Etah Heartbreaking Incident

जब बचपन के कंधों पर लाश का बोझ आ जाए

उत्तर प्रदेश के एटा जिले से आज, 16 जनवरी 2026 को एक ऐसी खबर और तस्वीर सामने आई है, जिसने इंसानियत के अस्तित्व पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं। हम अक्सर कहते हैं कि बच्चे भगवान का रूप होते हैं, उनकी दुनिया खिलौनों और किताबों तक सीमित होनी चाहिए। लेकिन क्या हो जब एक 8 साल के बच्चे की दुनिया एक सरकारी अस्पताल के मुर्दाघर (Post-mortem House) के बाहर सिमट कर रह जाए? क्या हो जब जिस उम्र में उसे मां की लोरी सुनकर सोना चाहिए था, उस उम्र में वह अपनी ही मां के शव की पहरेदारी कर रहा हो? एटा की रुला देने वाली तस्वीर आज हर न्यूज चैनल, हर मोबाइल स्क्रीन और हर संवेदनशील व्यक्ति के दिलो-दिमाग पर छाई हुई है। यह तस्वीर सिर्फ एक घटना नहीं है, बल्कि हमारे समाज के माथे पर लगा वह कलंक है जिसे शायद गंगाजल भी न धो पाए।

आज के इस 3000 शब्दों के विस्तृत विशेष ब्लॉग में, हम इस घटना की एक-एक परत खोलेंगे। हम जानेंगे कि आखिर क्यों एक 8 साल के बच्चे को अकेले अपनी मां का शव लेकर पोस्टमार्टम हाउस जाना पड़ा? कहां थे उसके रिश्तेदार? कहां था हमारा समाज? और उस “सिस्टम” का क्या हुआ जो गरीबों के हक की बात करते नहीं थकता? यह कहानी एक बच्चे की हिम्मत की है, लेकिन उससे भी ज्यादा यह कहानी हमारे समाज की बुझ चुकी संवेदनाओं की है।

भाग 1: वो मनहूस सुबह और एक अकेला बच्चा

घटना एटा जिले के वीरांगना अवंतीबाई मेडिकल कॉलेज (जिला अस्पताल) की है। तारीख थी 16 जनवरी, 2026 की सुबह। कड़ाके की ठंड पड़ रही थी। लोग अपनी रजाइयों में दुबके थे। लेकिन अस्पताल के पोस्टमार्टम हाउस के बाहर एक अजीब सा सन्नाटा पसरा था, जिसे एक बच्चे की सिसकियों ने तोड़ रखा था।

यह बच्चा महज 8 साल का है। नाम पूछने पर शायद वह अपनी तोतली जुबान में जवाब भी न दे पाए, लेकिन उसके हालात ने सब कुछ बयां कर दिया था। उसके पास एक स्ट्रेचर पर एक महिला का शव रखा था। वह महिला कोई और नहीं, बल्कि उसकी अपनी मां, नीलम (काल्पनिक नाम, गोपनीयता हेतु) थी।

दृश्य जो पत्थर को भी पिघला दे: प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, वह बच्चा शव के पास बिल्कुल अकेला बैठा था। उसकी आंखों के आंसू सूख चुके थे, शायद पिछले कई दिनों से रोते-रोते। वह कभी शव के ऊपर से चादर हटाकर अपनी मां का चेहरा देखता, तो कभी उम्मीद भरी नजरों से वहां से गुजरने वाले अस्पताल कर्मचारियों की ओर देखता। उसे समझ नहीं आ रहा था कि अब आगे क्या करना है। उसे बस इतना पता था कि “मां सो रही है, और डॉक्टर अंकल ने कहा है कि इसे यहां (पोस्टमार्टम हाउस) ले जाना है।”

जब यह एटा की रुला देने वाली तस्वीर सोशल मीडिया पर वायरल हुई, तब जाकर प्रशासन की नींद टूटी। लेकिन सवाल यह है कि जब वह बच्चा शव लेकर वहां पहुंचा, तब उसे रोकने वाला, उसे गले लगाने वाला कोई क्यों नहीं था?

