योवेरी मुसेवेनी युगांडा राष्ट्रपति

अफ्रीकी महाद्वीप की राजनीति हमेशा से ही दुनिया भर के राजनीतिक पंडितों के लिए चर्चा का विषय रही है। विशेष रूप से पूर्वी अफ्रीका का देश युगांडा, जो अपने जटिल इतिहास, संघर्षों और लंबे समय तक चलने वाले शासनों के लिए जाना जाता है। आज, 17 जनवरी 2026 को, इतिहास ने एक बार फिर खुद को दोहराया है। युगांडा के चुनाव आयोग ने आधिकारिक परिणामों की घोषणा कर दी है, और जिस बात के कयास लगाए जा रहे थे, वही हुआ है।

योवेरी मुसेवेनी सातवीं बार देश के राष्ट्रपति चुने गए

युगांडा की सत्ता पर फिर मुसेवेनी काबिज हो गए हैं। यह कोई साधारण जीत नहीं है; यह योवेरी मुसेवेनी का लगातार सातवां कार्यकाल है, जो उन्हें आधुनिक इतिहास में दुनिया के सबसे लंबे समय तक सेवा करने वाले नेताओं की सूची में और ऊपर ले जाता है।

1. 2026 का चुनाव: एकतरफा जीत या विवादित जनादेश?

युगांडा के चुनाव आयोग द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, 81 वर्षीय योवेरी मुसेवेनी ने अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी को भारी मतों के अंतर से हराया है। राष्ट्रीय प्रतिरोध आंदोलन (NRM) के नेता मुसेवेनी ने लगभग 59% वोट हासिल किए हैं। हालांकि, यह आंकड़ा उनके पिछले चुनावों की तुलना में थोड़ा कम हो सकता है, लेकिन सत्ता बनाए रखने के लिए यह पर्याप्त से अधिक है।

जैसे ही यह खबर फैली कि युगांडा की सत्ता पर फिर मुसेवेनी आ गए हैं, राजधानी कंपाला की सड़कों पर मिश्रित प्रतिक्रिया देखने को मिली। एक तरफ उनके समर्थक पीले कपड़े पहने (जो उनकी पार्टी का रंग है) जश्न मना रहे थे, तो दूसरी तरफ भारी सुरक्षा बलों की तैनाती के बीच सन्नाटा पसरा हुआ था। विपक्ष ने इन नतीजों को सिरे से खारिज कर दिया है। उनका आरोप है कि यह चुनाव “स्वतंत्र और निष्पक्ष” नहीं था। इंटरनेट शटडाउन, विपक्षी नेताओं की नजरबंदी और मतदान केंद्रों पर अनियमितताओं के आरोपों ने इस जीत पर सवालिया निशान लगा दिए हैं।

लेकिन मुसेवेनी के लिए, यह जीत उनके उस दावे की पुष्टि है कि युगांडा के लोग अभी भी “स्थिरता” को “अनिश्चित बदलाव” पर तरजीह देते हैं। अपने विजय भाषण में, मुसेवेनी ने इसे “शांति और प्रगति की जीत” बताया और विदेशी ताकतों को युगांडा के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करने की चेतावनी दी।

2. योवेरी मुसेवेनी: विद्रोही से लेकर ‘राष्ट्रपति फॉर लाइफ’ तक का सफर

यह समझने के लिए कि 2026 में भी युगांडा की सत्ता पर फिर मुसेवेनी कैसे बने हुए हैं, हमें इतिहास के पन्नों को पलटना होगा। योवेरी मुसेवेनी का उदय एक मुक्तिदाता के रूप में हुआ था। 1970 और 80 के दशक में युगांडा इदी अमीन और मिल्टन ओबोटे जैसे तानाशाहों के क्रूर शासन के अधीन था। अराजकता, मानवाधिकारों का हनन और आर्थिक पतन उस समय की पहचान थे।

