आज का दिन, 11 जनवरी, भारतीय इतिहास के पन्नों में एक गहरे शोक और अपूरणीय क्षति के रूप में दर्ज है। आज ही के दिन, 1966 में, भारत ने अपने सबसे लाडले, सबसे सरल और स्वाभिमानी सपूत को खो दिया था। हम बात कर रहे हैं भारत के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री (Lal Bahadur Shastri) की।
कद में छोटे, लेकिन इरादों में हिमालय से भी ऊंचे—शास्त्री जी ने भारत को उस वक्त संभाला था जब देश अनाज की कमी और युद्ध के संकट से जूझ रहा था। आज उनकी 60वीं पुण्यतिथि (60th Death Anniversary) पर पूरा देश उन्हें नमन कर रहा है। दिल्ली के Vijay Ghat से लेकर देश के हर स्कूल और कॉलेज में श्रद्धांजलि सभाओं का आयोजन किया गया है।
देश शोक में! लाल बहादुर शास्त्री की पुण्यतिथि पर पूरे भारत में श्रद्धांजलि
1. राष्ट्र ने किया नमन: विजय घाट पर श्रद्धासुमन
आज सुबह नई दिल्ली स्थित Vijay Ghat (लाल बहादुर शास्त्री जी की समाधि स्थल) पर एक भावुक वातावरण था। कड़ाकेदार ठंड के बावजूद, राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू, प्रधानमंत्री Narendra Modi और कई केंद्रीय मंत्रियों ने समाधि स्थल पर जाकर पुष्प अर्पित किए।
प्रधानमंत्री का संदेश: पीएम मोदी ने सोशल मीडिया पर श्रद्धांजलि देते हुए लिखा:
“शास्त्री जी का जीवन सादगी और कर्तव्यनिष्ठा की मिसाल है। कठिन समय में उन्होंने देश को जो नेतृत्व दिया, उसके लिए भारत उनका सदैव ऋणी रहेगा। उनका नारा ‘जय जवान-जय किसान’ आज भी हमें प्रेरणा देता है।”
देश भर में आयोजित प्रार्थना सभाओं में ‘राम धुन’ बजाई गई, जो शास्त्री जी को बेहद प्रिय थी।

2. गुदड़ी के लाल: प्रारंभिक जीवन और संघर्ष
लाल बहादुर शास्त्री का जन्म 2 अक्टूबर 1904 को उत्तर प्रदेश के मुगलसराय में हुआ था। यह एक संयोग ही है कि उनका जन्मदिन राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के साथ आता है। एक अत्यंत साधारण परिवार में जन्मे नन्हे लाल बहादुर ने बचपन में ही अपने पिता को खो दिया था।
गरीबी और स्वाभिमान: शास्त्री जी का बचपन कड़े संघर्षों में बीता।
- नदी पार कर स्कूल जाना: कहा जाता है कि उनके पास नाव वाले को देने के लिए पैसे नहीं होते थे, इसलिए वे अपनी किताबें सिर पर रखकर गंगा नदी तैरकर स्कूल जाते थे। यह कहानी उनकी शिक्षा के प्रति लगन को दर्शाती है।
- उपनाम का त्याग: वे जाति प्रथा के सख्त खिलाफ थे। उन्होंने अपना जाति सूचक उपनाम ‘श्रीवास्तव’ हटा दिया और काशी विद्यापीठ से पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्हें ‘Shastri’ (विद्वान) की उपाधि मिली, जो बाद में उनके नाम का हिस्सा बन गई।
3. स्वतंत्रता संग्राम के सिपाही
गांधी जी के आह्वान पर, शास्त्री जी ने बहुत कम उम्र में ही देश की आजादी की लड़ाई में कूदने का फैसला किया।
- असहयोग आंदोलन: 1921 में जब वे केवल 17 वर्ष के थे, वे जेल गए।
- नमक सत्याग्रह: 1930 में उन्होंने ‘नमक सत्याग्रह’ में सक्रिय भूमिका निभाई और ढाई साल के लिए जेल गए।
- भारत छोड़ो आंदोलन: 1942 में उन्होंने भूमिगत होकर आंदोलन का नेतृत्व किया।
