UGC new rules protest

शिक्षा के मंदिर में हिंसा का तांडव

शिक्षा का उद्देश्य चरित्र निर्माण और भविष्य को संवारना होता है, लेकिन जब नीतियां और नियम छात्रों के हितों के विपरीत महसूस होने लगें, तो परिणाम क्या होता है? इसका ज्वलंत उदाहरण आज झारखंड की राजधानी रांची में देखने को मिला। जो कैंपस कल तक छात्रों की हंसी-ठिठोली और वाद-विवाद प्रतियोगिताओं से गूंजता था, वह आज पुलिस के सायरन, आंसू गैस के गोलों और छात्रों की नारेबाजी से गूंज रहा है।

UGC के नए नियमों पर झारखंड में बवाल अब केवल एक असहमति नहीं रह गया है, बल्कि इसने एक हिंसक संघर्ष का रूप ले लिया है। रांची यूनिवर्सिटी (Ranchi University), जो राज्य का एक प्रतिष्ठित संस्थान है, आज किसी युद्ध के मैदान से कम नहीं लग रहा था। लाठियां भांजी गईं, पत्थर चले, और देखते ही देखते पूरा विश्वविद्यालय परिसर छावनी में तब्दील हो गया।

आखिर ऐसा क्या हुआ कि कलम पकड़ने वाले हाथों ने पत्थर उठा लिए? आखिर यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (UGC) का वो कौन सा नया फरमान है जिसने झारखंड के आदिवासी और मूलवासी छात्रों को इतना उद्वेलित कर दिया है? और सबसे बड़ा सवाल—छात्र गुट आपस में ही क्यों भिड़ गए? आज के इस मेगा-ब्लॉग में, हम इस पूरी घटना की एक-एक परत खोलेंगे। हम जानेंगे कि UGC के नए नियमों पर झारखंड में बवाल के पीछे की असली वजह क्या है, जमीनी हकीकत क्या है और इसका छात्रों के भविष्य पर क्या असर पड़ने वाला है।

भाग 1: घटनाक्रम – जब कैंपस बना कुरुक्षेत्र

मंगलवार की सुबह रांची यूनिवर्सिटी के लिए किसी सामान्य दिन जैसी नहीं थी। सुबह से ही कैंपस के मुख्य द्वार पर गहमागहमी थी। विभिन्न छात्र संगठन अपनी-अपनी मांगों को लेकर लामबंद हो रहे थे। एक तरफ वे छात्र थे जो UGC के नए सुधारों को लागू करने का विरोध कर रहे थे, तो दूसरी तरफ वे छात्र थे (मुख्यतः एक विशेष विचारधारा से जुड़े संगठन) जो इन नियमों का समर्थन कर रहे थे या कम से कम हिंसक विरोध के खिलाफ थे।

विरोध प्रदर्शन से संघर्ष तक: दोपहर होते-होते UGC के नए नियमों पर झारखंड में बवाल ने उग्र रूप ले लिया। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, विरोध कर रहे छात्रों का एक जत्था जब वाइस चांसलर (VC) कार्यालय का घेराव करने बढ़ा, तो दूसरे गुट ने उन्हें रोकने की कोशिश की। पहले जुबानी जंग हुई, फिर धक्के-मुक्की और देखते ही देखते स्थिति नियंत्रण से बाहर हो गई।

  • पथराव: मोराबादी स्थित कैंपस में ईंट और पत्थर चलने लगे। लाइब्रेरी और प्रशासनिक भवन के शीशे चकनाचूर हो गए।
  • पुलिस की एंट्री: स्थिति को बिगड़ता देख जिला प्रशासन ने भारी पुलिस बल तैनात किया। पुलिस को भीड़ तितर-बितर करने के लिए लाठीचार्ज करना पड़ा और आंसू गैस के गोले छोड़ने पड़े।
  • घायल छात्र: इस खूनी संघर्ष में दोनों गुटों के दर्जनों छात्र घायल हुए हैं, जिन्हें रिम्स (RIMS) अस्पताल में भर्ती कराया गया है। कई पुलिसकर्मियों को भी चोटें आई हैं।

