ईरान की गलियों में गूंजा ‘डेथ टू डिक्टेटर’: 21 प्रांतों तक फैली बगावत की चिंगारी

ईरान, जो अपनी प्राचीन सभ्यता और समृद्ध संस्कृति के लिए जाना जाता है, आज एक बार फिर इतिहास के सबसे कठिन चौराहे पर खड़ा है। तेहरान की तंग गलियों से लेकर मशहद और इस्फ़हान के विशाल चौराहों तक, आज एक ही गूंज सुनाई दे रही है— ‘मर्ग बर डिक्टेटर’ (Death to Dictator)। यह नारा केवल एक राजनीतिक विरोध नहीं है, बल्कि यह उस संचित आक्रोश की अभिव्यक्ति है जो दशकों से दमन, आर्थिक बदहाली और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अभाव के कारण पनप रहा था। देखते ही देखते, यह विरोध प्रदर्शन ईरान के 21 से अधिक प्रांतों में फैल चुका है, जिसे विश्लेषक ‘ईरानी शासन के लिए अब तक की सबसे बड़ी चुनौती’ मान रहे हैं।

ईरान की गलियों में गूंजा ‘डेथ टू डिक्टेटर’: 21 प्रांतों तक फैली बगावत की चिंगारी

1. बगावत की चिंगारी: क्या है ताजा विरोध का कारण?

ईरान में विरोध प्रदर्शनों का इतिहास पुराना है, लेकिन 2026 की यह बगावत कई मायनों में अलग है। इसकी तात्कालिक वजहें निम्नलिखित हैं:

  • आर्थिक बदहाली और महंगाई: ईरान की मुद्रा ‘रियाल’ अपने ऐतिहासिक निचले स्तर पर है। खाने-पीने की चीजों के दाम आसमान छू रहे हैं। मध्यम वर्ग पूरी तरह से खत्म हो रहा है, जिससे आम जनता के पास खोने के लिए कुछ नहीं बचा है।
  • सख्त सामाजिक प्रतिबंध: मोरलिटी पुलिस की सख्ती और व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर पहरे ने युवाओं, विशेषकर महिलाओं को सड़कों पर उतरने के लिए मजबूर कर दिया है।
  • भ्रष्टाचार का आरोप: प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि देश की संपत्ति का एक बड़ा हिस्सा विदेशी मिलिशिया समूहों और परमाणु कार्यक्रमों पर खर्च किया जा रहा है, जबकि आम ईरानी भूख से मर रहा है।

2. 21 प्रांतों का आक्रोश: एक राष्ट्रीय विद्रोह

शुरुआत में यह विरोध प्रदर्शन छोटे समूहों तक सीमित था, लेकिन अब यह एक राष्ट्रीय आंदोलन बन चुका है।

  • छात्रों की भूमिका: तेहरान विश्वविद्यालय और अन्य प्रमुख शैक्षणिक संस्थानों के छात्र इस आंदोलन के केंद्र में हैं। वे क्लास का बहिष्कार कर रहे हैं और शासन विरोधी नारों के साथ मार्च निकाल रहे हैं।
  • श्रमिक वर्ग का साथ: तेल क्षेत्रों और कारखानों के श्रमिकों ने हड़ताल शुरू कर दी है। ईरान की अर्थव्यवस्था काफी हद तक तेल पर निर्भर है, और इन हड़तालों ने शासन की कमर तोड़ दी है।
  • विविधता: इस बार के प्रदर्शनों में जातीय सीमाएं टूट गई हैं। कुर्द, बलूच और अजेरी समुदाय एक साथ आकर शासन के खिलाफ खड़े हैं।
ईरान की गलियों में गूंजा ‘डेथ टू डिक्टेटर’: 21 प्रांतों तक फैली बगावत की चिंगारी

3. ‘डेथ टू डिक्टेटर’: नारे के पीछे का मनोविज्ञान

ईरान में ‘डिक्टेटर’ शब्द सीधे तौर पर सर्वोच्च नेता (Supreme Leader) को संबोधित करने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है।

