कहते हैं कि दुनिया में अगर कोई भगवान का दूसरा रूप है, तो वह मां है। मां न केवल जन्म देती है, बल्कि अपने बच्चे की रक्षा के लिए वह काल से भी लड़ सकती है। शास्त्रों और पुराणों में हमने सावित्री की कहानियां सुनी हैं जो यमराज से अपने पति के प्राण वापस ले आई थीं, लेकिन कलयुग में एक मां ने अपनी सूझबूझ, हिम्मत और विज्ञान की मदद से कुछ ऐसा ही चमत्कार कर दिखाया है।
आज की यह ब्रेकिंग न्यूज सिर्फ एक खबर नहीं, बल्कि एक मिसाल है। एक ऐसी घटना जिसने चिकित्सा जगत को भी हैरान कर दिया है और हर उस व्यक्ति के लिए एक सबक है जो यह मानता है कि चमत्कार सिर्फ कहानियों में होते हैं। एक मां ने अपने बेजान हो चुके बेटे के सीने पर अपनी हथेलियां रखकर और अपने मुंह से सांस देकर उसे मौत के मुंह से वापस खींच लिया। यह कहानी है कार्डियोपल्मोनरी रिससिटेशन (CPR) की शक्ति और एक मां की कभी न हार मानने वाली जिजीविषा की।
भाग 1: वो मनहूस दोपहर और अचानक छाया सन्नाटा
यह घटना एक सामान्य मध्यमवर्गीय परिवार की है। घर में हंसी-खुशी का माहौल था। 12 वर्षीय आरव (परिवर्तित नाम) स्कूल से आने के बाद अपने कमरे में खेल रहा था। उसकी मां, सुनीता (परिवर्तित नाम), रसोई में दोपहर के खाने की तैयारी कर रही थीं। सब कुछ सामान्य था, जैसे हर रोज होता है। लेकिन नियति ने उस दिन कुछ और ही तय कर रखा था।
अचानक आरव के कमरे से एक तेज आवाज आई और फिर गहरा सन्नाटा छा गया। मां का दिल किसी अनहोनी की आशंका से धड़क उठा। सुनीता दौड़कर कमरे में गईं तो देखा कि आरव जमीन पर अचेत पड़ा है। उसके हाथ-पैर ठंडे पड़ रहे थे और आंखें पथरा गई थीं। शायद उसे बिजली का जोरदार झटका लगा था या फिर उसे अचानक कार्डियक अरेस्ट (Cardiac Arrest) आया था। कारण जो भी हो, परिणाम भयानक था।
सांसें थमीं, दिल रुका सुनीता ने बेटे को झकझोरा, उसका नाम पुकारा, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला। उन्होंने उसके सीने पर कान लगाकर धड़कन सुनने की कोशिश की। सन्नाटा। उन्होंने उसकी नाक के पास उंगली रखकर सांस जांचने की कोशिश की। सांसें थम चुकी थीं। आरव का शरीर नीला पड़ने लगा था।
यह वह पल होता है जब अच्छे-अच्छों के हाथ-पैर फूल जाते हैं। परिवार के अन्य सदस्य घबराहट में चीखने-चिल्लाने लगे। कोई पानी छिड़क रहा था, कोई एम्बुलेंस को फोन करने के लिए मोबाइल ढूंढ रहा था। लेकिन सुनीता जानती थीं कि एम्बुलेंस आने में कम से कम 15 से 20 मिनट लगेंगे, और उनके बेटे के पास इतना वक्त नहीं है। मेडिकल साइंस कहता है कि अगर दिल रुकने के 4 मिनट के भीतर दिमाग को ऑक्सीजन न मिले, तो ब्रेन डैमेज शुरू हो जाता है और 10 मिनट में मृत्यु निश्चित है।
सुनीता के सामने यमराज खड़े थे, और उनके पास हथियार के रूप में सिर्फ दो चीजें थीं – उनकी ममता और इंटरनेट पर देखा गया CPR का एक वीडियो।

