सड़कें, जो विकास की जीवनरेखा मानी जाती हैं, कभी-कभी मृत्यु का द्वार भी बन जाती हैं। भारत में सड़क दुर्घटनाओं के आंकड़े भयावह हैं, और हर दिन अखबारों के पन्ने किसी न किसी त्रासदी की खबर से रंगे होते हैं। लेकिन कुछ हादसे ऐसे होते हैं जो न केवल दिल दहला देते हैं, बल्कि पूरी व्यवस्था और सुरक्षा मानकों पर गंभीर सवाल खड़े कर देते हैं। आंध्र प्रदेश में हाल ही में घटित एक ऐसी ही घटना ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है। एक निजी बस और ट्रक की भीषण टक्कर, उसके बाद उठी आग की लपटें, और उसमें फंसकर तीन जिंदगियों का दर्दनाक अंत – यह दृश्य किसी बुरे सपने से कम नहीं था।
इस 4000 शब्दों के विस्तृत ब्लॉग पोस्ट में, हम इस “Andhra Pradesh हादसा: बस-ट्रक की टक्कर के बाद लगी भीषण आग, 3 लोगों की जलकर मौत” की घटना का गहराई से विश्लेषण करेंगे। हम न केवल घटनाक्रम को समझेंगे, बल्कि इसके पीछे के कारणों, भारतीय सड़कों पर सुरक्षा की स्थिति, रात्रि यात्रा के जोखिमों और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के उपायों पर भी विस्तार से चर्चा करेंगे। यह ब्लॉग उन परिवारों के प्रति एक संवेदना है जिन्होंने अपने प्रियजनों को खोया, और साथ ही समाज और प्रशासन के लिए एक चेतावनी भी है।
भाग 1: काली रात का खौफनाक मंजर – घटनाक्रम
यह हादसा आंध्र प्रदेश के प्रकाशम जिले में हुआ, जो राज्य के प्रमुख जिलों में से एक है। रात का समय था, जब ज्यादातर यात्री अपनी सीटों पर सो रहे थे या अपनी मंजिल तक पहुंचने का इंतजार कर रहे थे। एक निजी ट्रेवल्स की बस यात्रियों को लेकर अपने गंतव्य की ओर बढ़ रही थी। बस में सवार लोगों में छात्र, नौकरीपेशा लोग और परिवार शामिल थे, जो अलग-अलग कारणों से यात्रा कर रहे थे। किसी को घर जाने की जल्दी थी, तो कोई काम के सिलसिले में सफर कर रहा था।
प्रत्यक्षदर्शियों और पुलिस रिपोर्ट के अनुसार, बस तेज गति से चल रही थी। राष्ट्रीय राजमार्ग पर रात के सन्नाटे में वाहनों की रफ्तार अक्सर बढ़ जाती है। तभी विपरीत दिशा से या शायद आगे चल रहे एक भारी-भरकम ट्रक से बस की जोरदार टक्कर हुई। टक्कर इतनी भीषण थी कि इसकी आवाज दूर-दूर तक सुनी गई। यह कोई साधारण टक्कर नहीं थी। टक्कर के तुरंत बाद, घर्षण और ईंधन टैंक के फटने से बस में आग लग गई।
कुछ ही सेकंडों में, पूरी बस आग का गोला बन गई। यात्रियों को संभलने का मौका तक नहीं मिला। गहरी नींद में सो रहे यात्री झटके से जागे, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। बस के अंदर धुएं का गुबार भर गया और बाहर आग की लपटें आसमान छू रही थी। चीख-पुकार मच गई। लोग जान बचाने के लिए खिड़कियों और आपातकालीन दरवाजों की तरफ भागे।
स्थानीय लोग, जो आसपास के गांवों या ढाबों पर थे, आवाज सुनकर दौड़े। उन्होंने बस के शीशे तोड़कर लोगों को बाहर निकालने की कोशिश की। लेकिन आग इतनी तेजी से फैली कि तीन लोग दुर्भाग्यवश बस के अंदर ही फंस गए। आग की तीव्रता के कारण उन्हें बचाया नहीं जा सका और वे जिंदा जल गए। यह दृश्य इतना भयावह था कि बचाव कार्य में लगे लोगों की रूह कांप गई। मरने वालों की पहचान करना भी मुश्किल हो गया था।

घायलों को तुरंत नजदीकी अस्पतालों में ले जाया गया। कई लोग गंभीर रूप से जले हुए थे, जबकि कईयों को हड्डी टूटने और अन्य चोटें आई थीं। पुलिस और फायर ब्रिगेड की गाड़ियां मौके पर पहुंचीं और काफी मशक्कत के बाद आग पर काबू पाया गया, लेकिन तब तक बस पूरी तरह से जलकर खाक हो चुकी थी। लोहे का एक काला ढांचा सड़क पर खड़ा था, जो कुछ देर पहले तक एक चलती-फिरती गाड़ी थी।
भाग 2: दुर्घटना के कारण – चूक कहां हुई?
