शिक्षा के मंदिर या धोखे के व्यापार?
भारत जैसे विकासशील देश में, शिक्षा केवल साक्षर होने का प्रमाण नहीं है; यह करोड़ों युवाओं के लिए गरीबी से बाहर निकलने, सामाजिक सम्मान पाने और अपने तथा अपने परिवार के लिए एक बेहतर भविष्य के निर्माण का एकमात्र साधन है। माता-पिता अपनी जीवन भर की पूंजी अपने बच्चों की उच्च शिक्षा (Higher Education) पर खर्च कर देते हैं। लेकिन क्या हो जब वह ‘विश्वविद्यालय’ जहाँ आपने दाखिला लिया है, वह केवल कागजों पर या किसी किराए के छोटे से भवन में चलने वाला एक ‘फर्जी’ संस्थान निकले?
हाल ही में, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC – University Grants Commission) ने भारतीय शिक्षा प्रणाली की सफाई करते हुए एक अत्यंत सख्त और ऐतिहासिक कदम उठाया है। UGC ने देश भर में चल रहे 32 फर्जी विश्वविद्यालयों (Fake Universities) की एक सूची जारी की है और छात्रों तथा अभिभावकों को कड़ी चेतावनी दी है कि वे इन गैर-मान्यता प्राप्त संस्थानों में भूलकर भी प्रवेश न लें।
एक विश्लेषक के दृष्टिकोण से, यह खबर केवल 32 संस्थानों के बंद होने की नहीं है; यह भारत में जड़ जमा चुके एक बहुत बड़े ‘शिक्षा माफिया’ (Education Mafia) और ‘डिग्री मिल’ (Diploma Mills) के काले व्यापार को उजागर करती है।
1. UGC का एक्शन: 32 फर्जी विश्वविद्यालयों की कड़वी सच्चाई
UGC भारत में उच्च शिक्षा का सर्वोच्च नियामक (Apex Regulator) है। इसका मुख्य कार्य विश्वविद्यालयों को मान्यता देना, उनके पाठ्यक्रम के मानक तय करना और उन्हें वित्तीय अनुदान प्रदान करना है। जब UGC किसी संस्थान को ‘फर्जी’ (Fake) घोषित करता है, तो इसका सीधा अर्थ यह है कि उस संस्थान के पास छात्रों को डिग्री प्रदान करने का कोई कानूनी, संवैधानिक या वैधानिक अधिकार नहीं है।

ताजा घोषणा का अवलोकन:
UGC द्वारा जारी की गई 32 फर्जी विश्वविद्यालयों की सूची इस बात का प्रमाण है कि शिक्षा के नाम पर धोखाधड़ी किसी एक राज्य तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक अखिल भारतीय समस्या (Pan-India problem) बन चुकी है। इन 32 संस्थानों में से अधिकांश संस्थान ऐसे हैं जो केवल एक वेबसाइट, एक फैंसी नाम और आकर्षक ब्रोशर के दम पर चल रहे थे।
फर्जी विश्वविद्यालय क्या है? (What makes a University ‘Fake’?)
UGC अधिनियम, 1956 की धारा 22 के अनुसार, केवल वही संस्थान “डिग्री” (Degree) प्रदान कर सकता है जो:
- संसद के किसी अधिनियम (Central Act) द्वारा स्थापित हो।
- राज्य विधानमंडल के किसी अधिनियम (State Act) द्वारा स्थापित हो।
- धारा 3 के तहत ‘डीम्ड टू बी यूनिवर्सिटी’ (Deemed-to-be University) का दर्जा प्राप्त हो।
- संसदीय अधिनियम के तहत डिग्री देने के लिए विशेष रूप से सशक्त (Empowered) कोई संस्थान हो।
इन 32 संस्थानों में से किसी ने भी इन वैधानिक शर्तों को पूरा नहीं किया है। उन्होंने न तो सरकार से अनुमति ली है और न ही UGC के मानकों का पालन किया है।
2. भौगोलिक वितरण: किस राज्य में है शिक्षा माफिया का सबसे बड़ा जाल?
