राष्ट्रपति मुर्मू

भारतीय राजनीति और संवैधानिक गरिमा के इतिहास में 7 मार्च 2026 का दिन एक ऐसे अप्रिय विवाद के लिए दर्ज हो गया है, जिसने न केवल एक राज्य और केंद्र के बीच की खाई को चौड़ा किया है, बल्कि देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद के सम्मान और आदिवासी अस्मिता पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

पश्चिम बंगाल के सिलीगुड़ी (दार्जिलिंग जिला) में आयोजित 9वें अंतर्राष्ट्रीय संथाल सम्मेलन (9th International Santhal Conclave) में देश की महामहिम राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू (President Droupadi Murmu) के साथ हुए कथित प्रोटोकॉल उल्लंघन और ऐन मौके पर कार्यक्रम स्थल (Venue) बदले जाने की घटना ने एक बड़े राष्ट्रीय राजनीतिक तूफान को जन्म दे दिया है। इस घटना से व्यथित होकर ओडिशा के मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी (Mohan Charan Majhi) ने बेहद कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए इसे ‘लॉजिस्टिक समस्या’ मानने से साफ इनकार कर दिया है।

1. विवाद की जड़: सिलीगुड़ी में 7 मार्च 2026 को असल में क्या हुआ था?

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू, जो स्वयं संथाल आदिवासी समुदाय से आती हैं और ओडिशा के रायरंगपुर (Rairangpur) से ताल्लुक रखती हैं, को दार्जिलिंग जिले के सिलीगुड़ी में 9वें अंतर्राष्ट्रीय संथाल सम्मेलन में मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया था। यह संथाल समुदाय का एक बहुत बड़ा और प्रतिष्ठित वार्षिक आयोजन है।

कार्यक्रम स्थल का अंतिम समय में बदलाव: तय कार्यक्रम के अनुसार, यह विशाल जनसभा सिलीगुड़ी के विधाननगर (Bidhannagar – फांसीदेवा ब्लॉक) में आयोजित होनी थी। विधाननगर एक ऐसा क्षेत्र है जहां आदिवासी आबादी, विशेषकर संथाल लोगों की संख्या काफी अधिक है और वहां एक बड़ा मैदान उपलब्ध है जहाँ लाखों लोग आसानी से एकत्रित हो सकते थे।

लेकिन, राष्ट्रपति के दौरे से ठीक पहले पश्चिम बंगाल के स्थानीय प्रशासन (जिला प्रशासन और पुलिस) ने सुरक्षा, भारी भीड़ और ‘लॉजिस्टिक’ (Logistical) कारणों का हवाला देते हुए विधाननगर में अनुमति देने से इनकार कर दिया। इसके बजाय, प्रशासन ने बागडोगरा हवाई अड्डे के करीब स्थित गोसाईंपुर (Gossainpur) में एक बहुत छोटे और असुविधाजनक स्थान पर कार्यक्रम को स्थानांतरित कर दिया।

नतीजा – खाली कुर्सियां और मायूस आदिवासी: गोसाईंपुर में कार्यक्रम स्थल इतना दूर और असुविधाजनक था कि सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए दूर-दराज से आए हजारों संथाल भाई-बहन वहां पहुँच ही नहीं सके। जब राष्ट्रपति मुर्मू कार्यक्रम स्थल पर पहुंचीं, तो वहां उपस्थित लोगों की संख्या निराशाजनक रूप से कम थी। यह देखकर राष्ट्रपति खुद को रोक नहीं पाईं और उन्होंने मंच से ही अपना दर्द और नाराजगी व्यक्त कर दी।

2. ओडिशा के सीएम मोहन चरण माझी का फूटा गुस्सा: “यह ओडिया और आदिवासियों का अपमान है”

राष्ट्रपति के इस अपमानजनक अनुभव की गूंज सबसे तेज ओडिशा में सुनाई दी। ओडिशा के मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी, जो स्वयं एक मुखर आदिवासी नेता और संथाल समुदाय से आते हैं, ने शनिवार (7 मार्च 2026) की देर रात सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ (पूर्व में ट्विटर) पर एक लंबा और कड़ा बयान जारी किया।

