आखिरकार वह खबर आ ही गई जिसका इंतजार लाखों सिनेप्रेमी और शिवकार्तिकेयन (Sivakarthikeyan) के फैंस बेसब्री से कर रहे थे। पोंगल 2026 के सबसे बड़े क्लैश से ठीक पहले, सुधा कोंगरा द्वारा निर्देशित फिल्म ‘Parasakthi’ ने अपनी सबसे बड़ी बाधा पार कर ली है। केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC) ने फिल्म को U/A सर्टिफिकेट दे दिया है।
सेंसर बोर्ड के साथ हफ्तों चली रस्साकशी, दर्जनों कट्स की मांग और रिलीज डेट टलने के डर के बाद, फिल्म अब अपने निर्धारित समय यानी 10 जनवरी 2026 को सिनेमाघरों में दस्तक देने के लिए तैयार है।
इस विस्तृत ब्लॉग में हम इस पूरी ‘Parasakthi Controversy’ की गहराई में जाएंगे, फिल्म की ऐतिहासिक कहानी को समझेंगे, 1952 की क्लासिक फिल्म से इसके कनेक्शन को जानेंगे और यह भी देखेंगे कि बॉक्स ऑफिस पर इसका मुकाबला किन फिल्मों से है।

सेंसर बोर्ड का U/A सर्टिफिकेट: राहत की सांस
फिल्म की रिलीज से महज 24 घंटे पहले आई यह खबर मेकर्स के लिए किसी संजीवनी से कम नहीं है। रिपोर्टों के मुताबिक, CBFC ने फिल्म को U/A (Parental Guidance) सर्टिफिकेट दिया है, लेकिन यह आसानी से नहीं मिला।
विवाद क्या था? सेंसर बोर्ड की रिवाइजिंग कमेटी ने फिल्म में दिखाए गए 1960 के दशक के हिंदी विरोधी आंदोलनों (Anti-Hindi Agitation) के चित्रण पर आपत्ति जताई थी।
- खबरों के अनुसार, बोर्ड ने शुरुआत में फिल्म में 23 से 38 कट्स लगाने का सुझाव दिया था।
- मेकर्स को डर था कि इतने सारे कट्स से फिल्म की आत्मा और उसका ऐतिहासिक संदर्भ (Historical Context) खत्म हो जाएगा।
- निर्देशक सुधा कोंगरा, जो अपनी बेबाक स्टोरीटेलिंग के लिए जानी जाती हैं, ने फिल्म के मूल स्वरूप को बचाने के लिए रिवाइजिंग कमेटी के सामने अपना पक्ष रखा।
अंततः, कुछ संशोधनों और म्यूट (Mute) किए गए संवादों के बाद, बोर्ड ने फिल्म को हरी झंडी दे दी। हालांकि, यह अभी भी स्पष्ट नहीं है कि फाइनल कट में कितने दृश्य हटाए गए हैं, लेकिन U/A सर्टिफिकेट का मिलना यह सुनिश्चित करता है कि फिल्म अब पारिवारिक दर्शकों तक पहुंच सकेगी।
कहानी की नींव: 1960 का मद्रास और भाषा की लड़ाई
‘Parasakthi’ कोई आम मसाला फिल्म नहीं है। यह फिल्म हमें इतिहास के उन पन्नों में ले जाती है, जब तमिलनाडु (तत्कालीन मद्रास स्टेट) भाषा की अस्मिता की लड़ाई लड़ रहा था।
फिल्म की कहानी 1965 के उस दौर पर आधारित है जब केंद्र सरकार द्वारा हिंदी को आधिकारिक भाषा बनाने के फैसले के खिलाफ पूरा दक्षिण भारत उबल पड़ा था।
- शिवकार्तिकेयन का किरदार: फिल्म में शिवकार्तिकेयन चेझियन (Chezhaiyan) का किरदार निभा रहे हैं, जो एक सरकारी कर्मचारी है। शुरुआत में वह भाषा के मुद्दे पर तटस्थ (Neutral) रहता है, लेकिन हालात उसे एक आंदोलनकारी बनने पर मजबूर कर देते हैं।
- अथर्व का रोल: अथर्व मुरली फिल्म में चिन्ना (Chinna) की भूमिका में हैं, जो एक इंजीनियरिंग छात्र है और हिंदी विरोधी आंदोलन का नेतृत्व करता है।
- जयम रवि (क्रेडिटेड एज रवि मोहन): सबसे बड़ा सरप्राइज पैकेज जयम रवि हैं, जो इस फिल्म में एक कठोर पुलिस अधिकारी/प्रशासक के रूप में विलेन की भूमिका में दिखेंगे। उनका किरदार उस समय की सत्ता और दमन का प्रतीक है।
यह फिल्म सिर्फ विरोध प्रदर्शन नहीं, बल्कि दो भाइयों की विचारधाराओं के टकराव और एक ऐसे दौर की कहानी है जब छात्रों ने राजनीति की दिशा बदल दी थी।
इतिहास का पन्ना: क्या है 1965 का हिंदी विरोधी आंदोलन?