UGC की इस सूची का भौगोलिक विश्लेषण (Geographical Analysis) करने पर कुछ चौंकाने वाले पैटर्न सामने आते हैं। इन 32 फर्जी विश्वविद्यालयों का फैलाव पूरे देश में है, लेकिन कुछ राज्य इस धोखे के ‘हब’ (Hub) बन चुके हैं।
प्रभावित राज्यों का सांख्यिकीय रुझान (Trends based on standard UGC crackdowns):
| राज्य / केंद्र शासित प्रदेश | फर्जी विश्वविद्यालयों का घनत्व | विश्लेषण और कारण |
| उत्तर प्रदेश (UP) | सर्वाधिक | विशाल जनसंख्या, उच्च शिक्षा के लिए सीटों की कमी और टियर-2/टियर-3 शहरों में जागरूकता का अभाव शिक्षा माफियाओं को यहां पनपने का सबसे बड़ा अवसर देता है। |
| दिल्ली (Delhi/NCR) | अत्यधिक | देश की राजधानी होने के नाते, दिल्ली का पता (Address) छात्रों को बहुत आकर्षित करता है। कई फर्जी संस्थान केवल एक कमरे या बेसमेंट से ‘राष्ट्रीय’ या ‘अंतरराष्ट्रीय’ नाम वाली यूनिवर्सिटी चला रहे थे। |
| पश्चिम बंगाल | उच्च | ऐतिहासिक रूप से शिक्षा का केंद्र होने के कारण, धोखेबाज संस्थान महान शिक्षाविदों के नाम का दुरुपयोग करके यहाँ फर्जी बोर्ड और विश्वविद्यालय चलाते हैं। |
| ओडिशा / महाराष्ट्र | मध्यम | तकनीकी (Engineering/Management) और व्यावसायिक डिग्रियों की भारी मांग के कारण यहाँ फर्जी तकनीकी संस्थान सक्रिय पाए जाते हैं। |
| दक्षिण भारतीय राज्य | तुलनात्मक रूप से कम | केरल, कर्नाटक और तमिलनाडु में शिक्षा का बुनियादी ढांचा और राज्य स्तरीय नियामक अधिक सख्त हैं, इसलिए यहाँ ऐसे संस्थानों की संख्या उत्तर भारत की तुलना में कम है। |
3. ‘मोडस ऑपरेंडी’ (Modus Operandi): ये संस्थान छात्रों को कैसे फंसाते हैं?
यह सबसे बड़ा सवाल है कि 21वीं सदी के इंटरनेट युग में, जहाँ हर जानकारी उंगलियों पर उपलब्ध है, हजारों छात्र इन फर्जी विश्वविद्यालयों के जाल में कैसे फंस जाते हैं? इसके पीछे एक बहुत ही सोची-समझी मनोवैज्ञानिक और मार्केटिंग रणनीति काम करती है।

A. भव्य और भ्रामक वेबसाइटें (Deceptive Digital Presence):
इन 32 संस्थानों में से अधिकांश की वेबसाइटें भारत के असली और शीर्ष विश्वविद्यालयों (जैसे JNU, DU या BHU) से भी अधिक आकर्षक दिखती हैं। वेबसाइट पर विदेशी छात्रों की तस्वीरें, अंतरराष्ट्रीय सेमिनार के फर्जी वीडियो और बड़ी-बड़ी कंपनियों के लोगो (Logos) लगाए जाते हैं ताकि छात्र को लगे कि यह एक विश्वस्तरीय संस्थान है।
B. ‘अंतरराष्ट्रीय’ या ‘राष्ट्रीय’ शब्दों का दुरुपयोग:
ये संस्थान जानबूझकर अपने नाम के आगे “National”, “International”, “Indian Board of…”, “Global” या किसी महान स्वतंत्रता सेनानी का नाम जोड़ लेते हैं। उदाहरण के लिए, “कमर्शियल यूनिवर्सिटी लिमिटेड, दिल्ली” या “यूनाइटेड नेशंस यूनिवर्सिटी”। आम छात्र या ग्रामीण परिवेश से आने वाले माता-पिता इन भारी-भरकम नामों से प्रभावित हो जाते हैं और उन्हें लगता है कि यह कोई सरकारी या मान्यता प्राप्त संस्था है।