सीएम माझी ने अपने बयान में स्पष्ट किया कि पश्चिम बंगाल की तृणमूल कांग्रेस (TMC) सरकार की इस हरकत को केवल एक “प्रशासनिक या लॉजिस्टिक समस्या” कहकर खारिज नहीं किया जा सकता।

सीएम माझी के बयान के मुख्य बिंदु:

  1. संवैधानिक गरिमा को ठेस: उन्होंने लिखा, “भारत के राष्ट्रपति का पद हमारे गणतंत्र का सर्वोच्च संवैधानिक पद है। यह राजनीतिक मतभेदों से ऊपर है और संविधान की गरिमा का प्रतिनिधित्व करता है। इस पद की पवित्रता को कम करने वाली कोई भी कार्रवाई हमारे संवैधानिक ढांचे के प्रति सम्मान को कम करती है।”
  2. आदिवासी संवेदनशीलता की कमी: मुख्यमंत्री ने कहा, “अंतर्राष्ट्रीय संथाल सम्मेलन की अनुमति न देना और अचानक कार्यक्रम स्थल को बदलना महज ‘लॉजिस्टिक समस्या’ नहीं है। एक ऐसा अवसर जिसे संथाल समुदाय की समृद्ध विरासत का जश्न मनाने के लिए आयोजित किया गया था, उसे वह सम्मान नहीं मिला जिसका वह हकदार था। यह हमारे आदिवासी भाई-बहनों के प्रति प्रशासन की संवेदनहीनता को दर्शाता है।”
  3. ओडिशा का गौरव आहत: सीएम माझी ने राष्ट्रपति की पृष्ठभूमि का जिक्र करते हुए भावुक अंदाज में कहा, “श्रीमती मुर्मू जी, जो हमारे ओडिशा की माटी की बेटी हैं और रायरंगपुर से उठकर राष्ट्रपति भवन तक पहुंची हैं, वह करोड़ों लोगों की आकांक्षाओं और गौरव का प्रतीक हैं। संथाल समुदाय के एक सदस्य के रूप में, पश्चिम बंगाल सरकार की इस हरकत ने मेरे और पूरी ओडिया आबादी के मन में गहरा दुख और पीड़ा पैदा की है।”
  4. संकीर्ण राजनीति: उन्होंने स्पष्ट किया कि हमारे जीवंत लोकतंत्र में ऐसी ‘संकीर्ण राजनीतिक सोच’ के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए।

सीएम माझी का यह बयान सिर्फ एक राजनीतिक प्रहार नहीं था, बल्कि यह उस सांस्कृतिक और भावनात्मक जुड़ाव का प्रकटीकरण था जो ओडिशा का हर नागरिक अपनी माटी की बेटी द्रौपदी मुर्मू के साथ महसूस करता है।

3. मंच से छलका राष्ट्रपति मुर्मू का दर्द: “क्या ममता दीदी मुझसे नाराज हैं?”

आमतौर पर भारत के राष्ट्रपति सार्वजनिक मंचों पर राज्यों के प्रशासन की आलोचना करने से बचते हैं। लेकिन 7 मार्च को सिलीगुड़ी में जो हुआ, उसने राष्ट्रपति की सहनशीलता की सीमा को पार कर दिया। गोसाईंपुर के खाली मैदान को देखकर राष्ट्रपति मुर्मू ने अपने लिखित भाषण से हटकर दिल से अपनी बात रखी।

राष्ट्रपति के भावुक बोल:

  • “उन्होंने (प्रशासन) कहा था कि वह जगह (विधाननगर) बहुत भीड़भाड़ वाली है, आप वहां नहीं जा पाएंगी। लेकिन मुझे लगता है कि वहां आसानी से पांच लाख लोग इकट्ठा हो सकते थे। मुझे नहीं पता कि प्रशासन के दिमाग में क्या चल रहा था कि उन्होंने सम्मेलन के लिए ऐसी जगह चुनी जहां मेरे संथाल लोग पहुंच ही नहीं सके।”
  • “मैं बहुत दुखी हूं कि यहां के लोग सम्मेलन तक नहीं पहुंच पाए क्योंकि इसे इतनी दूर आयोजित किया गया। शायद राज्य सरकार नहीं चाहती कि भारी संख्या में आदिवासी समुदाय इकट्ठा हो।”

