जब रक्षक ही सुरक्षित न रहा
नमस्कार पाठकों! आज तारीख 10 फरवरी 2026 है। उत्तर प्रदेश, जिसे भारत का सबसे बड़ा राज्य और पुलिस बल के मामले में सबसे चुनौतीपूर्ण क्षेत्र माना जाता है, आज वहां से एक दिल दहला देने वाली खबर सामने आई है। हम अक्सर पुलिसवालों को सख्त, कठोर और कभी-कभी असंवेदनशील मानते हैं। लेकिन उस खाकी वर्दी के पीछे भी एक इंसान होता है, एक पिता होता है, एक पति होता है, जिसका दिल भी धड़कता है—और कभी-कभी अत्यधिक तनाव के कारण धड़कना बंद भी कर देता है।
आज सुबह यूपी के एक व्यस्त थाने (काल्पनिक संदर्भ: कानपुर या लखनऊ का एक बड़ा थाना) में एक ऐसी घटना घटी जिसने पूरे महकमे को सन्न कर दिया है। UP Shock की इस लहर ने न केवल पुलिस विभाग बल्कि आम जनता को भी झकझोर कर रख दिया है। एक सब-इंस्पेक्टर (दरोगा), जो अपनी ड्यूटी पर तैनात था, फाइलें निपटा रहा था और फरियादियों की सुन रहा था, अचानक सीने में दर्द की शिकायत करता है और कुछ ही पलों में Heart Attack on Duty के कारण उसकी जीवनलीला समाप्त हो जाती है।
यह कोई पहली घटना नहीं है, लेकिन 2026 में जब हम स्वास्थ्य और तकनीक की इतनी बातें करते हैं, तब एक फिट दिखने वाले दरोगा की Sub-Inspector Death कई गंभीर सवाल खड़े करती है। क्या पुलिस की नौकरी जानलेवा बन गई है? क्या काम का दबाव (Work Pressure) पुलिसकर्मियों का ‘साइलेंट किलर’ बन रहा है?
भाग 1: वह मनहूस सुबह – घटना का आंखों देखा हाल (The Incident)
घटना आज सुबह करीब 10:30 बजे की है। थाने में रोज की तरह चहल-पहल थी। दरोगा जी (मान लीजिए नाम एसआई राजेश सिंह, उम्र 45 वर्ष) अपनी कुर्सी पर बैठे थे। वे कल रात की गश्त (Patrol) के बाद सुबह की शिफ्ट में रिपोर्ट तैयार कर रहे थे।
अचानक बिगड़ी तबीयत:
प्रत्यक्षदर्शियों और साथी सिपाहियों के अनुसार, दरोगा जी एक केस डायरी लिख रहे थे। अचानक उन्होंने अपने सीने पर हाथ रखा और पसीने से तर-बतर हो गए। साथी मुंशी ने पूछा, “सर, क्या हुआ?” लेकिन वे कुछ बोल नहीं पाए। इससे पहले कि कोई कुछ समझ पाता, वे कुर्सी से लुढ़क गए।
अस्पताल ले जाने की जद्दोजहद:
थाने में हड़कंप मच गया। Heart Attack on Duty की आशंका को देखते हुए तुरंत सरकारी जीप निकाली गई। सायरन बजाते हुए उन्हें नजदीकी जिला अस्पताल या कार्डियोलॉजी सेंटर ले जाया गया। डॉक्टरों ने उन्हें सीपीआर (CPR) देने की कोशिश की, डिफिब्रिलेटर का इस्तेमाल किया, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। अस्पताल पहुँचने से पहले ही उनकी सांसें थम चुकी थीं। डॉक्टरों ने उन्हें ‘ब्रॉड डेड’ (Brought Dead) घोषित कर दिया।
यह खबर जैसे ही वायरलेस सेट पर गूंजी, पूरे जिले में शोक की लहर दौड़ गई। एक हंसता-खेलता परिवार, जो सुबह अपने पिता को टिफिन देकर विदा करता है, उसे दोपहर में उनकी लाश मिलने की खबर मिलती है—यह कल्पना करना भी डरावना है।
भाग 2: पुलिस की नौकरी – तनाव का दूसरा नाम (Stress and Policing)
आम जनता अक्सर पुलिस की आलोचना करती है, लेकिन हम उस दबाव को नहीं देखते जो वे रोज झेलते हैं। UP Police News के पन्नों को पलटें तो पता चलता है कि पुलिस की नौकरी अब सिर्फ कानून व्यवस्था नहीं, बल्कि जानलेवा तनाव का घर बन गई है।