भाग 2: फ्लैशबैक – एक साल पहले शुरू हुई थी बर्बादी की कहानी

इस दुखद घटना की जड़ें आज से एक साल पहले जुड़ी हुई हैं। यह परिवार एटा के जैथरा थाना क्षेत्र के एक गांव का रहने वाला था। खुशहाल परिवार था, लेकिन फिर बदकिस्मती ने दस्तक दी।

पिता की मौत और एचआईवी (HIV) का कलंक: बच्चे के पिता की मौत करीब एक साल पहले एचआईवी (HIV/AIDS) संक्रमण के कारण हो गई थी। ग्रामीण भारत में आज भी एचआईवी को लेकर जागरूकता की भारी कमी है। लोग इसे बीमारी नहीं, बल्कि पाप समझते हैं। जैसे ही गांव वालों और रिश्तेदारों को पता चला कि पिता की मौत एचआईवी से हुई है, उन्होंने इस परिवार का हुक्का-पानी बंद कर दिया।

पिता के जाने के बाद, मां ही इस 8 साल के मासूम का एकमात्र सहारा थी। लेकिन कुदरत का कहर अभी बाकी था। मां भी इसी संक्रमण की चपेट में आ गई और साथ ही उन्हें टीबी (Tuberculosis) ने भी जकड़ लिया।

जायदाद का लालच और रिश्तों का कत्ल: इस बच्चे ने मीडिया को जो बताया, वह रोंगटे खड़े कर देने वाला है। उसने बताया कि उसके चाचा और अन्य रिश्तेदार जानते थे कि मां बीमार है। लेकिन किसी ने इलाज के लिए एक रुपया भी नहीं दिया। क्यों? क्योंकि उनकी नजर उस जमीन और मकान पर थी जो पिता के मरने के बाद मां के नाम थी। रिश्तेदार चाहते थे कि मां भी मर जाए तो सारी जायदाद उनके नाम हो जाए। यह सोचकर ही घिन आती है कि 2026 के आधुनिक भारत में भी संपत्ति के लालच में लोग इस हद तक गिर सकते हैं कि एक अनाथ बच्चे को लावारिस छोड़ दें।

Etah Heartbreaking Incident

भाग 3: आठ दिन का संघर्ष और मेडिकल कॉलेज की उदासीनता

मां की तबीयत बिगड़ने पर यह 8 साल का बच्चा, जो शायद खुद ठीक से अपना ख्याल नहीं रख सकता, अपनी मां को लेकर एटा के मेडिकल कॉलेज पहुंचा। जरा सोचिए, उस बच्चे ने कैसे मां को ऑटो या बस में बिठाया होगा? कैसे उसने पर्चा बनवाया होगा? रिपोर्ट्स के मुताबिक, वह पिछले 8 दिनों से अस्पताल में अपनी मां की सेवा कर रहा था।

  • वह खुद दवाइयां लाता।
  • वह खुद मां को पानी पिलाता।
  • वह अस्पताल के फर्श पर सोता।

इस दौरान अस्पताल का स्टाफ कहां था? डॉक्टर्स कहां थे? क्या किसी ने नहीं देखा कि एक छोटा बच्चा अकेले एक गंभीर मरीज की तीमारदारी कर रहा है? अस्पताल प्रशासन का कहना है कि उन्होंने इलाज किया, लेकिन ‘अटेंडेंट’ (परिचारक) की जिम्मेदारी उनकी नहीं होती। यह तकनीकी जवाब हो सकता है, लेकिन मानवीय जवाब नहीं।

मौत की रात: बुधवार की रात मां ने दम तोड़ दिया। बच्चा मां के बगल में बैठा रहा। उसे लगा मां गहरी नींद में है। जब सुबह डॉक्टर ने उसे मृत घोषित किया, तो बच्चे की दुनिया उजड़ गई। उसे बताया गया कि शव का पोस्टमार्टम होगा। और फिर वही हुआ, जो एटा की रुला देने वाली तस्वीर में हम सबने देखा। वह बच्चा शव के साथ अकेला पोस्टमार्टम हाउस के बाहर खड़ा हो गया।

भाग 4: “सिस्टम” कहां था? एम्बुलेंस और शव वाहन का अभाव

इस पूरी घटना में सबसे बड़ा विलेन अगर कोई है, तो वह है हमारा ‘सिस्टम’। उत्तर प्रदेश सरकार ने गरीबों के लिए मुफ्त एम्बुलेंस और शव वाहन (Hearse Van) की योजनाएं चलाई हैं। लेकिन धरातल पर हकीकत कुछ और ही है।

जब मां की मौत हुई, तो नियमानुसार अस्पताल प्रशासन को शव वाहन की व्यवस्था करनी चाहिए थी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। बच्चे को शव को स्ट्रेचर या किसी अन्य साधन से पोस्टमार्टम हाउस तक ले जाना पड़ा। क्या उस समय अस्पताल के मैनेजर की नजर उस पर नहीं पड़ी?

