) पहुंचेगा।
- यह गर्भावस्था एक अपराध (रेप) का परिणाम है, इसलिए इसे समाप्त करने की अनुमति दी जाए।
अध्याय 2: हाईकोर्ट का फैसला – ‘त्वरित और संवेदनशील’
गुजरात हाईकोर्ट के माननीय न्यायाधीश ने मामले की गंभीरता को समझते हुए तनिक भी देरी नहीं की। आमतौर पर अदालती प्रक्रियाओं में समय लगता है, लेकिन यहाँ ‘समय’ ही सबसे बड़ा शत्रु था।
अदालत का अवलोकन (Observation): कोर्ट ने कहा कि अगर एक 13 साल की बच्ची को जबरन इस गर्भावस्था को ढोने पर मजबूर किया गया, तो यह उसके मानवाधिकारों का हनन होगा। यह न केवल उसके शरीर के लिए खतरनाक है, बल्कि उसके पूरे जीवन पर एक काला धब्बा लगा सकता है।
आदेश (The Order):
- तत्काल टर्मिनेशन: कोर्ट ने सिविल अस्पताल (संभवतः सोला या असरवा सिविल अस्पताल) के डॉक्टरों को निर्देश दिया कि वे तत्काल प्रभाव से गर्भपात की प्रक्रिया शुरू करें।
- डीएनए संरक्षण (DNA Preservation): चूंकि यह एक रेप केस है, इसलिए कोर्ट ने आदेश दिया कि गर्भस्थ भ्रूण (Fetus) का टिश्यू सैंपल और डीएनए सुरक्षित रखा जाए। यह भविष्य में आरोपी को सजा दिलाने में सबसे बड़ा सबूत बनेगा।
- पीड़िता की देखभाल: कोर्ट ने अस्पताल प्रशासन को निर्देश दिया कि प्रक्रिया के बाद बच्ची को आवश्यक काउंसलिंग और पोस्ट-ऑपरेटिव देखभाल प्रदान की जाए।
अध्याय 3: मेडिकल परिप्रेक्ष्य – 13 साल की उम्र में जोखिम
इस फैसले को सही ठहराने के लिए हमें चिकित्सा विज्ञान को समझना होगा। आखिर 13 साल की बच्ची के लिए गर्भधारण करना इतना खतरनाक क्यों है?
शारीरिक जोखिम (Physical Risks):
- अविकसित पेल्विस (Pelvis): 13 साल की उम्र में लड़कियों की पेल्विक हड्डियां (Pelvic Bones) पूरी तरह विकसित नहीं होती हैं। ऐसे में प्रसव (Delivery) के दौरान जान जाने का खतरा बहुत अधिक होता है।
- एनीमिया और कुपोषण: किशोरियों में खून की कमी आम है। गर्भावस्था में शरीर को अतिरिक्त पोषण की जरूरत होती है, जो एक बच्ची का शरीर प्रदान करने में सक्षम नहीं होता।
- प्री-एक्लेमप्सिया: कम उम्र में हाई ब्लड प्रेशर और दौरे पड़ने का खतरा बढ़ जाता है।
मानसिक जोखिम (Mental Trauma): एक बच्ची, जो खुद अभी बच्चा है, वह मातृत्व की जिम्मेदारी कैसे उठा सकती है? रेप से पैदा हुआ बच्चा उसे ताउम्र उस हादसे की याद दिलाता रहेगा। इसे ‘Post Traumatic Stress Disorder’ (PTSD) कहते हैं।
इसलिए, 15 हफ्ते (जो कि सुरक्षित सीमा के भीतर है) में गर्भपात करना ही एकमात्र मानवीय विकल्प था।

अध्याय 4: भारत का गर्भपात कानून (MTP Act) क्या कहता है?
