आज 15 जनवरी 2026 है, और पूरा देश ‘सेना दिवस’ (Army Day) के गौरवशाली अवसर को मना रहा है। भारतीय सेना के शौर्य और बलिदान को नमन करने के इस पावन दिन पर, रक्षा मंत्रालय ने देश को एक बहुत बड़ी सौगात दी है। नई दिल्ली के साउथ ब्लॉक में हुई रक्षा अधिग्रहण परिषद (DAC) की एक उच्च-स्तरीय बैठक में, जिसकी अध्यक्षता रक्षा मंत्री ने की, भारतीय सेना की मारक क्षमता को कई गुना बढ़ाने वाले प्रस्तावों को मंजूरी दी गई है। सरकार ने मेक इन इंडिया पहल को एक और बड़ी सफलता दिलाते हुए ₹15,000 करोड़ के ड्रोन और आर्टिलरी सिस्टम की खरीद को हरी झंडी दे दी है।
रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की नई उड़ान
यह निर्णय केवल हथियारों की खरीद का नहीं है, बल्कि यह भारत की बदलती रक्षा नीति, स्वदेशीकरण के प्रति प्रतिबद्धता और भविष्य के युद्धों के लिए हमारी तैयारियों का एक स्पष्ट संकेत है। जहां एक तरफ दुनिया भू-राजनीतिक अस्थिरता के दौर से गुजर रही है, वहीं भारत अपनी सीमाओं को सुरक्षित करने के लिए अब दूसरों पर निर्भर नहीं है। यह बजट और यह मंजूरी इस बात का प्रमाण है कि भारत अब रक्षा आयातक (Importer) से रक्षा विनिर्माता (Manufacturer) बनने की राह पर तेजी से दौड़ रहा है।
1. 15 जनवरी 2026: रक्षा क्षेत्र के लिए एक ऐतिहासिक दिन
आज का दिन भारतीय रक्षा इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाएगा। रक्षा अधिग्रहण परिषद (DAC) की बैठक, जो रक्षा खरीद के लिए सर्वोच्च निर्णय लेने वाली संस्था है, ने स्पष्ट कर दिया है कि आधुनिक युद्ध अब पारंपरिक तरीकों से नहीं लड़े जाएंगे। 2020 के बाद से दुनिया ने देखा है कि कैसे आर्मेनिया-अजरबैजान युद्ध, रूस-यूक्रेन संघर्ष और पश्चिम एशिया के तनाव में तकनीक ने बाजी पलटी है। इन युद्धों ने सिद्ध कर दिया है कि जिसके पास बेहतर ड्रोन तकनीक और सटीक तोपखाना (Artillery) है, विजय उसी की होती है।
इसी सीख को आत्मसात करते हुए, भारत सरकार ने ₹15,000 करोड़ के ड्रोन और आर्टिलरी सिस्टम के लिए ‘एक्सेप्टेंस ऑफ नेसेसिटी’ (AoN) जारी की है। इस मंजूरी का सबसे खास पहलू यह है कि यह पूरी तरह से ‘Buy Indian-IDDM’ (Indigenously Designed, Developed and Manufactured) श्रेणी के तहत दी गई है। इसका अर्थ है कि ये सभी हथियार और सिस्टम भारतीय कंपनियों द्वारा भारत में ही बनाए जाएंगे। यह निर्णय भारतीय डिफेंस स्टार्टअप्स, एमएसएमई (MSME) और बड़े रक्षा उपक्रमों के लिए एक बूस्टर डोज साबित होगा।
इस मंजूरी के साथ ही सेना दिवस का उत्साह दोगुना हो गया है। यह संदेश सीमाओं पर तैनात जवानों के लिए भी है कि देश उनके हाथों में दुनिया के सबसे बेहतरीन और आधुनिक हथियार देने के लिए प्रतिबद्ध है।

2. ड्रोन युद्ध का नया युग: आसमान में भारत की निगाहें
इस डील का एक बड़ा हिस्सा उन्नत ड्रोन सिस्टम के लिए आवंटित किया गया है। 2026 में युद्ध का स्वरूप बदल चुका है। अब सैनिक सीमा पार जाकर रेकी करने के बजाय ड्रोन्स का इस्तेमाल करते हैं। ₹15,000 करोड़ के ड्रोन और आर्टिलरी सिस्टम के तहत सेना को विभिन्न प्रकार के अनमैन्ड एरियल व्हीकल्स (UAVs) मिलेंगे।
