Yuvraj Sehwag Selfie

2000s क्रिकेट गैंग फिर साथ: युवराज सिंह, सहवाग, अजीत अगरकर की एक सेल्फी ने इंटरनेट पर मचा दिया तूफान

समय का पहिया कितनी तेजी से घूमता है, इसका अंदाजा हमें अक्सर तब लगता है जब हम अपनी पुरानी तस्वीरों को देखते हैं या अपने बचपन के नायकों को एक साथ, एक फ्रेम में, वर्षों बाद मुस्कुराते हुए देखते हैं। भारतीय क्रिकेट के इतिहास में कई सुनहरे अध्याय लिखे गए हैं, लेकिन 2000 का दशक (2000s era) एक ऐसा दौर था जिसने भारतीय क्रिकेट की परिभाषा को पूरी तरह बदल कर रख दिया था। यह वह दौर था जब भारतीय टीम ने ‘भद्रजनों के खेल’ (Gentleman’s Game) में आक्रामकता का तड़का लगाया था। यह वह दौर था जब टीम इंडिया ने सिर्फ जीतना ही नहीं, बल्कि विपक्ष की आंखों में आंखें डालकर जवाब देना सीखा था।

और इसी दौर के तीन सबसे चमकदार सितारे—युवराज सिंह, वीरेंद्र सहवाग और अजीत अगरकर—जब एक ही फ्रेम में नजर आए, तो इंटरनेट पर एक ऐसी सुनामी आई जिसने हर क्रिकेट प्रेमी को पुरानी यादों के समंदर में डुबो दिया। सोशल मीडिया पर एक सेल्फी वायरल हुई, और अचानक से हर कोई 2003 वर्ल्ड कप, 2007 टी20 वर्ल्ड कप और उन नीली जर्सी वाले दिनों की चर्चा करने लगा। यह ब्लॉग पोस्ट उस एक तस्वीर की कहानी, इन तीन दिग्गजों की दोस्ती, और 2000 के दशक की उस सुनहरी विरासत का एक विस्तृत दस्तावेज है, जिसने आज के भारतीय क्रिकेट की नींव रखी।

एक सेल्फी और यादों का सैलाब

सोशल मीडिया आज के दौर में ब्रेकिंग न्यूज का सबसे बड़ा स्रोत है, लेकिन कभी-कभी यह एक ‘टाइम मशीन’ का काम भी करता है। हाल ही में, जब युवराज सिंह ने अपने इंस्टाग्राम हैंडल पर वीरेंद्र सहवाग और अजीत अगरकर के साथ एक सेल्फी पोस्ट की, तो कैप्शन की जरूरत ही नहीं पड़ी। तस्वीर अपने आप में एक पूरी कहानी कह रही थी। तीन दोस्त, तीन लीजेंड्स, और चेहरे पर वही पुरानी शरारती मुस्कान जो कभी ड्रेसिंग रूम की जान हुआ करती थी।

तस्वीर में तीनों काफी रिलैक्स्ड नजर आ रहे थे। वीरेंद्र सहवाग अपने चिर-परिचित अंदाज में, युवराज सिंह अपने स्टाइलिश चश्मे के साथ और अजीत अगरकर अपनी शांत लेकिन सौम्य मुस्कान के साथ। यह तस्वीर शायद किसी गोल्फ कोर्स की थी या किसी निजी समारोह की, लेकिन इसने प्रशंसकों को सीधे 20 साल पीछे पहुंचा दिया।

इंटरनेट पर प्रतिक्रियाओं की बाढ़ आ गई। “बचपन की यादें ताजा हो गईं,” “असली मैच विनर,” “द गोल्डन गैंग”—जैसे कमेंट्स से सोशल मीडिया पट गया। यह केवल एक तस्वीर नहीं थी; यह उस पीढ़ी के लिए एक इमोशनल ट्रिगर था जो स्कूल से भागकर इनका मैच देखने के लिए टीवी के सामने चिपक जाता था। आइए, इस तिकड़ी और उनके दौर के महत्व को गहराई से समझते हैं।