पुलिस की भूमिका – देर आए दुरुस्त आए? जब यह मामला मीडिया में उछला और स्थानीय लोगों ने भीड़ लगानी शुरू की, तब जाकर जैथरा थाना प्रभारी (SHO) रितेश कुमार और उनकी टीम मौके पर पहुंची। पुलिस ने देखा कि बच्चे का कोई नहीं है। कोई रिश्तेदार फोन नहीं उठा रहा है। पुलिस ने मानवीय चेहरा दिखाते हुए बच्चे को खाना खिलाया और शव के अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी ली। पुलिस अधिकारियों ने बच्चे के रिश्तेदारों से भी संपर्क करने की कोशिश की, लेकिन जैसा कि अनुमान था, कोई भी आने को तैयार नहीं था। अंततः पुलिस और कुछ समाजसेवियों ने मिलकर मां का अंतिम संस्कार करवाया और बच्चे ने मुखाग्नि द

भाग 5: एचआईवी (HIV) का सामाजिक बहिष्कार – एक कड़वी सच्चा

एटा की रुला देने वाली तस्वीर के पीछे का एक बड़ा कारण एचआईवी से जुड़ा सामाजिक कलंक (Stigma) है। अगर उस महिला की मौत किसी साधारण बीमारी या एक्सीडेंट से हुई होती, तो शायद पूरा गांव इकट्ठा हो जाता। लेकिन ‘एड्स’ का नाम सुनते ही संवेदनाएं मर गईं।

भारत में आज भी एचआईवी मरीजों और उनके परिवारों को अछूत समझा जाता है।

  1. सामाजिक दूरी: लोग उनसे बात करना बंद कर देते हैं।
  2. स्कूल से बेदखली: इस बच्चे ने बताया कि पिता की मौत के बाद वह स्कूल नहीं जा पाया क्योंकि बच्चों ने उसका मजाक उड़ाना शुरू कर दिया था या शायद फीस के पैसे नहीं थे।
  3. इलाज में भेदभाव: कई बार मेडिकल स्टाफ भी एचआईवी मरीजों के पास जाने से कतराता है।

यह घटना हमें सोचने पर मजबूर करती है कि हम विज्ञान में चाहे कितने भी आगे बढ़ जाएं, मानसिकता में हम आज भी पाषाण युग में जी रहे हैं। उस बच्चे का क्या कसूर था? उसने तो कोई पाप नहीं किया था। फिर उसे यह सजा क्यों मिली?

भाग 6: अबोध मन पर गहरा आघात (Trauma)

मनोवैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो इस घटना का उस 8 साल के बच्चे पर क्या असर पड़ेगा?

  • असुरक्षा की भावना: उसने देखा कि जब उसे सबसे ज्यादा जरूरत थी, तब अपने सगे चाचा-ताऊ ने मुंह फेर लिया। उसे अब रिश्तों पर कभी भरोसा नहीं होगा।
  • बचपन का अंत: जिस उम्र में उसे खेलना चाहिए था, उस उम्र में उसने मौत, पुलिस, पोस्टमार्टम और श्मशान घाट देख लिया। उसका बचपन इसी एक दिन में खत्म हो गया।
  • डर और अकेलापन: अब वह दुनिया में बिल्कुल अकेला है। उसके सिर पर न पिता का साया है, न मां का आंचल।

भविष्य का सवाल: अब इस बच्चे का क्या होगा? पुलिस ने चाइल्ड लाइन (Childline) या बाल कल्याण समिति (CWC) को सूचित किया होगा। उसे किसी बाल गृह (Shelter Home) में भेजा जाएगा। लेकिन क्या सरकारी बाल गृह उसे मां का प्यार दे पाएंगे? क्या वह कभी एक सामान्य नागरिक बन पाएगा या यह आघात उसे जीवन भर डराता रहेगा?

भाग 7: समाज की चुप्पी – हम सब गुनहगार हैं

जब वह बच्चा पोस्टमार्टम हाउस के बाहर बैठा था, वहां से सैकड़ों लोग गुजरे होंगे।

  • किसी ने वीडियो बनाया होगा।
  • किसी ने फोटो खींचकर व्हाट्सएप स्टेटस लगाया होगा।
  • किसी ने “तौबा-तौबा” करके मुंह फेर लिया होगा।

लेकिन किसी ने आगे बढ़कर उस बच्चे के सिर पर हाथ क्यों नहीं रखा? किसी ने उसे पानी की बोतल क्यों नहीं दी? यह ‘बाइस्टैंडर इफेक्ट’ (Bystander Effect) हमारे समाज की सबसे बड़ी बीमारी है। हम तमाशा देखने के आदी हो गए हैं। हम सोशल मीडिया पर #JusticeForEtahBoy ट्रेंड करवा सकते हैं, लेकिन सड़क पर उतरकर मदद नहीं कर सकते।

एटा की रुला देने वाली तस्वीर वास्तव में उस बच्चे की तस्वीर नहीं है, यह हमारे मरे हुए जमीर की तस्वीर है। यह आईना है जिसमें हमें अपना कुरूप चेहरा दिखाई दे रहा है।