इस फैसले को समझने के लिए हमें भारत के MTP (Amendment) Act, 2021 को जानना जरूरी है। यह दुनिया के सबसे प्रगतिशील कानूनों में से एक है।
कानून के मुख्य प्रावधान:
- 0 से 20 सप्ताह:
- एक पंजीकृत डॉक्टर (RMP) की सलाह पर गर्भपात किया जा सकता है।
- यह किसी भी महिला के लिए लागू है (चाहे विवाहित हो या अविवाहित)।
- 20 से 24 सप्ताह:
- दो डॉक्टरों की राय जरूरी है।
- यह विशेष श्रेणियों के लिए है: जैसे रेप सर्वाइवर (बलात्कार पीड़िता), नाबालिग (Minors), दिव्यांग महिलाएं, या अगर महिला की वैवाहिक स्थिति बदल गई हो (तलाक/विधवा)।
- इस केस में 13 वर्षीय पीड़िता इसी श्रेणी में आती है।
- 24 सप्ताह के बाद:
- केवल मेडिकल बोर्ड की अनुमति से।
- यह तब किया जाता है जब भ्रूण में कोई गंभीर असामान्यता (Fetal Abnormality) हो या मां की जान को खतरा हो।
महत्वपूर्ण नोट: MTP एक्ट की धारा 3(4) के अनुसार, अगर लड़की नाबालिग (18 साल से कम) है, तो गर्भपात के लिए उसके अभिभावक (Guardian) की लिखित सहमति अनिवार्य है। इस केस में पिता ने कोर्ट के माध्यम से सहमति दी।
अध्याय 5: पॉक्सो एक्ट (POCSO) और गोपनीयता
जब कोई नाबालिग गर्भपात के लिए अस्पताल जाती है, तो डॉक्टर के लिए पुलिस को सूचित करना अनिवार्य होता है (POCSO एक्ट के तहत)। कई बार इस डर से परिवार वाले झोलाछाप डॉक्टरों के पास चले जाते हैं, जो जानलेवा साबित होता है।
लेकिन हाईकोर्ट के हस्तक्षेप ने यह सुनिश्चित किया कि:
- प्रक्रिया कानूनी रूप से हो।
- बच्ची की पहचान (Identity) गुप्त रखी जाए।
- अस्पताल में पुलिस का व्यवहार संवेदनशील हो।

अध्याय 6: समाज की भूमिका – ‘कलंक’ से ‘करुणा’ तक
गुजरात हाईकोर्ट का फैसला तो आ गया, लेकिन समाज का फैसला क्या है?
- विक्टिम ब्लेमिंग (Victim Blaming): अक्सर ऐसे मामलों में समाज पीड़िता को ही दोषी ठहराने लगता है। हमें यह मानसिकता बदलनी होगी। वह अपराधी नहीं, अपराध की शिकार है।
- काउंसलिंग की जरूरत: गर्भपात के बाद बच्ची को सामान्य जीवन में लौटने के लिए परिवार और समाज के सहयोग की जरूरत होगी।
- यौन शिक्षा (Sex Education): बच्चों को ‘गुड टच, बैड टच’ और अपनी सुरक्षा के बारे में जागरूक करना अब समय की मांग नहीं, बल्कि अनिवार्यता है।
अध्याय 7: सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों की नज़ीर
गुजरात हाईकोर्ट का यह फैसला सुप्रीम कोर्ट की उस लकीर पर चलता है जो उसने ‘X vs Union of India’ (2022) मामले में खींची थी। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा था कि:
- “हर महिला को अपनी ‘प्रजनन स्वायत्तता’ (Reproductive Autonomy) का अधिकार है।”
- “नाबालिगों को सुरक्षित गर्भपात से वंचित करना उनके जीने के अधिकार (Article 21) का उल्लंघन है।”
गुजरात हाईकोर्ट ने इसी संवैधानिक भावना को बरकरार रखा है।
न्याय की मशाल
18 फरवरी 2026 का यह फैसला केवल एक केस का निपटारा नहीं है, बल्कि यह उन हजारों बेजुबान बच्चियों के लिए उम्मीद की किरण है जो ऐसे हालातों में फंस जाती हैं।
न्यायालय ने तत्परता दिखाकर एक 13 साल की बच्ची का बचपन बचाने का प्रयास किया है। अब डॉक्टरों की जिम्मेदारी है कि वे इस प्रक्रिया को सुरक्षित रूप से पूरा करें, और पुलिस की जिम्मेदारी है कि उस दरिंदे को सख्त से सख्त सजा (फांसी या आजीवन कारावास) दिलाए, जिसकी वजह से यह नौबत आई।
हमारा संदेश: अगर आपके आसपास किसी महिला या बच्ची को ऐसी मदद की जरूरत हो, तो डरे नहीं। कानून आपके साथ है। सही समय पर लिया गया कानूनी कदम किसी की जिंदगी बचा सकता है।
महत्वपूर्ण हेल्पलाइन:
- चाइल्डलाइन: 1098
- महिला हेल्पलाइन: 181
- पुलिस: 100 / 112