यह दृश्य अत्यंत भयावह था। जो जगह संवाद का केंद्र होनी चाहिए थी, वहां संवादहीनता ने हिंसा को जन्म दिया।

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भाग 2: आखिर क्या है विवाद की जड़? (UGC के वो नियम)

इस पूरे हंगामे को समझने के लिए हमें उस मूल कारण को समझना होगा जिसने इस चिंगारी को हवा दी। UGC के नए नियमों पर झारखंड में बवाल मुख्य रूप से तीन बड़े बदलावों को लेकर है, जिन्हें केंद्र सरकार और UGC ने हाल ही में अनिवार्य किया है।

1. पीएचडी प्रवेश में ‘NET स्कोर’ की अनिवार्यता

UGC ने हाल ही में निर्देश जारी किया है कि अब विश्वविद्यालयों में पीएचडी (Ph.D.) में प्रवेश के लिए अलग से प्रवेश परीक्षा (Entrance Exam) नहीं ली जाएगी, बल्कि ‘नेट’ (NET – National Eligibility Test) के स्कोर के आधार पर ही एडमिशन होगा।

  • विरोध क्यों? झारखंड के छात्रों का तर्क है कि यहाँ के ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों के छात्र, जो हिंदी माध्यम से पढ़े हैं या जिनके पास संसाधनों की कमी है, वे राष्ट्रीय स्तर की ‘नेट’ परीक्षा में दिल्ली या मुंबई के छात्रों के साथ प्रतिस्पर्धा नहीं कर सकते।
  • उनका कहना है कि राज्य विश्वविद्यालयों की अपनी प्रवेश परीक्षा (JET/Entrance Test) से स्थानीय छात्रों को मौका मिलता था। UGC के नए नियमों पर झारखंड में बवाल का यह सबसे बड़ा कारण है, क्योंकि छात्रों को लगता है कि इससे उच्च शिक्षा के दरवाजे उनके लिए बंद हो जाएंगे।

2. 4-वर्षीय स्नातक कोर्स (FYUP) और संसाधनों की कमी

नई शिक्षा नीति (NEP) के तहत 4 साल का ग्रेजुएशन कोर्स लागू किया गया है।

  • समस्या: रांची यूनिवर्सिटी और इसके संबद्ध कॉलेजों में न तो पर्याप्त क्लासरूम हैं, न ही प्रोफेसर। 3 साल का कोर्स पूरा करने में ही यहाँ 4-5 साल लग जाते हैं (सत्र विलंब)। ऐसे में 4 साल का कोर्स और रिसर्च वर्क का बोझ डालना अव्यावहारिक है। छात्र इसे ‘शिक्षा का बाजारीकरण’ बता रहे हैं।

3. 75% उपस्थिति और छात्रवृत्ति के नियम

UGC ने निर्देश दिया है कि छात्रवृत्ति और परीक्षा फॉर्म भरने के लिए 75% बायोमेट्रिक उपस्थिति अनिवार्य होगी।

  • जमीनी हकीकत: झारखंड के कई छात्र दूर-दराज के गांवों से आते हैं। परिवहन की व्यवस्था लचर है। कई छात्र पार्ट-टाइम काम करके पढ़ाई का खर्च उठाते हैं। ऐसे कड़े नियम उन्हें शिक्षा से वंचित कर देंगे।

भाग 3: छात्रों का दर्द – “यह हमारे सपनों की हत्या है”