क. लोइटरिंग म्यूनिशन (आत्मघाती ड्रोन): भविष्य के युद्धों में ‘लोइटरिंग म्यूनिशन’ (Loitering Munitions) गेम-चेंजर माने जाते हैं। इन्हें आम भाषा में ‘कामिकेज़ ड्रोन’ या आत्मघाती ड्रोन भी कहा जाता है। ये ड्रोन हवा में काफी देर तक मंडरा सकते हैं (Loiter), अपने लक्ष्य की पहचान कर सकते हैं और फिर एक मिसाइल की तरह उस पर गिरकर उसे नष्ट कर सकते हैं। इस डील के तहत, भारतीय सेना को ऐसे हजारों स्वदेशी ड्रोन मिलेंगे जो पहाड़ों में छिपे दुश्मन के बंकरों, रडार सिस्टम और काफिलों को बिना किसी मानवीय जोखिम के नष्ट कर सकेंगे। ये ड्रोन लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश जैसी दुर्गम चोटियों पर दुश्मन की गतिविधियों पर नजर रखने और तुरंत हमला करने में सक्षम होंगे।
ख. स्वार्म ड्रोन्स (Swarm Drones): आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) से लैस स्वार्म ड्रोन्स का बेड़ा भी इस खरीद का हिस्सा है। स्वार्म टेक्नोलॉजी में सैकड़ों छोटे ड्रोन एक साथ, एक झुंड की तरह काम करते हैं। वे आपस में संवाद करते हैं और दुश्मन के एयर डिफेंस सिस्टम को चकमा देकर हमला करते हैं। भारत उन चुनिंदा देशों में शामिल हो रहा है जो इस तकनीक को अपनी सेना में सक्रिय रूप से शामिल कर रहे हैं। भारतीय स्टार्टअप्स ने इस क्षेत्र में अद्भुत काम किया है और अब उन्हें सेना का साथ मिल रहा है।
ग. सर्विलांस और लॉजिस्टिक्स ड्रोन: हमले के अलावा, निगरानी और रसद आपूर्ति के लिए भी ड्रोन्स खरीदे जाएंगे। ऊंचाई वाले क्षेत्रों में जहां सैनिकों तक राशन और गोला-बारूद पहुंचाना मुश्किल होता है, वहां हेवी-लिफ्ट लॉजिस्टिक्स ड्रोन (Heavy-lift Logistics Drones) जीवनरक्षक साबित होंगे। यह सैनिकों के जीवन को आसान बनाने और ऑपरेशनल एफिशिएंसी बढ़ाने की दिशा में एक बड़ा कदम है।
3. आर्टिलरी का आधुनिकीकरण: तोपखाने की गूंज
युद्ध के मैदान का राजा ‘आर्टिलरी’ (तोपखाना) को कहा जाता है। कारगिल युद्ध हो या कोई अन्य संघर्ष, तोपखाने ने हमेशा निर्णायक भूमिका निभाई है। ₹15,000 करोड़ के ड्रोन और आर्टिलरी सिस्टम की मंजूरी में आधुनिक तोपखाने पर विशेष ध्यान दिया गया है।
क. एडवांस्ड टोड आर्टिलरी गन सिस्टम (ATAGS): रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (DRDO) और निजी क्षेत्र की कंपनियों (जैसे टाटा और भारत फोर्ज) द्वारा विकसित ATAGS (Advanced Towed Artillery Gun System) दुनिया की सबसे बेहतरीन 155mm/52 कैलिबर तोपों में से एक है। इसकी मारक क्षमता 48 किलोमीटर तक है, जो अपनी श्रेणी में सर्वाधिक है। इस मंजूरी के बाद, भारतीय सेना को इन शक्तिशाली तोपों की बड़ी खेप मिलने का रास्ता साफ हो गया है। ये तोपें पुरानी हो रही फील्ड गन्स की जगह लेंगी और चीन सीमा पर भारत की गोलाबारी क्षमता (Firepower) को कई गुना बढ़ा देंगी।
ख. पिनाका मल्टी-बैरल रॉकेट लॉन्चर (Pinaka MBRL): आर्टिलरी का मतलब सिर्फ तोपें नहीं, बल्कि रॉकेट सिस्टम भी है। भगवान शिव के धनुष ‘पिनाक’ के नाम पर बना यह स्वदेशी रॉकेट सिस्टम दुश्मन के इलाके में तबाही मचाने के लिए जाना जाता है। नए गाइडेड पिनाका रॉकेट्स की खरीद भी इस योजना का हिस्सा हो सकती है, जो सटीकता के साथ लंबी दूरी तक मार कर सकते हैं।
