सिनेमा कभी भी सिर्फ मनोरंजन का साधन नहीं रहा है; यह समाज का आईना भी है और कई बार समाज को दिशा देने वाला एक शक्तिशाली हथियार भी। भारत में पिछले कुछ वर्षों से सिनेमा और राजनीति के बीच की रेखा बहुत धुंधली हो गई है। हाल ही में, राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता और तमिल सिनेमा के दिग्गज फिल्म निर्माता वेत्रीमारन के एक बयान ने सोशल मीडिया पर तहलका मचा दिया है, जिसे सीधे तौर पर ब्लॉकबस्टर फिल्म धुरंधर 2 से जोड़कर देखा जा रहा है।
क्या सिनेमा के जरिए इतिहास को दोबारा लिखा जा रहा है? क्या दर्शकों की याददाश्त (Memory) के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है? एक ऐसे दौर में जहाँ हर बड़ी फिल्म को एक राजनीतिक चश्मे से देखा जाता है, वेत्रीमारन के बयान ने एक नई और तीखी बहस छेड़ दी है। इस विस्तृत ब्लॉग पोस्ट में हम इस पूरे विवाद की गहराई में जाएंगे, वेत्रीमारन के दावों का विश्लेषण करेंगे, और यह समझने की कोशिश करेंगे कि क्या सच में वेत्रीमारन का यह बयान धुरंधर 2 के खिलाफ एक खुला मोर्चा है?
वेत्रीमारन ने असल में क्या कहा? (विवाद की जड़)
यह पूरा विवाद तब शुरू हुआ जब वेत्रीमारन फिल्म नीलिरा (Neelira) के ट्रेलर लॉन्च इवेंट में पहुंचे। राणा दग्गुबाती द्वारा सह-निर्मित और सोमीथरन द्वारा निर्देशित नीलिरा 1988 के श्रीलंकाई गृहयुद्ध के इर्द-गिर्द घूमती है और एक युद्ध पीड़ित बच्चे की यादों पर आधारित है।
मंच से बोलते हुए, वेत्रीमारन ने वर्तमान सिनेमाई प्रवृत्तियों पर कड़ा प्रहार किया। उन्होंने बिना किसी फिल्म का नाम लिए कहा:
“आजकल हर चीज़ प्रोपेगेंडा (Propaganda) बन गई है। प्रोपेगेंडा में यह ताकत होती है कि वह आपकी याददाश्त और इतिहास को प्रभावित कर सके। यह फिल्म (नीलिरा) नफरत की बात नहीं करती, न ही यह हिंसा को बढ़ावा देती है। यह करोड़ों रुपये खर्च करके किसी विचारधारा को थोपने वाली प्रोपेगेंडा फिल्म नहीं है। इसका मकसद नफरत और हिंसा को भुनाकर 100 करोड़ रुपये कमाना नहीं है।”
उन्होंने आगे नोटबंदी (Demonetisation) का जिक्र करते हुए एक ऐसा बयान दिया, जिसके बाद सोशल मीडिया पर यूजर्स तुरंत समझ गए कि यह इशारा बॉक्स ऑफिस पर रिकॉर्ड तोड़ रही धुरंधर 2 की तरफ है। वेत्रीमारन ने कहा, “हम सभी जानते हैं कि नोटबंदी ने हमें कैसे प्रभावित किया। हम जानते हैं कि पुराने नोट बदलने के लिए लाइनों में खड़े होकर कितने लोगों की जान गई। लेकिन सिनेमा के जरिए उस त्रासदी के प्रभाव को आसानी से बदला जा रहा है। हमारी याददाश्त बहुत चंचल है और प्रोपेगेंडा इसे आसानी से मैनिपुलेट कर सकता है।”
नोटबंदी (Demonetisation) का वह सीन जिसने बहस छेड़ दी
आखिर वेत्रीमारन ने नोटबंदी का जिक्र क्यों किया? इसका सीधा तार आदित्य धर द्वारा निर्देशित धुरंधर 2 में 2016 की नोटबंदी के चित्रण से जुड़ा है। रणवीर सिंह स्टारर इस स्पाई थ्रिलर में नोटबंदी को ‘ऑपरेशन ग्रीन लीफ’ नाम का एक कूटनीतिक मास्टरस्ट्रोक बताया गया है। फिल्म की कहानी के अनुसार, पाकिस्तान से आने वाली 60,000 करोड़ रुपये की जाली करेंसी और आतंकवाद की फंडिंग की कमर तोड़ने के लिए यह कदम उठाया गया था।

सिनेमाई बनाम जमीनी हकीकत का टकराव:
- फिल्म का नजरिया: इस सीक्वल में यह दिखाया गया है कि कैसे एक मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति ने देश की सुरक्षा के लिए यह बड़ा कदम उठाया। इसे एक देशभक्तिपूर्ण मिशन के रूप में महिमामंडित किया गया है।
- वेत्रीमारन का नजरिया: एक यथार्थवादी फिल्म निर्माता होने के नाते, वेत्रीमारन का मानना है कि इस तरह का महिमामंडन आम जनता के उस दर्द और संघर्ष को पूरी तरह से मिटा देता है, जो उन्होंने बैंकों की कतारों में खड़े होकर सहा था। उनका तर्क है कि बड़े बजट का सिनेमा लोगों के वास्तविक दुख को ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ के आवरण से ढक कर इतिहास को बदल रहा है।
फिल्म समीक्षकों और राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि धुरंधर 2 का सिनेमाई प्रभाव बहुत गहरा है। जब कोई फिल्म तकनीकी रूप से इतनी शानदार होती है, तो उसके भीतर छुपे संदेश दर्शकों के अवचेतन मन (Subconscious mind) में सीधे उतर जाते हैं।
सोशल मीडिया पर छिड़ी तीखी बहस: कला या एजेंडा?