2000 का दशक: भारतीय क्रिकेट का पुनर्जागरण

इस सेल्फी के महत्व को समझने के लिए हमें उस दौर को समझना होगा जिसमें ये तीनों खेलते थे। 2000 का दशक भारतीय क्रिकेट के लिए एक ‘ट्रांजिशन’ यानी बदलाव का दौर था। 90 के दशक में भारतीय टीम काफी हद तक सचिन तेंदुलकर के प्रदर्शन पर निर्भर थी। लेकिन 2000 में मैच फिक्सिंग स्कैंडल के बाद जब सौरव गांगुली ने कमान संभाली, तो एक नई टीम इंडिया का जन्म हुआ।

Yuvraj Sehwag Selfie

यह टीम इंडिया निडर थी। यह टीम इंडिया विदेशों में जीतना जानती थी। और इस नई टीम इंडिया की रीढ़ की हड्डी थे—युवराज सिंह, वीरेंद्र सहवाग, अजीत अगरकर, जहीर खान, हरभजन सिंह और मोहम्मद कैफ जैसे युवा खिलाड़ी।

युवराज, सहवाग और अगरकर—ये तीनों उस ‘युवा ब्रिगेड’ का हिस्सा थे जिसने ऑस्ट्रेलिया, इंग्लैंड और पाकिस्तान जैसी मजबूत टीमों को उन्हीं की धरती पर धूल चटाना शुरू किया था। आज जब हम रोहित शर्मा या विराट कोहली की आक्रामक कप्तानी देखते हैं, तो हमें याद रखना चाहिए कि उस आक्रामकता के बीज इसी पीढ़ी ने बोए थे। इन तीनों की दोस्ती मैदान के अंदर जितनी गहरी थी, मैदान के बाहर उतनी ही मजबूत थी, जो इस वायरल सेल्फी में साफ झलकती है।

युवराज सिंह: द फाइटर और सिक्सर किंग

इस सेल्फी में सबसे स्टाइलिश दिखने वाले युवराज सिंह, 2000 के दशक के भारतीय क्रिकेट के ‘पोस्टर बॉय’ थे। जब उन्होंने 2000 में आईसीसी नॉकआउट ट्रॉफी में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ डेब्यू किया था, तो स्टीव वॉ और ग्लेन मैकग्राथ जैसे दिग्गजों के खिलाफ उनकी आक्रामक बल्लेबाजी ने दुनिया को बता दिया था कि एक सितारा पैदा हो चुका है।

युवराज सिंह और वीरेंद्र सहवाग की दोस्ती जगजाहिर है। दोनों ही आक्रामक बल्लेबाज थे और दोनों ही स्पिनरों को रिमांड पर लेने के लिए जाने जाते थे। इस सेल्फी को देखकर नेटवेस्ट ट्रॉफी 2002 का फाइनल याद आता है, जहां युवराज ने मोहम्मद कैफ के साथ मिलकर असंभव को संभव कर दिखाया था। वह लॉर्ड्स की बालकनी में गांगुली का टी-शर्ट लहराना भारतीय क्रिकेट का सबसे प्रतिष्ठित दृश्य है, लेकिन उस जीत की नींव युवराज सिंह ने रखी थी।

2007 का टी20 वर्ल्ड कप और 2011 का वनडे वर्ल्ड कप—इन दोनों बड़े टूर्नामेंट्स में युवराज सिंह ‘मैन ऑफ द टूर्नामेंट’ या प्रमुख नायक रहे। स्टुअर्ट ब्रॉड को मारे गए वो छह छक्के आज भी रोंगटे खड़े कर देते हैं। लेकिन युवराज की कहानी सिर्फ क्रिकेट तक सीमित नहीं है। कैंसर से उनकी जंग और फिर मैदान पर वापसी ने उन्हें एक ‘खिलाड़ी’ से ऊपर उठकर एक ‘योद्धा’ बना दिया।

