Supreme Court Stem Cell Therapy Autism

उम्मीद का व्यापार बनाम विज्ञान की सच्चाई

भारत में ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर (Autism Spectrum Disorder – ASD) से जूझ रहे बच्चों के माता-पिता हर दिन एक संघर्ष जीते हैं। अपने बच्चे को दुनिया के साथ तालमेल बिठाते देखने की चाहत में, वे अक्सर हर उस दरवाजे को खटखटाते हैं जहाँ से ‘इलाज’ की थोड़ी सी भी रोशनी दिखाई दे। इसी हताशा (Desperation) और उम्मीद के बीच पिछले कुछ सालों में भारत में एक नया बाजार खड़ा हुआ—Stem Cell Therapy का बाजार।

देश के कई बड़े शहरों में क्लिनिक और अस्पताल यह दावा कर रहे थे कि वे स्टेम सेल थेरेपी के जरिए ऑटिज्म को ‘ठीक’ कर सकते हैं या उसके लक्षणों में भारी सुधार ला सकते हैं। लाखों रुपये खर्च करने के बाद भी जब परिणाम नहीं मिले, तो सवाल उठने लगे। क्या यह विज्ञान है या सिर्फ एक प्रयोग?

आज, 2 फरवरी 2026 को Supreme Court of India ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए इस बहस पर विराम लगा दिया है। शीर्ष अदालत ने National Medical Commission (NMC) के उस निर्णय को सही ठहराया है जिसमें ऑटिज्म के इलाज के लिए स्टेम सेल थेरेपी के व्यावसायिक उपयोग पर रोक लगाई गई थी।

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि ऑटिज्म के लिए स्टेम सेल थेरेपी अभी भी “Experimental” (प्रायोगिक) चरण में है और इसे एक मानक उपचार (Standard Treatment) के रूप में नहीं बेचा जा सकता।

भाग 1: सुप्रीम कोर्ट का फैसला – ‘इलाज’ या ‘प्रयोग’? (The Verdict)

यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक कैसे पहुंचा, यह जानना दिलचस्प है। दरअसल, NMC (राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान आयोग) ने ऑटिज्म के लिए स्टेम सेल थेरेपी को ‘अनुशंसित उपचार’ मानने से इनकार कर दिया था। इसके खिलाफ कुछ डॉक्टर्स और पेरेंट्स एसोसिएशन ने याचिका दायर की थी। उनका तर्क था कि यह थेरेपी कारगर है और इस पर रोक लगाना मरीज के ‘इलाज के अधिकार’ का हनन है।

कोर्ट ने क्या कहा? जस्टिस की बेंच ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद कहा:

  1. पर्याप्त सबूत नहीं: वर्तमान में ऐसा कोई भी ग्लोबल क्लिनिकल डेटा या रैंडमाइज्ड कंट्रोल ट्रायल (RCT) मौजूद नहीं है जो यह साबित करे कि स्टेम सेल थेरेपी ऑटिज्म को ठीक कर सकती है।
  2. प्रीडेटरी मार्केटिंग (Predatory Marketing): कोर्ट ने चिंता जताई कि कई क्लीनिक माता-पिता की भावनाओं का फायदा उठाकर, झूठे वादे करके लाखों रुपये वसूल रहे हैं। इसे ‘अनैतिक’ बताया गया।
  3. सुरक्षा जोखिम: कोर्ट ने विशेषज्ञों की राय का हवाला देते हुए कहा कि बच्चों की रीढ़ की हड्डी में इंजेक्शन लगाने या उनके शरीर में बाहरी सेल डालने के गंभीर साइड इफेक्ट्स हो सकते हैं।
  4. फैसला: कोर्ट ने आदेश दिया कि ऑटिज्म के लिए स्टेम सेल थेरेपी का उपयोग केवल Clinical Trials (कड़े नियमों के तहत होने वाले शोध) के रूप में ही किया जा सकता है। इसे ‘थेरेपी’ या ‘इलाज’ बताकर खुले बाजार में बेचा नहीं जा सकता।
Supreme Court Stem Cell Therapy Autism