वेत्रीमारन के इस बयान के बाद इंटरनेट दो धड़ों में बंट गया है।
समर्थकों का पक्ष:
एक बड़ा वर्ग वेत्रीमारन की बातों से पूरी तरह सहमत है। लोगों का कहना है कि आज के दौर में नफरत बेचना सिनेमा का एक नया और सबसे सफल बिजनेस मॉडल बन गया है। एक यूजर ने रेडिट (Reddit) पर लिखा, “प्रोपेगेंडा फिल्म को प्रोपेगेंडा नहीं कहेंगे तो क्या कहेंगे? वेत्रीमारन ने बिना किसी डर के सच बोला है।”
आलोचकों का पलटवार:
वहीं, दूसरी ओर रणवीर सिंह की इस फिल्म के प्रशंसकों ने वेत्रीमारन को आड़े हाथों लिया। नेटिज़ेंस ने याद दिलाया कि वेत्रीमारन ने खुद अपनी फिल्म विदुथलाई (Viduthalai) में कथित तौर पर नक्सलवाद के प्रति सहानुभूति दिखाई थी। एक यूजर ने एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर तीखा कमेंट करते हुए कहा, “जब आप अपनी फिल्मों में पुलिस को अत्याचारी और वामपंथी चरमपंथियों को नायक बनाते हैं, तो क्या वह प्रोपेगेंडा नहीं है? हर फिल्म का अपना एक नजरिया होता है, कम से कम यह स्पाई थ्रिलर बोरिंग तो नहीं है!”
राजनीतिक गलियारों में गूंज: अखिलेश से लेकर ओवैसी तक
जब से धुरंधर 2 रिलीज हुई है, यह राजनीतिक बहस का केंद्र बन गई है। वेत्रीमारन अकेले नहीं हैं जिन्होंने इस पर निशाना साधा है। भारत के कई प्रमुख राजनीतिक चेहरों और प्रभावशाली विचारकों ने इस पर अपनी प्रतिक्रिया दी है:
- अखिलेश यादव (सपा प्रमुख):समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने खुले तौर पर इस सीक्वल को ‘पेड प्रोपेगेंडा’ (Paid Propaganda) करार दिया। उनका आरोप है कि सार्वजनिक धन और सरकारी समर्थन का इस्तेमाल करके विपक्षी दलों की छवि खराब करने और एक विशेष विचारधारा को स्थापित करने के लिए ऐसी फिल्में बनाई जा रही हैं।
- असदुद्दीन ओवैसी (AIMIM चीफ):लोकसभा सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने इस पैन-इंडिया रिलीज को “तीन घंटे की बकवास” बताया। उन्होंने कहा, “क्या वह कोई पिक्चर है? तीन घंटे की बकवास। उसमें गालियों और हिंसा को बढ़ावा देने के अलावा है ही क्या? इसे देखने के बाद इंसान यही सोचता है कि एक खास समुदाय को गाली दी जाए या नहीं।”
- ध्रुव राठी (YouTuber):मशहूर यूट्यूबर ध्रुव राठी ने अपनी हालिया वीडियो में इसे ‘बीजेपी का सबसे महंगा चुनावी विज्ञापन’ कहा है। राठी ने आरोप लगाया कि पहले भाग में प्रोपेगेंडा थोड़ा सूक्ष्म था, लेकिन इस बार मेकर्स ने अति-आत्मविश्वास में गैसलाइटिंग (Gaslighting) की सारी हदें पार कर दी हैं।
बॉलीवुड का पूर्ण समर्थन: करण जौहर ने की तारीफ
जहाँ एक तरफ राजनीतिक और सामाजिक हलकों में आलोचना हो रही है, वहीं बॉलीवुड इस फिल्म के समर्थन में मजबूती से खड़ा है। हाल ही में फिल्म निर्माता करण जौहर ने इस फिल्म को देखकर अपनी लंबी इंस्टाग्राम पोस्ट में जमकर तारीफ की।
करण ने लिखा, “देशभक्ति और अल्फा एनर्जी की बहसें चलती रहेंगी, लेकिन यह फिल्म उससे कहीं आगे है। जसकीरत की बैकस्टोरी, देशभक्ति का जज्बा, और यहां तक कि विलेन को जिस मानवीय तरीके से दिखाया गया है, वह अद्भुत है। आदित्य धर ने एक नया बेंचमार्क सेट कर दिया है।” उन्होंने रणवीर सिंह के अभिनय को उनके करियर का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन बताया।
शिल्पा शिरोडकर और राकेश बेदी जैसे अन्य सितारों ने भी सोशल मीडिया पर इस फिल्म के प्रति अपना प्यार जाहिर किया है, जो यह दर्शाता है कि फिल्म इंडस्ट्री के भीतर इसका भारी क्रेज है।

बॉक्स ऑफिस पर रिकॉर्ड तोड़ कमाई: नफरत बिकती है या सिनेमा?