जब भी कोई बड़ा हादसा होता है, तो सबसे पहला सवाल यही उठता है कि गलती किसकी थी? Andhra Pradesh हादसा: बस-ट्रक की टक्कर के बाद लगी भीषण आग, 3 लोगों की जलकर मौत – इस घटना के पीछे कई संभावित कारण हो सकते हैं, जो अक्सर भारतीय सड़क दुर्घटनाओं में कॉमन होते हैं।
1. ड्राइवरों की थकान और नींद: रात के समय होने वाली दुर्घटनाओं में सबसे बड़ा कारण ड्राइवरों की नींद होती है। लंबी दूरी की बसों के ड्राइवर अक्सर बिना पर्याप्त आराम किए लगातार गाड़ी चलाते हैं। ट्रक ड्राइवर भी दिन-रात माल पहुंचाने के दबाव में होते हैं। क्या इस हादसे में भी किसी ड्राइवर को झपकी आ गई थी? क्या वे ओवरवर्क्ड थे? यह जांच का एक महत्वपूर्ण विषय है।
2. तेज रफ्तार और ओवरटेकिंग: निजी बस ऑपरेटर अक्सर समय बचाने और जल्दी ट्रिप पूरी करने के चक्कर में बसों को निर्धारित गति सीमा से बहुत तेज चलाते हैं। रात में सड़कें खाली देखकर यह रफ्तार और बढ़ जाती है। गलत तरीके से ओवरटेक करना, ब्लाइंड स्पॉट्स का ध्यान न रखना और रश ड्राइविंग इस हादसे का कारण बन सकती है। टक्कर की तीव्रता बताती है कि वाहनों की गति कम नहीं थी।
3. वाहनों की तकनीकी खराबी: क्या बस या ट्रक में कोई तकनीकी खराबी थी? कई बार पुराने टायर, खराब ब्रेक या हेडलाइट्स की समस्या रात के समय दुर्घटना का कारण बनती है। बस में आग इतनी जल्दी क्यों लगी? क्या ईंधन टैंक सुरक्षित नहीं था या इंजन में कोई शॉर्ट सर्किट हुआ था? वाहनों की फिटनेस जांच में कोताही अक्सर जानलेवा साबित होती है।
4. सड़क की स्थिति और इंफ्रास्ट्रक्चर: हालांकि राष्ट्रीय राजमार्ग आमतौर पर अच्छी स्थिति में होते हैं, लेकिन कई बार सड़कों पर गड्ढे, डायवर्जन के निशान न होना, या लाइटिंग की कमी भी हादसे का कारण बनती है। क्या जिस जगह हादसा हुआ, वहां कोई खतरनाक मोड़ या ब्लैक स्पॉट था? प्रकाशम जिले के उस विशेष खंड पर पहले भी दुर्घटनाएं हुई हैं या नहीं, यह भी देखना जरूरी है।
5. ज्वलनशील पदार्थों का परिवहन: बस में आग इतनी तेजी से फैलने का एक कारण यह भी हो सकता है कि बस में या ट्रक में कोई ज्वलनशील पदार्थ मौजूद हो। अक्सर बसों में पार्सल के रूप में अवैध सामान ले जाया जाता है। अगर ऐसा कुछ था, तो यह गंभीर लापरवाही है।

भाग 3: आग लगने का विज्ञान और बसों की डिजाइन
Andhra Pradesh हादसा: बस-ट्रक की टक्कर के बाद लगी भीषण आग, 3 लोगों की जलकर मौत – इस हेडलाइन में ‘आग’ शब्द सबसे ज्यादा डराने वाला है। टक्कर के बाद आग लगना एक बेहद खतरनाक स्थिति है। आधुनिक वोल्वो या स्लीपर बसों में आरामदायक सीटें, पर्दे और एयर कंडीशनिंग सिस्टम होता है। ये सभी चीजें अत्यधिक ज्वलनशील होती हैं।
जब बस की ट्रक से टक्कर होती है, तो अक्सर डीजल टैंक फट जाता है। डीजल सड़क पर फैलता है और घर्षण से पैदा हुई चिंगारी उसे आग में बदल देती है। बस के इंटीरियर में इस्तेमाल होने वाला फोम, रेक्सीन, प्लास्टिक और कपड़े आग को ईंधन देते हैं। एसी बसों में खिड़कियां सील होती हैं, जिससे धुआं बाहर नहीं निकल पाता। कार्बन मोनोऑक्साइड जैसी जहरीली गैसें चंद मिनटों में यात्रियों को बेहोश कर देती हैं, जिससे वे भागने में असमर्थ हो जाते हैं।