भाग 2: रणभूमि बना घर का फर्श – मां का संघर्ष
उस समय सुनीता एक साधारण गृहिणी नहीं, बल्कि एक योद्धा थीं। उन्होंने अपने आंसुओं को रोका, अपने कांपते हाथों को संभाला और निर्णय लिया। उन्होंने बेटे को समतल फर्श पर लिटाया। बिस्तर या गद्दे पर CPR प्रभावी नहीं होता, यह बात उन्हें याद थी।
छाती पर दबाव (Chest Compression) सुनीता ने अपने दोनों हाथों की हथेलियों को एक के ऊपर एक रखा और आरव की छाती के बिल्कुल बीचों-बीच (स्टर्नम हड्डी पर) रखा। उन्होंने अपनी कोहनियों को सीधा किया और पूरी ताकत से छाती को दबाना शुरू किया।
“एक, दो, तीन, चार…” वह मन ही मन गिनती जा रही थीं। यह आसान नहीं था। एक 12 साल के बच्चे की छाती को 2 इंच तक गहरा दबाना पड़ता है ताकि रुका हुआ दिल पंप कर सके और दिमाग तक खून पहुंच सके। यह प्रक्रिया बेहद थका देने वाली होती है, लेकिन एक मां की शक्ति के आगे थकान की क्या बिसात?
मुंह से सांस (Rescue Breaths) 30 बार छाती दबाने के बाद, सुनीता ने आरव का सिर थोड़ा पीछे की ओर झुकाया ताकि श्वास नली (Airway) खुल जाए। उन्होंने उसकी नाक को उंगली और अंगूठे से बंद किया, अपना मुंह उसके मुंह पर पूरी तरह सील किया और दो बार जोर से हवा फूंकी। उन्होंने देखा कि हवा देने पर आरव की छाती थोड़ी ऊपर उठी। इसका मतलब था कि हवा फेफड़ों तक जा रही है।
यह चक्र चलता रहा। 30 बार कम्प्रेशन, 2 बार सांस। 30 बार कम्प्रेशन, 2 बार सांस।
मिनट बीत रहे थे। घरवाले रो रहे थे। “अब कुछ नहीं हो सकता, छोड़ दो,” शायद किसी ने कहा भी होगा। लेकिन सुनीता रुकी नहीं। उनके पसीने की बूंदें बेटे के चेहरे पर गिर रही थीं। वह थक चुकी थीं, उनकी बाहें दुख रही थीं, सांस फूल रही थी, लेकिन वह अपने बेटे के दिल को धड़काने की जिद्द पर अड़ी थीं।
करीब 7 से 8 मिनट के लगातार संघर्ष के बाद, जिसे हम “मौत से हाथापाई” कह सकते हैं, एक चमत्कार हुआ। आरव के शरीर में एक झटका लगा। उसने एक गहरी, खरड़ाहट भरी सांस (Gasp) ली। उसकी उंगलियां हिलीं। सुनीता ने फिर से नब्ज जांची। एक बहुत ही धीमी, लेकिन स्पष्ट धड़कन वापस आ चुकी थी।
भाग 3: अस्पताल का सफर और डॉक्टरों की हैरानी
जैसे ही आरव की सांसें लौटीं, एम्बुलेंस भी आ गई। उसे तुरंत नजदीकी सुपर स्पेशलिटी अस्पताल ले जाया गया। उसे आईसीयू में भर्ती कराया गया।
जब डॉक्टरों ने आरव की जांच की और पूरी घटना सुनी, तो वे दंग रह गए। वरिष्ठ कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. वर्मा (काल्पनिक नाम) ने मीडिया को बताया, “जब बच्चा हमारे पास लाया गया, तो उसकी स्थिति स्थिर थी। अगर उसकी मां ने उस वक्त CPR न दिया होता, तो बच्चा अस्पताल पहुंचने से पहले ही ब्रेन डेड हो चुका होता। उस मां ने जो किया, वह किसी चमत्कार से कम नहीं है, लेकिन यह चमत्कार विज्ञान पर आधारित है।”