जब हमने आंदोलनरत छात्रों से बात की, तो उनका गुस्सा और हताशा साफ झलक रही थी।

एक प्रदर्शनकारी छात्र, रमेश मुंडा (नाम परिवर्तित) ने कहा, “दिल्ली में एसी कमरों में बैठकर नियम बनाना आसान है। उन्हें क्या पता कि लोहरदगा या सिमडेगा के गांव से रांची आकर पढ़ाई करना कितना मुश्किल है? UGC के नए नियमों पर झारखंड में बवाल हम शौक से नहीं कर रहे। अगर नेट का स्कोर अनिवार्य हुआ, तो हमारे जैसे गरीब आदिवासी छात्र कभी डॉक्टर (Ph.D.) नहीं बन पाएंगे। यह अमीरों को और अमीर और गरीबों को अनपढ़ रखने की साजिश है।”

एक छात्रा, जो पुलिस लाठीचार्ज में घायल हुई थी, ने बताया, “हम तो सिर्फ वीसी सर को ज्ञापन देने जा रहे थे। हमने क्या गुनाह किया? क्या अपनी बात रखना अपराध है? दूसरे गुट ने हम पर हमला किया और पुलिस ने भी हमें ही पीटा। हम पीछे नहीं हटेंगे। यह हमारी अस्मिता की लड़ाई है।”

यह भावना पूरे झारखंड के छात्र समुदाय में फैल रही है। उन्हें लग रहा है कि UGC के नए नियमों पर झारखंड में बवाल उनकी अस्तित्व रक्षा के लिए जरूरी है। वे इसे ‘केंद्रीयकरण बनाम क्षेत्रीय स्वायत्तता’ की लड़ाई के रूप में देख रहे हैं।

भाग 4: छात्र गुटों में भिड़ंत – राजनीति या विचारधारा?

रांची यूनिवर्सिटी कैंपस का रणक्षेत्र में बदलना केवल छात्रों की मांगों तक सीमित नहीं है, इसमें छात्र राजनीति का भी गहरा रंग है।

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समर्थक बनाम विरोधी:

  • विरोध करने वाला गुट: इसमें मुख्य रूप से आदिवासी छात्र संघ (ASA), झारखंड छात्र मोर्चा (JCM) और वामपंथी छात्र संगठन (AISA) शामिल हैं। इनका तर्क है कि नए नियम ‘सामाजिक न्याय’ के खिलाफ हैं और वंचित वर्गों को नुकसान पहुंचाएंगे।
  • समर्थन करने वाला गुट: दूसरी तरफ, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) जैसे संगठन हैं। इनका कहना है कि UGC के नियम शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के लिए हैं। इनका आरोप है कि विरोधी गुट छात्रों को भड़का रहा है और कैंपस में अराजकता फैला रहा है।

टकराव का बिंदु: जब विरोधी गुट ने यूनिवर्सिटी के गेट बंद कर दिए और क्लास रोकने की कोशिश की, तो समर्थक गुट ने इसका विरोध किया। उनका कहना था कि “विरोध के नाम पर पढ़ाई बाधित नहीं होनी चाहिए।” इसी बात पर बहस हुई और UGC के नए नियमों पर झारखंड में बवाल ने हिंसक रूप ले लिया। विश्लेषकों का मानना है कि आगामी छात्र संघ चुनावों और राज्य की राजनीति ने भी इस आग में घी डालने का काम किया है।

भाग 5: विश्वविद्यालय प्रशासन की विफलता

इतने बड़े पैमाने पर हंगामा हुआ, तो सवाल उठता है कि विश्वविद्यालय प्रशासन और खुफिया तंत्र क्या कर रहा था?

कुलपति (VC) की प्रतिक्रिया: रांची यूनिवर्सिटी के कुलपति ने घटना पर गहरा दुख जताया है। उन्होंने कहा, “UGC के नियम केंद्र के हैं, हम सिर्फ पालन करने वाली संस्था हैं। छात्रों की शंकाओं का समाधान बातचीत से हो सकता था। हिंसा किसी समस्या का हल नहीं है। हमने एक जांच समिति गठित की है जो इस उपद्रव के लिए जिम्मेदार तत्वों की पहचान करेगी।”

हालांकि, आलोचकों का कहना है कि प्रशासन भांपने में नाकाम रहा कि UGC के नए नियमों पर झारखंड में बवाल इतना बढ़ सकता है।