C. विदेशी विश्वविद्यालयों से फर्जी गठजोड़ (Fake Foreign Tie-ups):
छात्रों को यह लालच दिया जाता है कि उनका संस्थान अमेरिका, यूके या ऑस्ट्रेलिया की किसी यूनिवर्सिटी से मान्यता प्राप्त (Affiliated) है। वे दावा करते हैं कि कुछ सेमेस्टर भारत में पढ़ने के बाद छात्र को सीधे विदेश भेज दिया जाएगा।
D. 100% प्लेसमेंट की झूठी गारंटी:
भारत में बेरोजगारी एक बड़ी समस्या है। ये फर्जी विश्वविद्यालय इसी असुरक्षा का फायदा उठाते हैं। वे अपने ब्रोशर में ‘100% जॉब गारंटी’ और लाखों रुपये के फर्जी प्लेसमेंट पैकेज के दावे छापते हैं, जो हताश छात्रों के लिए एक बड़ा चुंबक साबित होता है।
E. आसान प्रवेश और कम फीस का लालच:
जहाँ असली विश्वविद्यालयों (IITs, IIMs, या केंद्रीय विश्वविद्यालयों) में प्रवेश के लिए कठिन प्रवेश परीक्षाएं (CUET, JEE, NEET) पास करनी पड़ती हैं और भारी फीस चुकानी पड़ती है, वहीं ये फर्जी संस्थान “डायरेक्ट एडमिशन” (Direct Admission) और “कम फीस में डिग्री” का लालच देते हैं।
4. कानूनी ढांचा: UGC अधिनियम, 1956 और ‘विश्वविद्यालय’ शब्द का उपयोग
भारत में उच्च शिक्षा का कानूनी ढांचा अत्यंत स्पष्ट है, फिर भी इन कानूनों में कुछ ऐसी खामियां रही हैं जिनका फायदा उठाकर ये संस्थान वर्षों तक चलते रहे। आइए इस कानूनी पहलू को विस्तार से समझें।
UGC Act 1956 की धारा 23: “विश्वविद्यालय” शब्द का संरक्षण
कानून की यह धारा स्पष्ट रूप से कहती है कि कोई भी संस्थान (Institution), जब तक कि वह किसी केंद्रीय अधिनियम, प्रांतीय अधिनियम, या राज्य अधिनियम द्वारा स्थापित न हो, या उसे ‘डीम्ड यूनिवर्सिटी’ का दर्जा प्राप्त न हो, अपने नाम के साथ “विश्वविद्यालय” (University) शब्द का प्रयोग किसी भी रूप में नहीं कर सकता।
इन 32 फर्जी विश्वविद्यालयों ने सबसे पहला और सबसे बड़ा अपराध इसी धारा का उल्लंघन करके किया है। उन्होंने अवैध रूप से अपने बोर्ड और वेबसाइटों पर ‘यूनिवर्सिटी’ शब्द का इस्तेमाल किया।

सजा और जुर्माने की विडंबना (The Irony of Penalties):
UGC अधिनियम की धारा 24 के तहत, यदि कोई संस्थान फर्जी डिग्री बांटता है या नियमों का उल्लंघन करता है, तो उस पर जुर्माना लगाने का प्रावधान है। लेकिन विडंबना यह है कि यह जुर्माना राशि ऐतिहासिक रूप से बहुत कम (महज कुछ हजार रुपये) रही है। हालांकि अब इसमें संशोधन के प्रयास हुए हैं, लेकिन कमजोर दंडात्मक कार्रवाई के कारण शिक्षा माफिया एक संस्थान बंद होने पर दूसरे नाम से नई ‘दुकान’ खोल लेते हैं।
UGC का वर्तमान एक्शन केवल एक चेतावनी नहीं है, बल्कि यह राज्य सरकारों और पुलिस प्रशासन के लिए एक निर्देश है कि वे इन 32 संस्थानों के प्रमोटरों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) के तहत धोखाधड़ी, जालसाजी (Forgery) और आपराधिक साजिश के सख्त मुकदमे दर्ज करें।
5. विनाशकारी प्रभाव: छात्रों के जीवन और भविष्य पर क्या असर पड़ता है?
