AR Rahman Statement

भारतीय फिल्म उद्योग, जिसे हम प्यार से बॉलीवुड कहते हैं, दशकों से सपनों की दुनिया रहा है। यह वह जगह थी जहां कहानियां बुनी जाती थीं, जहां संगीत रूह को छू लेता था और जहां कला और कलाकार का सम्मान सर्वोपरि था। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में, इस चमकती दुनिया की सतह पर दरारें दिखाई देने लगी हैं। ये दरारें तब और गहरी हो गईं जब इंडस्ट्री के दो दिग्गज कलाकारों – संगीत के जादूगर ए.आर. रहमान और बहुमुखी प्रतिभा के धनी जावेद जाफरी – ने खुलकर अपनी पीड़ा और चिंता व्यक्त की। हाल ही में, जावेद जाफरी ने ए.आर. रहमान के पुराने बयान का समर्थन करते हुए जो बातें कही हैं, उसने एक बार फिर उस बहस को छेड़ दिया है कि क्या बॉलीवुड अपनी आत्मा खो चुका है? क्या हिंदी फिल्म उद्योग अब केवल एक कॉर्पोरेट मशीन बनकर रह गया है जहां रचनात्मकता का दम घुट रहा है?

इस विस्तृत ब्लॉग में, हम जावेद जाफरी के बयान, ए.आर. रहमान के दर्द और बॉलीवुड की बदलती हुई तस्वीर का गहराई से विश्लेषण करेंगे। हम यह समझने की कोशिश करेंगे कि आखिर वो कौन से कारण हैं जिन्होंने इन महान कलाकारों को यह कहने पर मजबूर कर दिया कि “बॉलीवुड अब पहले जैसा नहीं रहा।”

भूमिका: जब दिग्गजों का धैर्य जवाब दे जाए

सिनेमा केवल मनोरंजन का साधन नहीं है; यह समाज का दर्पण है। लेकिन जब उस दर्पण को बनाने वाले कारीगर ही यह कहने लगें कि अब काम करने में वह आनंद नहीं रहा, तो यह चिंता का विषय है। जावेद जाफरी, जिन्होंने 80 के दशक से लेकर अब तक बॉलीवुड के कई दौर देखे हैं, हाल ही में एक इंटरव्यू में खुलकर सामने आए। उन्होंने ऑस्कर विजेता संगीतकार ए.आर. रहमान के उस बयान का पुरजोर समर्थन किया, जिसमें रहमान ने इंडस्ट्री में मौजूद ‘गैंग्स’ और गुटबाजी की बात की थी।

जावेद जाफरी का यह बयान केवल एक प्रतिक्रिया नहीं है, बल्कि यह उस पूरी पीढ़ी का दर्द है जिसने बॉलीवुड को बनते और संवरते देखा है। यह उस दौर की याद दिलाता है जब फिल्में दिल से बनाई जाती थीं, न कि एक्सेल शीट्स पर नफा-नुकसान देखकर। आज जब हम इस विषय पर चर्चा कर रहे हैं, तो यह समझना जरूरी है कि यह केवल दो व्यक्तियों की शिकायत नहीं है, बल्कि यह एक संस्थागत पतन (Institutional Decay) की ओर इशारा है।

ए.आर. रहमान का दर्द: फ्लैशबैक 2020

जावेद जाफरी के बयान को समझने के लिए हमें थोड़ा पीछे जाना होगा। साल 2020, जब सुशांत सिंह राजपूत की मृत्यु के बाद बॉलीवुड में नेपोटिज्म और गुटबाजी पर बहस अपने चरम पर थी। उसी दौरान, ‘दिल बेचारा’ फिल्म के संगीत रिलिज के समय ए.आर. रहमान ने एक रेडियो इंटरव्यू में जो कहा, उसने सबको चौंका दिया था।

रहमान, जो अपनी शांति और काम में मग्न रहने के लिए जाने जाते हैं, ने कहा था, “मैं अच्छी फिल्में करने से मना नहीं करता, लेकिन मुझे लगता है कि एक गैंग है जो गलतफहमियां फैला रहा है। लोग मुझसे काम करना चाहते हैं, लेकिन एक गैंग उन्हें मेरे पास आने से रोक रहा है।”