मुसेवेनी ने राष्ट्रीय प्रतिरोध सेना (NRA) का गठन किया और एक लंबा गुरिल्ला युद्ध लड़ा। 1986 में, जब उन्होंने कंपाला पर कब्जा किया और सत्ता संभाली, तो उन्होंने वादा किया था कि यह “महज गार्ड का बदलना नहीं है, बल्कि एक मौलिक बदलाव है।” उस समय, पश्चिम ने उन्हें “अफ्रीकी नेताओं की नई नस्ल” के रूप में देखा था।

शुरुआती वर्षों में, मुसेवेनी ने वास्तव में देश को स्थिर किया। उन्होंने एचआईवी/एड्स महामारी के खिलाफ एक सफल अभियान चलाया, अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाया और देश में शांति बहाल की। लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता गया, “मुक्तिदाता” की छवि “सत्तावादी शासक” में बदलने लगी। 1996 में पहले प्रत्यक्ष चुनाव हुए, जिसे उन्होंने जीता। इसके बाद 2001, 2006, 2011, 2016, 2021 और अब 2026 में भी जीत हासिल की।

3. संविधान में संशोधन: सत्ता में बने रहने की कुंजी

मुसेवेनी के इतने लंबे समय तक सत्ता में बने रहने का एक बड़ा कारण युगांडा के संविधान में किए गए सुनियोजित बदलाव हैं। जब 1995 में नया संविधान बनाया गया था, तो उसमें राष्ट्रपति पद के लिए दो कार्यकाल की सीमा तय की गई थी।

  • 2005 का संशोधन: अपने दूसरे कार्यकाल के अंत के करीब, मुसेवेनी ने संसद के माध्यम से कार्यकाल की सीमा (Term Limits) को समाप्त करवा दिया। इसने उन्हें 2006 और उसके बाद के चुनावों में खड़े होने की अनुमति दी। आलोचकों का कहना था कि सांसदों को इसके लिए रिश्वत दी गई थी।
  • 2017 का संशोधन: जैसे-जैसे मुसेवेनी की उम्र बढ़ रही थी, संविधान में 75 वर्ष की आयु सीमा एक बाधा बन रही थी। 2017 में, एक अत्यधिक विवादास्पद और हिंसक संसदीय सत्र के बाद, आयु सीमा (Age Limit) को भी हटा दिया गया।

इन दो प्रमुख संशोधनों ने यह सुनिश्चित कर दिया कि कानूनी रूप से मुसेवेनी जब तक चाहें, राष्ट्रपति बने रह सकते हैं। यही कारण है कि आज हम देख रहे हैं कि युगांडा की सत्ता पर फिर मुसेवेनी काबिज हैं। विपक्ष का आरोप है कि संविधान को एक व्यक्ति की महत्वाकांक्षाओं के अनुरूप बार-बार बदला गया है।

4. 2026 के चुनाव में विपक्ष की चुनौतियां

इस बार के चुनाव में विपक्ष का चेहरा मुख्य रूप से युवा नेता बॉबी वाइन (रॉबर्ट क्यागुलानी) और उनकी पार्टी नेशनल यूनिटी प्लेटफॉर्म (NUP) थी। पॉप स्टार से राजनेता बने बॉबी वाइन ने युगांडा के युवाओं की हताशा को आवाज दी है। युगांडा की 75% से अधिक आबादी 30 वर्ष से कम उम्र की है। इनमें से अधिकांश ने मुसेवेनी के अलावा किसी और राष्ट्रपति को नहीं देखा है। इन्हें “मुसेवेनी बेबीज” कहा जाता है।

बॉबी वाइन का अभियान “तानाशाही को उखाड़ फेंकने” और “नया युगांडा” बनाने पर केंद्रित था। लेकिन उन्हें भारी दमन का सामना करना पड़ा। चुनाव प्रचार के दौरान उनकी रैलियों को रोका गया, उनके समर्थकों को गिरफ्तार किया गया और उन पर कई बार शारीरिक हमले भी हुए।