जब एक छात्र को यह पता चलता है कि उसने जिस संस्थान में अपने जीवन के तीन या चार कीमती साल और लाखों रुपये लगाए हैं, वह फर्जी है, तो इसका मनोवैज्ञानिक और आर्थिक प्रभाव विनाशकारी होता है।
- डिग्री कागज का एक बेकार टुकड़ा: इन 32 संस्थानों से प्राप्त की गई कोई भी डिग्री (BA, B.Sc, B.Tech, MBA, Ph.D) पूरी तरह से अमान्य (Invalid) है। इस डिग्री का उपयोग किसी भी सरकारी नौकरी (UPSC, SSC, State PSC, Banking), रक्षा सेवाओं, या मान्यता प्राप्त निजी कंपनियों में नौकरी पाने के लिए नहीं किया जा सकता।
- उच्च शिक्षा के रास्ते बंद:यदि किसी छात्र ने इन फर्जी विश्वविद्यालयों से ग्रेजुएशन किया है, तो वह भारत या विदेश के किसी भी असली विश्वविद्यालय में पोस्ट-ग्रेजुएशन (मास्टर्स) या पीएचडी के लिए आवेदन नहीं कर सकता।
- आर्थिक बर्बादी:मध्यम वर्गीय और गरीब परिवारों ने अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए बैंक से जो ‘एजुकेशन लोन’ (Education Loan) लिया होता है, वह पैसा पूरी तरह से डूब जाता है। बैंक लोन की ईएमआई (EMI) माफ नहीं करता, और छात्र के पास नौकरी न होने के कारण परिवार कर्ज के दलदल में फंस जाता है।
- मनोवैज्ञानिक आघात (Psychological Trauma):समाज में बदनामी का डर और अपने करियर के बर्बाद होने का अहसास छात्रों को गहरे अवसाद (Depression) में धकेल देता है। कई मामलों में छात्रों का आत्मविश्वास पूरी तरह से टूट जाता है।
6. सत्यापन गाइड: एक वैध और फर्जी विश्वविद्यालय की पहचान कैसे करें? (Step-by-Step Verification)
छात्रों और अभिभावकों को अब आंख मूंदकर किसी भी संस्थान पर भरोसा नहीं करना चाहिए। किसी भी कॉलेज या यूनिवर्सिटी में दाखिला लेने से पहले ‘डिजिटल वेरिफिकेशन’ (Digital Verification) करना अत्यंत आवश्यक है।
यहाँ वह प्रक्रिया दी गई है जिससे आप कुछ ही मिनटों में एक असली और फर्जी विश्वविद्यालय के बीच का अंतर पहचान सकते हैं:
कदम 1: UGC की आधिकारिक वेबसाइट की जांच करें (The Holy Grail)
यह सबसे पहला और सबसे प्रामाणिक कदम है।
- सीधे ugc.gov.in या ugc.ac.in पर जाएं।
- ‘Universities’ या ‘Higher Education Institutions (HEIs)’ वाले टैब पर क्लिक करें।
- यहाँ आपको केंद्रीय, राज्य, निजी और डीम्ड विश्वविद्यालयों की अद्यतन (Updated) सूचियां मिलेंगी।
- यदि आप जिस विश्वविद्यालय में दाखिला ले रहे हैं, उसका नाम इन सूचियों में नहीं है, तो तुरंत सतर्क हो जाएं। UGC की वेबसाइट पर ‘Fake Universities’ का एक अलग सेक्शन भी है, जहाँ आप इन 32 संस्थानों के नाम देख सकते हैं।
कदम 2: NAAC प्रत्यायन (NAAC Accreditation) की जांच करें
राष्ट्रीय मूल्यांकन एवं प्रत्यायन परिषद (NAAC) भारत में उच्च शिक्षा संस्थानों की गुणवत्ता का आकलन करती है और उन्हें ग्रेड (A++, A+, A, B आदि) देती है।
- फर्जी विश्वविद्यालयों के पास कभी भी NAAC ग्रेडिंग नहीं होती। संस्थान की वेबसाइट पर NAAC का लोगो होना ही काफी नहीं है, NAAC की आधिकारिक वेबसाइट (naac.gov.in) पर जाकर उस संस्थान का नाम खोजें।