सोचिए, एक ऐसा व्यक्ति जिसने भारत को दो ऑस्कर दिलाए, जिसे दुनिया ‘मोजार्ट ऑफ मद्रास’ कहती है, उसे बॉलीवुड में काम न मिलने का कारण ‘गंदी राजनीति’ बताना पड़े। यह बयान अपने आप में यह बताने के लिए काफी था कि मुंबई फिल्म इंडस्ट्री में टैलेंट से ज्यादा ‘कनेक्शन’ और ‘गुलामी’ मायने रखने लगी है। रहमान ने स्पष्ट किया था कि कैसे मुकेश छाबड़ा (दिल बेचारा के निर्देशक) को भी लोगों ने सलाह दी थी कि वे रहमान के पास न जाएं।

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रहमान का यह बयान उस समय एक धमाके की तरह था, लेकिन समय के साथ इंडस्ट्री ने इसे भुला दिया। हालांकि, अब जावेद जाफरी ने इसे दोबारा हवा दी है और पुष्टि की है कि रहमान गलत नहीं थे।

जावेद जाफरी का बेबाक समर्थन: क्या कहा उन्होंने?

हाल ही में एक मीडिया बातचीत के दौरान, जब जावेद जाफरी से इंडस्ट्री के बदलते स्वरूप के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने बिना किसी लाग-लपेट के अपनी राय रखी। उन्होंने ए.आर. रहमान का उदाहरण देते हुए कहा कि जब इतना बड़ा कलाकार ऐसी बात कहता है, तो यह कोई छोटी बात नहीं है।

जावेद जाफरी ने कहा, “बॉलीवुड अब पहले जैसा नहीं रहा। पहले यहां एक अपनापन था, एक रूह थी। अब सब कुछ कॉर्पोरेट हो गया है। अब फिल्में ‘प्रोजेक्ट’ बन गई हैं और कास्टिंग ‘पैकेज’ का हिस्सा होती है। अब यह नहीं देखा जाता कि कौन सा अभिनेता उस किरदार के लिए सबसे उपयुक्त है, बल्कि यह देखा जाता है कि किसके साथ किसका समीकरण बैठ रहा है या कौन किस कैंप का हिस्सा है।”

जावेद जाफरी का इशारा साफ था। उनका मानना है कि इंडस्ट्री में अब ‘टैलेंट’ से ज्यादा ‘मार्केट वैल्यू’ और ‘पीआर मशीनरी’ का बोलबाला है। उन्होंने पुरानी यादें ताजा करते हुए बताया कि कैसे पहले प्रोड्यूसर्स और डायरेक्टर्स के बीच एक पारिवारिक रिश्ता होता था। सेट पर हंसी-मजाक होता था और कला का सम्मान होता था। लेकिन अब, वैनिटी वैन कल्चर और एजेन्सी कल्चर ने मानवीय संवेदनाओं को खत्म कर दिया है।

बॉलीवुड का बदलता स्वरूप: कला बनाम कॉर्पोरेट

जावेद जाफरी और ए.आर. रहमान के बयानों की तह में जाएं, तो सबसे बड़ा बदलाव जो नजर आता है, वह है ‘कॉर्पोरेटाइजेशन’। 2000 के दशक की शुरुआत तक, फिल्म निर्माण मुख्य रूप से स्वतंत्र निर्माताओं के हाथ में था। ये निर्माता अक्सर अपनी जमीन-जायदाद गिरवी रखकर फिल्में बनाते थे क्योंकि उन्हें कहानी पर भरोसा होता था। उस समय रिस्क लेने की क्षमता ज्यादा थी।