सहवाग और अगरकर के साथ उनकी बॉन्डिंग हमेशा खास रही है। ड्रेसिंग रूम की कहानियों में अक्सर जिक्र आता है कि कैसे ये तीनों मिलकर जूनियर खिलाड़ियों के साथ प्रैंक किया करते थे। युवराज सिंह की हंसी और उनका बेबाक अंदाज इस सेल्फी में भी वही पुराना जादू बिखेर रहा है। फैंस के लिए युवी सिर्फ एक क्रिकेटर नहीं, एक इमोशन हैं। और जब वह अपने पुराने साथियों के साथ दिखते हैं, तो वह इमोशन दोगुना हो जाता है।

वीरेंद्र सहवाग: नजफगढ़ का नवाब और मल्टीटास्कर

सेल्फी में दूसरी प्रमुख शख्सियत वीरेंद्र सहवाग हैं। दुनिया के लिए वे एक विध्वंसक बल्लेबाज थे, लेकिन अपने दोस्तों के लिए वे ‘वीरू’ हैं। सहवाग का क्रिकेट खेलने का तरीका बिल्कुल सरल था—”गेंद देखो, गेंद मारो।” 2000 के दशक में जब टेस्ट क्रिकेट में सलामी बल्लेबाज रक्षात्मक खेल खेलते थे, सहवाग ने पहली गेंद से चौका मारने का ट्रेंड शुरू किया।

अजीत अगरकर और युवराज सिंह के साथ सहवाग की केमिस्ट्री इसलिए भी खास थी क्योंकि ये तीनों एक ही समय में टीम का अहम हिस्सा बने थे। सहवाग ने एक बार इंटरव्यू में कहा था कि वे बल्लेबाजी करते समय गाने गाते थे। यह उनका बेफिक्र अंदाज था जिसने उन्हें महान बनाया। चाहे मुल्तान में तिहरा शतक हो या पाकिस्तान के खिलाफ उनकी लगातार धुनाई, सहवाग ने क्रिकेट में ‘डर’ शब्द को अपनी डिक्शनरी से हटा दिया था।

आजकल सहवाग सोशल मीडिया पर अपनी वन-लाइनर्स और मजेदार कमेंट्री के लिए जाने जाते हैं। लेकिन इस सेल्फी में उनकी मुस्कान बता रही है कि पुराने दोस्तों के साथ मिलने का सुकून कुछ और ही होता है। सहवाग और युवराज ने कई बार मध्यक्रम और शीर्ष क्रम में भारत को संभाला। उनकी साझेदारी सिर्फ रनों की नहीं थी, बल्कि मजे और बेफिक्री की भी थी।

सहवाग की मौजूदगी किसी भी फोटो या ड्रेसिंग रूम को हल्का-फुल्का बना देती है। युवराज सिंह अक्सर मजाक में कहते हैं कि सहवाग जैसा इंसान उन्होंने अपनी जिंदगी में नहीं देखा, जो आउट होने के बाद भी उतना ही खुश रहता है जितना शतक मारने के बाद। यह ‘जीनियस माइंडसेट’ ही सहवाग को इस गैंग का सबसे अलग सदस्य बनाता है।

अजीत अगरकर: शांत योद्धा और अब चीफ सेलेक्टर

इस तिकड़ी में तीसरे और शायद सबसे दिलचस्प व्यक्ति हैं अजीत अगरकर। अक्सर जब हम 2000 के दशक के स्टार्स की बात करते हैं, तो सचिन, सौरव, राहुल, युवी और वीरू के नाम पहले आते हैं। लेकिन अजीत अगरकर उस टीम के ‘अनसंग हीरो’ (Unsung Hero) थे। और वर्तमान में भारतीय पुरुष क्रिकेट टीम के चीफ सेलेक्टर (Chief Selector) होने के नाते, उनकी उपस्थिति इस सेल्फी को और भी खास बनाती है।

