उत्तराखंड की शांत वादियों में हुए एक जघन्य अपराध ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था। अंकिता भंडारी, एक 19 साल की युवती, जो अपने सपनों को पूरा करने के लिए घर से निकली थी, वह सिस्टम और सत्ता के नशे में चूर दरिंदों का शिकार बन गई। आज एक बार फिर यह मामला सुर्खियों में है। अंकिता भंडारी हत्याकांड में अब एक नया और निर्णायक मोड़ आ गया है। जनता के भारी दबाव और विपक्ष के तीखे हमलों के बाद, मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की सरकार ने आखिरकार इस मामले की CBI जांच की सिफारिश कर दी है।
लेकिन सबसे बड़ा सवाल अभी भी वही है—आखिर वह VVIP कौन है, जिसके लिए अंकिता पर ‘स्पेशल सर्विस’ देने का दबाव बनाया जा रहा था?
अंकिता भंडारी हत्याकांड: एक दर्दनाक फ्लैशबैक
इस केस की गहराई में जाने से पहले, यह समझना जरूरी है कि आखिर हुआ क्या था। पौड़ी गढ़वाल की रहने वाली अंकिता भंडारी ऋषिकेश के वनंतरा रिसॉर्ट में रिसेप्शनिस्ट के तौर पर काम करती थी। यह रिसॉर्ट पुलकित आर्य का था, जो पूर्व भाजपा नेता का बेटा है।
अंकिता अचानक गायब हो गई, और जब उसकी तलाश शुरू हुई, तो एक खौफनाक सच सामने आया। पुलिस जांच में पता चला कि पुलकित आर्य और उसके साथियों ने अंकिता को चीला नहर में धक्का देकर मार डाला था। हत्या का कारण? अंकिता ने रिसॉर्ट में आने वाले एक VVIP मेहमान को ‘स्पेशल सर्विस’ (जिसका मतलब अनैतिक देह व्यापार था) देने से साफ इनकार कर दिया था।
अपनी स्वाभिमान की रक्षा के लिए जान दे दी, लेकिन अपने पीछे कई सवाल छोड़ गई। अंकिता भंडारी को न्याय दिलाने की मांग पूरे देश में गूंज उठी।

स्पेशल सर्विस और रहस्यमयी VVIP का सच
इस पूरे केस की धुरी एक ही शब्द पर टिकी है—‘स्पेशल सर्विस’। अंकिता की अपने दोस्त के साथ हुई व्हाट्सएप चैट वायरल हुई थी, जिसमें उसने साफ तौर पर लिखा था कि रिसॉर्ट का मालिक उस पर किसी मेहमान को ‘एक्स्ट्रा सर्विस’ देने का दबाव बना रहा है। उसने लिखा था, “मैं यहां गलत काम करने नहीं आई हूं।”
जनता और अंकिता के माता-पिता शुरू से ही यह सवाल पूछ रहे हैं कि आखिर वह VVIP कौन था?
- क्या वह कोई बड़ा राजनेता था?
- क्या वह कोई वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी था?
- या फिर वह कोई बड़ा कारोबारी था जिसके रसूख के आगे सिस्टम नतमस्तक था?
हैरानी की बात यह है कि पुलिस की एसआईटी (SIT) जांच ने चार्जशीट दाखिल की, आरोपियों को गिरफ्तार किया, लेकिन इस VVIP का नाम कभी आधिकारिक तौर पर सामने नहीं आया। यह संदेह पैदा करता है कि क्या जांच एजेंसी किसी बड़े नाम को बचाने की कोशिश कर रही थी?
धामी सरकार का यू-टर्न: अब CBI जांच क्यों?
शुरुआत में, उत्तराखंड पुलिस और सरकार का कहना था कि एसआईटी (SIT) बहुत अच्छा काम कर रही है और CBI जांच की कोई जरूरत नहीं है। नैनीताल हाईकोर्ट ने भी एसआईटी जांच पर भरोसा जताया था। लेकिन अब अचानक धामी सरकार ने सीबीआई जांच की सिफारिश करने का फैसला क्यों किया? इसके पीछे कई बड़े कारण हो सकते हैं:
- जनता का आक्रोश: उत्तराखंड की जनता, खासकर महिलाएं और युवा, सड़कों पर उतर आए थे। “अंकिता हम शर्मिंदा हैं, तेरे कातिल जिंदा हैं” के नारों ने सरकार की नींद उड़ा दी थी।
- चुनावी दबाव: आगामी चुनावों को देखते हुए सरकार किसी भी तरह की ‘एंटी-इनकंबेंसी’ या नाराजगी मोल नहीं लेना चाहती।
- विपक्ष का हमला: विपक्षी दलों ने इसे एक बड़ा मुद्दा बना दिया था और सरकार पर VVIP को बचाने का आरोप लगा रहे थे।
- न्याय की गुहार: अंकिता के माता-पिता लगातार धरने पर बैठे थे और उन्होंने कसम खाई थी कि जब तक सीबीआई जांच नहीं होती, वे चुप नहीं बैठेंगे।
सरकार का यह कदम देर से लिया गया सही फैसला माना जा सकता है, लेकिन क्या अब बहुत देर हो चुकी है? क्या सबूत अब भी सुरक्षित हैं?