भाग 8: दाना मांझी की याद – इतिहास खुद को दोहराता है

आपको याद होगा ओडिशा का दाना मांझी? वह आदिवासी व्यक्ति जिसे एम्बुलेंस नहीं मिली थी और उसे अपनी पत्नी का शव कंधे पर लादकर 10 किलोमीटर पैदल चलना पड़ा था। उस घटना ने पूरी दुनिया में भारत की शर्मिंदगी कराई थी। आज, सालों बाद, एटा में वही इतिहास दोहराया गया है। फर्क बस इतना है कि वहां एक पति था, और यहां एक 8 साल का दूधमुंहा बच्चा है। सरकारें बदल गईं, योजनाएं बदल गईं, बजट बदल गया, लेकिन गरीब की नियति नहीं बदली। गरीब के लिए सम्मानजनक मौत आज भी एक लक्जरी है।

भाग 9: प्रशासन और सरकार से सवाल

इस घटना के बाद अब लीपापोती का दौर शुरू होगा।

  1. जांच कमेटी बिठाई जाएगी।
  2. शायद किसी छोटे कर्मचारी को सस्पेंड कर दिया जाएगा।
  3. नेता जी आकर मुआवजे का ऐलान करेंगे।

लेकिन क्या इससे उस बच्चे की मां वापस आ जाएगी?

  • सवाल यह है कि मेडिकल कॉलेज में मरीज की निगरानी प्रणाली (Monitoring System) क्या थी?
  • सवाल यह है कि एचआईवी पीड़ित परिवार को सरकारी योजनाओं का लाभ क्यों नहीं मिल रहा था?
  • सवाल यह है कि जब रिश्तेदार शव लेने नहीं आए, तो अस्पताल प्रशासन ने तुरंत पुलिस या एनजीओ से संपर्क क्यों नहीं किया? बच्चे को शव के साथ अकेला क्यों छोड़ा?

जिलाधिकारी (DM) और मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) को इन सवालों के जवाब देने होंगे। केवल “जांच चल रही है” कहने से काम नहीं चलेगा।

भाग 10: हम क्या कर सकते हैं? (Call to Action)

यह ब्लॉग लिखने का उद्देश्य केवल आपको खबर सुनाना नहीं है, बल्कि आपको जगाना है। एटा की रुला देने वाली तस्वीर देखकर अगर आपकी आंखों में आंसू आए हैं, तो उन आंसुओं को व्यर्थ न जाने दें।

  1. जागरूक बनें: अपने आसपास देखें। अगर कोई एचआईवी मरीज या उसका परिवार है, तो उनसे भेदभाव न करें। उन्हें अपनाएं।
  2. मदद करें: अगर सड़क पर कोई मुसीबत में दिखे, तो वीडियो बनाने के बजाय मदद का हाथ बढ़ाएं।
  3. दबाव बनाएं: सोशल मीडिया का इस्तेमाल सही कामों के लिए करें। प्रशासन से सवाल पूछें। बाल कल्याण समिति से मांग करें कि इस बच्चे के पुनर्वास (Rehabilitation) और शिक्षा की पूरी जिम्मेदारी सरकार उठाए।

एक माफीनामे की जरूरत

अंत में, एटा के उस 8 साल के बच्चे से हम सब—प्रशासन, समाज, रिश्तेदार और मीडिया—माफी मांगते हैं। बेटा, हम तुम्हें बचा नहीं पाए। हम तुम्हारी मां को बचा नहीं पाए। हम तुम्हें वो बचपन नहीं दे पाए जिसके तुम हकदार थे। तुम्हारी वह तस्वीर, जिसमें तुम मां के शव के पास उदास बैठे हो, हमें जीवन भर सोने नहीं देगी।

आज 16 जनवरी, 2026 का दिन इतिहास में एक काले दिन के रूप में दर्ज हो गया है। उम्मीद है कि यह घटना आखिरी होगी। उम्मीद है कि भविष्य में किसी बच्चे को अपनी मां के शव का बोझ अपने नन्हे कंधों पर नहीं उठाना पड़ेगा। लेकिन यह उम्मीद तब तक पूरी नहीं होगी जब तक हम और आप बदलेंगे नहीं।

By Isha Patel

Isha Patel Tez Khabri के साथ जुड़ी एक समाचार रिपोर्टर हैं। वे भारत और राज्यों से जुड़ी ताज़ा, ब्रेकिंग और जनहित से संबंधित खबरों को कवर करती हैं। Isha Patel शिक्षा, प्रशासन, सामाजिक मुद्दों और स्थानीय घटनाओं पर सत्यापित व तथ्यात्मक रिपोर्टिंग करती हैं।

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