आरव को दो दिन वेंटिलेटर पर रखा गया, लेकिन अब वह खतरे से बाहर है। उसके दिमाग को कोई नुकसान नहीं पहुंचा है, जो इस बात का सबूत है कि सुनीता ने CPR की तकनीक का बिल्कुल सही इस्तेमाल किया था। उनका दिया हुआ कृत्रिम रक्त संचार (Blood Circulation) ही था जिसने एम्बुलेंस आने तक आरव के दिमाग को जिंदा रखा।
भाग 4: CPR क्या है? (The Science of Survival)
इस घटना को सिर्फ एक कहानी की तरह पढ़ना काफी नहीं है। हमें यह समझना होगा कि आखिर सुनीता ने किया क्या? CPR यानी Cardiopulmonary Resuscitation एक जीवन रक्षक तकनीक है।
जब किसी व्यक्ति को कार्डियक अरेस्ट आता है, तो उसका दिल धड़कना बंद कर देता है। इसका मतलब है कि शरीर के बाकी अंगों, विशेषकर दिमाग और फेफड़ों तक खून की आपूर्ति बंद हो जाती है।
- Cardio का अर्थ है दिल।
- Pulmonary का अर्थ है फेफड़े।
- Resuscitation का अर्थ है पुनर्जीवित करना।
CPR कैसे काम करता है? जब हम छाती पर जोर से और तेजी से दबाव डालते हैं (Chest Compressions), तो हम असल में दिल को बाहर से भींच रहे होते हैं। यह दबाव दिल के अंदर मौजूद खून को धकेलता है और उसे शरीर में, और सबसे महत्वपूर्ण, दिमाग तक पहुंचाता है। जब हम मुंह से सांस देते हैं (Rescue Breaths), तो हम मरीज के फेफड़ों में ऑक्सीजन पहुंचाते हैं। यह ऑक्सीजन खून में मिलती है और कम्प्रेशन के जरिए दिमाग तक पहुंचती है।
यह प्रक्रिया दिल को दोबारा स्टार्ट नहीं करती (वह काम डिफाइब्रिलेटर मशीन का है), लेकिन यह प्रक्रिया “समय खरीदती” है। यह शरीर को तब तक जिंदा रखती है जब तक कि मेडिकल टीम आकर दिल को दोबारा धड़काने का इलाज न शुरू कर दे। सुनीता ने यही किया – उन्होंने समय खरीदा।
भाग 5: भारत में जागरूकता की कमी और उसकी कीमत
सुनीता की कहानी एक सुखद अपवाद है। दुर्भाग्यवश, भारत में हर साल लाखों लोग अचानक कार्डियक अरेस्ट (SCA) से मर जाते हैं क्योंकि उनके आसपास खड़े लोगों को CPR देना नहीं आता।

आंकड़े डराने वाले हैं। भारत में अस्पताल के बाहर होने वाले कार्डियक अरेस्ट में बचने की संभावना 1% से भी कम है। इसका मुख्य कारण यह है कि लोग एम्बुलेंस का इंतजार करते हैं या मरीज को गाड़ी में डालकर अस्पताल भागते हैं, लेकिन बीच के वो 10 मिनट, जब मरीज को CPR की सबसे ज्यादा जरूरत होती है, बर्बाद हो जाते हैं।
आम भ्रांतियां (Common Myths):
- “मैं हड्डी तोड़ दूंगा”: बहुत से लोग डरते हैं कि वे छाती दबाते समय पसलियां तोड़ देंगे। सच यह है कि एक टूटी हुई पसली ठीक हो सकती है, लेकिन गई हुई जान वापस नहीं आ सकती। अगर CPR के दौरान पसली चटकने की आवाज आए, तो भी रुकना नहीं चाहिए।
- “यह सिर्फ डॉक्टरों का काम है”: गलत। CPR एक बेसिक फर्स्ट एड स्किल है जो स्कूल के बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक, सबको आनी चाहिए।
