Attack on BJP

भारतीय राजनीति में दक्षिण भारत, विशेषकर तमिलनाडु, हमेशा से एक अभेद्य दुर्ग रहा है जहां राष्ट्रीय पार्टियों, विशेषकर भारतीय जनता पार्टी (BJP) के लिए अपनी पैठ बनाना एक कठिन चुनौती रही है। भाषा, संस्कृति और क्षेत्रीय अस्मिता की राजनीति यहां के जनमानस में रची-बसी है। आज, 17 जनवरी, 2026 का दिन तमिलनाडु और राष्ट्रीय राजनीति के लिए एक महत्वपूर्ण दिन साबित हुआ, जब कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने चेन्नई में एक विशाल जनसभा को संबोधित करते हुए केंद्र की सत्ताधारी पार्टी पर अब तक का सबसे जोरदार प्रहार किया। राज्य में आगामी राजनीतिक गतिविधियों और डीएमके-कांग्रेस गठबंधन की मजबूती को प्रदर्शित करते हुए खड़गे ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि तमिलनाडु के लोग आत्मसम्मान से समझौता नहीं करते और वे भेदभाव की राजनीति को कभी स्वीकार नहीं करेंगे। खड़गे का BJP पर तीखा हमला केवल एक राजनीतिक बयान नहीं, बल्कि दक्षिण भारत में भाजपा के विस्तारवादी एजेंडे के खिलाफ एक वैचारिक युद्ध का शंखनाद है।

दक्षिण के दुर्ग में कांग्रेस अध्यक्ष की हुंकार और राजनीतिक

1. चेन्नई की रैली: शक्ति प्रदर्शन और वैचारिक हुंकार

तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई, जो द्रविड़ राजनीति का केंद्र है, आज कांग्रेस और डीएमके के झंडों से पटी हुई थी। अवसर था गठबंधन की एकजुटता रैली का। मंच पर तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे एक साथ मौजूद थे। भीड़ का उत्साह बता रहा था कि राज्य में गठबंधन की जड़ें कितनी गहरी हैं।

जब मल्लिकार्जुन खड़गे माइक पर आए, तो उन्होंने किसी लाग-लपेट के बिना सीधा केंद्र सरकार को निशाने पर लिया। 83 वर्षीय खड़गे, जो अपने तल्ख तेवरों और स्पष्टवादिता के लिए जाने जाते हैं, ने भाजपा की ‘हिंदी, हिंदू, हिंदुस्तान’ की कथित विचारधारा और तमिलनाडु की ‘तमिल अस्मिता’ के बीच की लकीर को गहरा कर दिया। उन्होंने कहा कि दिल्ली में बैठी सरकार को लगता है कि वे रिमोट कंट्रोल से तमिलनाडु को चला सकते हैं, लेकिन वे भूल जाते हैं कि यह पेरियार, अन्नादुराई और कामराज की धरती है।

खड़गे का BJP पर तीखा हमला इस बात पर केंद्रित था कि केंद्र सरकार लगातार गैर-भाजपा शासित राज्यों, विशेषकर तमिलनाडु के साथ सौतेला व्यवहार कर रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि चाहे वह जीएसटी का बकाया हो, बाढ़ राहत कोष हो, या फिर विकास परियोजनाएं, हर जगह तमिलनाडु के साथ भेदभाव किया जा रहा है। उन्होंने जनता से आह्वान किया कि वे इस “विभाजनकारी और अहंकारी” राजनीति को खारिज करें।

2. ‘भेदभाव की राजनीति’: खड़गे के आरोपों का विश्लेषण

खड़गे ने अपने भाषण में बार-बार ‘भेदभाव’ (Discrimination) शब्द का प्रयोग किया। राजनीतिक विश्लेषकों के लिए यह समझना जरूरी है कि इस शब्द के पीछे के ठोस कारण और मुद्दे क्या हैं, जिन्हें कांग्रेस और डीएमके जनता के बीच ले जा रहे हैं।