विपक्ष के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि मुसेवेनी के पास राज्य के संसाधनों, सेना और पुलिस का पूरा नियंत्रण था। मीडिया पर सरकारी पकड़ मजबूत थी, और ग्रामीण क्षेत्रों में, जहां मुसेवेनी का समर्थन अभी भी मजबूत है, विपक्ष अपनी पैठ बनाने में संघर्ष कर रहा था। ग्रामीण मतदाता अभी भी मुसेवेनी को शांति के मसीहा के रूप में देखते हैं और उन्हें डर है कि उनके जाने से देश में फिर से गृहयुद्ध छिड़ सकता है। मुसेवेनी ने इस डर का बखूबी इस्तेमाल किया।

5. चुनाव के दौरान इंटरनेट और मीडिया पर प्रतिबंध

आधुनिक चुनावों में सोशल मीडिया एक बड़ी भूमिका निभाता है। 2026 के चुनाव से ठीक पहले और मतदान के दौरान, युगांडा में इंटरनेट सेवाओं को गंभीर रूप से बाधित किया गया था। सरकार का तर्क था कि यह “राष्ट्रीय सुरक्षा” और “गलत सूचना को रोकने” के लिए जरूरी है।

फेसबुक, ट्विटर (X), और व्हाट्सएप जैसे प्लेटफॉर्म महीनों से ब्लॉक या प्रतिबंधित थे। मतदान के दिन पूर्ण इंटरनेट शटडाउन ने पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए। चुनाव पर्यवेक्षकों को भी कई केंद्रों तक पहुंचने से रोका गया।

जब सूचना का प्रवाह रुक जाता है, तो अफवाहें फैलती हैं और सत्ताधारी दल के लिए अपने आख्यान (Narrative) को नियंत्रित करना आसान हो जाता है। अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों ने इसे “अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला” करार दिया। लेकिन इन आलोचनाओं का मुसेवेनी पर कोई असर नहीं पड़ा। परिणाम वही रहा—युगांडा की सत्ता पर फिर मुसेवेनी

6. पश्चिमी देशों की दुविधा

अमेरिका और यूरोपीय संघ जैसे पश्चिमी देशों के लिए युगांडा एक कूटनीतिक पहेली बना हुआ है। एक तरफ, वे मुसेवेनी के मानवाधिकार रिकॉर्ड, लोकतंत्र के क्षरण और समलैंगिक विरोधी कानूनों की कड़ी आलोचना करते हैं। दूसरी तरफ, मुसेवेनी पूर्वी अफ्रीका में पश्चिम के एक प्रमुख सुरक्षा सहयोगी हैं।

युगांडा की सेना सोमालिया में अल-शबाब के खिलाफ लड़ने वाले अफ्रीकी संघ मिशन (AMISOM/ATMIS) में सबसे बड़ा योगदानकर्ता है। मुसेवेनी ने खुद को क्षेत्र में स्थिरता के गारंटर के रूप में पेश किया है। दक्षिण सूडान और कांगो के संघर्षों में भी युगांडा की भूमिका महत्वपूर्ण है।

पश्चिमी देश डरते हैं कि यदि वे मुसेवेनी पर बहुत अधिक दबाव डालते हैं, तो क्षेत्र की सुरक्षा व्यवस्था चरमरा सकती है या युगांडा चीन और रूस की ओर और अधिक झुक सकता है। मुसेवेनी इस भू-राजनीतिक लाभ को अच्छी तरह समझते हैं। वह जानते हैं कि पश्चिम केवल बयानों तक सीमित रहेगा, लेकिन कोई ठोस प्रतिबंध नहीं लगाएगा। यही कारण है कि अंतरराष्ट्रीय आलोचनाओं के बावजूद, युगांडा की सत्ता पर फिर मुसेवेनी बने रहने में सफल रहे हैं।