लेकिन जैसे ही बड़े कॉर्पोरेट हाउस और स्टूडियोज ने एंट्री ली, खेल बदल गया।

  1. कंटेंट पर कम, पैकेजिंग पर ज्यादा ध्यान: कॉर्पोरेट स्टूडियोज रचनात्मकता को आंकड़ों में तौलते हैं। उनके लिए फिल्म एक ‘प्रोडक्ट’ है। जावेद जाफरी ने सही कहा कि अब फिल्में ‘प्रपोजल’ या ‘प्रोजेक्ट’ बन गई हैं। स्क्रिप्ट बाद में लिखी जाती है, पहले यह तय होता है कि कौन सा बड़ा स्टार डेट्स दे रहा है और उस स्टार के साथ कौन सी एक्ट्रेस ‘हॉट’ दिखेगी।
  2. कास्टिंग का गणित: पहले कास्टिंग डायरेक्टर का काम होता था सही किरदार के लिए सही चेहरा ढूंढना। आज, कास्टिंग डायरेक्टर पर भी प्रोडक्शन हाउस और स्टार्स का दबाव होता है। जावेद जाफरी जैसे मंझे हुए कलाकारों को दरकिनार कर दिया जाता है क्योंकि उनके सोशल मीडिया फॉलोअर्स शायद किसी नए इन्फ्लुएंसर से कम हों। यह एक कड़वी सच्चाई है कि आज टैलेंट को इंस्टाग्राम रील्स के तराजू पर तौला जा रहा है।
  3. एजेंट्स का एकाधिकार: आज किसी भी बड़े एक्टर तक पहुंचना एक निर्देशक के लिए महाभारत जीतने जैसा है। बीच में टैलेंट मैनेजमेंट एजेंसियों की एक लंबी दीवार है। ये एजेंसियां तय करती हैं कि स्टार किस के साथ काम करेगा। अक्सर ये एजेंसियां ‘पैकेज डील’ करती हैं – “अगर आप हमारे इस बड़े स्टार को लेंगे, तो आपको हमारे इन तीन नए (और अक्सर कम प्रतिभाशाली) कलाकारों को भी फिल्म में लेना होगा।” यही वह ‘गैंग’ है जिसकी ओर रहमान ने इशारा किया था।

संगीत जगत की त्रासदी: ए.आर. रहमान का अलगाव क्यों?

जावेद जाफरी ने रहमान के समर्थन में जो बात कही, वह संगीत उद्योग की वर्तमान स्थिति पर एकदम सटीक बैठती है। बॉलीवुड संगीत, जो कभी दुनिया भर में अपनी मौलिकता और मेलोडी के लिए जाना जाता था, आज ‘रीमिक्स’ के दलदल में फंस गया है।

1. संगीत कंपनियों की दादागिरी: आज फिल्म का निर्देशक या संगीतकार यह तय नहीं करता कि फिल्म में कौन सा गाना होगा। यह फैसला म्यूजिक लेबल्स करते हैं। टी-सीरीज जैसे बड़े लेबल्स का एकाधिकार (Monopoly) हो चुका है। वे अपनी पुरानी लाइब्रेरी से कोई गाना उठाते हैं और संगीतकार को आदेश देते हैं कि इसका रीमिक्स बनाओ। ए.आर. रहमान जैसे स्वाभिमानी और मौलिक कलाकार के लिए यह स्थिति असहनीय है। रहमान अपनी धुनें खुद बनाते हैं, वे किसी के आदेश पर ‘मसकली’ का कबाड़ा नहीं कर सकते (जैसा कि तनिष्क बागची ने किया और रहमान ने उस पर नाराजगी भी जताई थी)।

2. मौलिकता की मौत: जावेद जाफरी ने भी इस बात पर जोर दिया कि पहले गीतों में शायरी होती थी, रूह होती थी। आज गानों के बोल बेतुके हैं और संगीत शोर है। जब रहमान ने कहा कि “एक गैंग मेरे खिलाफ काम कर रहा है,” तो उनका मतलब उन लोगों से था जो जानते हैं कि रहमान कभी भी औसत दर्जे का काम (Mediocrity) स्वीकार नहीं करेंगे। इसलिए, म्यूजिक कंपनियों और कुछ निर्माताओं ने मिलकर ऐसी परिस्थिति पैदा कर दी कि रहमान को हिंदी फिल्मों से दूर रखा जाए, ताकि वे अपनी मनमानी चला सकें।