कदम 3: NIRF रैंकिंग (National Institutional Ranking Framework)
शिक्षा मंत्रालय द्वारा हर साल भारत के शीर्ष संस्थानों की NIRF रैंकिंग जारी की जाती है। यदि कोई संस्थान दावा करता है कि वह भारत के सर्वश्रेष्ठ संस्थानों में से एक है, तो उसका नाम NIRF रैंकिंग सूची में अवश्य होना चाहिए।
कदम 4: वाइस चांसलर (VC) और फैकल्टी की प्रोफाइल जांचें
एक प्रामाणिक विश्वविद्यालय के कुलपति (Vice-Chancellor) और प्रोफेसरों का एक मजबूत अकादमिक इतिहास होता है (जैसे उनके रिसर्च पेपर, पुरानी नौकरियां)। फर्जी विश्वविद्यालयों की वेबसाइट पर अक्सर फैकल्टी के नाम या तो गायब होते हैं या फर्जी तस्वीरें (Stock Photos) लगाई गई होती हैं। उनके नामों को ‘LinkedIn’ या ‘Google Scholar’ पर सर्च करें।
कदम 5: भ्रामक विज्ञापनों से बचें (Beware of Hyper-Marketing)
यदि कोई विश्वविद्यालय आपको बार-बार फोन करके (Telecalling) एडमिशन लेने का दबाव डाल रहा है, बिना किसी एंट्रेंस टेस्ट के ‘तुरंत एडमिशन’ का ऑफर दे रहा है, या ‘फीस में भारी छूट’ की बात कर रहा है, तो यह ‘रेड फ्लैग’ (Red Flag) है। अच्छे विश्वविद्यालयों को छात्रों के पीछे भागने की आवश्यकता नहीं होती; छात्र उनके पास जाते हैं।
7. व्यवस्था की खामियां: ये ‘डिग्री मिल’ (Diploma Mills) बार-बार क्यों पनपते हैं?
UGC ने यह कार्रवाई की है, जो सराहनीय है। लेकिन यह सवाल समाजशास्त्रियों और शिक्षाविदों को परेशान करता है कि 32 विश्वविद्यालयों को इस स्तर तक पहुंचने ही क्यों दिया गया? क्या नियामक तंत्र (Regulatory mechanism) सोया हुआ था?
- कार्रवाई में देरी (Delayed Action):UGC आमतौर पर तब कार्रवाई करता है जब उसे कई शिकायतें मिल चुकी होती हैं और तब तक हजारों छात्र ठगे जा चुके होते हैं। प्रो-एक्टिव (Pro-active) सर्विलांस की भारी कमी है।
- स्थानीय और राजनीतिक संरक्षण (Local Patronage):कई मामलों में देखा गया है कि इन फर्जी संस्थानों के प्रमोटर रसूखदार लोग होते हैं। स्थानीय पुलिस और प्रशासन अक्सर इनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने से कतराते हैं, जिससे इन्हें वर्षों तक फलने-फूलने का मौका मिलता है।
- मुकदमों की धीमी गति (Slow Judicial Process):भारत की न्याय प्रणाली में मुकदमों के निपटारे में लगने वाला लंबा समय भी इन शिक्षा माफियाओं का हौसला बढ़ाता है। जब तक अदालत से सजा होती है, तब तक वे करोड़ों रुपये कमाकर किसी और शहर में नया फर्जी संस्थान खोल लेते हैं।
- मांग और आपूर्ति का भारी अंतर (Demand-Supply Gap):भारत में हर साल लाखों छात्र 12वीं कक्षा पास करते हैं, लेकिन गुणवत्तापूर्ण उच्च शिक्षा (Quality Higher Education) संस्थानों में सीटें बहुत सीमित हैं। अच्छी जगह एडमिशन न मिल पाने की हताशा में छात्र इन फर्जी संस्थानों के आसान ‘एडमिशन ट्रैप’ में फंस जाते हैं।
8. वैश्विक परिदृश्य: क्या यह केवल भारत की समस्या है?