7. युगांडा की अर्थव्यवस्था: विकास बनाम असमानता

मुसेवेनी के समर्थकों का तर्क है कि उनके शासन में युगांडा ने महत्वपूर्ण आर्थिक प्रगति की है। बुनियादी ढांचे का विकास हुआ है, सड़कें बनी हैं, और जलविद्युत परियोजनाओं का विस्तार हुआ है। हाल के वर्षों में तेल की खोज ने भी आर्थिक उम्मीदें बढ़ाई हैं।

हालांकि, आलोचकों का कहना है कि यह विकास असमान है।

  • बेरोजगारी: युवाओं में बेरोजगारी की दर बहुत अधिक है। शिक्षित युवाओं के पास नौकरी नहीं है, जो बॉबी वाइन जैसे नेताओं के प्रति उनके आकर्षण का मुख्य कारण है।
  • भ्रष्टाचार: मुसेवेनी के शासन में भ्रष्टाचार संस्थागत हो गया है। बड़े स्कैंडल और सार्वजनिक धन का गबन आम बात है, लेकिन उच्च पदस्थ अधिकारियों पर शायद ही कभी कार्रवाई होती है।
  • सार्वजनिक सेवाएं: स्वास्थ्य और शिक्षा क्षेत्र की स्थिति दयनीय है। सरकारी अस्पतालों में दवाओं की कमी है और स्कूलों में शिक्षकों का अभाव है।

मुसेवेनी का 2026 का चुनाव अभियान “भविष्य को सुरक्षित करने” (Securing the Future) के नारे पर था, जिसमें औद्योगीकरण और रोजगार सृजन का वादा किया गया था। लेकिन 40 साल सत्ता में रहने के बाद भी अगर ये समस्याएं बनी हुई हैं, तो क्या अगले 5 साल में कुछ बदलेगा? यह एक बड़ा सवाल है।

8. सेना की भूमिका: सत्ता का असली केंद्र

युगांडा की राजनीति में सेना (UPDF) की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। मुसेवेनी एक सैन्य पृष्ठभूमि से आते हैं और उन्होंने हमेशा सेना को अपने सत्ता के आधार के रूप में रखा है। सेना संसद में भी प्रतिनिधित्व करती है और नागरिक मामलों में उसका हस्तक्षेप बढ़ा है।

विपक्ष का आरोप है कि सेना अब देश की रक्षक नहीं, बल्कि मुसेवेनी के शासन की रक्षक बन गई है। चुनाव के दौरान, सड़कों पर बख्तरबंद गाड़ियों और सैनिकों की मौजूदगी ने मतदाताओं में भय का माहौल पैदा कर दिया। कई विश्लेषकों का मानना है कि युगांडा की सत्ता पर फिर मुसेवेनी के आने का असली कारण “बैलट” (मतपत्र) नहीं, बल्कि “बुलेट” (गोली) का डर है।

सेना के शीर्ष पदों पर मुसेवेनी के वफादार या उनके अपने जातीय समूह के लोग काबिज हैं। इससे सेना के भीतर भी विभाजन और असंतोष की खबरें आती रहती हैं, लेकिन मुसेवेनी ने अब तक इसे नियंत्रित रखा है।

9. उत्तराधिकार का सवाल: मुहूजी का प्रोजेक्ट?

81 वर्ष की आयु में सातवां कार्यकाल शुरू करते हुए, मुसेवेनी के सामने सबसे बड़ा प्रश्न उनके उत्तराधिकारी का है। युगांडा के राजनीतिक गलियारों में लंबे समय से यह चर्चा है कि मुसेवेनी अपने बेटे, जनरल मुहूजी कैनरुगाबा (Muhoozi Kainerugaba) को सत्ता सौंपने की तैयारी कर रहे हैं।