3. सोलो कंपोजर का अंत: पहले एक फिल्म का संगीत एक ही संगीतकार देता था, जिससे फिल्म के साउन्डट्रैक में एक एकरूपता रहती थी। आज एक फिल्म में पांच गाने होते हैं और पांच अलग-अलग संगीतकार होते हैं। इसे ‘मल्टी-कंपोजर एल्बम’ कहा जाता है। रहमान जैसे दिग्गज, जो पूरी फिल्म के बैकग्राउंड स्कोर और गानों को एक सूत्र में पिरोते हैं, वे इस ‘किराना दुकान’ वाली संस्कृति में फिट नहीं बैठते। इसीलिए उन्हें काम नहीं दिया जाता या वे खुद ऐसे प्रोजेक्ट्स से दूर रहते हैं।

कैंप कल्चर और नेपोटिज्म: टैलेंट का दम घुटता है

जावेद जाफरी ने अपने बयान में यह भी संकेत दिया कि इंडस्ट्री में अब ‘अपने लोगों’ को प्रमोट करने का चलन बढ़ गया है। यह केवल स्टार किड्स (नेपोटिज्म) तक सीमित नहीं है, बल्कि यह ‘कैंप कल्चर’ के बारे में है।

बॉलीवुड में आज स्पष्ट रूप से कुछ बड़े कैंप हैं – धर्मा प्रोडक्शंस, यश राज फिल्म्स, टी-सीरीज, और सलमान खान फिल्म्स आदि। अगर आप इन कैंपों के ‘गुड बुक्स’ में हैं, तो आपका करियर सुरक्षित है। लेकिन अगर आप एक स्वतंत्र कलाकार हैं, चाहे आप जावेद जाफरी हों या ए.आर. रहमान, आपको संघर्ष करना पड़ेगा।

जावेद जाफरी, जो एक बेहतरीन डांसर, एक्टर, वॉयस ओवर आर्टिस्ट और कॉमेडियन हैं, उन्हें पिछले एक दशक में उतनी फिल्में नहीं मिलीं जितनी उनकी प्रतिभा के हिसाब से मिलनी चाहिए थीं। ऐसा क्यों? क्योंकि वे किसी कैंप का हिस्सा नहीं हैं। वे काम मांगते नहीं फिरते, और इंडस्ट्री अब ऐसी नहीं रही कि टैलेंट को खुद खोज कर लाए।

रहमान का मामला भी यही है। वे चेन्नई में रहते हैं, वे मुंबई की पार्टियों में जाकर पीआर (PR) नहीं करते। आज के बॉलीवुड में जो ‘दिखता नहीं, वो बिकता नहीं’। और जो पार्टियों में जाकर लॉबिंग नहीं करता, उसे ‘आउटसाइडर’ मान लिया जाता है, भले ही उसने देश को ऑस्कर क्यों न दिलाया हो।

भाषा और संस्कृति का ह्रास

जावेद जाफरी अक्सर हिंदी और उर्दू भाषा के गिरते स्तर पर भी बोलते रहे हैं। उनके हालिया समर्थन में यह बात भी निहित है। पुराने दौर का बॉलीवुड ‘हिंदुस्तानी’ था। संवाद लेखकों को उर्दू और हिंदी का गहरा ज्ञान होता था। गाने लिखने वाले शायर होते थे।

आज की पीढ़ी के लेखक अंग्रेजी में सोचते हैं और रोमन में हिंदी लिखते हैं। जावेद जाफरी जैसे कलाकार, जिनकी भाषा पर जबरदस्त पकड़ है, वे आज की स्क्रिप्ट्स को देखकर निराश होते हैं। जब ए.आर. रहमान जैसे संगीतकार इरशाद कामिल या गुलजार जैसे गीतकारों के साथ काम करते हैं, तो जादू होता है। लेकिन आज की इंडस्ट्री को ‘हुक लाइन’ चाहिए जो इंस्टाग्राम रील्स पर वायरल हो सके, न कि ऐसी शायरी जो रूह में उतर जाए। यह सांस्कृतिक गिरावट भी एक बड़ा कारण है कि पुराने दिग्गज अब यहां खुद को ‘मिसफिट’ (बेमेल) महसूस करते हैं।