इस हादसे में भी संभवतः यही हुआ होगा। आग लगते ही बस का इलेक्ट्रिक सिस्टम फेल हो गया होगा, जिससे ऑटोमैटिक दरवाजे लॉक हो गए होंगे। आपातकालीन निकास (इमरजेंसी एग्जिट) तक पहुंचना धुएं और भगदड़ में मुश्किल हो गया होगा। भारतीय बस बॉडी कोड में सुरक्षा के कई मानक हैं, लेकिन क्या उनका पालन सख्ती से हो रहा है? क्या बसों में फायर रिटार्डेंट (आग रोकने वाली) सामग्री का उपयोग किया जा रहा है?
भाग 4: पीड़ितों और उनके परिवारों का दर्द
अखबारों के लिए यह एक खबर है, लेकिन उन परिवारों के लिए यह जीवन भर का अंधेरा है जिन्होंने अपनों को खोया। तीन लोगों की जलकर मौत – यह सिर्फ एक आंकड़ा नहीं है। इनमें से कोई घर का एकमात्र कमाने वाला हो सकता है, कोई छात्र हो सकता है जिसके सुनहरे भविष्य के सपने थे, या कोई माता-पिता हो सकते हैं जो अपने बच्चों से मिलने जा रहे थे।
जरा सोचिए उस परिवार की मनोदशा के बारे में जिसे फोन पर यह खबर मिली होगी कि उनके परिजन अब इस दुनिया में नहीं रहे, और उनका शव भी पहचान में नहीं आ रहा है। यह दर्द असहनीय है। घायलों की स्थिति भी कम दर्दनाक नहीं है। जलने के घाव भरने में महीनों या साल लग जाते हैं। शारीरिक पीड़ा के साथ-साथ मानसिक आघात (Trauma) भी गहरा होता है। जो लोग उस जलती बस से बाहर निकले, वे शायद उस मंजर को कभी भूल नहीं पाएंगे। उनकी रातों की नींद उड़ जाएगी।
सरकार मुआवजे की घोषणा कर देती है – मृतकों के लिए कुछ लाख, घायलों के लिए कुछ हजार। लेकिन क्या पैसा किसी की जान की कीमत हो सकता है? क्या मुआवजा उस मां के आंसू पोंछ सकता है जिसने अपना बेटा खो दिया? यह सवाल हमेशा अनुत्तरित रह जाता है।
भाग 5: भारतीय सड़कों पर सुरक्षा की स्थिति – एक कड़वी सच्चाई
Andhra Pradesh हादसा: बस-ट्रक की टक्कर के बाद लगी भीषण आग, 3 लोगों की जलकर मौत – यह घटना एक बार फिर भारतीय सड़क सुरक्षा रिकॉर्ड पर काला धब्बा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, दुनिया भर में होने वाली सड़क दुर्घटनाओं में मौतों का एक बड़ा हिस्सा भारत में होता है।
हमारे देश में ड्राइविंग लाइसेंस प्राप्त करना बेहद आसान है, लेकिन सुरक्षित ड्राइविंग की समझ बहुत कम लोगों में है। ट्रैफिक नियमों का पालन डर से किया जाता है, जिम्मेदारी से नहीं। सीट बेल्ट और हेलमेट जैसे सुरक्षा उपकरणों को लोग बोझ समझते हैं। हाईवे पर लेन ड्राइविंग का कोई अनुशासन नहीं है। भारी वाहन, कार और दोपहिया वाहन एक ही लेन में जिग-जैग चलते हैं।
निजी बस ऑपरेटरों की मनमानी भी एक बड़ी समस्या है। वे मुनाफे के लिए सुरक्षा मानकों से समझौता करते हैं। बसों में क्षमता से अधिक यात्री भरना, पार्सल लादना, और बसों का सही रखरखाव न करना आम बात है। आरटीओ (RTO) और पुलिस की मिलीभगत से फिटनेस सर्टिफिकेट आसानी से मिल जाते हैं, चाहे गाड़ी की हालत कैसी भी हो।
इसके अलावा, सड़कों की डिजाइन में भी खामियां हैं। कई हाईवे गांवों और कस्बों के बीच से गुजरते हैं, जहां स्थानीय ट्रैफिक और पैदल यात्री हाईवे पर आ जाते हैं। ‘ब्लैक स्पॉट्स’ (जहां बार-बार दुर्घटनाएं होती हैं) की पहचान तो की जाती है, लेकिन उन्हें सुधारने की गति बहुत धीमी है।
भाग 6: रात्रि यात्रा (Night Travel) – सुविधा या जोखिम?
