भारत की सीमाओं की सुरक्षा और मुश्किल भौगोलिक क्षेत्रों में सैन्य ऑपरेशन्स को और अधिक सटीक बनाने के लिए भारतीय वायुसेना (IAF) ने ‘मानवरहित नवाचारों’ (Unmanned Innovations) की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया है। अप्रैल 2026 की नवीनतम अधिसूचना के अनुसार, रक्षा मंत्रालय ने वायुसेना की विशिष्ट Garud Special Forces के लिए कॉम्पैक्ट ‘माइक्रो यूएवी’ (Micro UAV) सिस्टम की खरीद के लिए ‘रिक्वेस्ट फॉर इंफॉर्मेशन’ (RFI) जारी कर दी है।
ये नए ड्रोन विशेष रूप से 16,400 फीट (लगभग 5,000 मीटर) तक की अत्यधिक ऊंचाई पर काम करने के लिए डिजाइन किए गए हैं। हिमालय की बर्फीली चोटियों और दुर्गम इलाकों में जहाँ ऑक्सीजन कम होती है और मौसम अनिश्चित रहता है, वहाँ ये मानवरहित विमान गरुड़ कमांडो के लिए ‘आसमान में तीसरी आंख’ का काम करेंगे। आइए जानते हैं कि इन Unmanned Innovations में ऐसा क्या खास है जो हमारी वायुसेना को दुनिया की सबसे आधुनिक सेनाओं की कतार में खड़ा कर देगा।
माइक्रो यूएवी सिस्टम: 16,400 फीट की ऊंचाई पर सटीक वार
इन नए ड्रोन्स की सबसे बड़ी खूबी इनकी ‘हाई-अल्टिट्यूड’ क्षमता है। अक्सर सामान्य ड्रोन पहाड़ों की ऊंचाई और वहां चलने वाली तेज हवाओं के सामने टिक नहीं पाते, लेकिन ये माइक्रो यूएवी सिस्टम निम्नलिखित तकनीकी खूबियों से लैस होंगे:
- ऑपरेशनल एल्टीट्यूड: ये 16,400 फीट तक की ऊंचाई पर न केवल उड़ान भर सकेंगे, बल्कि वहां से रीयल-टाइम डेटा भेजने में भी सक्षम होंगे।
- VTOL क्षमता: इनमें ‘वर्टिकल टेक-ऑफ एंड लैंडिंग’ (VTOL) की सुविधा होगी, जिसका मतलब है कि इन्हें लॉन्च करने के लिए किसी रनवे की जरूरत नहीं होगी—इन्हें एक छोटे से पहाड़ी हिस्से से भी उड़ाया जा सकेगा।
- डे-नाइट ऑपरेशन: उन्नत कैमरों और थर्मल सेंसर की मदद से ये रात के अंधेरे और खराब मौसम में भी दुश्मन की गतिविधियों को ट्रैक कर सकेंगे।

गरुड़ स्पेशल फोर्सेस की ताकत में होगा इजाफा
Garud Special Forces भारतीय वायुसेना की वह इकाई है जो एयरबेस की सुरक्षा और कठिन ऑपरेशन्स के लिए जानी जाती है। इन Unmanned Innovations के शामिल होने से कमांडो ऑपरेशन्स की रणनीति पूरी तरह बदल जाएगी:
- लोकल सर्विलांस: कमांडो अपने साथ इन्हें एक छोटे बैग में ले जा सकते हैं, जिससे वे मिशन के दौरान तुरंत आसपास की स्थिति का जायजा ले पाएंगे।
- सुरक्षित संचार: इन ड्रोन्स में एंटी-जैमिंग और सुरक्षित संचार तकनीक होगी, जिससे दुश्मन इनका डेटा हैक नहीं कर पाएगा।
- पोर्टेबिलिटी: ये ‘लाइटवेट और मैन-पोर्टेबल’ प्लेटफॉर्म हैं, यानी एक अकेला सैनिक इसे आसानी से ले जा सकता है और ऑपरेट कर सकता है।
स्वदेशी और ‘मेक-इन-इंडिया’ का नया अध्याय
यह प्रोजेक्ट पूरी तरह से ‘आत्मनिर्भर भारत’ और ‘मेक-इन-इंडिया’ (Make-I) विजन के अनुरूप है। सरकार ने स्पष्ट किया है कि इन माइक्रो यूएवी का निर्माण भारतीय वेंडर्स, स्टार्टअप्स और MSMEs द्वारा किया जाएगा।