क. वित्तीय संघवाद पर प्रहार (Fiscal Federalism): खड़गे ने आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि तमिलनाडु देश की अर्थव्यवस्था में सबसे ज्यादा योगदान देने वाले राज्यों में से एक है। तमिलनाडु से केंद्र को भारी मात्रा में टैक्स जाता है, लेकिन जब उस टैक्स के पैसे को वापस राज्यों में बांटने (Devolution) की बात आती है, तो तमिलनाडु को बहुत कम हिस्सा मिलता है। खड़गे ने आरोप लगाया कि दक्षिण भारत की मेहनत की कमाई का उपयोग उत्तर भारत के उन राज्यों में राजनीतिक लाभ लेने के लिए किया जा रहा है जहां भाजपा का आधार मजबूत है। उन्होंने इसे “आर्थिक अन्याय” करार दिया।

Attack on BJP

ख. आपदा राहत में देरी: तमिलनाडु अक्सर चक्रवातों और बाढ़ का सामना करता है। खड़गे ने याद दिलाया कि जब भी तमिलनाडु ने प्राकृतिक आपदाओं के लिए केंद्र से विशेष पैकेज की मांग की, केंद्र ने या तो बहुत कम राशि दी या फिर उसे देने में इतनी देरी की कि उसका कोई औचित्य नहीं रहा। इसके विपरीत, भाजपा शासित राज्यों को तुरंत मदद मिल जाती है। खड़गे का BJP पर तीखा हमला इसी दोहरे मापदंड को उजागर करने के लिए था।

ग. राज्यपाल का हस्तक्षेप: तमिलनाडु सरकार और राज्यपाल के बीच का संघर्ष जगजाहिर है। खड़गे ने कहा कि भाजपा राजभवन का उपयोग चुनी हुई सरकारों को अस्थिर करने और परेशान करने के लिए कर रही है। विधानसभा द्वारा पारित विधेयकों को रोकना, राज्य के नीतिगत फैसलों में अड़ंगा डालना और समानांतर सरकार चलाने की कोशिश करना—खड़गे ने इसे लोकतंत्र की हत्या बताया। उन्होंने कहा कि राज्यपाल भाजपा के एजेंट की तरह काम कर रहे हैं, जो तमिल जनता के जनादेश का अपमान है।

3. भाषा और संस्कृति: भावनाओं का ज्वार

तमिलनाडु की राजनीति में भाषा केवल संचार का माध्यम नहीं, बल्कि एक भावना है। हिंदी थोपे जाने का विरोध (Anti-Hindi Imposition) यहां का सबसे पुराना और सबसे शक्तिशाली राजनीतिक हथियार है। भाजपा पर अक्सर यह आरोप लगता है कि वह एक राष्ट्र, एक भाषा के एजेंडे को आगे बढ़ा रही है।

मल्लिकार्जुन खड़गे, जो स्वयं दक्षिण भारत (कर्नाटक) से आते हैं, ने इस नब्ज को बखूबी पकड़ा। उन्होंने कहा, “भाजपा और आरएसएस आपकी भाषा, आपकी संस्कृति और आपके इतिहास को बदलना चाहते हैं। वे विविधता से नफरत करते हैं। वे चाहते हैं कि आप वही बोलें, वही पहनें और वही खाएं जो वे तय करें।” खड़गे का BJP पर तीखा हमला करते हुए उन्होंने चेतावनी दी कि तमिल भाषा की प्राचीनता और महानता को कम आंकने की कोई भी कोशिश भाजपा के लिए आत्मघाती साबित होगी। उन्होंने नई शिक्षा नीति (NEP) के कुछ प्रावधानों का भी जिक्र किया जिसे तमिलनाडु सरकार ने राज्य के हितों के खिलाफ माना है। खड़गे ने साफ किया कि कांग्रेस पार्टी सभी भाषाओं का सम्मान करती है और किसी भी राज्य पर कोई भाषा थोपने के खिलाफ है। यह बयान भाजपा के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद (Cultural Nationalism) के खिलाफ द्रविड़ अस्मिता (Dravidian Identity) को ढाल बनाने की रणनीति का हिस्सा है।

4. भाजपा की आक्रामक रणनीति और खड़गे का पलटवार

पिछले कुछ वर्षों में, भाजपा ने तमिलनाडु में अपने विस्तार के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया है। प्रदेश अध्यक्ष के. अन्नामलाई के नेतृत्व में भाजपा ने राज्य में आक्रामक यात्राएं की हैं और डीएमके सरकार पर भ्रष्टाचार और परिवारवाद के आरोप लगाए हैं। भाजपा ‘आध्यात्मिक राजनीति’ के जरिए तमिल मतदाताओं को लुभाने की कोशिश कर रही है, जिसमें काशी-तमिल संगमम जैसे आयोजन शामिल हैं।