  1. संवादहीनता: नए नियमों को लागू करने से पहले छात्रों के साथ कोई ओपन हाउस या सेमिनार नहीं किया गया।
  2. सुरक्षा में चूक: जब पता था कि दो विरोधी गुट आमने-सामने हैं, तो पर्याप्त सुरक्षा बल पहले से क्यों नहीं तैनात किया गया?
  3. अनिश्चितता: छात्रवृत्ति और एडमिशन को लेकर जो भ्रम की स्थिति थी, उसे समय रहते साफ नहीं किया गया।

भाग 6: पुलिस कार्रवाई और मानवाधिकार के सवाल

कैंपस के अंदर पुलिस का घुसना हमेशा से विवादास्पद रहा है। मंगलवार की घटना में पुलिस ने जिस तरह बल प्रयोग किया, उस पर भी सवाल उठ रहे हैं।

वायरल वीडियो में पुलिस को लाइब्रेरी और हॉस्टल के अंदर घुसकर छात्रों को पीटते हुए देखा जा सकता है। कई छात्राओं ने आरोप लगाया है कि महिला पुलिस की अनुपस्थिति में पुरुष पुलिसकर्मियों ने उनके साथ बदसलूकी की। पुलिस प्रशासन का कहना है कि उपद्रवी तत्व पेट्रोल बम और लोहे की रॉड लेकर आए थे, इसलिए आत्मरक्षा और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए लाठीचार्ज जरूरी था।

लेकिन बड़ा सवाल यह है: क्या छात्रों को अपराधी की तरह पीटना जायज है? UGC के नए नियमों पर झारखंड में बवाल को क्या डंडे के जोर पर शांत किया जा सकता है? इतिहास गवाह है कि छात्र आंदोलनों को जितना दबाया जाता है, वे उतने ही उग्र होते जाते हैं।

भाग 7: झारखंड की शिक्षा व्यवस्था पर असर

इस बवाल का सबसे बुरा असर राज्य की पहले से चरमराई शिक्षा व्यवस्था पर पड़ रहा है।

  • परीक्षाएं स्थगित: हंगामे को देखते हुए यूनिवर्सिटी ने चल रही सेमेस्टर परीक्षाएं अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दी हैं।
  • सत्र विलंब (Session Late): रांची यूनिवर्सिटी में सत्र पहले ही 1-2 साल पीछे चल रहा है। इस हड़ताल और तालाबंदी से सत्र और पिछड़ जाएगा। इसका सीधा नुकसान उन छात्रों को होगा जिन्हें आगे की पढ़ाई या नौकरी के लिए डिग्री की जरूरत है।
  • भय का माहौल: जो छात्र पढ़ने आना चाहते हैं, वे भी अब कैंपस आने से डर रहे हैं। माता-पिता अपने बच्चों को कॉलेज भेजने से कतरा रहे हैं।

UGC के नए नियमों पर झारखंड में बवाल ने राज्य की उच्च शिक्षा को एक ऐसे चौराहे पर लाकर खड़ा कर दिया है जहाँ से आगे का रास्ता धुंधला दिखाई दे रहा है।

भाग 8: सामाजिक-आर्थिक परिप्रेक्ष्य – क्यों उबल रहा है झारखंड?

झारखंड को अलग राज्य बने 25 साल से ज्यादा हो गए हैं, लेकिन शैक्षणिक पिछड़ापन आज भी एक कड़वी सच्चाई है।

डिजिटल डिवाइड (Digital Divide): UGC अब ऑनलाइन कोर्सेज (SWAYAM) और डिजिटल लर्निंग पर जोर दे रहा है। लेकिन झारखंड के सुदूर गांवों में आज भी बिजली और इंटरनेट नहीं है। ऐसे में ‘ब्लेंडेड लर्निंग’ की बात करना छात्रों के साथ मजाक जैसा लगता है।