- “मुंह से सांस देना गंदा है”: अगर आप अजनबी को मुंह से सांस देने में असहज हैं, तो केवल छाती दबाना (Hands-Only CPR) भी बहुत प्रभावी है। लेकिन बच्चों के मामले में (जैसे आरव का केस था), सांस देना बहुत जरूरी होता है क्योंकि बच्चों में कार्डियक अरेस्ट अक्सर सांस रुकने (Asphyxia) के कारण होता है।
सुनीता ने इन सभी भ्रांतियों को तोड़ा। उन्होंने डर को हावी नहीं होने दिया। उन्होंने यह नहीं सोचा कि “मैं डॉक्टर नहीं हूं”। उन्होंने बस यह सोचा कि “मैं एक मां हूं”।
भाग 6: ‘गोल्डन ऑवर’ नहीं, ‘गोल्डन मिनट्स’
सड़क हादसों में हम अक्सर “गोल्डन ऑवर” (सुनहरा घंटा) की बात करते हैं, यानी हादसे के बाद का पहला घंटा। लेकिन कार्डियक अरेस्ट में हमारे पास घंटे नहीं, सिर्फ मिनट होते हैं। इसे “Platimum Ten Minutes” भी कहा जाता है।
- 0-4 मिनट: अगर इस दौरान CPR शुरू हो जाए, तो बचने की संभावना और ब्रेन डैमेज न होने की संभावना सबसे अधिक होती है।
- 4-6 मिनट: ब्रेन डैमेज शुरू हो सकता है।
- 6-10 मिनट: गंभीर ब्रेन डैमेज की संभावना।
- 10 मिनट के बाद: बचने की संभावना न के बराबर।
सुनीता ने घटना के पहले 2 मिनट के भीतर ही CPR शुरू कर दिया था। यही वह निर्णय था जिसने आरव को दूसरा जीवन दिया
भाग 7: माँ का सहज ज्ञान (Maternal Instinct) बनाम प्रशिक्षण
इस घटना में एक दिलचस्प पहलू यह है कि सुनीता कोई प्रशिक्षित नर्स या डॉक्टर नहीं थीं। उन्होंने कुछ महीने पहले सोशल मीडिया पर एक वायरल वीडियो देखा था जिसमें CPR देने का तरीका बताया गया था। उस समय उन्होंने इसे बस कौतूहलवश देखा था, लेकिन उनके अवचेतन मन (Subconscious Mind) ने उस जानकारी को स्टोर कर लिया था।
जब आरव गिरा, तो वह जानकारी ‘ममत्व’ के वेग के साथ बाहर आई। इसे ही “Presence of Mind” (सूझबूझ) कहते हैं। अक्सर आपात स्थिति में लोग “फ्रीज” (सुन्न) हो जाते हैं। इसे “Fight, Flight, or Freeze” रिस्पॉन्स कहा जाता है। ज्यादातर लोग फ्रीज हो जाते हैं। लेकिन एक मां, जब अपने बच्चे को खतरे में देखती है, तो वह “Fight” मोड में आ जाती है।
मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि संकट के समय माताओं में एड्रेनालाईन (Adrenaline) का स्तर इतना बढ़ जाता है कि वे भारी वजन उठा सकती हैं या बिना थके घंटों शारीरिक श्रम कर सकती हैं। सुनीता ने 10-12 मिनट तक लगातार CPR दिया, जो एक सामान्य व्यक्ति के लिए जिम में भारी कसरत करने से भी ज्यादा कठिन है। यह ऊर्जा उन्हें उनके बेटे के प्रति प्रेम ने दी थी।
भाग 8: समाज के लिए एक वेक-अप कॉल
यह घटना हर भारतीय परिवार के लिए एक चेतावनी (Wake-up Call) है। हम अपने घरों में टीवी, फ्रिज, और एसी पर लाखों खर्च करते हैं, लेकिन क्या हम प्राथमिक चिकित्सा (First Aid) सीखने पर कुछ घंटे खर्च करते हैं?