हालांकि, खड़गे ने भाजपा की इस कवायद को ‘छलावा’ करार दिया। उन्होंने कहा कि चुनाव आते ही भाजपा को तमिल संस्कृति और थिरुक्कुरल की याद आती है, लेकिन बाकी समय वे तमिल हितों के खिलाफ काम करते हैं। खड़गे का BJP पर तीखा हमला इस बात पर था कि भाजपा की विचारधारा सामाजिक न्याय (Social Justice) के खिलाफ है। तमिलनाडु सामाजिक न्याय की प्रयोगशाला रहा है, जहां आरक्षण और समानता के मुद्दे सर्वोपरि हैं। खड़गे ने आरोप लगाया कि भाजपा आरक्षण को खत्म करना चाहती है और मनुवादी व्यवस्था लाना चाहती है, जिसे तमिलनाडु की प्रबुद्ध जनता कभी स्वीकार नहीं करेगी। उन्होंने कहा कि भाजपा यहां कितनी भी यात्राएं कर ले, उनकी ‘नफरત की दुकान’ तमिलनाडु के ‘प्यार और भाईचारे के बाजार’ में नहीं खुल सकती।

5. ‘करारा जवाब’: डीएमके-कांग्रेस गठबंधन का आत्मविश्वास

खड़गे ने अपने भाषण के अंत में कहा कि “तमिलनाडु की जनता भाजपा को करारा जवाब देगी।” इस आत्मविश्वास के पीछे का गणित क्या है?

मजबूत गठबंधन: तमिलनाडु में डीएमके और कांग्रेस का गठबंधन एक स्वाभाविक और मजबूत गठबंधन साबित हुआ है। 2019 और 2024 के लोकसभा चुनावों में और 2021 के विधानसभा चुनावों में इस गठबंधन ने क्लीन स्वीप किया था। दोनों पार्टियों के बीच सीटों के बंटवारे से लेकर वैचारिक स्तर तक एक सहज समझ है। खड़गे और स्टालिन की दोस्ती इस गठबंधन की धुरी है।

जमीनी पकड़: डीएमके का कैडर बेस गांव-गांव तक फैला है, जबकि कांग्रेस का अपना एक पारंपरिक वोट बैंक है। जब ये दोनों मिल जाते हैं, तो विपक्ष (विशेषकर अन्नाद्रमुक और भाजपा) के लिए जगह बहुत कम बचती है। अन्नाद्रमुक (AIADMK) की आंतरिक कलह और कमजोर नेतृत्व ने भी भाजपा के लिए मुश्किलें खड़ी की हैं, क्योंकि भाजपा को एक मजबूत सहयोगी की जरूरत थी जो अब उसके पास नहीं है।

वैचारिक स्पष्टता: तमिलनाडु का मतदाता राजनीतिक रूप से बहुत जागरूक है। वह स्पष्ट रूप से धर्मनिरपेक्षता और संघीय ढांचे के पक्ष में वोट करता है। खड़गे जानते हैं कि जब तक वे भाजपा को ‘तमिल विरोधी’ और ‘संघीय ढांचा विरोधी’ साबित करते रहेंगे, तब तक जनता का समर्थन गठबंधन को मिलता रहेगा।

Attack on BJP

6. राष्ट्रीय राजनीति में इसके निहितार्थ

खड़गे का BJP पर तीखा हमला केवल तमिलनाडु तक सीमित नहीं है। इसके राष्ट्रीय मायने भी हैं।

इंडिया गठबंधन (INDIA Bloc) की एकता: खड़गे इंडिया गठबंधन के अध्यक्ष भी हैं। तमिलनाडु में उनकी और स्टालिन की एकजुटता राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी गठबंधन की मजबूती का संदेश देती है। यह दिखाता है कि क्षेत्रीय क्षत्रप और कांग्रेस मिलकर भाजपा के रथ को रोक सकते हैं।

उत्तर बनाम दक्षिण की बहस: खड़गे का यह बयान ‘उत्तर बनाम दक्षिण’ की बहस को और हवा दे सकता है। भाजपा इसे देश को बांटने वाली राजनीति कह सकती है, जबकि कांग्रेस इसे राज्यों के अधिकारों की लड़ाई बताती है। 2026 में, जब परिसीमन (Delimitation) की तलवार दक्षिण भारतीय राज्यों पर लटक रही है (जिससे उनकी लोकसभा सीटें कम हो सकती हैं), खड़गे का यह बयान दक्षिण के राज्यों की एकजुटता का आधार बन सकता है।