भाषा की बाधा: NET और अन्य राष्ट्रीय परीक्षाएं मुख्य रूप से अंग्रेजी या कठिन हिंदी में होती हैं। झारखंड की स्थानीय भाषाओं (नागपुरी, खोरठा, संथाली) से आने वाले छात्रों के लिए यह एक बड़ी बाधा है। उन्हें लगता है कि UGC के नए नियमों पर झारखंड में बवाल करना उनकी मजबूरी है, वरना वे मुख्यधारा से पूरी तरह कट जाएंगे।

संसाधनों का अभाव: दिल्ली यूनिवर्सिटी के पास जो फंड और फैकल्टी है, उसका 10% भी रांची या कोल्हान यूनिवर्सिटी के पास नहीं है। तो फिर नियम “एक देश, एक विधान” की तर्ज पर एक जैसे कैसे हो सकते हैं? समान नियम लागू करने से पहले समान अवसर और संसाधन देना जरूरी है।

भाग 9: समाधान की राह क्या हो?

आग लगाना आसान है, बुझाना मुश्किल। UGC के नए नियमों पर झारखंड में बवाल को शांत करने के लिए तत्काल और दीर्घकालिक दोनों तरह के उपायों की जरूरत है।

1. लचीलापन (Flexibility): UGC को राज्यों की विशिष्ट परिस्थितियों को देखते हुए नियमों में ढील देनी चाहिए। जैसे, पीएचडी प्रवेश के लिए नेट स्कोर के साथ-साथ यूनिवर्सिटी एंट्रेंस का विकल्प भी खुला रखना चाहिए (जैसा कि कुछ राज्यों ने मांग की है)।

2. संवाद (Dialogue): विश्वविद्यालय प्रशासन, सरकार और छात्र प्रतिनिधियों के बीच तुरंत बातचीत होनी चाहिए। एक ‘शिकायत निवारण प्रकोष्ठ’ बनाना चाहिए जहाँ छात्र अपनी शंकाएं रख सकें।

3. बुनियादी ढांचा सुधारें: नियम थोपने से पहले क्लासरूम, लैब और लाइब्रेरी को अपग्रेड किया जाए। प्रोफेसरों की खाली पड़ी हजारों सीटों को तुरंत भरा जाए।

4. शांति की अपील: छात्र संगठनों को भी समझना होगा कि हिंसा से उनकी मांगें कमजोर होती हैं। यूनिवर्सिटी उनकी है, संपत्ति उनकी है। इसे जलाकर वे अपना ही भविष्य जला रहे हैं।

भाग 10: राष्ट्रीय परिदृश्य – क्या यह सिर्फ झारखंड की समस्या है?

नहीं, UGC के नए नियमों पर झारखंड में बवाल कोई अकेली घटना नहीं है। पिछले कुछ महीनों में देश के कई हिस्सों – चाहे वह JNU हो, इलाहाबाद यूनिवर्सिटी हो या हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी – में ऐसे विरोध देखे गए हैं।

यह दर्शाता है कि भारत की उच्च शिक्षा एक संक्रमण काल (Transition Phase) से गुजर रही है। ‘एक देश, एक परीक्षा’ (CUET/NET) का मॉडल विविधतापूर्ण भारत में चुनौतियों का सामना कर रहा है। केंद्र की मानकीकरण (Standardization) की कोशिश और राज्यों की क्षेत्रीय आकांक्षाओं के बीच टकराव बढ़ रहा है। झारखंड का यह बवाल उसी बड़े कैनवास का एक हिस्सा है।

छात्रों के भविष्य से खिलवाड़ कब तक?