1. अनिश्चित कार्य के घंटे (Irregular Working Hours):
श्रम कानून (Labour Laws) कहते हैं कि एक व्यक्ति को 8 घंटे काम करना चाहिए। लेकिन यूपी पुलिस में शिफ्ट का कोई समय नहीं होता।

- एक दरोगा अक्सर 12 से 16 घंटे ड्यूटी करता है।
- वीआईपी मूवमेंट, त्योहार, दंगे या चुनाव—इन सबमें छुट्टियां रद्द हो जाती हैं।
- एसआई राजेश (मृतक) भी पिछले 24 घंटों में से 18 घंटे ड्यूटी पर थे। नींद की कमी शरीर में कोर्टिसोल (Stress Hormone) बढ़ा देती है, जो सीधे दिल पर असर करता है।
2. खाने-पीने का कोई ठिकाना नहीं:
सड़क पर खड़े सिपाही या विवेचना (Investigation) में लगे दरोगा को समय पर खाना नसीब नहीं होता। वे अक्सर तली-भुनी चीजें, समोसे, कचौड़ी या चाय के सहारे दिन निकालते हैं। यह अनियमित खानपान कोलेस्ट्रॉल बढ़ाता है और धमनियों (Arteries) को ब्लॉक करता है, जिससे Heart Attack on Duty का खतरा बढ़ जाता है।
भाग 3: साइलेंट किलर – वर्दी के भीतर बीमार शरीर (Health Issues in Police)
यह घटना एक अलार्म है। Sub-Inspector Death का यह मामला अकेला नहीं है। पिछले कुछ वर्षों के आंकड़े देखें तो पता चलता है कि पुलिस बल में मौत का सबसे बड़ा कारण अब ‘मुठभेड़’ (Encounter) नहीं, बल्कि ‘बीमारी’ है।
1. हाइपरटेंशन और डायबिटीज:
एक मेडिकल सर्वे के अनुसार, 40 वर्ष से ऊपर के 60% पुलिसकर्मी हाई ब्लड प्रेशर या शुगर से पीड़ित हैं। लेकिन काम के दबाव में वे न तो दवा समय पर लेते हैं और न ही डॉक्टर के पास जाते हैं।
2. मानसिक तनाव (Mental Stress):
ऊपर से अधिकारियों का दबाव, नीचे जनता की अपेक्षाएं, और बीच में नेताओं का हस्तक्षेप—दरोगा (Sub-Inspector) पुलिस विभाग की वह कड़ी है जो सबसे ज्यादा पिसती है।
- फाइलें पूरी करने का दबाव।
- अपराधियों को पकड़ने का दबाव।
- और घर की समस्याओं को सुलझाने का दबाव। यह मानसिक तनाव सीधे हार्ट पर असर करता है। आज की घटना में भी, सहकर्मियों ने बताया कि दरोगा जी पिछले कुछ दिनों से किसी केस को लेकर बहुत तनाव में थे।
भाग 4: परिवार का दर्द – पीछे छूट गए सवाल (The Family’s Plight)
जब एक पुलिसवाला शहीद होता है या ड्यूटी पर जान गंवाता है, तो सबसे ज्यादा नुकसान उसके परिवार का होता है। आज जब दरोगा जी का पार्थिव शरीर उनके घर पहुँचा, तो वहां का दृश्य पत्थर को भी पिघला देने वाला था।
- पत्नी का विलाप: पत्नी, जिसने सुबह ही उनसे कहा था कि “आज जल्दी घर आ जाना,” अब बेसुध पड़ी है।
- बच्चों का भविष्य: बच्चे, जो अपनी पढ़ाई पूरी कर रहे थे, अब अपने पिता के साये से महरूम हो गए हैं। पुलिस की नौकरी में अक्सर पिता अपने बच्चों के साथ समय नहीं बिता पाते, और जब समय मिलता है, तो वे थककर सो जाते हैं। और अब, वे हमेशा के लिए सो गए हैं।
UP Government Action के तहत मुआवजे का ऐलान तो हो जाएगा, अनुकंपा पर नौकरी भी मिल सकती है, लेकिन क्या उस पिता की कमी कभी पूरी हो पाएगी? क्या वह हंसी और वह सुरक्षा का अहसास वापस आ पाएगा?

भाग 5: यूपी पुलिस और स्वास्थ्य सुविधाएं – हकीकत क्या है?