आरव की जान बच गई क्योंकि उसकी मां जागरूक थीं। लेकिन क्या हम अपने परिवार को बचाने के लिए तैयार हैं? कल्पना कीजिए कि आपके सामने आपके पिता, पति, पत्नी या बच्चे को दिल का दौरा पड़े। वे गिर जाएं। एम्बुलेंस दूर हो। आप क्या करेंगे? क्या आप बेबस होकर उन्हें मरते हुए देखेंगे? या आप सुनीता की तरह उनकी जान बचाएंगे?
हर घर में एक ‘हीरो’ की जरूरत सरकार और स्वयंसेवी संस्थाओं को चाहिए कि वे CPR प्रशिक्षण को एक जन-आंदोलन बनाएं।
- स्कूलों के पाठ्यक्रम में इसे अनिवार्य किया जाए।
- कॉर्पोरेट ऑफिसों में साल में एक बार वर्कशॉप हो।
- रेसिडेंशियल सोसाइटियों में कैंप लगाए जाएं।
भाग 9: CPR देने का सही तरीका (Step-by-Step Guide)
सुनीता ने जो किया, उसे हर कोई सीख सकता है। यहां CPR देने का एक सरल विवरण दिया गया है ताकि आप भी किसी की जान बचा सकें। (नोट: प्रैक्टिकल ट्रेनिंग लेना हमेशा बेहतर होता है)।
चरण 1: जांच करें (Check)
- सबसे पहले देखें कि क्या आसपास का माहौल सुरक्षित है (जैसे बिजली का तार तो नहीं है)।
- मरीज के कंधे थपथपाएं और जोर से पूछें, “क्या आप ठीक हैं?”
- अगर कोई जवाब न मिले और छाती ऊपर-नीचे न हो रही हो (सांस न चल रही हो), तो समझ लें कि यह कार्डियक अरेस्ट है।
चरण 2: कॉल करें (Call)
- तुरंत किसी को एम्बुलेंस (108 या स्थानीय नंबर) बुलाने के लिए कहें। अगर आप अकेले हैं, तो फोन को स्पीकर पर रखें और एम्बुलेंस बुलाएं।
चरण 3: कम्प्रेशन (Compression – C)
- मरीज को सख्त जमीन पर सीधा लिटाएं।
- अपने एक हाथ की हथेली का निचला हिस्सा (Heel of hand) छाती के बीचों-बीच (दोनों निप्पल के बीच) रखें।
- दूसरे हाथ को पहले हाथ के ऊपर रखें और उंगलियों को लॉक करें।
- अपनी कोहनियों को बिल्कुल सीधा रखें और कंधों को मरीज की छाती के ऊपर लाएं।
- पूरे शरीर के वजन का इस्तेमाल करते हुए छाती को कम से कम 2 इंच (5 सेंटीमीटर) नीचे दबाएं।
- दबाव की गति तेज होनी चाहिए – 1 मिनट में 100 से 120 बार। (डिस्को दीवाने गाने की बीट याद रखें)।
- दबाने के बाद छाती को पूरा ऊपर आने दें (Recoil)।
चरण 4: एयरवे (Airway – A)
- 30 बार दबाने के बाद, मरीज का सिर माथे से पीछे धकेलें और ठुड्डी (Chin) को ऊपर उठाएं। इससे सांस की नली सीधी हो जाती है।
चरण 5: ब्रीदिंग (Breathing – B)