साउथ सिनेमा का उदय और बॉलीवुड का आईना

जब जावेद जाफरी कहते हैं कि “बॉलीवुड अब पहले जैसा नहीं रहा,” तो इसका एक संदर्भ यह भी है कि दर्शक अब बदल गए हैं और वे दक्षिण भारतीय सिनेमा की ओर रुख कर रहे हैं। ए.आर. रहमान मुख्य रूप से दक्षिण से आते हैं, लेकिन उन्होंने हिंदी सिनेमा को अपना सर्वश्रेष्ठ दिया।

विडंबना देखिए कि जिस रहमान को बॉलीवुड में काम नहीं मिल रहा था (या रोका जा रहा था), उसी रहमान ने दक्षिण भारत की फिल्मों (जैसे ‘पोन्नियिन सेलवन’) में अद्भुत संगीत देकर फिर से साबित कर दिया कि वे क्या चीज हैं।

जावेद जाफरी का बयान इस बात की ओर भी इशारा करता है कि दक्षिण भारतीय इंडस्ट्री ने अपनी संस्कृति, अपनी भाषा और अपने कलाकारों का सम्मान नहीं छोड़ा है। वहां भी बिजनेस जरूरी है, लेकिन कला की कीमत पर नहीं। बॉलीवुड ने पश्चिमीकरण की दौड़ में अपनी मौलिकता खो दी है। ‘बाहुबली’, ‘आरआरआर’, ‘कांतारा’ और ‘पुष्पा’ जैसी फिल्मों की सफलता ने बॉलीवुड के ‘कॉर्पोरेट मॉडल’ के मुंह पर तमाचा मारा है। दर्शकों ने बता दिया है कि उन्हें ‘पैकेज’ नहीं, ‘कहानियां’ चाहिए।

क्या जावेद जाफरी और रहमान गलत हैं?

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कुछ लोग तर्क दे सकते हैं कि बदलाव प्रकृति का नियम है और बॉलीवुड भी बदल रहा है। वे कह सकते हैं कि ओटीटी (OTT) ने नए दरवाजे खोले हैं। यह सच है कि ओटीटी प्लेटफॉर्म्स ने मनोज बाजपेयी, पंकज त्रिपाठी और नवाजुद्दीन सिद्दीकी जैसे कलाकारों को एक नया जीवन दिया है। जावेद जाफरी ने भी ओटीटी पर कुछ अच्छा काम किया है।

लेकिन, जावेद जाफरी और रहमान जिस “मेनस्ट्रीम बॉलीवुड” की बात कर रहे हैं, वह बड़े पर्दे का सिनेमा है। वहां आज भी स्थिति दयनीय है। बड़े बजट की फिल्में आज भी कुछ गिने-चुने परिवारों और कॉर्पोरेट हाउसों के नियंत्रण में हैं। एक अच्छी कहानी वाली छोटी फिल्म को थिएटर नसीब नहीं होते क्योंकि किसी बड़े स्टार की खराब फिल्म ने सारी स्क्रीन्स कब्जा कर रखी होती हैं।

ए.आर. रहमान का दर्द यह नहीं था कि उन्हें काम नहीं मिल रहा; उनका दर्द यह था कि उन्हें अच्छे काम से वंचित रखा जा रहा है। और जावेद जाफरी का दर्द यह है कि जिस इंडस्ट्री को उन्होंने अपने खून-पसीने से सींचा, वह अब एक ऐसा बाजार बन गई है जहां इंसानी रिश्तों की कोई कद्र नहीं है। इसलिए, उनका कहना बिल्कुल सही है।