प्रोटोकॉल उल्लंघन पर ममता बनर्जी का जिक्र: प्रोटोकॉल के अनुसार राष्ट्रपति की अगवानी के लिए राज्य के मुख्यमंत्री या किसी वरिष्ठ कैबिनेट मंत्री का होना अनिवार्य है। लेकिन बागडोगरा एयरपोर्ट पर उन्हें रिसीव करने के लिए केवल सिलीगुड़ी के मेयर (गौतम देब), दार्जिलिंग के डीएम और पुलिस कमिश्नर मौजूद थे। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी या उनके मंत्रिमंडल का कोई सदस्य वहां नहीं था।

इस पर राष्ट्रपति ने बेहद शालीन लेकिन चुभने वाले अंदाज में कहा:

  • “ममता बनर्जी मेरी छोटी बहन जैसी हैं। मैं भी बंगाल की बेटी हूं (पड़ोसी राज्य होने के नाते)। मुझे नहीं पता कि क्या वह मुझसे नाराज हैं। खैर, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। आप सब खुश रहें।”

राष्ट्रपति का यह बयान भारतीय राजनीतिक इतिहास में एक दुर्लभ क्षण था, जब राष्ट्र प्रमुख ने सीधे तौर पर किसी मुख्यमंत्री की गैरमौजूदगी पर इस तरह अपनी पीड़ा व्यक्त की हो।

4. क्या है ‘द ब्लू बुक’ (The Blue Book) और कैसे हुआ प्रोटोकॉल का उल्लंघन?

एक आम पाठक के मन में यह सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर यह ‘प्रोटोकॉल’ (Protocol) होता क्या है और इसे न मानने पर इतना बड़ा विवाद क्यों हो रहा है? आइए इसे तकनीकी और प्रशासनिक नजरिए (EEAT Expertise) से समझते हैं।

भारत में वीवीआईपी (VVIP) हस्तियों—विशेषकर राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति और प्रधानमंत्री—की सुरक्षा और आधिकारिक दौरों के लिए गृह मंत्रालय (MHA) द्वारा एक अति-गोपनीय और विस्तृत मार्गदर्शिका तैयार की गई है, जिसे ‘द ब्लू बुक’ (The Blue Book) कहा जाता है।

राष्ट्रपति के दौरे के नियम:

  1. अगवानी (Reception at the Airport): जब भी देश के राष्ट्रपति किसी राज्य के आधिकारिक दौरे पर आते हैं, तो यह राज्य सरकार का संवैधानिक दायित्व है कि राज्य के राज्यपाल (Governor), मुख्यमंत्री (Chief Minister), या यदि मुख्यमंत्री अपरिहार्य कारणों से उपलब्ध नहीं हैं, तो राज्य के मुख्य सचिव (Chief Secretary), पुलिस महानिदेशक (DGP) और एक वरिष्ठ कैबिनेट मंत्री हवाई अड्डे पर उनकी अगवानी करें।
  2. समारोह में उपस्थिति: राष्ट्रपति जिस सार्वजनिक समारोह में मुख्य अतिथि होते हैं, वहां राज्य सरकार के उच्च प्रतिनिधियों का होना अनिवार्य है ताकि यह प्रदर्शित हो सके कि राज्य अपने राष्ट्र प्रमुख का सम्मान कर रहा है।
  3. कार्यक्रम स्थल का निर्धारण (ASL – Advanced Security Liaison): कार्यक्रम स्थल का चयन एडवांस सिक्योरिटी लाइजन (ASL) की बैठक में तय होता है, जिसमें राष्ट्रपति सचिवालय, आईबी (IB), और राज्य पुलिस शामिल होती है। राज्य सरकार को पर्याप्त सुरक्षा और लॉजिस्टिक सहायता प्रदान करनी होती है।

सिलीगुड़ी में क्या गलत हुआ?