  • सत्ता को चुनौती: दशकों तक सर्वोच्च नेता की आलोचना करना मौत को दावत देने जैसा था। लेकिन आज, दीवारें इन नारों से पटी पड़ी हैं। यह संकेत देता है कि जनता का डर अब खत्म हो चुका है।
  • व्यवस्था में बदलाव की मांग: प्रदर्शनकारी केवल सुधार (Reform) नहीं चाहते, वे व्यवस्था परिवर्तन (Regime Change) की मांग कर रहे हैं। उनका मानना है कि वर्तमान धार्मिक तंत्र (Theocracy) आधुनिक दुनिया और उनकी जरूरतों के साथ तालमेल नहीं बिठा सकता।

4. सरकार की प्रतिक्रिया: दमन और इंटरनेट ब्लैकआउट

ईरानी सुरक्षा बलों ने हमेशा की तरह इस बार भी सख्त रुख अपनाया है।

  • बल प्रयोग: आंसू गैस, रबर की गोलियों और कई जगहों पर सीधे गोलीबारी की खबरें आ रही हैं। मानवाधिकार संगठनों के अनुसार, मरने वालों और गिरफ्तार होने वालों की संख्या तेजी से बढ़ रही है।
  • डिजिटल सेंसरशिप: विरोध को दबाने के लिए सरकार ने इंटरनेट को पूरी तरह से बंद कर दिया है या गति बेहद कम कर दी है। व्हाट्सएप और इंस्टाग्राम जैसे प्लेटफॉर्म ब्लॉक कर दिए गए हैं ताकि प्रदर्शनकारी आपस में समन्वय न कर सकें।
  • विदेशी साजिश का आरोप: ईरानी नेतृत्व इन प्रदर्शनों को अमेरिका और इजरायल की साजिश बता रहा है, जबकि प्रदर्शनकारियों का कहना है कि यह उनकी अपनी आवाज है।

5. वैश्विक प्रभाव और कूटनीतिक दबाव

ईरान की आंतरिक अस्थिरता का प्रभाव पूरी दुनिया पर पड़ रहा है।

  • तेल बाजार: ईरान दुनिया के प्रमुख तेल उत्पादकों में से एक है। वहां की अशांति अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों को प्रभावित कर सकती है।
  • मानवाधिकार चिंताएं: संयुक्त राष्ट्र और कई यूरोपीय देशों ने प्रदर्शनकारियों पर हो रहे जुल्म की निंदा की है। ईरान पर नए आर्थिक प्रतिबंध लगाने की मांग उठ रही है।
  • क्षेत्रीय सुरक्षा: अगर ईरान में सत्ता परिवर्तन होता है या अस्थिरता बढ़ती है, तो इसका असर लेबनान, सीरिया और इराक जैसे देशों पर भी पड़ेगा जहां ईरान का गहरा प्रभाव है।

6. निष्कर्ष: क्या यह ईरान की नई सुबह है?

ईरान की गलियों में गूंजते नारे और 21 प्रांतों में फैली यह चिंगारी यह स्पष्ट करती है कि दमन के जरिए आवाज को दबाने की एक सीमा होती है। चाहे नतीजा जो भी हो, लेकिन एक बात साफ है कि ईरानी समाज अब बदल चुका है। नई पीढ़ी अपनी आवाज बुलंद करना जानती है।

ईरान का भविष्य अब इस बात पर निर्भर करेगा कि शासन जनता की मांगों को सुनता है या फिर दमन के रास्ते पर आगे बढ़ता है। इतिहास गवाह है कि जब जनता सड़कों पर उतर आती है, तो बड़े-बड़े सिंहासन हिल जाते हैं।

लेखक की राय: यह समय ईरान के लिए बेहद संवेदनशील है। दुनिया भर की नजरें तेहरान पर टिकी हैं। क्या यह ‘अरब स्प्रिंग’ की तरह कोई बड़ी क्रांति साबित होगा या शासन इसे दबाने में कामयाब होगा, यह आने वाले कुछ हफ्तों में स्पष्ट हो जाएगा।

By Isha Patel

Isha Patel Tez Khabri के साथ जुड़ी एक समाचार रिपोर्टर हैं। वे भारत और राज्यों से जुड़ी ताज़ा, ब्रेकिंग और जनहित से संबंधित खबरों को कवर करती हैं। Isha Patel शिक्षा, प्रशासन, सामाजिक मुद्दों और स्थानीय घटनाओं पर सत्यापित व तथ्यात्मक रिपोर्टिंग करती हैं।

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