खेल की दुनिया में अक्सर कहा जाता है कि “इतिहास विजेताओं द्वारा लिखा जाता है।” स्कोरबोर्ड पर दर्ज जीत के आंकड़े ही अंततः मायने रखते हैं। लेकिन, कभी-कभी, बस कभी-कभी, खेल के मैदान पर कुछ ऐसा घटित होता है जो हार और जीत के गणित से बहुत ऊपर उठ जाता है। एक ऐसी हार होती है जो हजार जीतों से ज्यादा भारी पड़ती है। एक ऐसी पारी होती है जो मैच तो नहीं जिता पाती, लेकिन एक पूरी पीढ़ी की मानसिकता बदल देती है।
आज हम बात कर रहे हैं विराट कोहली (Virat Kohli) की। किंग कोहली। रन मशीन। लेकिन आज हम उनके शतकों के शतक या उनके विश्व रिकॉर्ड्स की बात नहीं करेंगे। आज हम बात करेंगे उस “अधूरी जीत” की, उस एक पारी की, जिसने दुनिया को बताया कि ‘विराट कोहली’ होना असल में क्या है।
यह कहानी है एडिलेड ओवल, 2014 की। एक टेस्ट मैच, जिसने भारतीय क्रिकेट के इतिहास को हमेशा के लिए बदल दिया।
भाग 1: सन्नाटा, डर और एक नया कप्तान
दिसंबर 2014। ऑस्ट्रेलिया का दौरा। यह दौरा शुरू होने से पहले ही क्रिकेट जगत शोक में डूबा हुआ था। फिल ह्यूज (Phillip Hughes) की दुखद मृत्यु ने पूरे ऑस्ट्रेलिया को झकझोर कर रख दिया था। माहौल गमगीन था। दूसरी ओर, भारतीय टीम भी एक बदलाव के दौर से गुजर रही थी। नियमित कप्तान महेंद्र सिंह धोनी चोटिल थे और पहले टेस्ट के लिए उपलब्ध नहीं थे।
कमान सौंपी गई 26 वर्षीय विराट कोहली को। उस समय कोहली दुनिया के बेहतरीन बल्लेबाज बन चुके थे, लेकिन एक टेस्ट कप्तान के रूप में वे कैसे होंगे, यह कोई नहीं जानता था।
एडिलेड की पिच, ऑस्ट्रेलियाई दर्शकों का शोर, और मिचेल जॉनसन (Mitchell Johnson) की आग उगलती गेंदें। चुनौती पहाड़ जैसी थी। ऑस्ट्रेलिया ने अपनी पहली पारी में 517 रनों का विशाल स्कोर खड़ा किया। जवाब में भारत ने भी कोहली के शानदार 115 रनों की बदौलत 444 रन बनाए। लेकिन असली ड्रामा तो पांचवें दिन होना बाकी था।

पाँचवे दिन की चुनौती
ऑस्ट्रेलिया ने अपनी दूसरी पारी घोषित कर दी और भारत के सामने जीत के लिए 364 रनों का लक्ष्य रखा। टेस्ट क्रिकेट के इतिहास में, और विशेष रूप से ऑस्ट्रेलिया में, पांचवें दिन 360+ का लक्ष्य हासिल करना लगभग असंभव माना जाता था। इतिहास, आंकड़े और क्रिकेट पंडित कह रहे थे – “ड्रॉ के लिए खेलो। विकेट बचाओ। मैच बचाओ।”
लेकिन विराट कोहली की सोच अलग थी। उनकी आंखों में ‘ड्रॉ’ जैसा कोई शब्द नहीं था। उनकी डिक्शनरी में सिर्फ एक शब्द था – जीत।
भाग 2: वो जादुई पारी – 141 रन का जूनून
जब भारत दूसरी पारी में बल्लेबाजी करने आया, तो शिखर धवन और चेतेश्वर पुजारा जल्दी आउट हो गए। 57 रन पर 2 विकेट। यहाँ से कोई भी कप्तान डिफेंसिव हो जाता। लेकिन क्रीज पर आए विराट कोहली।
कोहली के दिमाग में क्या चल रहा था, यह उनकी पहली ही गेंद से साफ हो गया। उन्होंने मिचेल जॉनसन, जो उस समय दुनिया के सबसे खूंखार गेंदबाज थे, उनकी आँखों में आँखें डालकर देखना शुरू किया। बाउंसर का जवाब पुल शॉट से दिया, और स्लेजिंग का जवाब अपनी बल्लेबाजी से।
मुरली विजय के साथ जुगलबंदी
कोहली को साथ मिला मुरली विजय का। इन दोनों ने मिलकर एडिलेड ओवल में वो जादू बिखेरा जिसे आज भी याद किया जाता है। कोहली ने उस दिन कोई अंधाधुंध बैटिंग नहीं की। उन्होंने शुद्ध क्लास दिखाई।