अजीत अगरकर ने 90 के दशक के अंत में पर्दापण किया था और 2000 के दशक में वे वनडे क्रिकेट में भारत के सबसे भरोसेमंद विकेट लेने वाले गेंदबाज थे। उनके नाम वनडे में भारत के लिए सबसे तेज 50 विकेट लेने का रिकॉर्ड लंबे समय तक रहा। इतना ही नहीं, लॉर्ड्स के ऐतिहासिक मैदान पर शतक जड़ने का कारनामा जो सचिन और रिकी पोंटिंग जैसे दिग्गज नहीं कर पाए, वह अजीत अगरकर ने कर दिखाया था।

युवराज और सहवाग के साथ अगरकर की दोस्ती बहुत गहरी रही है। मुंबई के होने के बावजूद, अगरकर का नॉर्थ इंडियन खिलाड़ियों (युवी, वीरू, भज्जी) के साथ बहुत अच्छा तालमेल था। फील्ड पर वे हमेशा गंभीर दिखते थे, लेकिन दोस्तों के बीच वे अपनी हाजिरजवाबी के लिए जाने जाते थे।

आज अगरकर एक बहुत ही जिम्मेदारी भरे पद पर हैं। चीफ सेलेक्टर के रूप में उन्हें कई कड़े फैसले लेने पड़ते हैं, आलोचनाएं झेलनी पड़ती हैं। ऐसे में, अपने पुराने साथियों के साथ इस तरह के रिलैक्स्ड मूड में उन्हें देखना फैंस के लिए एक सुखद अनुभव है। यह दिखाता है कि पद और प्रतिष्ठा अपनी जगह है, लेकिन दोस्ती अपनी जगह। सोशल मीडिया पर कई लोगों ने मजाक में लिखा कि “युवी पाजी, अगरकर भाई से कहिए कि वर्ल्ड कप के लिए अच्छी टीम चुनें।” यह कमेंट्स दिखाते हैं कि फैंस आज भी इन खिलाड़ियों से कितना जुड़ाव महसूस करते हैं।

यादों का गलियारा: वो मैच, वो पल

इस सेल्फी ने न केवल इन तीन चेहरों को दिखाया, बल्कि उन अनगिनत यादों को भी ताज़ा कर दिया जो इन तीनों ने मिलकर बनाई थीं। आइए, कुछ ऐसे पलों को याद करें जहां यह ‘2000s गैंग’ अपने चरम पर था।

1. आईसीसी चैंपियंस ट्रॉफी 2002: यह वह टूर्नामेंट था जहां भारत और श्रीलंका संयुक्त विजेता बने थे। इस टूर्नामेंट में सहवाग की बल्लेबाजी, युवराज की फिनिशिंग और अगरकर की कसी हुई गेंदबाजी ने भारत को फाइनल तक पहुंचाया था। यह वह दौर था जब दुनिया मानने लगी थी कि भारत अब सिर्फ ‘घर का शेर’ नहीं है।

2. 2003 वर्ल्ड कप, दक्षिण अफ्रीका: सौरव गांगुली की कप्तानी में भारत ने फाइनल तक का सफर तय किया था। उस टूर्नामेंट में हर मैच एक उत्सव जैसा था। सहवाग ने लीग मैचों में तबाही मचाई थी, युवराज ने नामीबिया और कीनिया के खिलाफ और फिर पाकिस्तान के खिलाफ उस दबाव भरे मैच में महत्वपूर्ण पारियां खेली थीं। अगरकर हालांकि उस टूर्नामेंट में ज्यादा नहीं खेले थे, लेकिन वे उस स्क्वाड का महत्वपूर्ण हिस्सा थे। उस वर्ल्ड कप की जर्सी और खिलाड़ियों का जोश आज भी रोंगटे खड़े कर देता है।

