भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, लेकिन इस लोकतंत्र की छाती पर आज भी औपनिवेशिक काल की मानसिकता वाला एक ऐसा वर्ग बैठा है जो खुद को जनता का सेवक नहीं, बल्कि ‘शासक’ मानता है। हम अक्सर वीआईपी कल्चर (VIP Culture) खत्म करने की बातें सुनते हैं, गाड़ियों से लाल बत्तियां उतार दी गईं, लेकिन क्या अफसरों के दिमाग से वह लाल बत्ती उतरी? जवाब है नहीं।
हाल ही में एक ऐसी खबर ने फिर से भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं, जिसने कुछ साल पहले पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था। आपको याद होगा दिल्ली का त्यागराज स्टेडियम, जहां देश के भविष्य यानी एथलीट्स को शाम 7 बजे इसलिए बाहर निकाल दिया जाता था ताकि एक वरिष्ठ आईएएस अधिकारी (IAS Officer) अपने कुत्ते को टहला सकें। उस समय भारी बवाल हुआ था, सजा के तौर पर तबादले हुए थे, लेकिन आज खबर यह आ रही है कि वही ‘सिस्टम’ फिर से अपने पुराने ढर्रे पर लौट आया है। चर्चा है कि विवादित आईएएस अधिकारी को दिल्ली में एक महत्वपूर्ण और ‘बड़ी पोस्टिंग’ मिल गई है।
भाग 1: त्यागराज स्टेडियम का वह शर्मनाक किस्सा – फ्लैशबैक
इस नई पोस्टिंग के मायने समझने के लिए, हमें पहले उस घटना को याद करना होगा जिसने इसे जन्म दिया। मई 2022 की वह घटना भारतीय खेल जगत और प्रशासन के लिए एक काला अध्याय थी।
कुत्ते की सैर बनाम देश का मेडल दिल्ली का त्यागराज स्टेडियम, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर की सुविधाओं के लिए जाना जाता है, वहां सैकड़ों एथलीट्स अपनी पसीना बहाते हैं ताकि वे ओलंपिक और एशियाई खेलों में भारत का तिरंगा लहरा सकें। लेकिन मई 2022 में एक अंग्रेजी अखबार की रिपोर्ट ने एक चौंकाने वाला खुलासा किया। रिपोर्ट में बताया गया कि स्टेडियम के गार्ड शाम 7 बजते ही सीटियां बजाकर सभी खिलाड़ियों और कोचों को बाहर निकाल देते थे।
कारण? कोई सुरक्षा खतरा नहीं था, कोई रखरखाव का काम नहीं था। कारण यह था कि दिल्ली के तत्कालीन प्रधान सचिव (राजस्व) संजीव खिरवार को अपने पालतू कुत्ते के साथ वहां टहलना होता था।
वीआईपी का आगमन तस्वीरें गवाह थीं। खाली स्टेडियम, सुनसान सिंथेटिक ट्रैक, और उस पर टहलते हुए आईएएस अधिकारी और उनकी पत्नी (जो खुद भी एक आईएएस अधिकारी थीं), और साथ में उनका कुत्ता। जिस ट्रैक पर देश के धावकों को दौड़ना चाहिए था, वहां एक कुत्ता टहल रहा था। यह दृश्य किसी सामंतवादी युग का प्रतीक लग रहा था, जहां राजा के मनोरंजन के लिए प्रजा को मैदान खाली करना पड़ता था।
खिलाड़ियों ने दबी जुबान में बताया कि कैसे गर्मी के दिनों में शाम को अभ्यास करना उनके लिए कितना महत्वपूर्ण था, लेकिन ‘साहब’ के आने के डर से उन्हें 7 बजे से पहले ही बोरिया-बिस्तर समेटना पड़ता था। यह न केवल संसाधनों का दुरुपयोग था, बल्कि सत्ता का नशा था जो सिर चढ़कर बोल रहा था।

भाग 2: जनता का आक्रोश और सरकार की ‘त्वरित’ कार्रवाई
जैसे ही यह खबर मीडिया में आई और वह तस्वीर वायरल हुई, सोशल मीडिया पर भूचाल आ गया। लोग पूछने लगे कि क्या यह देश के करदाताओं का पैसा इसलिए खर्च होता है कि कोई अफसर अपने निजी शौक पूरे कर सके?