7. विकास के मॉडल पर बहस: द्रविड़ मॉडल बनाम गुजरात मॉडल

खड़गे ने अपने भाषण में तमिलनाडु के ‘द्रविड़ मॉडल’ (Dravidian Model of Development) की जमकर तारीफ की। उन्होंने कहा कि तमिलनाडु शिक्षा, स्वास्थ्य, और औद्योगिक विकास में भाजपा शासित राज्यों से कोसों आगे है। उन्होंने सवाल उठाया कि भाजपा किस मुंह से तमिलनाडु में वोट मांग रही है, जबकि उनके अपने शासित राज्यों में सामाजिक सूचकांक (Social Indices) बेहद खराब हैं। खड़गे का BJP पर तीखा हमला करते हुए पूछा, “क्या आप तमिलनाडु को उत्तर प्रदेश या मध्य प्रदेश बनाना चाहते हैं? क्या आप चाहते हैं कि यहां भी सांप्रदायिक दंगे हों?” यह तुलनात्मक राजनीति तमिलनाडु के शिक्षित मध्यम वर्ग को आकर्षित करती है। खड़गे ने यह स्थापित करने की कोशिश की कि भाजपा का मॉडल विनाशकारी है, जबकि डीएमके-कांग्रेस का मॉडल समावेशी विकास का है।

8. जातिगत जनगणना और सामाजिक न्याय

खड़गे ने अपने भाषण में जातिगत जनगणना (Caste Census) का मुद्दा भी उठाया, जो कांग्रेस का राष्ट्रीय एजेंडा है। तमिलनाडु, जहां 69% आरक्षण लागू है, वहां यह मुद्दा बहुत संवेदनशील और महत्वपूर्ण है। खड़गे ने भाजपा पर आरोप लगाया कि वह ओबीसी और दलितों की सही संख्या छिपाना चाहती है ताकि उन्हें उनका हक न देना पड़े। उन्होंने वादा किया कि केंद्र में उनकी सरकार आने पर वे जातिगत जनगणना कराएंगे और आरक्षण की 50% की सीमा को तोड़ देंगे। यह दांव भाजपा के हिंदुत्व एकीकरण (Hindutva Consolidation) के खिलाफ एक मजबूत काट है।

9. मीडिया और नैरेटिव वॉर

आज के दौर में राजनीति धारणाओं (Perception) का खेल है। खड़गे ने मीडिया के एक वर्ग पर भी निशाना साधा जो कथित तौर पर भाजपा का प्रचार तंत्र बना हुआ है। उन्होंने कहा कि टीवी पर चाहे कुछ भी दिखाया जाए, जमीन पर हकीकत कुछ और है। खड़गे का BJP पर तीखा हमला सोशल मीडिया पर भी ट्रेंड कर रहा है। कांग्रेस की आईटी सेल ने खड़गे के भाषण के वीडियो क्लिप्स को वायरल कर दिया है, जिसमें वे भाजपा को ललकारते हुए दिख रहे हैं। यह नैरेटिव वॉर यह सुनिश्चित करने के लिए है कि युवा मतदाता, जो सोशल मीडिया से प्रभावित होता है, वह भाजपा के प्रचार में न फंसे।

10. भाजपा की प्रतिक्रिया: आरोपों का खंडन

खड़गे के इस हमले पर भाजपा की ओर से भी तीखी प्रतिक्रिया आई है। तमिलनाडु भाजपा अध्यक्ष ने खड़गे के बयानों को हताशा का परिणाम बताया है। भाजपा का कहना है कि केंद्र सरकार ने तमिलनाडु को रिकॉर्ड फंड दिया है और कांग्रेस केवल झूठ फैलाकर लोगों को गुमराह कर रही है। भाजपा का तर्क है कि डीएमके और कांग्रेस परिवारवादी पार्टियां हैं जो अपने भ्रष्टाचार को छिपाने के लिए ‘तमिल कार्ड’ खेल रही हैं। हालांकि, खड़गे के आक्रामक तेवरों ने भाजपा को रक्षात्मक मुद्रा (Defensive Mode) में डाल दिया है।