भाग 2: ऑटिज्म क्या है? (Understanding Autism)

इस फैसले की गहराई को समझने के लिए हमें पहले यह समझना होगा कि ऑटिज्म क्या है।

ASD कोई बीमारी नहीं है: ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर एक Neurodevelopmental Condition (स्नायविक विकास संबंधी स्थिति) है। यह कोई बीमारी (Disease) नहीं है जिसे दवा या सर्जरी से ‘काटा’ जा सके।

  • इसमें बच्चे का दिमाग दूसरों से अलग तरीके से काम करता है।
  • संचार (Communication), सामाजिक मेलजोल और व्यवहार में दोहराव (Repetitive Behavior) इसके मुख्य लक्षण हैं।

समस्या कहां है? चूंकि मेडिकल साइंस के पास ऑटिज्म का कोई “Cure” (इलाज) नहीं है, इसलिए माता-पिता अक्सर वैकल्पिक चिकित्सा की तरफ भागते हैं। यहीं पर स्टेम सेल थेरेपी अपना जाल फैलाती है।

भाग 3: स्टेम सेल थेरेपी का हाइप – क्या वादा किया जाता है? (The Hype)

स्टेम सेल (Stem Cells) हमारे शरीर की ‘मास्टर सेल्स’ होती हैं। इनमें शरीर के किसी भी अंग या ऊतक (Tissue) को बनाने या रिपेयर करने की क्षमता होती है। ब्लड कैंसर (Leukemia) जैसे रोगों में बोन मैरो ट्रांसप्लांट के जरिए इसका सफल उपयोग दशकों से हो रहा है।

ऑटिज्म में दावा: कुछ निजी क्लीनिक दावा करते हैं कि:

  1. ऑटिज्म दिमाग में ‘सूजन’ (Inflammation) या ऑक्सीजन की कमी के कारण होता है।
  2. अगर हम बच्चे के शरीर में स्टेम सेल्स इंजेक्ट करें, तो वे दिमाग में जाकर डैमेज हुए न्यूरॉन्स को रिपेयर कर देंगे।
  3. इससे बच्चा बोलने लगेगा, उसका आई-कॉन्टेक्ट सुधर जाएगा और वह ‘नॉर्मल’ हो जाएगा।

सुनने में यह किसी चमत्कार जैसा लगता है। और यही कारण है कि माता-पिता अपना घर, ज़मीन और गहने बेचकर 5 लाख से 15 लाख रुपये तक के पैकेज खरीदते हैं।

भाग 4: विज्ञान क्या कहता है? (The Scientific Reality)

सुप्रीम कोर्ट ने हवा में फैसला नहीं दिया। उन्होंने ICMR (इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च) और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की रिपोर्ट्स का अध्ययन किया।

वैज्ञानिक वास्तविकता:

  1. कॉम्प्लेक्स डिसऑर्डर: ऑटिज्म केवल एक हिस्से की खराबी नहीं है। यह जेनेटिक्स और पर्यावरण के जटिल मिश्रण से होता है। स्टेम सेल जाकर सीधे दिमाग को ‘रिवायर’ (Rewire) कर देंगी, यह सोचना वैज्ञानिक रूप से अपरिपक्व है।
  2. प्लेसीबो इफेक्ट (Placebo Effect): कई बार माता-पिता को लगता है कि थेरेपी के बाद सुधार हुआ है। लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि यह सुधार अक्सर बच्चे की प्राकृतिक ग्रोथ या साथ में चल रही स्पीच थेरेपी का नतीजा होता है, न कि स्टेम सेल का।
  3. कोई सबूत नहीं: दुनिया की सबसे बड़ी ड्रग रेगुलेटर US FDA ने भी ऑटिज्म के लिए स्टेम सेल को मंजूरी नहीं दी है। उन्होंने इसे “संभावित रूप से असुरक्षित” माना है।

भाग 5: खतरे और साइड इफेक्ट्स (The Risks involved)

कोर्ट ने सबसे ज्यादा चिंता बच्चों की सुरक्षा को लेकर जताई। यह प्रक्रिया उतनी सीधी नहीं है जितनी बताई जाती है।