- द कवर ड्राइव: रयान हैरिस की गेंद पर खेला गया वो कवर ड्राइव, जिसमें बल्ला सीधा नीचे आया और गेंद गोली की रफ्तार से बाउंड्री पार गई।
- द फ्लिक: नाथन लियोन, जो रफ का फायदा उठा रहे थे, उनकी गेंदों को कलाइयों के सहारे मिड-विकेट की तरफ मोड़ना।
कोहली 60 पर पहुंचे, फिर 80 पर, और देखते ही देखते उन्होंने अपना शतक पूरा किया। यह मैच में उनका दूसरा शतक था। 141 रन। 175 गेंदें। 16 चौके और 1 छक्का।
यह सिर्फ रन नहीं थे। यह एक घोषणा थी। यह घोषणा थी कि “नया भारत” अब डरता नहीं है। यह भारत अब ड्रॉ के लिए नहीं, बल्कि विपक्ष की मांद में घुसकर उसे हराने के लिए खेलता है। 364 का लक्ष्य अब छोटा लगने लगा था। भारत जीत की दहलीज पर खड़ा था।
भाग 3: जब सपना टूटा – वो अधूरी जीत
स्कोर 242/2 था। भारत को जीत के लिए सिर्फ 120 के आसपास रन चाहिए थे और हाथ में 8 विकेट थे। पूरा देश टीवी स्क्रीन से चिपका हुआ था। ऐसा लग रहा था कि हम इतिहास रचने वाले हैं।
लेकिन फिर, क्रिकेट की अनिश्चितता ने अपना खेल दिखाया। मुरली विजय 99 रन पर आउट हो गए। एक नर्वस 90s का शिकार। विजय के आउट होते ही जैसे पहाड़ टूट पड़ा।
- अजिंक्य रहाणे – 0 पर आउट।
- रोहित शर्मा – 6 रन पर आउट।
- रिद्धिमान साहा – 13 रन पर आउट।
एक छोर पर विराट कोहली अकेले खड़े थे। एक राजा, जिसका किला उसके सामने ढह रहा था। वह देख रहे थे कि कैसे एक ऐतिहासिक जीत रेत की तरह मुट्ठी से फिसल रही है। दबाव बढ़ता गया। कोहली को अब हर गेंद पर रन बनाने थे। और इसी कोशिश में, नाथन लियोन की एक गेंद को पुल करने के चक्कर में वे डीप मिड-विकेट पर कैच दे बैठे।
जैसे ही मिचेल मार्श ने वह कैच पकड़ा, एडिलेड ओवल में सन्नाटा छा गया। कोहली कुछ पल के लिए वहीं खड़े रहे। सिर झुका हुआ। आंखों में नमी। और चेहरे पर एक अविश्वास। वह 141 रन बनाकर आउट हुए थे, लेकिन उनके लिए वह शतक मायने नहीं रखता था। उनके लिए वह जीत मायने रखती थी जो अब अधूरी रह गई थी।
भारत वह मैच 48 रनों से हार गया। एक ऐसी जीत जो हमारी मुट्ठी में थी, वह छिन गई।
भाग 4: मैच के बाद का वो इंटरव्यू – जिसने नजरिया बदल दिया
आमतौर पर, हारने वाला कप्तान मैच के बाद बहाने बनाता है। “पिच खराब थी”, “किस्मत ने साथ नहीं दिया”, या “हम ड्रॉ के लिए जा रहे थे”। लेकिन उस दिन प्रेजेंटेशन सेरेमनी में विराट कोहली ने जो कहा, उसने उन्हें एक महान खिलाड़ी से एक महान लीडर बना दिया।
जब उनसे पूछा गया कि उन्होंने ड्रॉ के लिए कोशिश क्यों नहीं की, तो कोहली ने अपनी बांहें चढ़ाते हुए कहा:
“मैं ड्रॉ के लिए खेलने के बारे में सोच भी नहीं सकता था। हम यहाँ जीतने आए थे। मुझे अपनी टीम पर गर्व है कि हमने लक्ष्य का पीछा किया। हमने कोशिश की। हारना बुरा लगता है, लेकिन हमने जिस तरह से क्रिकेट खेली, मुझे उस पर कोई पछतावा नहीं है। अगर मुझे दोबारा मौका मिले, तो मैं फिर से जीत के लिए ही जाऊंगा।”
यह बयान सिर्फ शब्दों का नहीं था। यह एक ‘Paradigm Shift’ (प्रतिमान बदलाव) था। उस दिन भारत मैच हार गया था, लेकिन विराट कोहली ने करोड़ों हिंदुस्तानियों का दिल जीत लिया था। उन्होंने दुनिया को बता दिया कि उनकी कप्तानी में भारतीय टीम ‘सुरक्षित’ क्रिकेट नहीं, बल्कि ‘साहसी’ क्रिकेट खेलेगी।