इंडस्ट्री को आत्मावलोकन की जरूरत

जावेद जाफरी द्वारा ए.आर. रहमान का समर्थन करना कोई विवाद खड़ा करना नहीं है, बल्कि यह एक ‘वेक-अप कॉल’ (चेतावनी) है। जब घर के बुजुर्ग या अनुभवी लोग शिकायत करने लगें, तो समझ लेना चाहिए कि घर की नींव में दीमक लग चुकी है।

बॉलीवुड को सोचना होगा कि:

  1. प्रतिभा का सम्मान कैसे हो: क्या हम केवल बॉक्स ऑफिस नंबरों के पीछे भागते रहेंगे या कला को भी जगह देंगे?
  2. गुटबाजी का अंत: क्या इंडस्ट्री बाहरी टैलेंट और वरिष्ठ कलाकारों के लिए अपने दरवाजे खोलेगी?
  3. संगीत की वापसी: क्या म्यूजिक लेबल्स अपनी दादागिरी बंद करके संगीतकारों को खुलकर काम करने देंगे?
  4. रिश्तों की अहमियत: क्या वैनिटी वैन से बाहर निकलकर कलाकार और निर्माता फिर से एक परिवार की तरह काम कर पाएंगे?

निष्कर्ष: उम्मीद की किरण या ढलता सूरज?

जावेद जाफरी का बयान और ए.आर. रहमान का अनुभव हमें एक कड़वी सच्चाई से रूबरू कराता है। “बॉलीवुड अब पहले जैसा नहीं रहा” – यह वाक्य एक हकीकत है। वह दौर जा चुका है जब फिल्में जुनून से बनती थीं। अब फिल्में ‘प्रोजेक्ट रिपोर्ट्स’ और ‘मार्केटिंग स्ट्रैटेजी’ से बनती हैं।

हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि सब कुछ खत्म हो गया है। जब तक जावेद जाफरी जैसे बेबाक कलाकार आवाज उठाते रहेंगे और ए.आर. रहमान जैसा टैलेंट अपने काम से जवाब देता रहेगा, तब तक उम्मीद बाकी है। दर्शकों ने भी अब ‘कचरा कंटेंट’ को नकारना शुरू कर दिया है। ’12th फेल’ और ‘लापता लेडीज’ जैसी फिल्मों की सफलता बताती है कि अगर नीयत साफ हो, तो बिना किसी गैंग या कॉर्पोरेट छल-कपट के भी दिल जीते जा सकते हैं।

लेकिन, मुख्यधारा के बॉलीवुड को अपनी कार्यप्रणाली में आमूलचूल परिवर्तन करना होगा। अगर उन्होंने अपने दिग्गजों का सम्मान करना नहीं सीखा और अपनी रचनात्मक स्वतंत्रता को कॉर्पोरेट्स के हाथों गिरवी रखना बंद नहीं किया, तो वह दिन दूर नहीं जब बॉलीवुड केवल इतिहास की किताबों में एक सुनहरे अध्याय के रूप में सिमट कर रह जाएगा।

जावेद जाफरी ने जो कहा, वह सिर्फ समर्थन नहीं, बल्कि एक आईना है। अब यह बॉलीवुड पर निर्भर करता है कि वह उस आईने में अपनी धूल साफ करता है या फिर आईना दिखाने वाले को ही गलत ठहराता है। ए.आर. रहमान का संगीत अमर है, और जावेद जाफरी की प्रतिभा बेमिसाल है। इंडस्ट्री को उनकी जरूरत है, उन्हें इंडस्ट्री की नहीं। यह बात जितनी जल्दी बॉलीवुड के ‘ठेकेदारों’ को समझ आ जाए, उतना ही हिंदी सिनेमा के भविष्य के लिए बेहतर होगा।

अंत में, एक दर्शक के तौर पर हमारी भी जिम्मेदारी है। हम कैसी फिल्मों को हिट कराते हैं? क्या हम रीमिक्स गानों का विरोध करते हैं? क्या हम अच्छे कलाकारों की फिल्मों को थिएटर में देखने जाते हैं? बॉलीवुड को बदलने की शक्ति अंततः हमारे ही हाथों में है। जावेद जाफरी और रहमान ने अपनी बात कह दी, अब बारी हमारी है।