आधुनिक जीवनशैली में समय की कमी के कारण लोग रात में यात्रा करना पसंद करते हैं ताकि दिन का समय काम में उपयोग हो सके। स्लीपर बसें इसी मांग का परिणाम हैं। लेकिन रात की यात्रा अपने साथ कई जोखिम लेकर आती है।
रात में दृश्यता (Visibility) कम होती है। ड्राइवर अक्सर हाई बीम का उपयोग करते हैं, जिससे सामने से आने वाले वाहन चालक की आंखें चंधिया जाती हैं। रात में मेडिकल सहायता मिलने में देरी होती है। सुनसान सड़कों पर मदद मिलना मुश्किल होता है। और सबसे बड़ा कारक – मानवीय शरीर की जैविक घड़ी (Biological Clock)। रात का समय शरीर के आराम करने का होता है। जबरदस्ती जागकर गाड़ी चलाने से रिफ्लेक्सेस (प्रतिक्रिया समय) धीमे हो जाते हैं। एक सेकंड की झपकी भी प्रलय ला सकती है।
इस आंध्र प्रदेश हादसे ने फिर से यह बहस छेड़ दी है कि क्या रात में बसों के संचालन पर सख्त नियम होने चाहिए? क्या दो ड्राइवरों का होना अनिवार्य किया जाना चाहिए और उसकी सख्ती से जांच होनी चाहिए? क्या ड्राइवरों के काम के घंटों (Duty Hours) को विनियमित किया जाना चाहिए?

भाग 7: बचाव और राहत कार्य – प्रशासन की भूमिका
हादसे के बाद प्रशासन की प्रतिक्रिया (Response Time) जीवन और मृत्यु के बीच का अंतर तय करती है। इस घटना में पुलिस और फायर ब्रिगेड की तत्परता की सराहना की जानी चाहिए कि उन्होंने आग को बुझाया और घायलों को अस्पताल पहुंचाया। लेकिन क्या हम और बेहतर कर सकते थे?
भारतीय राजमार्गों पर ट्रॉमा सेंटरों की कमी है। एंबुलेंस को पहुंचने में समय लगता है। कई बार एंबुलेंस में बुनियादी जीवन रक्षक उपकरण नहीं होते। हाईवे पेट्रोलिंग की गाड़ियां अक्सर कम दिखाई देती हैं। अगर एक्सीडेंट संभावित क्षेत्रों में क्विक रिस्पांस टीमें तैनात हों, तो शायद कुछ जानें बचाई जा सकती थीं।
इस हादसे में स्थानीय लोगों की भूमिका महत्वपूर्ण रही। अक्सर देखा जाता है कि पुलिस के आने से पहले स्थानीय लोग ही मसीहा बनकर आते हैं। इसलिए, ढाबों और पेट्रोल पंपों पर काम करने वाले लोगों को प्राथमिक चिकित्सा (First Aid) और आपदा प्रबंधन का बुनियादी प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए।
भाग 8: कानूनी पहलू और बीमा
दुर्घटना के बाद कानूनी लड़ाई भी लंबी और थकाऊ होती है। पुलिस एफआईआर दर्ज करती है, जांच होती है, लेकिन दोष सिद्ध होने में सालों लग जाते हैं। अक्सर ड्राइवरों को गिरफ्तार किया जाता है, लेकिन असली दोषी – बस मालिक, ट्रक मालिक या रखरखाव एजेंसियां – बच निकलते हैं। मोटर वाहन अधिनियम (Motor Vehicles Act) में संशोधन के बाद जुर्माना और सजा बढ़ाई गई है, लेकिन इसका कार्यान्वयन अभी भी एक चुनौती है।
बीमा (Insurance) का दावा प्राप्त करना भी पीड़ितों के लिए एक संघर्ष होता है। कागजी कार्रवाई, पोस्टमार्टम रिपोर्ट, और बीमा कंपनियों के नियम – ये सब मिलकर एक शोक संतप्त परिवार को और अधिक परेशान करते हैं। ट्रिब्यूनल में केस सालों चलते हैं। इस दिशा में सुधार की आवश्यकता है ताकि पीड़ितों को त्वरित न्याय और आर्थिक सहायता मिल सके।