  1. इंजेक्शन का तरीका: अक्सर स्टेम सेल्स को Intrathecal तरीके से (रीढ़ की हड्डी में इंजेक्शन लगाकर) दिया जाता है। यह बच्चों के लिए बेहद दर्दनाक और जोखिम भरा हो सकता है।
  2. ट्यूमर का खतरा: बाहरी स्टेम सेल्स शरीर के अंदर जाकर अनियंत्रित रूप से बढ़ सकती हैं और ट्यूमर (Tumor) या कैंसर का रूप ले सकती हैं।
  3. इम्यून रिजेक्शन: शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली बाहरी सेल्स को ‘दुश्मन’ मानकर हमला कर सकती है, जिससे जानलेवा रिएक्शन हो सकता है।
  4. दौरे (Seizures): कुछ मामलों में थेरेपी के बाद बच्चों में मिर्गी के दौरे पड़ने की घटनाएं भी सामने आई हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “हम मासूम बच्चों को गिनी पिग (प्रयोग का जानवर) नहीं बनने दे सकते।”

भाग 6: माता-पिता का दर्द और शोषण का बाज़ार (Exploitation of Hope)

यह फैसला उन माता-पिता के लिए एक झटका हो सकता है जो इसे आखिरी उम्मीद मान रहे थे, लेकिन यह उन्हें Financial Exploitation (आर्थिक शोषण) से बचाने के लिए भी जरूरी था।

मार्केटिंग का खेल:

  • क्लीनिक अक्सर सोशल मीडिया पर ऐसे वीडियो डालते हैं जिनमें ‘बिफोर और आफ्टर’ के जादुई नतीजे दिखाए जाते हैं। (जो अक्सर भ्रामक होते हैं)।
  • वे वैज्ञानिक शब्दों का भारी-भरकम इस्तेमाल करके (जैसे Mesenchymal Cells, Regenerative Medicine) माता-पिता को भ्रमित करते हैं।
  • जब थेरेपी काम नहीं करती, तो कहा जाता है- “हर बच्चे की बॉडी अलग है, आपको एक और सेशन लेना होगा।”

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला इस ‘लूट’ पर लगाम लगाएगा।

Supreme Court Stem Cell Therapy Autism

भाग 7: NMC और एथिक्स कमेटी की भूमिका

National Medical Commission (NMC) ने अपनी गाइडलाइंस में स्पष्ट कहा है कि स्टेम सेल थेरेपी का इस्तेमाल केवल रक्त-संबंधी विकारों (Blood Disorders) के लिए ही अप्रूव्ड है।

  • ऑटिज्म, सेरेब्रल पाल्सी या मस्कुलर डिस्ट्रॉफी के लिए इसे बेचना Professional Misconduct (पेशेवर कदाचार) माना जाएगा।
  • जो डॉक्टर ऐसा करते पाए जाएंगे, उनका लाइसेंस रद्द हो सकता है।

सुप्रीम कोर्ट ने NMC के इस कड़े रुख की सराहना की और इसे सख्ती से लागू करने का निर्देश दिया।

भाग 8: तो अब माता-पिता क्या करें? (What is the Alternative?)

अगर स्टेम सेल रास्ता नहीं है, तो ऑटिज्म वाले बच्चों के लिए सही रास्ता क्या है? कोर्ट ने कहा कि हमें Evidence-Based Therapies (प्रमाण-आधारित चिकित्सा) पर ध्यान देना चाहिए।

ऑटिज्म ‘ठीक’ नहीं होता, लेकिन सही इंटरवेंशन से बच्चा आत्मनिर्भर बन सकता है। इसमें शामिल हैं:

  1. ऑक्यूपेशनल थेरेपी (Occupational Therapy – OT): जो बच्चे को रोजमर्रा के काम करना और सेंसरी इश्यूज को संभालना सिखाती है।
  2. स्पीच थेरेपी (Speech Therapy): संचार कौशल सुधारने के लिए।
  3. एप्लाइड बिहेवियर एनालिसिस (ABA): व्यवहार को समझने और सुधारने के लिए।
  4. स्पेशल एजुकेशन: बच्चे की सीखने की क्षमता के अनुसार पढ़ाई।