गहराई से विश्लेषण: बॉलीवुड के पतन के 5 मुख्य स्तंभ

जावेद जाफरी और ए.आर. रहमान के बयानों को आधार बनाकर, आइए उन 5 मुख्य स्तंभों का विश्लेषण करें जो बॉलीवुड के वर्तमान संकट के लिए जिम्मेदार हैं। यह समझना जरूरी है ताकि हम जान सकें कि “पहले जैसा नहीं रहा” का वास्तविक अर्थ क्या है।

1. रचनात्मक दिवालियापन (Creative Bankruptcy)

80 और 90 के दशक में, भले ही तकनीक कमजोर थी, लेकिन कहानियां मौलिक थीं। सलीम-जावेद की जोड़ी हो या गुलजार की कलम, लेखकों को भगवान का दर्जा प्राप्त था। आज, रीमेक कल्चर ने इंडस्ट्री को घुन की तरह खा लिया है। साउथ की रीमेक, हॉलीवुड की कॉपी, या पुरानी फिल्मों का सीक्वल – मौलिकता कहां है? ए.आर. रहमान जैसे संगीतकार, जो अपनी रचनात्मकता के लिए जीते हैं, उन्हें ऐसे माहौल में घुटन महसूस होती है जहां उनसे कहा जाए कि “पुरानी धुन को नया बीट दे दो।” जावेद जाफरी ने भी देखा है कि कैसे कॉमेडी अब केवल फूहड़ता तक सिमट गई है, जबकि वे ‘जाने भी दो यारो’ या ‘धमाल’ जैसी स्मार्ट कॉमेडी का हिस्सा रहे हैं।

2. पीआर और मार्केटिंग का मायाजाल

आज किसी कलाकार की सफलता उसकी अभिनय क्षमता से नहीं, बल्कि उसकी पीआर एजेंसी की आक्रामकता से मापी जाती है। एयरपोर्ट लुक्स, जिम लुक्स और पेड पैपराजी कल्चर ने कला को पीछे धकेल दिया है। जावेद जाफरी जैसे अभिनेता, जो अपने काम पर विश्वास रखते हैं, वे इस शोर-शराबे में कहीं खो जाते हैं। ए.आर. रहमान तो अपनी विनम्रता के लिए जाने जाते हैं; वे इस पीआर रेस में दौड़ना ही नहीं चाहते। नतीजा यह होता है कि जो दिखता है (भले ही वह नकली हो), वही बिकता है।

3. संगीत का मशीनीकरण

संगीत अब रूह से नहीं, मशीन से बन रहा है। ऑटो-ट्यूनर ने ऐसे लोगों को भी गायक बना दिया है जो सुर में बोल भी नहीं सकते। ए.आर. रहमान ने हमेशा मानवीय स्पर्श (Human Touch) और लाइव वाद्ययंत्रों (Live Instruments) पर जोर दिया है। लेकिन प्रोड्यूसर्स को सस्ता और जल्दी संगीत चाहिए। वे प्रोग्रामिंग के जरिए संगीत बनवा लेते हैं। इससे उन हजारों वादकों (Musicians) का रोजगार छिन गया है जो पहले ऑर्केस्ट्रा में बजाते थे। जावेद जाफरी, जो संगीत और नृत्य की गहरी समझ रखते हैं, इस गिरावट को साफ महसूस करते हैं।

4. रिश्तों का व्यापारीकरण

पुराने दौर में, निर्माता और निर्देशक फिल्म फ्लॉप होने पर भी एक-दूसरे का साथ नहीं छोड़ते थे। यश चोपड़ा, मनमोहन देसाई या राज कपूर के दौर में टीमें सालों तक एक साथ काम करती थीं। आज, एक शुक्रवार को फिल्म फ्लॉप हुई, और अगले सोमवार को आपके फोन बजना बंद हो जाते हैं। ए.आर. रहमान ने जब कहा कि “गैंग उनके खिलाफ काम कर रहा है,” तो वह इसी निष्ठुरता (Ruthlessness) की ओर इशारा कर रहे थे। आज आप उतने ही महत्वपूर्ण हैं जितनी आपकी पिछली हिट फिल्म। जावेद जाफरी, जिन्होंने दशकों तक रिश्ते निभाए, इस खोखलेपन से आहत हैं।