फिल्म को बेहतर ढंग से समझने के लिए हमें उस ऐतिहासिक घटना को जानना जरूरी है जिस पर यह आधारित है।
26 जनवरी 1965 को भारत का संविधान लागू हुए 15 साल पूरे हो रहे थे। संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार, इस तारीख के बाद अंग्रेजी की जगह हिंदी को भारत की एकमात्र आधिकारिक भाषा (Official Language) बनना था। तमिलनाडु में इसका भारी विरोध हुआ क्योंकि लोगों को डर था कि इससे गैर-हिंदी भाषी लोगों को सरकारी नौकरियों और सत्ता में नुकसान होगा।
छात्रों की क्रांति: यह आंदोलन राजनेताओं ने नहीं, बल्कि छात्रों ने चलाया था। मदुरै और अन्नामलाई यूनिवर्सिटी (Annamalai University) इस आंदोलन के केंद्र थे। फिल्म के प्रोमो में जिस छात्र की झलक दिखाई गई है, माना जा रहा है कि वह राजेंद्रन (Rajendran) है—अन्नामलाई यूनिवर्सिटी का वह छात्र जो पुलिस फायरिंग में शहीद हो गया था।
सुधा कोंगरा ने इस फिल्म में उस दौर के गुस्से, पुलिस की लाठीचार्ज और छात्रों के बलिदान को जीवंत करने की कोशिश की है। यही कारण है कि सेंसर बोर्ड इस विषय को लेकर इतना संवेदनशील था।
‘Parasakthi’: एक नाम, दो युग
फिल्म का टाइटल ‘Parasakthi’ अपने आप में एक स्टेटमेंट है। यह नाम तमिल सिनेमा के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है।
- 1952 की ‘पराशक्ति’: यह फिल्म महान अभिनेता शिवाजी गणेशन की डेब्यू फिल्म थी। इसके संवाद एम. करुणानिधि (पूर्व मुख्यमंत्री) ने लिखे थे। यह फिल्म द्रविड़ आंदोलन (Dravidian Movement) का घोषणापत्र मानी जाती है। इसने उस समय के सामाजिक ढांचे, अंधविश्वास और ब्राह्मणवाद पर कड़ा प्रहार किया था।
- 2026 की ‘पराशक्ति’: सुधा कोंगरा की यह फिल्म उसी क्रांतिकारी तेवर को आगे बढ़ाती है। जहां 1952 की फिल्म ने सामाजिक कुरीतियों पर चोट की थी, वहीं 2026 की फिल्म भाषाई साम्राज्यवाद (Linguistic Imperialism) और केंद्र के वर्चस्व के खिलाफ आवाज उठाती है।
टाइटल का चुनाव संयोग नहीं है। यह दर्शाता है कि मेकर्स इस फिल्म को एक “कल्ट क्लासिक” का दर्जा देना चाहते हैं जो समाज को सोचने पर मजबूर कर दे।
कास्ट और क्रू: सपनों की टीम
फिल्म की स्टारकास्ट और टेक्निकल टीम इसे साल की सबसे बड़ी फिल्मों में से एक बनाती है।
- निर्देशक: सुधा कोंगरा (जिन्होंने साला खड़ूस और सूरराई पोट्रु जैसी फिल्में बनाई हैं) अपनी रिसर्च और इमोशनल स्टोरीटेलिंग के लिए जानी जाती हैं।
- संगीत: जीवी प्रकाश कुमार (GV Prakash Kumar) के लिए यह एक मील का पत्थर है क्योंकि यह उनकी 100वीं फिल्म है। फिल्म का गाना “रत्नमाला” पहले ही चार्टबस्टर बन चुका है।
- सिनेमेटोग्राफी: रवि के. चंद्रन जैसे दिग्गज ने 1960 के मद्रास को कैमरे में कैद किया है।
- नायिका: श्रीलीला (Sreeleela) इस फिल्म से तमिल में डेब्यू कर रही हैं। उनका किरदार ‘रत्नमाला’ एक तेलुगु लड़की का है जो हिंदी सिखाती है, जो कहानी में एक दिलचस्प मोड़ लाता है।
पोंगल क्लैश: ‘Jana Nayagan’&‘Parasakthi’
इस पोंगल पर तमिलनाडु के बॉक्स ऑफिस पर महायुद्ध होने वाला है।
- एक तरफ थलपति विजय की फिल्म ‘Jana Nayagan’ (जन नायकन) है, जो उनकी राजनीति में एंट्री से पहले आखिरी फिल्म मानी जा रही है।
- दूसरी तरफ शिवकार्तिकेयन की कंटेंट-ड्रिवन ‘Parasakthi’ है।
दिलचस्प बात यह है कि विजय की फिल्म को भी सेंसरशिप की समस्याओं का सामना करना पड़ा और मामला कोर्ट तक गया। दोनों फिल्मों का एक साथ रिलीज होना और दोनों का राजनीतिक विषयों (विजय की फिल्म समकालीन राजनीति पर, शिवकार्तिकेयन की ऐतिहासिक राजनीति पर) पर आधारित होना, इस क्लैश को और भी रोमांचक बनाता है।
इंडस्ट्री के जानकारों का मानना है कि जहां ‘Jana Nayagan’ को विजय की स्टार पावर का फायदा मिलेगा, वहीं ‘Parasakthi’ अपने दमदार कंटेंट और इमोशनल कनेक्ट के कारण बाजी मार सकती है।
‘Parasakthi’ को U/A सर्टिफिकेट मिलना अभिव्यक्ति की आजादी की एक छोटी जीत है। एक ऐसे दौर में जब ऐतिहासिक और राजनीतिक विषयों पर फिल्में बनाना मुश्किल होता जा रहा है, सुधा कोंगरा और शिवकार्तिकेयन ने एक जोखिम भरा कदम उठाया है।
10 जनवरी को जब यह फिल्म रिलीज होगी, तो यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या आज की पीढ़ी 1965 के उस संघर्ष को महसूस कर पाती है जिसने तमिलनाडु की पहचान को हमेशा के लिए बदल दिया था।