कुल मिलाकर, उन्होंने अपने जीवन के करीब 9 वर्ष जेल में बिताए। जेल में रहते हुए उन्होंने पश्चिमी दार्शनिकों, क्रांतिकारियों और समाज सुधारकों की किताबें पढ़ीं, जिसने उनके व्यक्तित्व को और निखारा।
4. राजनीति में शुचिता: रेल मंत्री पद से इस्तीफा
आजादी के बाद, शास्त्री जी ने कई महत्वपूर्ण पद संभाले। वे देश के गृह मंत्री और रेल मंत्री रहे। उनका कार्यकाल नैतिक जिम्मेदारी (Moral Responsibility) का स्वर्ण अध्याय माना जाता है।
इस्तीफे की कहानी: जब वे रेल मंत्री थे, तब महबूबनगर में एक भीषण रेल दुर्घटना हुई जिसमें 112 लोग मारे गए। शास्त्री जी इस घटना से इतने आहत हुए कि उन्होंने इसे अपनी व्यक्तिगत विफलता माना और नैतिकता के आधार पर इस्तीफा (Resignation) दे दिया। तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित नेहरू ने संसद में कहा था:
“मैं लाल बहादुर का इस्तीफा इसलिए स्वीकार कर रहा हूं, क्योंकि यह संवैधानिक औचित્ય की मिसाल बनेगा, न कि इसलिए कि वे इस दुर्घटना के लिए जिम्मेदार हैं।”
आज के दौर में जब नेता कुर्सी से चिपके रहते हैं, शास्त्री जी का यह कदम एक मिसाल है।
5. जब बने देश के दूसरे प्रधानमंत्री (1964)
1964 में पंडित जवाहरलाल नेहरू के निधन के बाद देश के सामने यक्ष प्रश्न था—“नेहरू के बाद कौन?” कांग्रेस पार्टी और देश ने एक ऐसे व्यक्ति को चुना जो शांत था, लेकिन कमजोर नहीं। 9 जून 1964 को लाल बहादुर शास्त्री भारत के दूसरे प्रधानमंत्री बने।
उनका कार्यकाल छोटा (मात्र 19 महीने) था, लेकिन चुनौतियों से भरा था।
- खाद्यान्न संकट: देश में अनाज की भारी कमी थी।
- पाकिस्तान का खतरा: पड़ोसी मुल्क भारत को कमजोर समझ रहा था।
- भाषा विवाद: दक्षिण भारत में हिंदी विरोधी आंदोलन चल रहे थे।

6. ‘जय जवान, जय किसान’: एक नारा जिसने देश जगा दिया
1965 में भारत दोहरे संकट से जूझ रहा था। एक तरफ सीमा पर पाकिस्तान गोलीबारी कर रहा था, और दूसरी तरफ देश में सूखे के कारण अकाल की स्थिति थी। अमेरिका ने भारत को गेहूं (PL-480 योजना) देने की धमकी दी थी कि अगर भारत ने पाकिस्तान के खिलाफ युद्ध बंद नहीं किया, तो अनाज रोक दिया जाएगा।
शास्त्री जी ने अमेरिका की धमकी के आगे झुकने से इनकार कर दिया। उन्होंने देशवासियों से अपील की:
“हम भूखे रह लेंगे, लेकिन अपना स्वाभिमान नहीं बेचेंगे।”
शास्त्री व्रत (Monday Fast): उन्होंने देशवासियों से अपील की कि वे सप्ताह में एक वक्त का खाना छोड़ दें। शुरुआत उन्होंने खुद अपने परिवार से की। उनके कहने पर करोड़ों भारतीयों ने सोमवार को खाना छोड़ दिया, जिसे ‘Shastri Vrat’ कहा जाने लगा।
इसी दौरान उन्होंने दिल्ली के रामलीला मैदान से वह ऐतिहासिक नारा दिया जो आज भी गूंजता है—“Jai Jawan, Jai Kisan”। उन्होंने समझाया कि सीमा पर लड़ने वाला जवान और खेत में अन्न उगाने वाला किसान—दोनों ही देश की रीढ़ हैं।
7. 1965 का भारत-पाकिस्तान युद्ध: ईंट का जवाब पत्थर से
पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान ने सोचा था कि शास्त्री जी एक कमजोर प्रधानमंत्री हैं और नेहरू की मृत्यु के बाद भारत अस्थिर है। इसी गलतफहमी में पाकिस्तान ने 1965 में भारत पर हमला कर दिया।