5. आलोचना के प्रति असहिष्णुता

आज बॉलीवुड में कोई भी सच सुनना पसंद नहीं करता। अगर कोई आलोचना करता है, तो उसे ‘ट्रोल’ या ‘जलने वाला’ कह दिया जाता है। जब रहमान ने अपनी बात रखी, तो कई लोगों ने उन्हें ही गलत समझा। लेकिन अब जब जावेद जाफरी जैसे वरिष्ठ अभिनेता ने उसका समर्थन किया है, तो यह स्पष्ट हो गया है कि समस्या व्यक्ति में नहीं, व्यवस्था में है। एक स्वस्थ इंडस्ट्री वह होती है जो अपनी कमियों को स्वीकार करे और सुधारे, न कि आलोचना करने वाले को ही बाहर का रास्ता दिखा दे।

जावेद जाफरी: एक अंडररेटेड लीजेंड की पीड़ा

इस पूरे प्रकरण में जावेद जाफरी की व्यक्तिगत यात्रा को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। ‘मेरी जंग’ में एक विलेन के रूप में धमाकेदार शुरुआत करने वाले जावेद ने साबित किया कि वे डांसर और एक्टर दोनों बेहतरीन हैं। ‘बूगी वूगी’ के जरिए उन्होंने भारत में डांस रियलिटी शोज की नींव रखी।

लेकिन क्या बॉलीवुड ने उन्हें उनका हक दिया? शायद नहीं। उन्हें अक्सर टाइपकास्ट किया गया या साइड रोल्स में समेट दिया गया। जब वे कहते हैं कि “इंडस्ट्री अब वैसी नहीं रही,” तो इसमें उनका अपना अनुभव भी बोलता है। उन्होंने देखा है कि कैसे कम प्रतिभाशाली लोग केवल ‘नेटवर्किंग’ के दम पर बड़े स्टार बन गए, जबकि असली टैलेंट संघर्ष करता रह गया। उनका ए.आर. रहमान का समर्थन करना, दरअसल हर उस कलाकार की आवाज बनना है जिसे सिस्टम ने हाशिए पर धकेल दिया है।

भविष्य की राह: समाधान क्या है?

केवल समस्या गिनने से हल नहीं निकलेगा। अगर बॉलीवुड को अपनी खोई हुई प्रतिष्ठा वापस पानी है, तो उसे कुछ कठोर कदम उठाने होंगे:

  1. लेखकों को राजा बनाना होगा: जब तक स्क्रिप्ट राइटर को स्टार से ज्यादा (या कम से कम सम्मानजनक) महत्व नहीं मिलेगा, कंटेंट नहीं सुधरेगा।
  2. संगीतकारों को आजादी: टी-सीरीज और अन्य लेबल्स को अपनी पकड़ ढीली करनी होगी। ए.आर. रहमान जैसे दिग्गजों को खुली छूट देनी होगी कि वे अपने विजन के हिसाब से संगीत बनाएं।
  3. ऑडिशन कल्चर: हर भूमिका के लिए, चाहे वह कितनी भी बड़ी क्यों न हो, ऑडिशन अनिवार्य होना चाहिए। इससे नेपोटिज्म का टैग हटेगा और सही टैलेंट सामने आएगा।
  4. पारदर्शिता: कास्टिंग और बॉक्स ऑफिस नंबर्स में पारदर्शिता लानी होगी। फेक कलेक्शन और पेड रिव्यूज की संस्कृति को बंद करना होगा।

जावेद जाफरी और ए.आर. रहमान ने घंटी बजा दी है। यह खतरे की घंटी भी हो सकती है और सुबह की अलार्म भी। यह इंडस्ट्री के दिग्गजों पर निर्भर करता है कि वे इसे कैसे लेते हैं।

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