3. पाकिस्तान का दौरा 2004 और 2006: ये वो दौरे थे जिसने इन तीनों की दोस्ती को और गहरा किया। मुल्तान में सहवाग का तिहरा शतक और लाहौर में युवराज का शतक। 2006 में वनडे सीरीज में युवराज और धोनी की साझेदारी और अगरकर की रिवर्स स्विंग। पाकिस्तान को उनकी धरती पर हराना उस समय सबसे बड़ी उपलब्धि मानी जाती थी, और इस तिकड़ी ने इसमें केंद्रीय भूमिका निभाई थी।

4. टी20 वर्ल्ड कप 2007: हालांकि अजीत अगरकर ने इसके बाद टी20 ज्यादा नहीं खेला, लेकिन सहवाग और युवराज ने जोहान्सबर्ग में इतिहास रचा। इंग्लैंड के खिलाफ छह छक्के और ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ सेमीफाइनल में युवराज की 70 रनों की पारी—ये वो पल थे जब भारत विश्व विजेता बना।

सोशल मीडिया का तूफान: फैंस की प्रतिक्रियाएं

जैसे ही यह तस्वीर पोस्ट हुई, इंटरनेट पर ‘नॉस्टेल्जिया’ की लहर दौड़ गई। ट्विटर (X) पर #YuvrajSingh, #Sehwag और #90sKids ट्रेंड करने लगे। फैंस की प्रतिक्रियाएं बहुत भावुक थीं।

एक यूजर ने लिखा, “मेरे बचपन के हीरो एक साथ। काश हम उस दौर में वापस जा सकते।” दूसरे ने लिखा, “यह सिर्फ एक फोटो नहीं है, यह भारतीय क्रिकेट का सबसे निडर युग है।” इंस्टाग्राम पर मीम्स की बाढ़ आ गई। एक लोकप्रिय मीम में दिखाया गया कि कैसे आज के दौर में खिलाड़ी पीआर (PR) एजेंसियों द्वारा मैनेज किए जाते हैं और उनकी दोस्ती बनावटी लगती है, जबकि युवराज-सहवाग-अगरकर की यह दोस्ती बिल्कुल असली (Raw and Real) है।

बहुत से लोगों ने अजीत अगरकर के लुक की भी तारीफ की। संन्यास के सालों बाद भी वे काफी फिट नजर आ रहे हैं। वहीं, युवराज और सहवाग के थोड़े बढ़े हुए वजन और सफेद होती दाढ़ी ने लोगों को यह अहसास दिलाया कि हम सब बड़े हो गए हैं। समय बीत गया है, लेकिन इन दिग्गजों के प्रति सम्मान और प्यार कम नहीं हुआ है।

एक दिलचस्प पहलू यह भी था कि कई युवा फैंस, जिन्होंने शायद इन तीनों को लाइव खेलते हुए नहीं देखा, वे भी इस हाइप का हिस्सा बन गए। उन्होंने यूट्यूब पर इनके पुराने वीडियो सर्च किए और कमेंट किया, “वाकई, वो दौर कुछ और ही था।” यह इस बात का सबूत है कि महानता को किसी परिचय की जरूरत नहीं होती, वह पीढ़ियों से परे होती है।

दोस्ती की मिसाल: मैदान से बाहर का रिश्ता

क्रिकेट एक टीम गेम है, लेकिन हर टीम में छोटे-छोटे ग्रुप बन जाते हैं। 2000 के दशक की टीम इंडिया में भी ऐसा ही था। लेकिन उस दौर की खास बात यह थी कि खिलाड़ियों के बीच आपसी मतभेद मनभेद में नहीं बदलते थे।

युवराज सिंह ने कई इंटरव्यूज में बताया है कि जब वे कैंसर से जूझ रहे थे, तब उनके पुराने साथियों ने उनका कितना साथ दिया। सहवाग अक्सर अस्पताल या घर पर उनसे मिलने जाते थे। अजीत अगरकर, जो कम बोलते हैं, हमेशा एक सपोर्ट सिस्टम की तरह मौजूद रहे।