सेना को खुली छूट: जब सेना प्रमुख ने शास्त्री जी से पूछा कि हमें क्या करना चाहिए? तो उस शांत दिखने वाले प्रधानमंत्री ने कड़क आवाज में कहा था:
“आप देश की रक्षा कीजिए और हमें बताइए कि आपको क्या चाहिए। ईंट का जवाब पत्थर से दीजिए।”
शास्त्री जी ने भारतीय सेना को Lahore (लाहौर) की तरफ कूच करने का आदेश दे दिया। भारतीय सेना लाहौर के हवाई अड्डे तक पहुंच गई थी। पाकिस्तान घबरा गया। शास्त्री जी ने दुनिया को दिखा दिया कि भारत शांतिप्रिय है, लेकिन कायर नहीं। इस युद्ध ने भारत का खोया हुआ आत्मसम्માન लौटाया।
8. ताशकंद समझौता और वह काली रात (Tashkent Agreement)
युद्ध विराम के बाद, सोवियत संघ (USSR) की मध्यस्थता में भारत और पाकिस्तान के बीच शांति वार्ता तय हुई। स्थान चुना गया—उज्बेकिस्तान की राजधानी ताशकंद (Tashkent)।
10 जनवरी 1966 को लाल बहादुर शास्त्री और अयूब खान ने ऐतिहासिक Tashkent Agreement पर हस्ताक्षर किए। समझौते के तहत दोनों देशों ने अपनी सेनाएं युद्ध से पहले की स्थिति में वापस बुलाने का वादा किया।
रहस्यमयी मृत्यु (Mystery Death): समझौते पर हस्ताक्षर करने के कुछ ही घंटों बाद, 10-11 जनवरी की दरमियानी रात को खबर आई कि लाल बहादुर शास्त्री का निधन हो गया है। आधिकारिक कारण Heart Attack (दिल का दौरा) बताया गया।
लेकिन यह खबर आज तक संदेह के घेरे में है।
- नीला शरीर: जब उनका पार्थिव शरीर भारत लाया गया, तो वह नीला पड़ चुका था। उनके चेहरे पर कटने के निशान थे।
- पोस्टमार्टम नहीं: हैरानी की बात यह है कि एक प्रधानमंत्री की विदेश में मृत्यु होने के बावजूद उनका पोस्टमार्टम नहीं कराया गया।
- परिजनों का दावा: उनकी पत्नी ललिता शास्त्री ने हमेशा दावा किया कि शास्त्री जी को जहर दिया गया था।
CIA या KGB? कई साजिश के सिद्धांत (Conspiracy Theories) मौजूद हैं। कुछ लोग इसमें अमेरिकी खुफिया एजेंसी CIA का हाथ मानते हैं (क्योंकि शास्त्री जी परमाणु परीक्षण करना चाहते थे), तो कुछ इसमें सोवियत संघ या आंतरिक राजनीति का हाथ देखते हैं। “द ताशकंद फाइल्स” जैसी फिल्मों ने इस मुद्दे को फिर से जीवित किया है।
9. सादगी की मूरत: शास्त्री जी के अनसुने किस्से
शास्त्री जी का जीवन Simple Living, High Thinking का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण था।
- फटी हुई धोती: एक बार उनकी पत्नी ने उनसे कहा कि आपकी धोती फट गई है, नई ले लीजिए। शास्त्री जी ने कहा, “यह अभी भी कोट के नीचे पहनने लायक है, इसे फेंको मत।” वे फटे हुए कपड़ों को भी सिलकर पहन लेते थे।
- सरकारी गाड़ी का उपयोग: प्रधानमंत्री बनने के बाद भी उन्होंने कभी अपने परिवार को सरकारी गाड़ी का निजी उपयोग नहीं करने दिया। एक बार उनके बेटे ने सरकारी कार चला ली, तो शास्त्री जी ने अगले दिन लॉग बुक चेक करके उतने किलोमीटर का पैसा सरकारी खजाने में जमा करवाया।
- कार लोन: पीएम रहते हुए उन्होंने फिएट कार (Fiat Car) खरीदने के लिए पंजाब नेशनल बैंक से 5,000 रुपये का लोन लिया था। उनके निधन के बाद वह लोन उनकी पत्नी ने अपनी पेंशन से चुकाया। सोचिए, एक प्रधानमंत्री जिसके पास कार खरीदने के पैसे नहीं थे!