गृह मंत्रालय का हस्तक्षेप मामला इतना बढ़ गया कि केंद्रीय गृह मंत्रालय (MHA) को दखल देना पड़ा। गृह मंत्री ने रिपोर्ट तलब की। जांच में आरोप सही पाए गए। सरकार ने एक कड़ा संदेश देने की कोशिश की। कुछ ही घंटों के भीतर, आईएएस संजीव खिरवार और उनकी पत्नी रिंकू दुग्गा का तबादला कर दिया गया।
सजा या पर्यटन? संजीव खिरवार को लद्दाख और उनकी पत्नी रिंकू दुग्गा को अरुणाचल प्रदेश भेजा गया। उस समय इसे एक “कड़ी सजा” के रूप में प्रचारित किया गया। सोशल मीडिया पर मीम्स की बाढ़ आ गई कि अब कुत्ता पहाड़ों में टहलेगा। लोगों को लगा कि न्याय हुआ है। सरकार ने यह संदेश देने की कोशिश की कि वीआईपी कल्चर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
लेकिन क्या वह वास्तव में सजा थी? या वह केवल जनता के गुस्से को शांत करने के लिए एक अस्थायी ‘कूलिंग ऑफ पीरियड’ था? आज के घटनाक्रम ने साबित कर दिया है कि भारतीय नौकरशाही की याददाश्त बहुत कमजोर होती है और उसका भाईचारा बहुत मजबूत।
भाग 3: ‘पनिशमेंट पोस्टिंग’ का मिथक और पूर्वोत्तर का अपमान
इस पूरे प्रकरण में एक बहुत बड़ा मुद्दा जो अक्सर चर्चा से बाहर रह जाता है, वह है तबादले को ‘सजा’ मानना। जब इन दोनों अधिकारियों को लद्दाख और अरुणाचल भेजा गया, तो इसे ‘पनिशमेंट पोस्टिंग’ कहा गया। यह मानसिकता अपने आप में समस्याग्रस्त है।
लद्दाख और अरुणाचल सजा क्यों? लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश भारत के अभिन्न अंग हैं और रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण हैं। वहां काम करने के लिए सबसे बेहतरीन और समर्पित अधिकारियों की जरूरत होती है। जब सरकार भ्रष्ट या दागी अफसरों को वहां भेजती है, तो वह परोक्ष रूप से यह संदेश देती है कि ये क्षेत्र ‘डंपिंग ग्राउंड’ हैं।
क्या अरुणाचल प्रदेश या लद्दाख के लोग अच्छी प्रशासन व्यवस्था के हकदार नहीं हैं? एक अधिकारी जो दिल्ली में अपनी शक्ति का दुरुपयोग कर रहा था, क्या गारंटी है कि वह सुदूर क्षेत्र में जाकर सुधर जाएगा? वास्तव में, सुदूर क्षेत्रों में जहां मीडिया की निगरानी कम होती है, ऐसे अफसरों की मनमानी और बढ़ जाने की आशंका रहती है।
नौकरशाही का कवच तबादला कभी भी वास्तविक सजा नहीं होती।
- वेतन और भत्ते: अधिकारी का वेतन कम नहीं होता। उनका ग्रेड पे वही रहता है।
- सुविधाएं: लद्दाख या अरुणाचल में भी उन्हें सरकारी आवास, गाड़ी और नौकर-चाकर मिलते हैं।
- करियर ग्राफ: उनकी वरिष्ठता (Seniority) पर कोई असर नहीं पड़ता।
यह केवल स्थान परिवर्तन है। यह वैसा ही है जैसे किसी बच्चे को शरारत करने पर कुछ देर के लिए दूसरे कमरे में भेज दिया जाए। कुछ समय बाद, जब मामला ठंडा हो जाता है, तो उन्हें वापस मुख्य धारा में बुला लिया जाता है। और यही अब हुआ है।
भाग 4: दिल्ली वापसी और ‘बड़ी पोस्टिंग’ – सिस्टम का सच
अब हम वर्तमान खबर पर आते हैं। खबरों के अनुसार, वह ‘निर्वासन’ का समय पूरा हो चुका है। लद्दाख और अरुणाचल में कुछ समय बिताने के बाद, अब उन अधिकारियों को कथित तौर पर दिल्ली में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी गई है (जैसा कि प्रॉम्प्ट में उल्लेखित है)।
जवाबदेही कहां है? यह घटनाक्रम कई गंभीर सवाल खड़े करता है:
- क्या उस अधिकारी के आचरण में सुधार की कोई समीक्षा की गई?