ये थेरेपी धीमी हैं, इसमें मेहनत लगती है, लेकिन यही एकमात्र वैज्ञानिक रास्ता है जो दीर्घकालिक (Long Term) परिणाम देता है।

भाग 9: क्या शोध (Research) भी बंद हो जाएगा

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि इसने Research पर रोक नहीं लगाई है।

  • कोर्ट ने कहा कि अगर कोई संस्थान ऑटिज्म पर स्टेम सेल का शोध करना चाहता है, तो उसे सरकार से अनुमति लेनी होगी।
  • यह एक Clinical Trial के रूप में होगा।
  • सबसे बड़ी बात: ट्रायल में शामिल मरीजों से पैसा नहीं लिया जा सकता

यह अंतर बहुत बड़ा है। अभी तक क्लीनिक इसे ‘ट्रायल’ कहकर भी लाखों रुपये वसूल रहे थे। अब अगर यह ट्रायल है, तो यह मुफ्त होना चाहिए और इसका डेटा पब्लिश होना चाहिए।

भाग 10: न्यूरोडायवर्सिटी को स्वीकारना (Acceptance is Key)

इस फैसले के बाद एक सामाजिक बहस भी छिड़ गई है। क्या हमें ऑटिज्म को ‘ठीक’ करने की इतनी कोशिश करनी चाहिए? Neurodiversity Movement का मानना है कि ऑटिज्म दिमाग की एक अलग वायरिंग है, कोई टूटी हुई मशीन नहीं।

  • बच्चों को दर्दनाक इंजेक्शन्स और सर्जरी से गुजारने के बजाय, हमें एक ऐसा समाज बनाने पर जोर देना चाहिए जो उन्हें स्वीकार करे।
  • पैसा ‘इलाज’ पर नहीं, बल्कि ‘सपोर्ट सिस्टम’ पर खर्च होना चाहिए।

भाग 11: दुनिया भर में क्या स्थिति है? (Global Context)

भारत अकेला देश नहीं है जिसने यह कदम उठाया है।

  • USA: एफडीए (FDA) ने “Rogue Clinics” (धोखेबाज क्लीनिक) के खिलाफ चेतावनी जारी की है जो अनअप्रूव्ड स्टेम सेल प्रोडक्ट्स बेच रहे हैं।
  • UK & Europe: वहां भी सख्त नियम हैं और इसे मानक उपचार नहीं माना जाता।

भारत अब उन देशों की सूची में शामिल हो गया है जिन्होंने मरीज की सुरक्षा को मुनाफे से ऊपर रखा है।

एक दरवाजा बंद, लेकिन सही रास्ता खुला

अंत में, सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला कड़वा लग सकता है, लेकिन यह जरूरी था। यह फैसला उन हजारों माता-पिता को झूठी उम्मीदों के कर्ज में डूबने से बचाएगा। यह फैसला मेडिकल साइंस की पवित्रता को बचाएगा।

माता-पिता के लिए संदेश साफ है: चमत्कार के पीछे मत भागिए। आपका बच्चा जैसा है, अद्भुत है। उसे स्टेम सेल्स की नहीं, आपके समय, धैर्य और सही थेरेपी की जरूरत है।

विज्ञान भविष्य में शायद कोई रास्ता खोज ले, लेकिन आज के लिए, स्टेम सेल थेरेपी ऑटिज्म का जवाब नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने आज ‘व्यापार’ को रोककर ‘विज्ञान’ और ‘मानवता’ की जीत सुनिश्चित की है।

जागरूक बनें, सुरक्षित रहें!

By Vivan Verma

विवान तेज खबरी (Tez Khabri) के समाचार रिपोर्टर हैं, जो ब्रेकिंग न्यूज़ और राष्ट्रीय स्तर की महत्वपूर्ण खबरों को कवर करते हैं। विवान तथ्यात्मक रिपोर्टिंग और तेज अपडेट के लिए जाने जाते हैं और प्रशासनिक व जनहित से जुड़े मामलों पर नियमित लेखन करते हैं।

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