भाग 9: भविष्य के लिए सबक – सुधार के उपाय
Andhra Pradesh हादसा: बस-ट्रक की टक्कर के बाद लगी भीषण आग, 3 लोगों की जलकर मौत – इस तरह की हेडलाइंस को रोकने के लिए हमें एक व्यापक दृष्टिकोण अपनाना होगा। यह केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि बस ऑपरेटरों, ड्राइवरों और यात्रियों की भी जिम्मेदारी है।
1. प्रौद्योगिकी का उपयोग: बसों में जीपीएस (GPS) और स्पीड गवर्नर्स का उपयोग अनिवार्य और सख्त होना चाहिए। ड्राइवर के व्यवहार पर नज़र रखने के लिए एआई-आधारित कैमरे लगाए जा सकते हैं जो ड्राइवर को नींद आने पर अलार्म बजा दें। बसों में ऑटोमैटिक फायर डिटेक्शन और सप्रेशन सिस्टम (आग बुझाने की प्रणाली) होना अनिवार्य होना चाहिए।
2. सख्त नियम और प्रवर्तन: ड्राइवरों के लिए काम के घंटे तय होने चाहिए। लंबी दूरी की बसों में दो ड्राइवर अनिवार्य होने चाहिए और वे शिफ्ट में गाड़ी चलाएं। आरटीओ को औचक निरीक्षण करना चाहिए और फिटनेस सर्टिफिकेट देने में पारदर्शिता लानी चाहिए। ओवरलोडिंग और तेज रफ्तार पर भारी जुर्माना होना चाहिए।
3. बस डिजाइन में सुधार: स्लीपर बसों की डिजाइन की समीक्षा होनी चाहिए। आपातकालीन निकास को अधिक सुलभ और आसान बनाया जाना चाहिए। बसों के अंदर ज्वलनशील पदार्थों के उपयोग को कम किया जाना चाहिए। कांच तोड़ने के हथौड़े हर सीट के पास उपलब्ध होने चाहिए और वे चोरी न हों, यह सुनिश्चित करना चाहिए।
4. जागरूकता और प्रशिक्षण: ड्राइवरों का नियमित प्रशिक्षण और स्वास्थ्य परीक्षण होना चाहिए। यात्रियों को भी यात्रा शुरू होने से पहले आपातकालीन निकास और सुरक्षा उपायों के बारे में वीडियो या डेमो के माध्यम से जानकारी दी जानी चाहिए, जैसे हवाई जहाज में दी जाती है।
5. सड़क बुनियादी ढांचे में सुधार: हाईवे पर साइनेज (संकेत चिन्ह) स्पष्ट होने चाहिए। डिवाइडर की ऊंचाई पर्याप्त होनी चाहिए ताकि विपरीत दिशा से आने वाले वाहन न टकराएं। ब्लैक स्पॉट्स को ठीक करना प्राथमिकता होनी चाहिए।
भाग 10: यात्रियों के लिए सुरक्षा टिप्स
एक यात्री के रूप में हम अपनी सुरक्षा के लिए क्या कर सकते हैं? हालांकि हादसा किसी के भी साथ हो सकता है, लेकिन कुछ सावधानियां जोखिम को कम कर सकती हैं।
- विश्वसनीय ऑपरेटर चुनें: चंद पैसे बचाने के लिए सस्ती और खटारा बसों में यात्रा न करें। प्रतिष्ठित ट्रेवल्स या सरकारी बसों को प्राथमिकता दें।
- सीट बेल्ट पहनें: अगर बस में सीट बेल्ट है, तो उसे जरूर पहनें। स्लीपर बसों में भी सुरक्षा बेल्ट का उपयोग करें।
- आपातकालीन निकास की जांच करें: बस में चढ़ते ही देख लें कि आपातकालीन खिड़की या दरवाजा कहां है और उसे कैसे खोलना है।