यह जानना दिलचस्प होगा कि फर्जी विश्वविद्यालयों या ‘डिप्लोमा मिल्स’ (Diploma Mills) की समस्या केवल भारत तक सीमित नहीं है। यह एक वैश्विक ‘सिंडिकेट’ (Global Syndicate) है।
- संयुक्त राज्य अमेरिका (USA): अमेरिका में भी सैकड़ों ऐसे असंबद्ध (Unaccredited) संस्थान हैं जो पैसे लेकर रातों-रात मास्टर या पीएचडी की डिग्री मेल (Mail) कर देते हैं। वहां इन्हें ‘डिग्री मिल’ कहा जाता है।
- यूनाइटेड किंगडम (UK): ब्रिटेन में फर्जी ‘ऑक्सब्रिज’ (Oxbridge) स्टाइल के नाम रखकर विदेशी छात्रों (विशेषकर एशियाई और अफ्रीकी) को ठगने वाले कई संस्थानों का पर्दाफाश हो चुका है।
हालांकि, विकसित देशों ने ब्लॉकचेन (Blockchain) तकनीक और डिजिटल डिग्री रिपॉजिटरी के माध्यम से इस पर काफी हद तक लगाम लगाई है। भारत सरकार द्वारा शुरू किया गया “नेशनल एकेडमिक डिपॉजिटरी (NAD) – DigiLocker” एक शानदार कदम है, जहाँ सभी प्रामाणिक डिग्रियों को डिजिटल रूप से सहेजा जा रहा है। यदि किसी विश्वविद्यालय की डिग्री NAD पर उपलब्ध नहीं है, तो उसके फर्जी होने की संभावना बहुत अधिक है।
9. समाधान और भविष्य का रोडमैप: शिक्षा के शुद्धिकरण के लिए क्या किया जाना चाहिए?
32 फर्जी विश्वविद्यालयों की घोषणा एक ‘सफाई अभियान’ है, लेकिन इस बीमारी का जड़ से इलाज करने के लिए कुछ कठोर ढांचागत सुधार (Structural Reforms) की आवश्यकता है:
- UGC को अधिक शक्ति (More Teeth to UGC): UGC के पास केवल चेतावनी जारी करने या पुलिस में FIR दर्ज कराने का अधिकार है। UGC को सीधे इन परिसरों (Campuses) को सील करने और उनकी संपत्तियों को कुर्क करने के लिए एक विशेष टास्क फोर्स (Special Task Force) बनाने का अधिकार दिया जाना चाहिए।
- सजा का कड़ा प्रावधान (Stringent Laws):शिक्षा के नाम पर धोखाधड़ी को ‘संगठित अपराध’ (Organized Crime) की श्रेणी में रखा जाना चाहिए। ऐसे अपराधों के लिए 10 साल से कम की सजा और भारी वित्तीय दंड का प्रावधान नहीं होना चाहिए।
- जागरूकता अभियान (Aggressive Awareness Campaigns):जिस तरह सरकार ‘जागो ग्राहक जागो’ या पोलियो के खिलाफ राष्ट्रीय अभियान चलाती है, उसी तरह ‘सही शिक्षा, सही चुनाव’ के लिए हर पंचायत, स्कूल और टेलीविजन पर बड़े स्तर का जागरूकता अभियान चलाया जाना चाहिए। छात्रों को 12वीं कक्षा में ही सिखाया जाना चाहिए कि असली कॉलेज की पहचान कैसे करें।
- तकनीक का इस्तेमाल (Tech-Driven Audits):कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) का उपयोग करके इंटरनेट पर चल रही संदिग्ध वेबसाइटों और उनके दावों को रियल-टाइम में स्कैन किया जाना चाहिए, ताकि कोई नया फर्जी विश्वविद्यालय अपनी दुकान शुरू करने से पहले ही पकड़ा जा सके।
सतर्कता ही सुरक्षा है
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा 32 फर्जी विश्वविद्यालयों की यह सूची जारी करना देश के उच्च शिक्षा परिदृश्य को स्वच्छ और पारदर्शी बनाने की दिशा में एक ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ के समान है। यह कार्रवाई स्पष्ट संदेश देती है कि शिक्षा के बाज़ारीकरण की आड़ में छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ करने वालों को बख्शा नहीं जाएगा।
लेकिन इस लड़ाई में सबसे बड़ी भूमिका स्वयं छात्रों और उनके अभिभावकों की है। शिक्षा कोई ऐसा उत्पाद नहीं है जिसे आप किसी आकर्षक विज्ञापन को देखकर तुरंत खरीद लें; यह आपके जीवन की सबसे बड़ी और महत्वपूर्ण ‘इन्वेस्टमेंट’ (Investment) है। दाखिला लेने से पहले संस्थानों की पृष्ठभूमि (Background) की जांच करने में थोड़ा समय बिताना, आपके वर्षों के समय, मेहनत और लाखों रुपयों को डूबने से बचा सकता है। यह 32 विश्वविद्यालयों की सूची एक चेतावनी है—शिक्षा के मंदिर में प्रवेश करने से पहले यह सुनिश्चित कर लें कि वहां सरस्वती का वास है, न कि किसी ठग का।