भाग 5: कोहली का ‘वो’ अंदाज़ – आक्रामकता और जुनून
जब हम “कोहली के अंदाज़” की बात करते हैं, तो यह सिर्फ कवर ड्राइव या फ्लिक शॉट तक सीमित नहीं है। यह एक मनोदशा (Mindset) है। एडिलेड 2014 की उस पारी ने कोहली के करियर का खाका तैयार किया।
1. आंखों में आंखें डालना
उस दौर में ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ी स्लेजिंग (गाली-गलौज या टीका-टिप्पणी) के लिए मशहूर थे। वे विरोधी को डराकर आउट करते थे। लेकिन कोहली ने उन्हें उन्हीं की भाषा में जवाब दिया। जब मिचेल जॉनसन ने गेंद फेंककर कोहली को मारी, तो कोहली डरे नहीं, बल्कि उनके पास जाकर खड़े हो गए। यह आक्रामकता भारतीय प्रशंसकों के लिए नई थी। हमें एक ऐसा नायक मिला था जो ईंट का जवाब पत्थर से देना जानता था।
2. चेज मास्टर (The Chase Master)
एडिलेड की उस पारी ने कोहली को ‘चेज मास्टर’ की उपाधि की नींव रखी। भले ही वह चेज पूरा नहीं हुआ, लेकिन उसने यह विश्वास पैदा किया कि दुनिया का कोई भी स्कोर कोहली की पहुंच से दूर नहीं है। बाद में हमने देखा कि कैसे उन्होंने टी20 और वनडे में असंभव लक्ष्यों को बौना साबित किया।
3. टीम की ढाल
कोहली का अंदाज़ ऐसा था कि वे पूरा दबाव अपने ऊपर ले लेते थे। जब तक कोहली क्रीज पर होते थे, बाकी टीम और पूरा देश चैन की सांस लेता था। एडिलेड में भी, जब तक वे खड़े थे, ऑस्ट्रेलिया के पसीने छूट रहे थे। स्टीव स्मिथ और रिकी पोंटिंग जैसे दिग्गजों ने भी माना कि कोहली की उस पारी ने उन्हें डरा दिया था।
भाग 6: अधूरी जीतों का दर्द – एक पैटर्न
यह सिर्फ एडिलेड 2014 की बात नहीं है। विराट कोहली के करियर में ऐसी कई पारियां हैं जो “मास्टरक्लास” थीं, लेकिन जीत “अधूरी” रह गई। यह उन्हें एक ‘Tragic Hero’ (दुखद नायक) जैसा बनाती हैं, जिससे हम और ज्यादा जुड़ाव महसूस करते हैं।
2016 टी20 वर्ल्ड कप सेमीफाइनल (बनाम वेस्टइंडीज)
वानखेड़े स्टेडियम, मुंबई। भारत मुश्किल में था। कोहली आए और उन्होंने 47 गेंदों में नाबाद 89 रन बनाए। वह पारी टी20 इतिहास की सबसे बेहतरीन पारियों में से एक थी। उन्होंने अकेले दम पर भारत को 192 तक पहुंचाया। यहाँ तक कि उन्होंने गेंदबाजी में भी विकेट लिया। लेकिन अंत में, नो-बॉल और ओस के कारण भारत हार गया। कोहली घुटनों पर बैठ गए थे। वह तस्वीर आज भी हर फैन को रुला देती है। एक और शानदार पारी, एक और अधूरी जीत।
2018 एजबेस्टन टेस्ट (बनाम इंग्लैंड)
इंग्लैंड में कोहली के रिकॉर्ड पर सवाल उठ रहे थे। पहले ही टेस्ट में उन्होंने अकेले संघर्ष किया। बाकी टीम ताश के पत्तों की तरह ढह रही थी, लेकिन कोहली ने 149 रन बनाए। दूसरी पारी में भी 51 रन। लेकिन भारत 31 रनों से हार गया। पूरी टीम ने साथ छोड़ दिया, लेकिन ‘किंग’ आखिरी सांस तक लड़ता रहा।
यह बार-बार हुआ। और शायद इसीलिए कोहली की ये पारियां उनके जीते हुए मैचों से ज्यादा याद की जाती हैं। क्योंकि इनमें संघर्ष है, दर्द है, और एक ऐसा अकेलापन है जिसे सिर्फ एक महान खिलाड़ी ही समझ सकता है।
भाग 7: विरासत (Legacy) – हारकर जीतने वाले को…
एडिलेड 2014 की उस हार ने भारतीय टीम को क्या दिया?