- ड्राइवर पर नजर रखें: अगर आपको लगे कि ड्राइवर तेज गाड़ी चला रहा है, रश ड्राइविंग कर रहा है या उसे नींद आ रही है, तो तुरंत टोकें और बस रुकवाएं। अन्य यात्रियों को भी साथ लें।
- ज्वलनशील पदार्थ न ले जाएं: बस में कभी भी पटाखा, गैस सिलेंडर या ज्वलनशील रसायन लेकर यात्रा न करें।
आंध्र प्रदेश के प्रकाशम जिले में हुआ यह हादसा एक दुखद याद दिलाता है कि जीवन कितना क्षणभंगुर है। “Andhra Pradesh हादसा: बस-ट्रक की टक्कर के बाद लगी भीषण आग, 3 लोगों की जलकर मौत” – हम इन शब्दों को पढ़ेंगे, अफसोस करेंगे और शायद कुछ दिनों में भूल जाएंगे। लेकिन जिन परिवारों ने अपने सदस्यों को खोया है, उनके लिए यह घाव कभी नहीं भरेगा।
यह समय एक-दूसरे पर उंगली उठाने का नहीं, बल्कि आत्ममंथन और सुधार का है। सरकार को नीतिगत स्तर पर कड़े फैसले लेने होंगे। प्रशासन को सड़क पर उतरकर नियमों का पालन करवाना होगा। बस ऑपरेटरों को मुनाफे से ऊपर मानव जीवन को रखना होगा। और हमें, एक जिम्मेदार नागरिक के रूप में, सड़क सुरक्षा के नियमों का पालन करना होगा।
हम उन तीन दिवंगत आत्माओं को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं और घायलों के शीघ्र स्वस्थ होने की कामना करते हैं। उम्मीद है कि यह हादसा व्यवस्था को झकझोरने का काम करेगा और भविष्य में सड़कों को सुरक्षित बनाने की दिशा में ठोस कदम उठाए जाएंगे। याद रखें, घर पर कोई आपका इंतजार कर रहा है। सुरक्षित चलें, सुरक्षित रहें।
परिशिष्ट: भारत में सड़क दुर्घटनाओं के आंकड़े (संदर्भ के लिए)
इस विषय की गंभीरता को समझने के लिए कुछ आंकड़ों पर नजर डालना जरूरी है। भारत में हर साल लगभग 1.5 लाख लोग सड़क हादसों में मारे जाते हैं। इसमें से एक बड़ा प्रतिशत राष्ट्रीय राजमार्गों पर होने वाली दुर्घटनाओं का है। बस दुर्घटनाओं में मृत्यु दर अक्सर अधिक होती है क्योंकि इसमें एक साथ कई लोग शामिल होते हैं और बस की बनावट में बाहर निकलने के रास्ते सीमित होते हैं। आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, तमिलनाडु और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में हाईवे एक्सीडेंट्स की संख्या काफी अधिक है। इन आंकड़ों को कम करने के लिए ‘विज़न ज़ीरो’ (Vision Zero) जैसी अवधारणाओं को अपनाने की जरूरत है, जिसका उद्देश्य सड़क दुर्घटनाओं में मौतों को शून्य करना है।
आग लगने के बाद के महत्वपूर्ण क्षण (The Golden Hour)
हादसे के बाद का पहला घंटा, जिसे ‘गोल्डन आवर’ कहा जाता है, बहुत महत्वपूर्ण होता है। आंध्र प्रदेश के इस हादसे में आग इतनी तेजी से फैली कि गोल्डन आवर का सिद्धांत भी काम नहीं कर पाया। लेकिन जो लोग घायल हुए, उनके लिए यह समय महत्वपूर्ण था। भारत सरकार ने ‘गुड समैरिटन लॉ’ (नेक आदमी का कानून) बनाया है, ताकि लोग घायलों की मदद करने से डरें नहीं। इस हादसे में स्थानीय लोगों ने मदद करके इस कानून की भावना को जीवित रखा। हमें समाज में मदद करने की इस भावना को और बढ़ावा देना चाहिए।