- मरीज की नाक को बंद करें।
- अपना मुंह उसके मुंह पर रखें और सील करें।
- दो बार सामान्य सांस दें (हर सांस 1 सेकंड की)। देखें कि छाती ऊपर उठ रही है या नहीं।
- अगर छाती नहीं उठ रही, तो सिर को दोबारा एडजस्ट करें।
- (नोट: अगर आप सांस देने में सहज नहीं हैं, तो सिर्फ कम्प्रेशन जारी रखें। उसे Hands-Only CPR कहते हैं)।
चरण 6: दोहराएं (Repeat)
- 30 कम्प्रेशन और 2 सांस का यह चक्र तब तक जारी रखें जब तक:
- मरीज होश में न आ जाए।
- एम्बुलेंस न आ जाए।
- आप पूरी तरह थक न जाएं।
भाग 10: बच्चों और शिशुओं के लिए CPR में अंतर
चूंकि यह घटना एक बच्चे से जुड़ी है, यह जानना जरूरी है कि बच्चों का CPR वयस्कों से थोड़ा अलग होता है। सुनीता ने अनजाने में ही सही, लेकिन सही तकनीक अपनाई थी।
- शिशु (1 साल से कम): इनके लिए हथेलियों का इस्तेमाल नहीं करते, बल्कि सिर्फ दो उंगलियों से छाती दबाते हैं। मुंह और नाक दोनों को अपने मुंह से कवर करते हैं।
- बच्चे (1 साल से प्यूबर्टी तक): इनके लिए अक्सर एक हाथ ही काफी होता है अगर बच्चा छोटा है। दबाव थोड़ा कम (लगभग 2 इंच) रखा जाता है। सांस देना बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि बच्चों में दिल की समस्या अक्सर सांस की कमी से शुरू होती है।
भाग 11: सुनीता का संदेश – “घबराओ मत, बस कोशिश करो”
अस्पताल में जब मीडिया ने सुनीता से बात की, तो वह अभी भी सदमे और राहत के मिश्रित भाव में थीं। उन्होंने हाथ जोड़कर सभी माताओं और नागरिकों से एक अपील की।
उन्होंने कहा, “मैंने कभी नहीं सोचा था कि मुझे अपने ही बेटे पर यह करना पड़ेगा। उस वक्त मुझे बस एक ही बात याद थी – मेरा बेटा सांस नहीं ले रहा और मुझे उसे सांस देनी है। मैं सभी से कहना चाहती हूं कि प्लीज, इंटरनेट का इस्तेमाल सिर्फ मनोरंजन के लिए मत करो। ऐसी चीजें भी सीखो। अगर मुझे वह वीडियो याद न होता, तो आज मेरा बेटा…” उनकी आवाज भर्रा गई।
सुनीता का यह संदेश डिजिटल युग के लिए बहुत प्रासंगिक है। हमारे पास दुनिया भर का ज्ञान हमारी जेब (स्मार्टफोन) में है, लेकिन हम रील स्क्रॉल करने में समय बिताते हैं। जीवन रक्षक वीडियो देखना और सीखना बोरिंग लग सकता है, लेकिन वही आपको ‘सुपरहीरो’ बना सकता है।
भाग 12: डॉक्टर और विज्ञान क्या कहते हैं?