रांची यूनिवर्सिटी के गेट पर बिखरे हुए कांच के टुकड़े और जले हुए टायरों के निशान कुछ दिनों में साफ हो जाएंगे, लेकिन छात्रों के मन पर लगे घाव इतनी आसानी से नहीं भरेंगे। UGC के नए नियमों पर झारखंड में बवाल ने एक गंभीर चेतावनी दी है।

यह चेतावनी है नीति-निर्माताओं के लिए कि जमीनी हकीकत को नजरअंदाज कर बनाए गए नियम विस्फोटक हो सकते हैं। यह चेतावनी है छात्र नेताओं के लिए कि विरोध का रास्ता लोकतांत्रिक होना चाहिए, हिंसक नहीं। और यह चेतावनी है समाज के लिए कि अगर हमने अपनी शिक्षा व्यवस्था को नहीं सुधारा, तो हम एक असंतुष्ट और आक्रोशित युवा पीढ़ी तैयार करेंगे।

आज जरूरत है कि केंद्र सरकार, राज्य सरकार और UGC मिलकर एक बीच का रास्ता निकालें। झारखंड के आदिवासी और पिछड़े छात्रों को ‘गुणवत्ता’ के नाम पर शिक्षा से बाहर नहीं किया जा सकता। उन्हें हाथ पकड़कर ऊपर लाने की जरूरत है, न कि ऊंची दीवार खड़ी करके रोकने की।

उम्मीद है कि रांची के आसमान में छाया यह धुंआ जल्द छंटेगा और कैंपस में फिर से नारों की जगह विचारों की गूंज सुनाई देगी। लेकिन तब तक, यह सवाल खड़ा रहेगा – क्या सुधार के नाम पर संघर्ष जरूरी है?

अभिभावकों की चिंताएं

इस पूरे घटनाक्रम में उन माता-पिता की चिंता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, जिन्होंने पेट काट-काटकर अपने बच्चों को रांची पढ़ने भेजा है।

लोहरदगा के एक किसान, जिनके बेटे रांची यूनिवर्सिटी में पढ़ते हैं, कहते हैं, “हमने सुना है कि वहां लड़ाई हो रही है। टीवी पर देखा तो डर लग रहा है। हमें UGC के नियम नहीं पता, हमें बस इतना पता है कि हमारा बेटा सुरक्षित रहे और डिग्री लेकर आए। अगर कॉलेज में पढ़ाई नहीं होगी, तो हम गरीब लोग कहाँ जाएंगे?”

यह दर्द बताता है कि UGC के नए नियमों पर झारखंड में बवाल का असर सिर्फ छात्रों तक सीमित नहीं है, यह हजारों परिवारों की उम्मीदों पर प्रहार है।

फैकल्टी (प्रोफेसर्स) का क्या कहना है?

यूनिवर्सिटी के एक वरिष्ठ प्रोफेसर ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, “नियम अच्छे हैं, लेकिन उन्हें लागू करने का तरीका गलत है। हम बिना इन्फ्रास्ट्रक्चर के 4 साल का कोर्स कैसे चलाएं? हमारे पास शोध कराने के लिए गाइड नहीं हैं। नेट स्कोर अनिवार्य करना अच्छा है क्वालिटी के लिए, लेकिन झारखंड के छात्रों का बेस कमजोर है। उन्हें ब्रिज कोर्स या तैयारी का समय दिए बिना यह नियम थोपना अनुचित है। प्रशासन और सरकार को व्यावहारिक होना पड़ेगा।”

आगे क्या? (The Way Forward)

अब सबकी नजरें राजभवन (राज्यपाल सह कुलाधिपति) और मुख्यमंत्री कार्यालय पर टिकी हैं। क्या वे हस्तक्षेप करेंगे?

  • धारा 144: फिलहाल कैंपस और आसपास के इलाकों में धारा 144 लगा दी गई है।
  • जांच: पुलिस ने सीसीटीवी फुटेज के आधार पर उपद्रवियों की पहचान शुरू कर दी है।

लेकिन असली समाधान पुलिस कार्रवाई नहीं, बल्कि ‘पॉलिसी रिव्यू’ है। जब तक UGC के नए नियमों पर झारखंड में बवाल के मूल कारणों (संसाधन, भाषा, अवसर की समानता) का समाधान नहीं होता, यह आग सुलगती रहेगी। शिक्षा को रणक्षेत्र बनने से बचाना हम सबकी सामूहिक जिम्मेदारी है।

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