मुहूजी, जो सेना के शीर्ष जनरल रहे हैं, सोशल मीडिया पर बहुत सक्रिय हैं और अक्सर विवादास्पद बयान देते रहते हैं। उन्होंने “एमके मूवमेंट” (MK Movement) भी शुरू किया है, जिसे अब पैट्रियॉटिक लीग ऑफ युगांडा (PLU) कहा जाता है। कई लोगों का मानना है कि यह 2026 का कार्यकाल एक “संक्रमणकालीन कार्यकाल” (Transitional Term) हो सकता है, जिसके दौरान मुसेवेनी धीरे-धीरे अपने बेटे को कमान सौंपेंगे।

यदि ऐसा होता है, तो युगांडा एक गणतंत्र के बजाय एक वंशवादी शासन की ओर बढ़ सकता है। इसे लेकर मुसेवेनी की अपनी पार्टी (NRM) के पुराने नेताओं में भी असंतोष है। लेकिन फिलहाल, युगांडा की सत्ता पर फिर मुसेवेनी ही हैं और उत्तराधिकार की योजना अभी भी एक रहस्य बनी हुई है।

10. अफ्रीका में ‘लाइफ प्रेसिडेंट्स’ सिंड्रोम

योवेरी मुसेवेनी की जीत को अफ्रीकी राजनीति के व्यापक संदर्भ में देखा जाना चाहिए। अफ्रीका में कई नेता दशकों तक सत्ता में बने रहते हैं। कैमरून के पॉल बिया, इक्वेटोरियल गिनी के थियोडोरो ओबियंग और युगांडा के मुसेवेनी इस प्रवृत्ति के उदाहरण हैं।

यह “बिग मैन सिंड्रोम” महाद्वीप के लोकतांत्रिक विकास में बाधा डालता है। जब एक ही व्यक्ति दशकों तक सत्ता में रहता है, तो संस्थान कमजोर हो जाते हैं। न्यायपालिका, चुनाव आयोग और पुलिस स्वतंत्र रूप से कार्य करने के बजाय शासक के प्रति वफादार हो जाते हैं। 2026 में युगांडा का चुनाव इस बात का प्रमाण है कि चुनावों का उपयोग केवल तानाशाही को वैधता प्रदान करने के लिए किया जा रहा है।

युवा अफ्रीकी आबादी अब इस पुराने ढांचे को चुनौती दे रही है। केन्या, सेनेगल और जाम्बिया में हुए हालिया बदलाव बताते हैं कि लोकतंत्र अभी भी जीवित है। लेकिन युगांडा में, मुसेवेनी ने सफलतापूर्वक इस बदलाव की लहर को रोक दिया है।

11. आगे की राह: संघर्ष या स्थिरता?

अब जब परिणाम घोषित हो चुके हैं और युगांडा की सत्ता पर फिर मुसेवेनी काबिज हो गए हैं, तो आगे क्या होगा?

  • विपक्ष का कदम: बॉबी वाइन और अन्य विपक्षी दल संभवतः परिणामों को अदालत में चुनौती देंगे। लेकिन पिछली मिसालों को देखते हुए, अदालत से चुनाव रद्द करने की उम्मीद बहुत कम है। विपक्ष अब सड़कों पर विरोध प्रदर्शन (Civil Disobedience) का रास्ता अपना सकता है, जिससे टकराव और हिंसा का खतरा बढ़ सकता है।
  • अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध: क्या पश्चिमी देश इस बार कड़े प्रतिबंध लगाएंगे? लक्षित प्रतिबंधों (Targeted Sanctions) की संभावना है, जो मुसेवेनी के करीबी अधिकारियों पर लगाए जा सकते हैं, लेकिन व्यापक आर्थिक प्रतिबंधों की संभावना कम है क्योंकि इससे आम जनता प्रभावित होगी।
  • आंतरिक सुरक्षा: मुसेवेनी के लिए सबसे बड़ी चुनौती बढ़ती हुई युवा आबादी के गुस्से को शांत करना होगा। यदि अर्थव्यवस्था रोजगार पैदा नहीं कर पाती है, तो राजनीतिक स्थिरता बनाए रखना मुश्किल होगा।