इन सब के बीच, धुरंधर 2 बॉक्स ऑफिस पर 1140 करोड़ रुपये का वर्ल्डवाइड कलेक्शन पार कर चुकी है। यह फिल्म सिर्फ 9 दिनों में इस आंकड़े तक पहुंची है। अल्लू अर्जुन की पुष्पा फ्रेंचाइजी (जिसने कुल 2221 करोड़ कमाए थे) के लाइफटाइम कलेक्शन को पीछे छोड़ते हुए, रणवीर सिंह की यह फ्रेंचाइजी अब तक 2447 करोड़ से अधिक की कमाई कर चुकी है।
यह एक बहुत बड़ा सवाल खड़ा करता है: क्या विवाद फिल्मों की कमाई बढ़ाते हैं?
जी हाँ! सिनेमा के इतिहास में यह बार-बार देखा गया है कि जब किसी फिल्म को लेकर वैचारिक मतभेद या राजनीतिक विवाद पैदा होता है, तो आम दर्शक (Neutral Audience) भी इस ‘फोमो’ (FOMO – Fear Of Missing Out) का शिकार होकर सिनेमाघरों की ओर खिंचे चले आते हैं।
सिनेमा, राजनीति और इतिहास: एक विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण (Expert Insight)
एक सिनेमाई विश्लेषक के तौर पर जब हम इस पूरे परिदृश्य को देखते हैं, तो कुछ बातें स्पष्ट होती हैं:
- सिनेमा की ताकत: इतिहास की किताबें अक्सर शासकों द्वारा लिखी जाती हैं, लेकिन आम जनमानस की स्मृति को सिनेमा गढ़ता है। जब कोई घटना स्क्रीन पर भव्य एक्शन, शानदार बैकग्राउंड म्यूजिक और एक सुपरस्टार के इमोशन के साथ पेश की जाती है, तो दर्शक तर्क भूलकर भावनाओं में बह जाते हैं।
- प्रोपेगेंडा बनाम कला:क्या कोई कला पूर्ण रूप से निष्पक्ष (Objective) हो सकती है? शायद नहीं। हर निर्देशक दुनिया को अपने चश्मे से देखता है। वेत्रीमारन की फिल्में हाशिए पर खड़े वर्गों (Marginalized classes) के नजरिए को दिखाती हैं, जबकि आदित्य धर की फिल्में राष्ट्रीय सुरक्षा और सैन्य दृष्टिकोण को प्राथमिकता देती हैं।
- याददाश्त के साथ खेल:वेत्रीमारन की यह बात सौ फीसदी सच है कि “याददाश्त बहुत चंचल है।” आज से 20 साल बाद, जो पीढ़ी नोटबंदी के समय पैदा ही नहीं हुई थी, वह सिनेमा देखकर ही उस ऐतिहासिक घटना का मूल्यांकन करेगी। ऐसे में फिल्म निर्माताओं की जिम्मेदारी बहुत बड़ी हो जाती है।
वेत्रीमारन का बयान किसी एक फिल्म या एक निर्देशक के खिलाफ नहीं है; यह एक सिस्टमेटिक बदलाव के खिलाफ उठी एक महत्वपूर्ण आवाज़ है। यह एक चेतावनी है कि हमें अपने इतिहास, अपने दर्द और अपनी सामूहिक यादों को केवल चमकते हुए सिल्वर स्क्रीन के हवाले नहीं कर देना चाहिए।
चाहे आप रणवीर सिंह के फैन हों या वेत्रीमारन के यथार्थवादी सिनेमा के मुरीद, एक बात तो तय है—यह बहस यहीं रुकने वाली नहीं है। सिनेमा हमेशा से समाज को झकझोरने का काम करता आया है, और आज यह काम वह पूरी शिद्दत से कर रहा है।
अब आपकी बारी है!
आपका इस पूरे विवाद पर क्या सोचना है? क्या आपको लगता है कि आजकल बड़े बजट की फिल्मों का इस्तेमाल राजनीतिक एजेंडे को सेट करने के लिए किया जा रहा है? या फिर सिनेमा को केवल मनोरंजन के नजरिए से देखा जाना चाहिए? अपने विचार नीचे कमेंट सेक्शन में जरूर शेयर करें

अंकिता गौतम एक अभिनेत्री, मॉडल और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर हैं। Tez Khabri पर वे मनोरंजन जगत (Entertainment), बॉलीवुड और लाइफस्टाइल से जुड़ी हर छोटी-बड़ी अपडेट साझा करती हैं। अपनी रचनात्मक शैली और सोशल मीडिया पर मजबूत पकड़ के कारण, वे युवाओं के बीच बेहद लोकप्रिय हैं।