- क्या स्टेडियम खाली कराने के कारण जिन खिलाड़ियों का नुकसान हुआ, उसकी भरपाई हुई?
- क्या ‘सजा’ का मतलब सिर्फ कुछ महीनों का वनवास है?
प्रशासनिक गलियारों में एक अलिखित नियम है – “ब्यूरोक्रेसी अपने लोगों को कभी नहीं छोड़ती।” चाहे कितना भी बड़ा विवाद हो, आईएएस लॉबी एक-दूसरे की रक्षा करती है। जांच कमेटियां बनती हैं, रिपोर्ट ठंडे बस्ते में जाती हैं, और जैसे ही जनता का ध्यान किसी और मुद्दे पर जाता है, दागी अफसरों को चुपचाप पुनर्स्थापित (Rehabilitate) कर दिया जाता है।
दिल्ली में पोस्टिंग पाना हर आईएएस का सपना होता है। यह सत्ता का केंद्र है। अगर स्टेडियम कांड जैसे गंभीर कदाचार के बावजूद किसी अधिकारी को वापस दिल्ली की मलाईदार पोस्टिंग मिल जाती है, तो यह बाकी ईमानदार अफसरों के मनोबल को तोड़ता है और दागी अफसरों को यह संदेश देता है कि “कुछ भी कर लो, अंत में सब ठीक हो जाएगा।”
भाग 5: भारतीय नौकरशाही की औपनिवेशिक मानसिकता (Colonial Mindset)
कुत्ता घुमाने के लिए स्टेडियम खाली कराने की घटना कोई अपवाद (Exception) नहीं है, बल्कि यह एक नियम है। यह उस मानसिकता का लक्षण है जो 1947 में अंग्रेजों के जाने के बाद भी नहीं गई।
आईसीएस से आईएएस तक का सफर अंग्रेजों ने ‘इंडियन सिविल सर्विस’ (ICS) बनाई थी भारत पर राज करने के लिए। उनका उद्देश्य जनता की सेवा करना नहीं, बल्कि ब्रिटिश साम्राज्य के हितों की रक्षा करना और जनता को नियंत्रण में रखना था। आजादी के बाद इसका नाम बदलकर ‘इंडियन एडमिनिस्ट्रेटिव सर्विस’ (IAS) कर दिया गया, लेकिन ‘डीएनए’ वही रहा।
आज भी कई अधिकारी खुद को ‘कलेक्टर’ या ‘साहब’ कहलवाना पसंद करते हैं। उनके लिए लाल बत्ती (भले ही अब न हो), हूटर, आगे-पीछे दौड़ते अर्दली और खाली सड़कें उनकी शक्ति का प्रदर्शन हैं।
साहब और सेवक का अंतर त्यागराज स्टेडियम की घटना में सबसे दुखद पहलू सुरक्षा गार्डों का व्यवहार था। जब उनसे पूछा गया कि वे खिलाड़ियों को क्यों भगा रहे हैं, तो उन्होंने कहा, “साहब आने वाले हैं।” यह डर बताता है कि एक आईएएस अधिकारी का रुतबा कानून और नियम से ऊपर माना जाता है। गार्ड को पता था कि अगर उसने नियम का हवाला देकर अधिकारी को रोका, तो उसकी नौकरी जा सकती है, लेकिन अगर उसने खिलाड़ियों को भगाया, तो कुछ नहीं होगा।
यह ‘माई-बाप’ संस्कृति लोकतंत्र को अंदर से खोखला कर रही है। जब एक अधिकारी को लगता है कि सरकारी संपत्ति (स्टेडियम) उसकी निजी जागीर है, तो वह संविधान की शपथ का उल्लंघन कर रहा होता है।

भाग 6: खेल संस्कृति बनाम बाबू संस्कृति
भारत ओलंपिक में मेडल टैली में ऊपर क्यों नहीं आता? इसके कई कारण हैं, लेकिन एक बड़ा कारण यह ‘बाबू संस्कृति’ भी है।
संसाधनों पर कब्जा भारत में खेल के मैदान, जिमखाना और क्लब अक्सर नौकरशाहों और राजनेताओं के कब्जे में रहते हैं।
- दिल्ली जिमखाना क्लब हो या गोल्फ क्लब, वहां सदस्यता पाने के लिए आम आदमी तरसता है, लेकिन नौकरशाहों के लिए वहां विशेष कोटा होता है।