रिटायरमेंट के बाद अक्सर खिलाड़ी अपनी-अपनी जिंदगियों में व्यस्त हो जाते हैं। कोई कमेंट्री कर रहा है, कोई कोचिंग, तो कोई प्रशासन में है। ऐसे में इन तीनों का वक्त निकालकर मिलना और पुरानी यादें ताजा करना यह बताता है कि उनका रिश्ता सिर्फ क्रिकेट के मैदान तक सीमित नहीं था। वे जीवन भर के दोस्त हैं।

आजकल की प्रतिस्पर्धी दुनिया में, जहां टीम में जगह बनाने के लिए गलाकाट प्रतिस्पर्धा है, ऐसी निस्वार्थ दोस्ती कम ही देखने को मिलती है। यह सेल्फी आज की युवा पीढ़ी के क्रिकेटरों के लिए भी एक संदेश है कि रिकॉर्ड और रन तो बनते-टूटते रहेंगे, लेकिन जो यादें और रिश्ते आप ड्रेसिंग रूम में बनाएंगे, वही अंत में आपके साथ रह जाएंगे।

अजीत अगरकर: एक नई भूमिका में पुराना दोस्त

इस तस्वीर में अजीत अगरकर की उपस्थिति पर थोड़ा और विस्तार से चर्चा करना जरूरी है। वे इस समय भारतीय क्रिकेट के सबसे शक्तिशाली पदों में से एक पर हैं। एक चयनकर्ता के रूप में, उन्हें अक्सर आलोचनाओं का सामना करना पड़ता है। चाहे वह टी20 वर्ल्ड कप के लिए टीम का चयन हो या किसी सीनियर खिलाड़ी को ड्रॉप करने का फैसला।

सोशल मीडिया पर अक्सर उन्हें ट्रोल किया जाता है। लेकिन इस तस्वीर ने उनके मानवीय पक्ष (Human Side) को दिखाया। इसने दिखाया कि चयन समिति की मीटिंग्स के तनाव और मीडिया की चकाचौंध से दूर, वह भी एक इंसान हैं जो अपने दोस्तों के साथ हंसना-बोलना चाहता है। युवराज और सहवाग के साथ उनकी बॉन्डिंग ने फैंस को यह याद दिलाया कि चयनकर्ता बनने से पहले, वह एक ऐसे खिलाड़ी थे जिसने भारत के लिए अपना पसीना बहाया है और कई मैच जिताए हैं।

क्या आज का क्रिकेट बदल गया है?

इस ‘रीयूनियन’ ने एक बहस को भी जन्म दिया है: क्या 2000 के दशक का क्रिकेट आज के क्रिकेट से बेहतर था?

तकनीकी रूप से, आज का क्रिकेट बहुत आगे निकल चुका है। फिटनेस का स्तर ऊंचा है, शॉट मेकिंग में विविधता है और पैसा बेहिसाब है। लेकिन 2000 के दशक के क्रिकेट में एक अलग तरह का ‘चरित्र’ (Character) था।

उस समय सोशल मीडिया नहीं था। खिलाड़ियों की हर हरकत पर चौबीसों घंटे निगरानी नहीं होती थी। इसलिए वे मैदान पर और बाहर अधिक स्वाभाविक (Natural) रहते थे। युवराज का गुस्सा, सहवाग की बेफिक्री, गांगुली की दादागिरी—यह सब बिना किसी फिल्टर के हमारे सामने आता था। आज के दौर में खिलाड़ी अक्सर रटे-रटाए बयान देते हैं और अपनी छवि को लेकर बहुत सतर्क रहते हैं।

शायद यही वजह है कि जब हम युवराज, सहवाग और अगरकर को इस तरह बेपरवाह होकर सेल्फी लेते देखते हैं, तो हमें वह ‘असलीपन’ याद आता है जो कहीं खो गया है। उस दौर में प्रतिद्वंद्विता भी थी, तो दोस्ती भी गहरी थी। मैच के बाद पार्टियों की कहानियां, प्रैंक्स के किस्से—ये सब उस युग को जादुई बनाते थे।