- कम लागत: स्वदेशी होने के कारण इनकी मरम्मत और रखरखाव विदेशों से मंगाए गए ड्रोन्स की तुलना में काफी सस्ता होगा।
- कस्टमाइजेशन: भारतीय कंपनियां इन्हें भारत की विशिष्ट जलवायु परिस्थितियों (जैसे लद्दाख की ठंड और राजस्थान की गर्मी) के अनुसार ढाल सकेंगी।
अनमैन्ड कॉम्बैट सर्च एंड रेस्क्यू (CSAR) की तैयारी
इन माइक्रो ड्रोन्स के अलावा, वायुसेना एक और क्रांतिकारी Unmanned Innovation पर काम कर रही है—’अनमैन्ड कॉम्बैट सर्च एंड रेस्क्यू’ (CSAR) एयरक्राफ्ट।
- इस ड्रोन का उपयोग युद्ध क्षेत्र में फंसे पायलटों या सैनिकों को सुरक्षित निकालने के लिए किया जाएगा।
- यह बिना किसी मानवीय पायलट के, खतरनाक इलाकों में जाकर रसद (Logistics) पहुँचाने और घायल सैनिकों को लाने में सक्षम होगा, जिससे बचाव मिशन में मानवीय जान का जोखिम कम हो जाएगा।
हाई-अल्टिट्यूड सूडो-सैटेलाइट्स (HAPS): आसमान में महीनों का पहरा
भविष्य की तैयारियों को देखते हुए, वायुसेना ‘हाई-अल्टिट्यूड सूडो-सैटेलाइट्स’ (HAPS) को भी अपनाने जा रही है।
- ये सौर ऊर्जा से चलने वाले ड्रोन होंगे जो 20 किलोमीटर की ऊंचाई पर महीनों तक उड़ते रह सकते हैं।
- ये सामान्य सैटेलाइट्स की तुलना में बहुत सस्ते होंगे और किसी विशेष क्षेत्र पर लगातार नजर रखने के लिए ‘स्टेशनरी टावर’ की तरह काम करेंगे।
सुरक्षित सीमाओं के लिए मानवरहित भविष्य
निष्कर्ष के तौर पर, Unmanned Innovations भारतीय वायुसेना को एक ऐसी डिजिटल और तकनीकी शक्ति दे रहे हैं, जहाँ दुश्मन का हर कदम हमारी नजर में होगा। 16,400 फीट की ऊंचाई पर माइक्रो यूएवी का तैनात होना न केवल गरुड़ कमांडो की सुरक्षा सुनिश्चित करेगा, बल्कि सीमाओं पर होने वाली घुसपैठ को भी शून्य पर ले आएगा। भारत अब केवल हथियार खरीदने वाला देश नहीं, बल्कि अत्याधुनिक मानवरहित प्रणालियों का निर्माता बनने की ओर अग्रसर है।
Unmanned Innovations FAQ:
वायुसेना के नए माइक्रो यूएवी की ऊंचाई सीमा क्या है?
ये ड्रोन 16,400 फीट (5,000 मीटर) की ऊंचाई पर सफलतापूर्वक काम करने के लिए डिजाइन किए गए हैं।
क्या इन ड्रोन्स को कोई भी सैनिक चला सकता है?
हाँ, ये ‘मैन-पोर्टेबल’ और उपयोग में आसान (User-friendly) हैं, जिससे गरुड़ कमांडो इन्हें युद्ध क्षेत्र में आसानी से ऑपरेट कर पाएंगे।
क्या ये ड्रोन पूरी तरह भारतीय हैं?
जी हाँ, सरकार की योजना के अनुसार इन्हें 50% से अधिक स्वदेशी पुर्जों के साथ ‘मेक-इन-इंडिया’ पहल के तहत भारतीय कंपनियों द्वारा विकसित किया जा रहा है।

भावेश Tez Khabri के सह-संस्थापक और प्रबंध संपादक हैं। अभिनय के क्षेत्र में अपनी पहचान बनाने के बाद, अब वे पत्रकारिता के माध्यम से समाज में पारदर्शिता लाने का प्रयास कर रहे हैं। भावेश जी मुख्य रूप से राजनीति, क्राइम और शिक्षा से जुड़ी खबरों का नेतृत्व करते हैं और सुनिश्चित करते हैं कि हर खबर पूरी तरह से सत्यापित (Verified) हो।