इस घटना पर चिकित्सा विशेषज्ञों की राय स्पष्ट है। एम्स के ट्रॉमा सेंटर के विशेषज्ञों के अनुसार, “बाइस्टेंडर सीपीआर” (Bystander CPR – यानी पास खड़े व्यक्ति द्वारा दिया गया सीपीआर) मरीज के बचने की संभावना को तीन गुना बढ़ा देता है।
डॉक्टरों का कहना है कि कार्डियक अरेस्ट के बाद दिमाग की कोशिकाएं ऑक्सीजन के बिना बहुत तेजी से मरती हैं। इसे “इररिवर्सिबल डैमेज” (जिसे ठीक न किया जा सके) कहते हैं। सुनीता द्वारा दिए गए CPR ने एक ‘ब्रिज’ (पुल) का काम किया। उन्होंने एक मैनुअल हार्ट पंप की भूमिका निभाई।
तकनीकी रूप से, जब सुनीता छाती दबा रही थीं, तो वे कृत्रिम रूप से ‘सिस्टोल’ (Systole – दिल का सिकुड़ना) और ‘डायस्टोल’ (Diastole – दिल का फैलना) पैदा कर रही थीं। यह रक्तचाप को इतना बनाए रखता है कि महत्वपूर्ण अंगों तक ऑक्सीजन पहुंचती रहे।
भाग 13: एक नई शुरुआत
आरव अब ठीक हो रहा है। उसे जल्द ही अस्पताल से छुट्टी मिल जाएगी। लेकिन यह घटना उसके और उसके परिवार के लिए एक नया जन्म है। आरव के लिए उसकी मां अब सिर्फ मां नहीं, बल्कि उसकी रक्षक हैं।
पड़ोसी और रिश्तेदार जो पहले घबराए हुए थे, अब सुनीता की तारीफ करते नहीं थक रहे। मोहल्ले में सुनीता को अब “झांसी की रानी” और “सावित्री” जैसे नामों से पुकारा जा रहा है। लेकिन सुनीता के लिए सबसे बड़ा इनाम यह है कि वह अपने बेटे की धड़कन को फिर से महसूस कर सकती हैं।
इस घटना ने पूरे शहर में जागरूकता की लहर दौड़ दी है। स्थानीय रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन (RWA) ने अगले ही हफ्ते सोसायटी में एक CPR ट्रेनिंग कैंप आयोजित करने का फैसला किया है, जिसका उद्घाटन सुनीता और आरव करेंगे। एक बुरी घटना ने समाज को एक अच्छी दिशा दे दी है।
भाग 14: निष्कर्ष – चमत्कार हम खुद हैं
“मां का चमत्कार” – यह शीर्षक बिल्कुल सही है, लेकिन यह चमत्कार किसी जादू की छड़ी से नहीं हुआ। यह चमत्कार ज्ञान, साहस और समय पर की गई कार्रवाई का मिश्रण था।
हम अक्सर सोचते हैं कि जान बचाना सिर्फ डॉक्टरों और भगवान के हाथ में है। लेकिन यह कहानी साबित करती है कि भगवान भी उसी की मदद करता है जो अपनी मदद खुद करता है। सुनीता ने हार मानने से इनकार कर दिया। उन्होंने मौत की आंखों में आंखें डालकर अपने बेटे को छीन लिया।
यह ब्लॉग पोस्ट उन सभी गुमनाम नायकों को समर्पित है जिन्होंने अपनी सूझबूझ से किसी की जान बचाई है। और यह उन सभी के लिए एक प्रेरणा है जो सोचते हैं कि वे कुछ नहीं कर सकते।
याद रखें, दो हाथ और एक समझदार दिमाग – बस इतना ही काफी है किसी को जिंदगी देने के लिए। अगली बार जब आप खाली बैठे हों, तो कोई फनी वीडियो देखने के बजाय CPR का ट्यूटोरियल देखें। क्या पता, अगला चमत्कार आपके हाथों से लिखा जाना हो।
आरव की जान बच गई, क्योंकि उसकी मां जानती थी कि क्या करना है। क्या आप तैयार हैं?
सीखने योग्य मुख्य बातें:
- डरें नहीं: कुछ न करने से बेहतर है कुछ करना। गलत CPR भी नो-CPR से बेहतर है।
- सीखें: आज ही ऑनलाइन वीडियो देखें या फर्स्ट एड कोर्स ज्वाइन करें।
- सिखाएं: अपने परिवार के हर सदस्य को, यहां तक कि बच्चों को भी आपातकालीन नंबर और बेसिक सीपीआर के बारे में बताएं।
- हिम्मत रखें: आपात स्थिति में पैनिक (Panic) सबसे बड़ा दुश्मन है। शांत दिमाग सबसे बड़ा हथियार है।
सुनीता की यह कहानी हमें याद दिलाती रहेगी कि मां की ममता में विज्ञान से भी बड़ी शक्ति होती है, और जब ये दोनों मिल जाएं, तो मृत्यु को भी हार माननी पड़ती है।