ग. माउंटेन आर्टिलरी: हिमालय की चोटियों पर भारी तोपें ले जाना मुश्किल होता है। इसलिए, ‘अल्ट्रा-लाइट होवित्जर’ (Ultra-Light Howitzers) और मोबाइल गन सिस्टम पर भी फोकस है। ये ऐसी बंदूकें हैं जिन्हें हेलिकॉप्टर के जरिए एक पहाड़ से दूसरे पहाड़ पर तुरंत शिफ्ट किया जा सकता है। 2026 के भारत में, हम ऐसी तोपें खुद बना रहे हैं जो वजन में हल्की लेकिन मारक क्षमता में भारी हैं।
4. मेक इन इंडिया: एक नारा नहीं, हकीकत
एक दशक पहले तक भारत दुनिया का सबसे बड़ा हथियार आयातक देश था। हम अपनी हर छोटी-बड़ी जरूरत के लिए रूस, अमेरिका, फ्रांस या इजराइल की ओर देखते थे। लेकिन ₹15,000 करोड़ के ड्रोन और आर्टिलरी सिस्टम की यह मंजूरी उस पुरानी सोच पर पूर्ण विराम लगाती है।
निजी क्षेत्र की भूमिका: इस डील का सबसे बड़ा फायदा भारत के निजी क्षेत्र (Private Sector) को मिलेगा। पहले रक्षा उत्पादन केवल सरकारी ऑर्डिनेंस फैक्ट्रीज और पीएसयू (PSUs) तक सीमित था। लेकिन अब टाटा, अडानी डिफेंस, भारत फोर्ज, कल्याणी ग्रुप, और सैकड़ों छोटे स्टार्टअप्स (जैसे आइडियाफोर्ज, न्यूस्पेस रिसर्च) मुख्य धारा में आ गए हैं। सरकार ने यह सुनिश्चित किया है कि इन ₹15,000 करोड़ का बड़ा हिस्सा इन भारतीय कंपनियों के पास जाए। इससे न केवल रक्षा क्षेत्र मजबूत होगा, बल्कि देश में रोजगार के हजारों नए अवसर पैदा होंगे। इंजीनियरों, तकनीशियनों और शोधकर्ताओं के लिए यह एक सुनहरा दौर है।
रक्षा गलियारे (Defense Corridors): उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु में बनाए गए डिफेंस इंडस्ट्रियल कॉरिडोर अब परिणाम देने लगे हैं। इस नई मंजूरी के बाद, इन गलियारों में स्थित फैक्ट्रियों में उत्पादन की गति बढ़ेगी। अलीगढ़, कानपुर, झांसी, और कोयंबटूर, होसुर जैसे शहर अब रक्षा उत्पादन के नए केंद्र बनकर उभर रहे हैं।

5. रणनीतिक महत्व: चीन और पाकिस्तान को कड़ा संदेश
रक्षा खरीद का सीधा संबंध राष्ट्रीय सुरक्षा और भू-राजनीति से होता है। ₹15,000 करोड़ के ड्रोन और आर्टिलरी सिस्टम की खरीद का समय और प्रकार दोनों ही बहुत महत्वपूर्ण हैं।
उत्तरी सीमा (चीन): लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश में चीन के साथ चल रहे गतिरोध को देखते हुए, भारत को अपनी आर्टिलरी और ड्रोन क्षमता को मजबूत करना अनिवार्य था। चीन के पास पहले से ही बड़ी संख्या में ड्रोन और रॉकेट फोर्स है। इस डील के माध्यम से भारत ने ‘शक्ति संतुलन’ (Balance of Power) को साधने की कोशिश की है। ATAGS तोपें और लोइटरिंग म्यूनिशन चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) के लिए एक बड़ा निवारक (Deterrent) साबित होंगे।
पश्चिमी सीमा (पाकिस्तान): पाकिस्तान सीमा पर अक्सर संघर्ष विराम उल्लंघन और घुसपैठ की घटनाएं होती रहती हैं। वहां सर्विलांस ड्रोन्स और सटीक तोपखाने का उपयोग करके भारत अपने बंकरों से बाहर निकले बिना ही दुश्मन के लॉन्च पैड्स को नष्ट कर सकता है। यह तकनीक ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ को और भी अधिक घातक और सुरक्षित बनाती है।
6. आत्मनिर्भरता की तकनीक: चुनौती और समाधान