- स्टेडियमों का रखरखाव खेल विभाग के अधीन होता है, जो अंततः आईएएस अधिकारियों द्वारा चलाया जाता है। वे अक्सर यह भूल जाते हैं कि उनका काम सुविधाएं प्रदान करना है, न कि उनका उपभोग करना।
जब एक खिलाड़ी देखता है कि उसकी ट्रेनिंग से ज्यादा महत्व एक कुत्ते की सैर को दिया जा रहा है, तो उसका मनोबल टूटता है। यह घटना सिर्फ स्टेडियम खाली कराने की नहीं थी, यह एक खिलाड़ी के सपनों को कुचलने की थी।
विदेशों से तुलना हम अक्सर अमेरिका, चीन या यूरोप के मेडल जीतने की बात करते हैं। वहां के खेल प्रशासक खिलाड़ियों के लिए काम करते हैं। वहां कोई मेयर या अधिकारी किसी एथलीट की ट्रेनिंग रोककर अपना कुत्ता नहीं घुमा सकता। अगर ऐसा हो जाए, तो वहां का मीडिया और कानून उस अधिकारी का करियर खत्म कर देगा। वहां जवाबदेही तय है। भारत में, जवाबदेही का मतलब सिर्फ “ट्रांसफर” है।
भाग 7: सिविल सेवा सुधारों की आवश्यकता
इस घटना और उसके बाद के पुनर्वास (Rehabilitation) ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भारत में प्रशासनिक सुधार (Administrative Reforms) की सख्त जरूरत है।
1. जवाबदेही कानून: वर्तमान में, किसी आईएएस अधिकारी को नौकरी से निकालना लगभग असंभव है। अनुच्छेद 311 उन्हें बहुत अधिक सुरक्षा प्रदान करता है। बेशक, यह राजनीतिक प्रतिशोध से बचाने के लिए था, लेकिन अब यह अक्षमता और अहंकार का कवच बन गया है। नियमों में बदलाव की जरूरत है ताकि गंभीर कदाचार के लिए ‘बर्खास्तगी’ या ‘डिमोशन’ जैसा कड़ा दंड दिया जा सके।
2. 360-डिग्री मूल्यांकन: अधिकारियों का मूल्यांकन सिर्फ उनकी फाइलों से नहीं, बल्कि जनता और उनके अधीन काम करने वाले कर्मचारियों के फीडबैक से होना चाहिए। अगर जनता किसी अधिकारी के व्यवहार से खुश नहीं है, तो उसे प्रमोशन या प्राइम पोस्टिंग नहीं मिलनी चाहिए।
3. वीआईपी सुविधाओं में कटौती: क्या एक आईएएस अधिकारी को इतने बड़े लुटियंस बंगले, दर्जनों नौकर और अनगिनत गाड़ियां चाहिए? जब तक वे राजाओं की तरह रहेंगे, वे राजाओं की तरह सोचेंगे। उनकी सुविधाएं कॉर्पोरेट सेक्टर की तरह ‘परफॉर्मेंस बेस्ड’ होनी चाहिए, न कि ‘पद बेस्ड’।
भाग 8: जनता की भूमिका और सोशल मीडिया की ताकत
इस अंधेरे में अगर कोई रोशनी की किरण है, तो वह है ‘जागरूक जनता’। त्यागराज स्टेडियम का मामला कभी सामने नहीं आता अगर मीडिया और सोशल मीडिया ने इसे नहीं उठाया होता।
आज का नागरिक चुप नहीं रहता। सबके हाथ में कैमरा है। अगर कोई वीआईपी ट्रैफिक नियम तोड़ता है, एंबुलेंस का रास्ता रोकता है, या सत्ता का दुरुपयोग करता है, तो उसका वीडियो मिनटों में वायरल हो जाता है। यह ‘डिजिटल निगरानी’ ही एकमात्र तरीका है जिससे इस निरंकुश नौकरशाही पर थोड़ा लगाम लगाया जा सकता है।
हालांकि, जनता की याददाश्त भी कमजोर होती है। हम एक मुद्दे पर गुस्सा होते हैं और चार दिन बाद भूल जाते हैं। सरकारें इसी का फायदा उठाती हैं। वे तूफान थमने का इंतजार करती हैं और फिर अपने चहेते अफसरों को वापस ले आती हैं। हमें यह सवाल पूछते रहना होगा—”उस जांच का क्या हुआ? उस अधिकारी को वापस क्यों लाया गया?”