12. मानवाधिकार संगठनों की रिपोर्ट

एमनेस्टी इंटरनेशनल और ह्यूमन राइट्स वॉच जैसी संस्थाओं ने चुनाव प्रक्रिया के दौरान हुए उल्लंघनों का विस्तृत दस्तावेजीकरण किया है। उनकी रिपोर्ट्स में अवैध हिरासत, यातना (Torture) और जबरन गुमशुदगी (Enforced Disappearances) के मामलों का जिक्र है।

खासकर नवंबर 2020 के दंगों, जिसमें 50 से अधिक लोग मारे गए थे, के बाद से सुरक्षा बलों का रवैया और अधिक आक्रामक हो गया है। 2026 के चुनाव में भी “ड्रोन्स” (बिना नंबर प्लेट वाली वैन) का इस्तेमाल करके विपक्षी समर्थकों को उठाने की खबरें आम रहीं। ये रिपोर्ट्स बताती हैं कि युगांडा की सत्ता पर फिर मुसेवेनी का आना केवल राजनीतिक जीत नहीं, बल्कि मानवाधिकारों की कीमत पर हासिल की गई सत्ता है।

13. क्षेत्रीय प्रभाव: पूर्वी अफ्रीकी समुदाय (EAC)

मुसेवेनी पूर्वी अफ्रीकी समुदाय के सबसे वरिष्ठ नेता हैं। उनकी जीत का मतलब है कि क्षेत्रीय एकीकरण और व्यापार नीतियों में उनकी आवाज सबसे प्रबल रहेगी। वह “ईस्ट अफ्रीकन फेडरेशन” के प्रबल समर्थक रहे हैं, जिसका उद्देश्य पूर्वी अफ्रीकी देशों को एक राजनीतिक संघ में बदलना है।

हालांकि, उनके पड़ोसी देशों, विशेष रूप से रवांडा और कांगो के साथ उनके संबंध उतार-चढ़ाव वाले रहे हैं। केन्या के साथ व्यापारिक विवाद भी उभरते रहे हैं। मुसेवेनी के सत्ता में बने रहने से क्षेत्रीय भू-राजनीति में यथास्थिति (Status Quo) बनी रहेगी, लेकिन पड़ोसी देशों के युवा नेताओं के साथ उनका तालमेल कैसा रहेगा, यह देखने वाली बात होगी।

14. भारत और युगांडा के संबंध

भारत के लिए, युगांडा एक महत्वपूर्ण भागीदार है। युगांडा में भारतीय मूल का एक बड़ा और प्रभावशाली समुदाय रहता है जो वहां की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान देता है। मुसेवेनी ने हमेशा भारतीय समुदाय का समर्थन किया है और इदी अमीन द्वारा उन्हें निकाले जाने की ऐतिहासिक गलती को सुधारा है।

भारत के लिए युगांडा की सत्ता पर फिर मुसेवेनी का आना कूटनीतिक रूप से सकारात्मक माना जा सकता है क्योंकि उनके साथ भारत के संबंध स्थिर और मैत्रीपूर्ण रहे हैं। व्यापार, निवेश और विकास सहयोग के मामले में दोनों देशों के बीच निरंतरता बनी रहेगी।

15. एक युग का जारी रहना

अंत में, 17 जनवरी 2026 का दिन युगांडा के इतिहास में एक और अध्याय जोड़ गया है। योवेरी मुसेवेनी, जिन्होंने 1986 में एक युवा क्रांतिकारी के रूप में सत्ता संभाली थी, अब एक बुजुर्ग राजनेता के रूप में अपनी पकड़ मजबूत कर चुके हैं।

यह जीत उनके समर्थकों के लिए स्थिरता और निरंतरता का प्रतीक है, जो मानते हैं कि केवल मुसेवेनी ही युगांडा को एकजुट रख सकते हैं। वहीं, उनके विरोधियों के लिए, यह लोकतंत्र की मृत्यु और एक परिवार के शासन को थोपने जैसा है।

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