उस हार ने हमें वह आत्मविश्वास दिया जिसकी बदौलत हमने 2018-19 में ऑस्ट्रेलिया को ऑस्ट्रेलिया में हराया। यह इतिहास में पहली बार हुआ था। फिर 2020-21 में गाबा का घमंड तोड़ा। उन ऐतिहासिक जीतों की नींव एडिलेड की उस ‘अधूरी जीत’ में ही रखी गई थी।
कोहली ने टीम के अंदर यह ज़हर भर दिया था कि हमें हार मंजूर है, लेकिन घुटने टेकना मंजूर नहीं। उन्होंने सिखाया कि प्रक्रिया (Process) और इरादा (Intent) परिणाम (Result) से ज्यादा महत्वपूर्ण है।
आज जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं, तो एडिलेड 2014 का स्कोरकार्ड कहता है “ऑस्ट्रेलिया जीता”। लेकिन क्रिकेट की रूह कहती है “विराट कोहली जीता”।
भाग 8: प्रशंसक का नजरिया – वो भावनाएं जो शब्द नहीं बन पातीं
एक क्रिकेट प्रशंसक के रूप में, उस दिन को याद करना आज भी रोंगटे खड़े कर देता है। मुझे याद है मैं अपने कॉलेज के हॉस्टल के टीवी रूम में बैठा था। सुबह से शाम हो गई थी। न खाना खाया था, न पानी पिया था। हर चौके पर हम उछलते थे। हर विकेट गिरने पर दिल बैठ जाता था।
जब कोहली आउट हुए, तो टीवी रूम में ऐसा सन्नाटा छा गया जैसे किसी की मृत्यु हो गई हो। कुछ लड़के रोने लगे थे। गुस्सा भी था, दुख भी था। लेकिन उस रात, जब हम बिस्तर पर गए, तो हमारे मन में कोहली के लिए जो इज्जत थी, वह कई गुना बढ़ गई थी।
हमें पता चल गया था कि हमारे पास एक ऐसा हीरा है जो कोयले की खदान में नहीं, बल्कि आग की भट्टी में तपकर और चमकदार बनता है। वह दिन था जब मैं ‘भारतीय क्रिकेट टीम’ का फैन होने के साथ-साथ ‘विराट कोहली’ का भक्त बन गया।
निष्कर्ष: युगों-युगों तक याद रखा जाएगा वो अंदाज़
आज विराट कोहली अपने करियर के अंतिम पड़ाव की ओर बढ़ रहे हैं। उनके नाम 80 से ज्यादा शतक हैं। अनगिनत मैन ऑफ द मैच अवॉर्ड्स हैं। विश्व कप की ट्रॉफी (2011 और 2024 टी20) भी उनके पास है।
लेकिन जब भी क्रिकेट इतिहास की किताबों में “साहस” का अध्याय लिखा जाएगा, तो एडिलेड 2014 की उस 141 रन की पारी का जिक्र सुनहरे अक्षरों में होगा। वह एक ऐसी पारी थी जिसने हार के मायने बदल दिए।
विराट कोहली का वह अंदाज़ – कॉलर ऊपर करना, आंखों में आग, और बल्ले से कविता लिखना – हमें हमेशा याद रहेगा। जीत अधूरी हो सकती है, लेकिन कोहली का प्रयास हमेशा पूर्ण (Complete) रहा है।
वो कहते हैं ना, “मंजिलें मिलें न मिलें, ये तो मुकद्दर की बात है, हम कोशिश भी न करें, ये तो गलत बात है।”
विराट कोहली ने उस दिन कोशिश की थी। एक ऐसी कोशिश जो जीत से ज्यादा खूबसूरत थी।
धन्यवाद, चीकू। उस दिन हमें सपने देखना सिखाने के लिए।