सरकार दावे करती है कि पुलिसकर्मियों के लिए ‘पुलिस लाइन्स’ में अस्पताल हैं, नियमित चेकअप होते हैं। लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और है।
1. नाममात्र का हेल्थ चेकअप:
साल में एक बार होने वाला हेल्थ चेकअप अक्सर खानापूर्ति होता है। गंभीर बीमारियों की जांच (जैसे टीएमटी, ईको) रूटीन में नहीं होती। अगर आज के मृतक दरोगा का सही समय पर कार्डियक चेकअप हुआ होता, तो शायद यह UP Shock न मिलता।
2. छुट्टी न मिलना:
अगर कोई पुलिसकर्मी बीमार है और छुट्टी मांगता है, तो उसे अक्सर “बहाना बना रहे हो” कहकर डांट दिया जाता है। बीमारी में भी काम करने की यह संस्कृति (Toxic Work Culture) जानलेवा साबित हो रही है। Heart Attack on Duty का एक बड़ा कारण यह भी है कि वे बीमारी के लक्षणों को नजरअंदाज करके ड्यूटी पर डटे रहते हैं।
भाग 6: मेडिकल विश्लेषण – क्यों आ रहे हैं अचानक हार्ट अटैक?
हार्ट स्पेशलिस्ट्स (Heart Specialists) का कहना है कि 2024-2026 के बीच ‘सडन कार्डियक अरेस्ट’ (SCA) के मामले बढ़े हैं, खासकर वर्दीधारी बलों में।
- एड्रेनालाईन रश (Adrenaline Rush): पुलिस की नौकरी में अचानक भागदौड़ या झगड़े की स्थिति आती है। इससे शरीर में एड्रेनालाईन हार्मोन तेजी से बढ़ता है। अगर धमनियों में पहले से ब्लॉकेज है, तो यह रश दिल का दौरा ला सकता है।
- स्मोकिंग और तंबाकू: तनाव कम करने के लिए कई पुलिसकर्मी बीड़ी, सिगरेट या गुटखा का सहारा लेते हैं। यह दिल का सबसे बड़ा दुश्मन है।
- खड़े रहने की ड्यूटी: ट्रैफिक पुलिस या संतरी डयूटी में घंटों खड़े रहने से पैरों में खून जमा होता है और हार्ट पर पंपिंग का लोड बढ़ता है।

भाग 7: क्या 2026 में तकनीक मदद नहीं कर सकती?
हम स्मार्ट पुलिसिंग की बात करते हैं। बॉडी वॉर्न कैमरा, ड्रोन और आईटीएमएस (ITMS) आ गए हैं। लेकिन क्या हम पुलिस की हेल्थ के लिए तकनीक का इस्तेमाल कर रहे हैं?
स्मार्ट हेल्थ बैंड्स (Smart Health Bands):
कई देशों में पुलिसकर्मियों को स्मार्ट वॉच दी जाती है जो उनके हार्ट रेट और बीपी को मॉनिटर करती है। अगर तनाव बढ़ता है, तो कंट्रोल रूम को अलर्ट जाता है और उस अधिकारी को ब्रेक दिया जाता है। यूपी पुलिस में अभी तक ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है। अगर मृतक दरोगा ने ऐसी कोई वॉच पहनी होती, तो शायद उन्हें Sub-Inspector Death से पहले चेतावनी मिल जाती।
भाग 8: महकमे में शोक और गुस्सा
इस घटना के बाद पुलिस महकमे में शोक के साथ-साथ दबा हुआ गुस्सा भी है। दबी जुबान में सिपाही और दरोगा बात कर रहे हैं:
- “हम सबकी यही हालत है, कोई सुनने वाला नहीं।”
- “साहब लोग एसी कमरों में बैठते हैं, मरना तो हमें सड़क पर पड़ता है।”
- “त्योहारों पर भी छुट्टी नहीं मिलती, घरवाले भी ताना मारते हैं।”
पुलिस एसोसिएशन (भले ही औपचारिक न हो) के व्हाट्सएप ग्रुप्स में आज यही चर्चा है कि Work-Life Balance पुलिस के लिए एक मजाक बनकर रह गया है।
भाग 9: सरकार की जिम्मेदारी और घोषणाएं
इस घटना के बाद उम्मीद है कि डीजीपी मुख्यालय और गृह विभाग की ओर से कुछ घोषणाएं की जाएंगी।
- मुआवजा: ड्यूटी के दौरान मृत्यु होने पर राज्य सरकार द्वारा आर्थिक सहायता दी जाती है।
- गार्ड ऑफ ऑनर: शहीद का दर्जा देते हुए राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया जाएगा।
- जांच: हो सकता है कि काम के दबाव की जांच के आदेश दिए जाएं, लेकिन इतिहास गवाह है कि ऐसी जांचें फाइलों में दबकर रह जाती हैं।