जब हम ₹15,000 करोड़ के ड्रोन और आर्टिलरी सिस्टम के स्वदेशीकरण की बात करते हैं, तो हमें चुनौतियों को भी समझना होगा। क्या भारत इंजन और चिप्स (Chips) के मामले में आत्मनिर्भर है? यह सच है कि अभी भी कुछ उच्च-तकनीकी घटक (High-tech Components) आयात करने पड़ते हैं। लेकिन इस डील में ‘स्वदेशी सामग्री’ (Indigenous Content) की शर्त 60% से 90% तक रखी गई है। सरकार ने रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (DRDO) के साथ-साथ निजी कंपनियों को आर एंड डी (Research & Development) पर खर्च करने के लिए प्रोत्साहित किया है। 2026 में भारत सेमीकंडक्टर मिशन के तहत अपनी खुद की चिप्स बनाने की दिशा में भी आगे बढ़ रहा है, जो भविष्य में ड्रोन्स और मिसाइलों के लिए महत्वपूर्ण होगा।
7. भविष्य का युद्ध: नेटवर्क सेंट्रिक वारफेयर
यह खरीद केवल लोहे और बारूद की नहीं है, बल्कि यह ‘नेटवर्क सेंट्रिक वारफेयर’ (Network Centric Warfare) की तैयारी है। आज के युद्ध में, एक ड्रोन द्वारा देखा गया लक्ष्य तुरंत आर्टिलरी कमांडर के टैबलेट पर दिखाई देता है, और सेकंडों के भीतर उस पर हमला हो जाता है। ₹15,000 करोड़ के ड्रोन और आर्टिलरी सिस्टम को भारतीय सेना के ‘कमांड, कंट्रोल, कम्युनिकेशंस, कंप्यूटर्स, इंटेलिजेंस, सर्विलांस और टोही’ (C4I2SR) नेटवर्क के साथ एकीकृत किया जाएगा।
यह एकीकरण (Integration) भारतीय सेना को एक स्मार्ट और डिजिटल सेना में बदल देगा। इससे निर्णय लेने का समय (Decision Making Time) कम होगा और हमले की सटीकता बढ़ेगी।
8. आर्थिक प्रभाव: पैसा भारत में ही रहेगा
जब हम विदेशों से हथियार खरीदते हैं, तो देश का पैसा बाहर जाता है और हमारी मुद्रा पर दबाव पड़ता है। लेकिन ₹15,000 करोड़ के ड्रोन और आर्टिलरी सिस्टम का निर्माण भारत में होने से यह पूंजी देश के भीतर ही रहेगी।
- एमएसएमई को लाभ: एक बड़ी तोप या ड्रोन बनाने में हजारों छोटे पुर्जों की जरूरत होती है। ये पुर्जे छोटी और मध्यम इकाइयों (MSMEs) द्वारा बनाए जाते हैं। इस डील से टियर-2 और टियर-3 शहरों में स्थित छोटी फैक्ट्रियों को ऑर्डर मिलेंगे।
- निर्यात क्षमता: जब भारतीय सेना अपने ही देश में बने हथियारों पर भरोसा जताती है, तो दुनिया का भरोसा भी उन पर बढ़ता है। आर्मेनिया, फिलीपींस और अफ्रीकी देशों ने पहले ही भारतीय हथियारों (जैसे पिनाका और ब्रह्मोस) में रुचि दिखाई है। यह नई खरीद भारत को एक बड़ा रक्षा निर्यातक (Defense Exporter) बनने में मदद करेगी।
9. सेना की परिचालन तैयारियों (Operational Readiness) पर प्रभाव
किसी भी सेना के लिए हथियारों की कमी या पुराने हथियार होना सबसे बड़ी कमजोरी होती है। भारतीय सेना लंबे समय से अपने तोपखाने के आधुनिकीकरण (Field Artillery Modernization Plan) की मांग कर रही थी। इस मंजूरी से सेना की परिचालन क्षमता में भारी वृद्धि होगी।
- सटीकता: गाइडेड म्यूनिशन और ड्रोन की मदद से ‘कोलेटरल डैमेज’ (Collateral Damage) कम होगा और केवल सैन्य लक्ष्यों को निशाना बनाया जा सकेगा।
- रेंज: नई तोपों की रेंज बढ़ने से सेना अपनी सीमा के भीतर सुरक्षित रहकर दुश्मन के ठिकानों पर हमला कर सकेगी।
- मनोबल: जब जवान के हाथ में आधुनिक हथियार होता है, तो उसका मनोबल सातवें आसमान पर होता है।
10. वैश्विक तुलना: हम कहां खड़े हैं?