युवराज सिंह: मेंटर और आइकन

इस सेल्फी को पोस्ट करने वाले युवराज सिंह आज भी युवाओं के मेंटर हैं। अभिषेक शर्मा और शुभमन गिल जैसे पंजाब के युवा सितारे अक्सर युवराज के मार्गदर्शन की बात करते हैं। यह देखना सुखद है कि जो व्यक्ति कभी ‘बैड बॉय’ की छवि रखता था, आज वह भारतीय क्रिकेट का ‘गॉडफादर’ जैसा फिगर बन गया है।

सहवाग और अगरकर के साथ उनकी यह तस्वीर यह भी बताती है कि वे अपने अतीत को नहीं भूले हैं। जीवन में आगे बढ़ना जरूरी है, लेकिन अपनी जड़ों और अपने पुराने साथियों को साथ लेकर चलना ही असली सफलता है। युवराज ने अपने करियर में कई उतार-चढ़ाव देखे—चोट, फॉर्म का जाना, कैंसर, वापसी, और फिर संन्यास। लेकिन इन सब के बीच, उनके दोस्त उनके साथ चट्टान की तरह खड़े रहे।

लीजेंड्स कभी रिटायर नहीं होते

अंत में, युवराज सिंह, वीरेंद्र सहवाग और अजीत अगरकर की यह सेल्फी महज कुछ पिक्सेल का संग्रह नहीं है। यह एक दस्तावेज है, एक वसीयतनामा है उस दोस्ती का, उस जुनून का और उस दौर का जिसने हमें क्रिकेट से प्यार करना सिखाया।

इंटरनेट पर मचा तूफान यह साबित करता है कि चाहे कितने भी नए सितारे आ जाएं, चाहे आईपीएल कितना भी बड़ा हो जाए, लेकिन जो जगह ‘2000s गैंग’ ने हमारे दिलों में बनाई है, उसे कोई नहीं भर सकता।

ये खिलाड़ी रिटायर हो चुके हैं, उन्होंने अपनी जर्सी उतार दी है, लेकिन उनकी विरासत आज भी जीवित है। जब भी रोहित शर्मा पुल शॉट मारते हैं, हमें युवराज की याद आती है। जब भी यशस्वी जायसवाल पहली गेंद पर चौका मारते हैं, हमें सहवाग की झलक दिखती है। और जब भी कोई गेंदबाज निचले क्रम में आकर उपयोगी रन बनाता है या महत्वपूर्ण साझेदारी तोड़ता है, हमें अजीत अगरकर याद आते हैं।

यह सेल्फी हमें याद दिलाती है कि क्रिकेट सिर्फ रनों और विकेटों का खेल नहीं है, यह रिश्तों और यादों का खेल है। हम उम्मीद करते हैं कि यह गैंग इसी तरह मिलता रहे, हंसता रहे और हमें उन सुनहरे दिनों की याद दिलाता रहे जब नीली जर्सी पहनना किसी सुपरहीरो के केप पहनने से कम नहीं था।

इस सेल्फी ने हमें एक पल के लिए अपनी भागदौड़ भरी जिंदगी से रुककर पीछे मुड़कर देखने का मौका दिया, और इसके लिए हम इन दिग्गजों के शुक्रगुजार हैं। वाकई, ओल्ड इज गोल्ड, और यह सेल्फी शुद्ध सोना है।

By Isha Patel

Isha Patel Tez Khabri के साथ जुड़ी एक समाचार रिपोर्टर हैं। वे भारत और राज्यों से जुड़ी ताज़ा, ब्रेकिंग और जनहित से संबंधित खबरों को कवर करती हैं। Isha Patel शिक्षा, प्रशासन, सामाजिक मुद्दों और स्थानीय घटनाओं पर सत्यापित व तथ्यात्मक रिपोर्टिंग करती हैं।

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