10. हरित क्रांति और श्वेत क्रांति के जनक
अक्सर इन क्रांतियों का श्रेय वैज्ञानिकों को दिया जाता है, लेकिन इसके पीछे की राजनीतिक इच्छाशक्ति शास्त्री जी की थी।
- Green Revolution: उन्होंने सी. सुब्रमण्यम को कृषि मंत्री बनाया और एमएस स्वामीनाथन को फ्री हैंड दिया ताकि देश अनाज में आत्मनिर्भर बने। उन्होंने अपने घर (PM आवास) के लॉन में भी हल चलाकर खेती की थी।
- White Revolution: आनंद (गुजरात) की अपनी यात्रा के दौरान वे अमूल की सफलता से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने वर्गीस कुरियन को पूरे देश में National Dairy Development Board (NDDB) बनाने के लिए कहा। इसी से भारत दुनिया का सबसे बड़ा दूध उत्पादक बना।
11. आज के भारत में शास्त्री जी की प्रासंगिकता (Relevance in 2026)
2026 में, जब हम एक विकसित भारत का सपना देख रहे हैं, शास्त्री जी के विचार पहले से कहीं ज्यादा प्रासंगिक हैं।
- भ्रष्टाचार मुक्त शासन: आज जब भ्रष्टाचार एक दीमक की तरह है, शास्त्री जी की ईमानदारी एक मशाल है।
- आत्मनिर्भर भारत: ‘मेक इन इंडिया’ और ‘वोकल फॉर लोकल’ की मूल भावना शास्त्री जी के स्वावलंबन में छिपी है।
- સર્જિકલ સ્ટ્રાઈક: दुश्मनों को घर में घुसकर मारने का जो साहस आज हम देखते हैं, उसकी नींव 1965 में लाहौर कूच के आदेश ने रखी थी।
12. भारत रत्न (मरणोपरांत)
लाल बहादुर शास्त्री जी को 1966 में मरणोपरांत भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान Bharat Ratna से नवाजा गया। वे यह सम्मान पाने वाले पहले व्यक्ति (मरणोपरांत) थे। विजय घाट पर लिखा उनका समाधि-लेख ‘जय जवान, जय किसान’ आज भी आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करता है।
लाल बहादुर शास्त्री केवल एक राजनेता नहीं थे, वे भारतीय आत्मा की अभिव्यक्ति थे। उन्होंने साबित किया कि बड़ा काम करने के लिए बड़े कद या बड़े घराने की जरूरत नहीं होती, बस एक बड़ा दिल और फौलाદી इरादा चाहिए।
आज उनकी पुण्यतिथि पर, हमें केवल उन्हें फूल मालाएं चढ़ाकर इतिश्री नहीं कर लेनी चाहिए। सच्ची श्रद्धांजलि तब होगी जब हम उनके मूल्यों—ईमानदारी, सादगी और राष्ट्रप्रेम—को अपने जीवन में उतारें।
ताशकंद की वह सर्द रात भले ही हमारे प्रिय नेता को हमसे छीन ले गई हो, लेकिन उनके विचार अमर हैं।
शत-शत नमन, भारत के लाल!