अगर हम वैश्विक शक्तियों से तुलना करें, तो अमेरिका, चीन और रूस ड्रोन तकनीक में बहुत आगे हैं। तुर्की और ईरान जैसे देशों ने भी सस्ते और प्रभावी ड्रोन बनाकर अपनी पहचान बनाई है। भारत ने इस दौड़ में थोड़ी देर से शुरुआत की, लेकिन हमारी गति तेज है। ₹15,000 करोड़ के ड्रोन और आर्टिलरी सिस्टम का यह निवेश हमें इन देशों के समकक्ष लाने का प्रयास है। विशेष रूप से, ‘सॉफ्टवेयर’ और ‘आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस’ में भारत की प्राकृतिक बढ़त (Natural Edge) हमारे ड्रोन्स को दुनिया के सबसे स्मार्ट ड्रोन्स में से एक बना सकती है।
11. आलोचना और चुनौतियां
हर बड़ी परियोजना के साथ कुछ चुनौतियां भी जुड़ी होती हैं। आलोचकों का कहना है कि:
- वितरण में देरी: भारतीय रक्षा परियोजनाओं में अक्सर देरी (Delay) की समस्या देखी गई है। सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि ये ड्रोन्स और तोपें समय सीमा के भीतर सेना तक पहुंचें।
- गुणवत्ता नियंत्रण: स्वदेशी उत्पादों की गुणवत्ता विश्वस्तरीय होनी चाहिए। युद्ध के मैदान में ‘सेकंड बेस्ट’ के लिए कोई जगह नहीं होती।
हालांकि, हाल के वर्षों में निजी क्षेत्र के आने से समय और गुणवत्ता दोनों में सुधार हुआ है। रक्षा मंत्रालय ने भी अपनी खरीद प्रक्रियाओं को सरल और तेज किया है।
12: एक सुरक्षित और सशक्त भारत की ओर
अंत में, 15 जनवरी 2026 को मिली ₹15,000 करोड़ के ड्रोन और आर्टिलरी सिस्टम की यह मंजूरी केवल एक सरकारी आदेश नहीं, बल्कि एक सुरक्षित भविष्य का संकल्प है। यह उस ‘नए भारत’ का उद्घोष है जो अपनी सुरक्षा के लिए किसी का मुंह नहीं ताकता।
यह पहल दिखाती है कि भारत समझ चुका है कि शक्ति ही शांति की गारंटी है। जब हमारे पास स्वदेशी तकनीक, स्वदेशी हथियार और स्वदेशी हौसला होगा, तो कोई भी शक्ति हमारी संप्रभुता को चुनौती देने का साहस नहीं कर सकेगी।
मेक इन इंडिया का शेर अब रक्षा क्षेत्र में दहाड़ रहा है। यह आर्टिलरी की गूंज और ड्रोन्स की उड़ान भारत के दुश्मनों के लिए चेतावनी है और भारत के नागरिकों के लिए सुरक्षा का आश्वासन।
आज सेना दिवस पर, यह देश के वीर जवानों को दी गई सबसे बेहतरीन सलामी है। जय हिंद!