भाग 9: क्या दिल्ली पोस्टिंग ही सफलता का पैमाना है?
एक सवाल यह भी उठता है कि आखिर हर अधिकारी दिल्ली क्यों आना चाहता है? दिल्ली पोस्टिंग को इतना ग्लैमरस क्यों बना दिया गया है?
दिल्ली में रहना शक्ति के केंद्र में रहना है। मंत्रालयों में बैठना, नीतियां बनाना (भले ही वे जमीन पर लागू न हों), और राजनीतिक आकाओं के करीब रहना—यही आज की नौकरशाही का अंतिम लक्ष्य बन गया है। क्षेत्र में काम करना, धूल-धूप में जनता की समस्याएं सुलझाना अब ‘सजा’ माना जाता है।
जब तक ‘फील्ड पोस्टिंग’ को ‘मंत्रालय पोस्टिंग’ से ज्यादा सम्मान नहीं मिलेगा, तब तक यह दौड़ जारी रहेगी। जिस अधिकारी ने लद्दाख में अच्छा काम किया हो, उसे वहां काम करने के लिए पुरस्कृत किया जाना चाहिए, न कि उसे वापस दिल्ली बुलाकर इनाम देना चाहिए। और जिसने दिल्ली में सत्ता का दुरुपयोग किया, उसे दिल्ली से हमेशा के लिए दूर रखना चाहिए।
भाग 10: अब आगे क्या?
वीआईपी अफसर की यह वीआईपी हरकत और उसके बाद मिली ‘बड़ी पोस्टिंग’ एक चक्रीय कहानी है जो भारत में बार-बार दोहराई जाती है। कुत्ता घुमाने के लिए स्टेडियम खाली कराना केवल एक घटना थी, लेकिन यह उस बीमारी का लक्षण है जो हमारे लोकतंत्र को संक्रमित कर चुकी है। वह बीमारी है—विशेषाधिकार (Entitlement)।
जब तक एक अधिकारी और एक आम नागरिक के बीच कानून के लागू होने में अंतर रहेगा, तब तक हम सच्चे अर्थों में विकसित राष्ट्र नहीं बन सकते। एक विकसित राष्ट्र वह नहीं है जहां गरीब के पास कार हो, बल्कि वह है जहां अमीर और शक्तिशाली भी सार्वजनिक परिवहन और सार्वजनिक नियमों का पालन करें।
आज, जब वह अधिकारी अपनी नई कुर्सी पर बैठेगा, तो शायद उसे अपनी जीत का अहसास होगा। उसे लगेगा कि सिस्टम ने उसे बचा लिया। लेकिन यह सिस्टम की जीत नहीं, बल्कि नैतिकता की हार है। यह उन हजारों एथलीट्स की हार है जो सुबह 4 बजे उठकर मेहनत करते हैं। यह उस टैक्स भरने वाले नागरिक की हार है जो सोचता है कि उसका पैसा देश के विकास में लग रहा है।
हमें क्या करना चाहिए?
- सवाल पूछें: आरटीआई (RTI) के माध्यम से पूछें कि पोस्टिंग का आधार क्या है?
- दबाव बनाएं: सोशल मीडिया और लोकतांत्रिक मंचों का उपयोग करके जवाबदेही मांगें।
- संस्कृति बदलें: अपने बच्चों को सिखाएं कि सिविल सर्विस का मतलब ‘सेवा’ है, ‘सत्ता’ नहीं।
अंत में, यह कुत्ता कांड इतिहास के पन्नों में एक अजीबोगरीब किस्से के रूप में दर्ज हो गया है, लेकिन इसका सबक बहुत गहरा है। अगर हम अब भी नहीं जागे, तो कल कोई और अफसर, किसी और स्टेडियम, अस्पताल या सड़क को अपने निजी शौक के लिए बंद करा देगा, और हम बस देखते रह जाएंगे।
लोकतंत्र में ‘वीआईपी’ सिर्फ एक होना चाहिए—और वह है भारत का आम नागरिक। जब तक यह बात हमारी नौकरशाही के दिमाग में नहीं घुसेगी, तब तक स्टेडियम खाली होते रहेंगे और कुत्ते टहलते रहेंगे।