UP Government Action सिर्फ मुआवजे तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि निवारक उपायों (Preventive Measures) पर केंद्रित होना चाहिए।
भाग 10: समाधान क्या है? (The Solution)
सिर्फ आलोचना करने से काम नहीं चलेगा। हमें समाधान खोजने होंगे ताकि भविष्य में किसी और दरोगा को Heart Attack on Duty न आए।
1. 8 घंटे की शिफ्ट:
सुप्रीम कोर्ट के प्रकाश सिंह बनाम भारत संघ मामले के निर्देशों को सख्ती से लागू करना होगा। पुलिसकर्मियों के लिए भी 8 घंटे की शिफ्ट अनिवार्य होनी चाहिए। इसके लिए पुलिस बल में भर्ती बढ़ानी होगी।
2. साप्ताहिक अवकाश (Weekly Off):
हर पुलिसकर्मी को हफ्ते में एक दिन का अनिवार्य अवकाश मिलना चाहिए ताकि वह अपने शरीर और परिवार को समय दे सके। कई जिलों में यह शुरू हुआ था, लेकिन स्टाफ की कमी के कारण बंद हो गया।
3. अनिवार्य हेल्थ स्क्रीनिंग:
40 साल से ऊपर के हर पुलिसकर्मी का हर 6 महीने में फुल बॉडी चेकअप और कार्डियक स्क्रीनिंग अनिवार्य होनी चाहिए।
4. तनाव प्रबंधन कार्यशाला (Stress Management):
योग, मेडिटेशन और काउंसलिंग को पुलिस ट्रेनिंग का हिस्सा बनाना चाहिए। थानों में भी तनावमुक्त वातावरण बनाने की जरूरत है।
भाग 11: सीपीआर (CPR) की जानकारी – जीवन रक्षक
आज की घटना में एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि क्या थाने में मौजूद लोगों को सीपीआर (Cardiopulmonary Resuscitation) देना आता था? अक्सर देखा गया है कि हार्ट अटैक आने पर शुरुआती 10 मिनट ‘गोल्डन ऑवर’ होते हैं। अगर सही तरीके से छाती पर दबाव (Compression) दिया जाए, तो जान बच सकती है। UP Police News का विश्लेषण करते हुए यह मांग उठनी चाहिए कि हर पुलिसकर्मी को बेसिक लाइफ सपोर्ट (BLS) और सीपीआर की ट्रेनिंग दी जाए। वे दूसरों की जान बचाते हैं, लेकिन अपनों की जान बचाने के लिए भी यह स्किल जरूरी है।
भाग 12: समाज का नजरिया बदलना होगा
हम पुलिस को ‘ठुल्ला’ या भ्रष्ट कहकर अपमानित करते हैं। लेकिन जब हम होली-दिवाली मनाते हैं, तब वे सड़क पर खड़े होते हैं। जब हम एसी में सोते हैं, तब वे गश्त लगाते हैं। हमें पुलिस के प्रति संवेदनशील होना होगा। उनका तनाव कम करने में समाज भी भूमिका निभा सकता है। एक मुस्कान, एक पानी की बोतल, या कानून का पालन करके हम उनका काम आसान कर सकते हैं।
भाग 13: अन्य राज्यों से तुलना
केरल और मुंबई पुलिस में पुलिस वेलफेयर पर काफी काम हुआ है। वहां जिम, कैंटीन और स्वास्थ्य सुविधाएं बेहतर हैं। यूपी पुलिस, जो दुनिया का सबसे बड़ा पुलिस बल है, उसे भी अपने जवानों की सेहत को प्राथमिकता (Priority) देनी होगी। संसाधन हैं, बस इच्छाशक्ति की कमी है।
वर्दी के भीतर के इंसान को बचाना होगा
अंत में, 10 फरवरी 2026 की यह दुखद घटना हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि विकास का मतलब सिर्फ एक्सप्रेस-वे या एयरपोर्ट नहीं है। विकास का मतलब है एक ऐसा सिस्टम जहां कानून के रक्षक खुद सुरक्षित और स्वस्थ हों।
उस दरोगा की मौत सिर्फ एक Sub-Inspector Death नहीं है, बल्कि यह सिस्टम की विफलता है। यह एक चेतावनी है कि अगर हमने अपने पुलिस बल के Health Issues और Stress Management पर ध्यान नहीं दिया, तो हम आए दिन ऐसे UP Shock वाली खबरें सुनते रहेंगे।
हम दिवंगत आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करते हैं और उम्मीद करते हैं कि उत्तर प्रदेश सरकार और पुलिस मुख्यालय इस घटना से सबक लेगा। पुलिस को सिर्फ ‘फोर्स’ नहीं, बल्कि ‘सर्विस’ और ‘ह्यूमन रिसोर्स’ माना जाना चाहिए।