सबूत मिटाने की साजिश: रिसॉर्ट पर बुलडोजर
इस केस का सबसे विवादास्पद पहलू वनंतरा रिसॉर्ट पर रातों-रात चला बुलडोजर था। अंकिता का शव मिलने के तुरंत बाद, प्रशासन ने जल्दबाजी में रिसॉर्ट के उस हिस्से को तोड़ दिया जहां अंकिता रहती थी।
प्रशासन ने इसे ‘त्वरित कार्रवाई’ और ‘गुस्सा’ बताया, लेकिन कानूनी जानकारों और जनता का मानना है कि यह सबूत मिटाने की साजिश थी।
- जिस कमरे में अंकिता रहती थी, वहां फिंगरप्रिंट्स हो सकते थे।
- वहां VVIP के आने के सबूत हो सकते थे।
- वहां डायरी या अन्य दस्तावेज हो सकते थे।
बुलडोजर की कार्रवाई ने जांच को कमजोर कर दिया। अब CBI जांच के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि नष्ट हो चुके सबूतों को कैसे फिर से जोड़ा जाए। क्या फॉरेंसिक टीम उस मलबे से सच निकाल पाएगी?
आरोपी पुलकित आर्य और उसका रसूख
मुख्य आरोपी पुलकित आर्य कोई साधारण अपराधी नहीं है। उसके पिता विनोद आर्य भाजपा के वरिष्ठ नेता थे और उन्हें राज्यमंत्री का दर्जा प्राप्त था (घटना के बाद उन्हें पार्टी से निकाल दिया गया)।
पुलकित की मानसिकता और उसका व्यवहार शुरू से ही संदिग्ध था। रिसॉर्ट के पूर्व कर्मचारियों ने भी खुलासा किया है कि रिसॉर्ट में अनैतिक गतिविधियां होती थीं और लड़कियों पर दबाव बनाया जाता था। अंकिता भंडारी हत्याकांड ने यह दिखा दिया कि कैसे रसूखदार लोग सत्ता की हनक में किसी की भी जान ले सकते हैं और उन्हें लगता है कि कानून उनका कुछ नहीं बिगाड़ पाएगा।
व्हाट्सएप चैट और डिजिटल सबूत
इस केस में सबसे अहम सबूत अंकिता का मोबाइल फोन और उसकी व्हाट्सएप चैट हैं। हालांकि, अंकिता का फोन नहर में फेंक दिया गया था और काफी मशक्कत के बाद बरामद हुआ। लेकिन क्या डेटा रिकवर हो पाया?
अंकिता ने अपने दोस्त को जो मैसेज भेजे थे, वे VVIP की पहचान का सबसे बड़ा सुराग हैं।
- उसने कहा था कि एक मेहमान सोमवार को आने वाला है।
- उस मेहमान के लिए ‘स्पेशल सर्विस’ की मांग की गई थी।
- पुलकित ने उसे 10,000 रुपये का लालच भी दिया था।
अगर सीबीआई इन डिजिटल सबूतों की गहराई से जांच करती है और उस दिन की लोकेशन ट्रेस करती है, तो उस रहस्यमयी मेहमान का चेहरा बेनकाब हो सकता है।
नार्को टेस्ट पर भी सस्पेंस
एसआईटी ने आरोपियों के नार्को टेस्ट की मांग की थी, लेकिन आरोपियों ने इसे कानूनी दांव-पेच में उलझा दिया। पुलकित आर्य ने नार्को टेस्ट के लिए शर्त रखी कि मीडिया मौजूद रहे और वीडियोग्राफी हो। यह स्पष्ट है कि आरोपी जांच को गुमराह करने और देरी करने की कोशिश कर रहे हैं।
अब जब मामला CBI जांच के दायरे में जाएगा, तो उम्मीद है कि केंद्रीय एजेंसी कोर्ट से सख्त अनुमति लेकर आरोपियों का नार्को टेस्ट करवाएगी। नार्को टेस्ट में ही वह सच सामने आ सकता है जो अब तक इन दरिंदों के दिमाग में कैद है—खासकर VVIP का नाम।
उत्तराखंड की बेटियों की सुरक्षा का सवाल
यह मामला सिर्फ एक हत्या का नहीं है, बल्कि यह देवभूमि उत्तराखंड में काम करने वाली हजारों बेटियों की सुरक्षा का है। पर्यटन और होटल इंडस्ट्री उत्तराखंड की रीढ़ है। हजारों लड़कियां होटलों और रिसॉर्ट्स में काम करती हैं।
अंकिता भंडारी केस ने इन लड़कियों के मन में डर पैदा कर दिया है।
- क्या कार्यस्थल पर महिलाएं सुरक्षित हैं?