11. भविष्य की राह: 2026 और उसके आगे

वर्ष 2026 भारतीय राजनीति के लिए महत्वपूर्ण है। तमिलनाडु में स्थानीय निकाय चुनाव या विधानसभा की उप-चुनाव जैसी गतिविधियां हो सकती हैं। ऐसे में खड़गे का यह दौरा कार्यकर्ताओं में जोश भरने के लिए था। यह भाषण संकेत देता है कि कांग्रेस अब भाजपा के खिलाफ रक्षात्मक नहीं, बल्कि आक्रामक खेलेगी। वह भाजपा को उसकी पिच पर खेलने के बजाय, अपनी पिच (क्षेत्रीय अस्मिता, संघवाद, सामाजिक न्याय) पर खेलने के लिए मजबूर करेगी।

12. क्या जनता वास्तव में ‘करारा जवाब’ देगी?

इतिहास गवाह है कि तमिलनाडु ने हमेशा दिल्ली के फरमानों को खारिज किया है। 1967 के बाद से यहां कभी भी राष्ट्रीय पार्टियों (कांग्रेस या भाजपा) की अपने दम पर सरकार नहीं बनी। यहां की जनता भावनात्मक रूप से अपनी भाषा और संस्कृति से जुड़ी है। जिस तरह से खड़गे ने मुद्दों को उठाया है—महंगाई, बेरोजगारी, जीएसटी में अन्याय, हिंदी थोपना—ये सभी आम आदमी को प्रभावित करते हैं। अगर भाजपा इन आशंकाओं को दूर करने में विफल रहती है, तो निश्चित रूप से उसे चुनावी नुकसान उठाना पड़ेगा। ‘करारा जवाब’ का मतलब है भाजपा की वोट हिस्सेदारी में गिरावट और गठबंधन की भारी जीत।

13. खड़गे का व्यक्तित्व: एक अनुभवी राजनेता की परिपक्वता

मल्लिकार्जुन खड़गे का यह भाषण उनके 50 साल से अधिक के राजनीतिक अनुभव का निचोड़ था। उन्होंने न तो अभद्र भाषा का प्रयोग किया और न ही व्यक्तिगत हमले किए (सिवाय नीतिगत आलोचना के)। उन्होंने तर्कों और आंकड़ों के साथ अपनी बात रखी। खड़गे का BJP पर तीखा हमला इसलिए भी प्रभावी था क्योंकि यह एक ऐसे नेता द्वारा किया गया था जो दलित समुदाय से आता है और जिसने जमीनी स्तर से संघर्ष करके यह मुकाम हासिल किया है। उनकी बातों में विश्वसनीयता थी।

14. दक्षिण का किला अभेद्य

अंत में, 17 जनवरी 2026 को चेन्नई में दिया गया मल्लिकार्जुन खड़गे का यह भाषण यह स्पष्ट करता है कि दक्षिण भारत में भाजपा के लिए रास्ता अभी भी बहुत कठिन है। खड़गे का BJP पर तीखा हमला केवल चुनावी बयानबाजी नहीं है, बल्कि यह दो विचारधाराओं के टकराव का प्रतीक है—एक तरफ केंद्रीकरण (Centralization) और एकरूपता की विचारधारा, और दूसरी तरफ संघवाद (Federalism) और विविधता की विचारधारा।

तमिलनाडु की जनता, जो अपनी राजनीतिक सूझबूझ के लिए जानी जाती है, वह इन दोनों विचारधाराओं को तोल रही है। खड़गे ने आज जो सवाल उठाए हैं—भेदभाव के, स्वाभिमान के और अधिकारों के—वे अनुत्तरित नहीं रह सकते। भाजपा को अगर तमिलनाडु में पैर जमाने हैं, तो उसे इन सवालों के ठोस जवाब देने होंगे, न कि केवल भावनात्मक मुद्दे उछालने होंगे।

फिलहाल, खड़गे की हुंकार ने यह तय कर दिया है कि आने वाले दिनों में तमिलनाडु की राजनीति का पारा और चढ़ेगा। जनता का फैसला क्या होगा, यह तो समय बताएगा, लेकिन आज कांग्रेस अध्यक्ष ने यह साबित कर दिया है कि विपक्ष अब चुप बैठने वाला नहीं है। भेदभाव की राजनीति के खिलाफ यह लड़ाई अब सड़कों से लेकर संसद तक और तीखी होगी।

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