- क्या होटल मालिक अपने कर्मचारियों को ‘संपत्ति’ समझते हैं?
- क्या सरकार के पास इन रिसॉर्ट्स की निगरानी के लिए कोई तंत्र है?
इस घटना के बाद सरकार ने सभी रिसॉर्ट्स की जांच के आदेश दिए थे, लेकिन वह सिर्फ एक खानापूर्ति बनकर रह गई। एक ठोस नीति और सख्त कानून की जरूरत है ताकि भविष्य में कोई और अंकिता दरिंदों का शिकार न बने।
न्याय की लंबी लड़ाई: माता-पिता का दर्द
अंकिता के माता-पिता का दर्द शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता। उन्होंने अपनी फूल सी बेटी को खो दिया। वे पिछले कई महीनों से दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं। कभी धरने पर बैठते हैं, तो कभी अदालतों के चक्कर काटते हैं।
उनका एक ही सवाल है—”मेरी बेटी के गुनहगारों को फांसी कब मिलेगी?” और “उस VVIP का नाम बताओ जिसकी वजह से मेरी बेटी मरी।” धामी सरकार द्वारा CBI जांच की सिफारिश उनके संघर्ष की पहली जीत है, लेकिन असली जीत तब होगी जब उस VVIP के हाथों में हथकड़ी होगी।
सीबीआई के सामने चुनौतियां
भले ही सीबीआई जांच की सिफारिश हो गई हो, लेकिन सीबीआई के लिए भी यह राह आसान नहीं होगी।
- समय का अंतराल: घटना को काफी समय बीत चुका है। क्राइम सीन से छेड़छाड़ हो चुकी है।
- गवाहों का पलटना: इस तरह के हाई-प्रोफाइल मामलों में अक्सर गवाहों को डराया-धमकाया जाता है या खरीद लिया जाता है।
- राजनीतिक दबाव: क्या सीबीआई बिना किसी दबाव के उस VVIP तक पहुंच पाएगी जो शायद सत्ता के गलियारों में बैठा हो?
सीबीआई को अपनी साख बचाने और अंकिता को न्याय दिलाने के लिए निष्पक्षता और तेजी से काम करना होगा।
सोशल मीडिया और जन-आंदोलन की भूमिका
इस पूरे मामले को जीवित रखने में सोशल मीडिया और जनता ने अहम भूमिका निभाई है। #JusticeForAnkita ट्रेंड ने सरकार को चैन से बैठने नहीं दिया। यू-ट्यूबर्स, सोशल एक्टिविस्ट और आम जनता ने मुख्यधारा की मीडिया से भी ज्यादा इस मुद्दे को उठाया।
यह साबित करता है कि लोकतंत्र में अगर जनता जागृत हो, तो बड़ी से बड़ी सरकार को झुकना पड़ता है। अंकिता भंडारी केस में सीबीआई जांच की सिफारिश यह दर्शाती है कि जन-आंदोलन कभी बेकार नहीं जाता।
अंकिता भंडारी केस
अंकिता भंडारी अब हमारे बीच नहीं है, लेकिन उसकी आवाज आज भी न्याय मांग रही है। धामी सरकार द्वारा CBI जांच की सिफारिश एक स्वागत योग्य कदम है, लेकिन यह अंत नहीं, शुरुआत है। अब नजरें सीबीआई पर होंगी कि वह कितनी जल्दी दूध का दूध और पानी का पानी करती है।
वह VVIP कौन है—यह सवाल आज भी यक्ष प्रश्न बना हुआ है। जब तक उस “सफेदपोश” अपराधी का चेहरा बेनकाब नहीं होता, तब तक अंकिता की आत्मा को शांति नहीं मिलेगी। यह लड़ाई सिर्फ एक परिवार की नहीं, बल्कि पूरे समाज की है, ताकि देवभूमि फिर से शर्मसार न हो।