  • ममता बनर्जी (CM) वहां नहीं थीं।
  • बंगाल सरकार का कोई भी कैबिनेट मंत्री मंच साझा करने या एयरपोर्ट पर रिसीव करने नहीं आया।
  • सिर्फ सिलीगुड़ी नगर निगम के मेयर, डीएम और सीपी ने राष्ट्रपति को रिसीव किया और विदा किया।
  • आयोजकों (अंतर्राष्ट्रीय संथाल परिषद) को अंतिम समय में स्थान बदलने के लिए मजबूर किया गया, जिससे कार्यक्रम वस्तुतः विफल हो गया।

उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ (Jagdeep Dhankhar) ने भी इसे स्पष्ट करते हुए कहा, “संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति के सम्मान में होने वाली ऐसी चूक अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है और इसे किसी भी सूरत में स्वीकार नहीं किया जा सकता।”

5. पश्चिम बंगाल सरकार और ममता बनर्जी का आक्रामक पलटवार

जैसे ही राष्ट्रपति का बयान मीडिया में आया और बीजेपी (BJP) तथा अन्य दलों ने टीएमसी (TMC) सरकार को घेरना शुरू किया, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अपनी चिर-परिचित आक्रामक शैली में पलटवार किया।

“हम पर झूठे आरोप लगाए जा रहे हैं” ममता बनर्जी ने स्पष्ट किया कि उनकी सरकार ने इस कार्यक्रम को रोकने या बाधित करने का कोई प्रयास नहीं किया। उन्होंने कहा:

  • “मुझ पर यह आरोप लगाया जा रहा है कि हमने लोगों को आने नहीं दिया। यह राज्य सरकार का आधिकारिक कार्यक्रम नहीं था। यह एक निजी एनजीओ (NGO) का कार्यक्रम था। राज्य सरकार को तो इसकी पूरी जानकारी भी नहीं दी गई थी।”
  • प्रशासन के अधिकारियों ने बताया कि आयोजक (अंतर्राष्ट्रीय संथाल परिषद) इतने बड़े आयोजन के लिए ‘तैयार नहीं’ थे। विधाननगर जैसी भीड़भाड़ वाली जगह पर राष्ट्रपति की सुरक्षा सुनिश्चित करना मुश्किल था, इसीलिए ASL (एडवांस सिक्योरिटी लाइजन) की सिफारिश के बाद राष्ट्रपति सचिवालय को लिखित में सूचित करके जगह बदली गई थी।

मणिपुर का मुद्दा उठाकर राष्ट्रपति पर निशाना: ममता बनर्जी यहीं नहीं रुकीं। उन्होंने राष्ट्रपति को भी राजनीति न करने की सलाह दे डाली। ममता ने कहा:

  • “मेरे मन में राष्ट्रपति के प्रति गहरा सम्मान है, लेकिन उन्हें भारतीय जनता पार्टी (BJP) की सलाह पर राजनीति नहीं करनी चाहिए। जब मणिपुर में आदिवासियों पर इतने अत्याचार हो रहे थे, महिलाओं को निर्वस्त्र घुमाया जा रहा था, तब आप (राष्ट्रपति) चुप क्यों थीं? तब आपने विरोध क्यों नहीं किया? जब दूसरे राज्यों में आदिवासियों पर जुल्म होता है, तो आप खामोश रहती हैं, केवल बंगाल को ही निशाना क्यों बनाया जा रहा है?”

ममता बनर्जी ने अपनी पार्टी के नेताओं को यह निर्देश भी दिया है कि वे राष्ट्रपति से मिलने का समय मांगें और उन्हें एक विस्तृत रिपोर्ट सौंपें कि तृणमूल सरकार ने बंगाल में आदिवासियों के कल्याण के लिए क्या-क्या ऐतिहासिक काम किए हैं।

6. राष्ट्रीय राजनीति में भूचाल: पीएम मोदी से लेकर मायावती तक का कड़ा रुख

इस घटना ने एक क्षेत्रीय प्रशासनिक मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर की राजनीतिक बहस में बदल दिया है। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के घटक दलों के साथ-साथ विपक्षी नेताओं ने भी इस मुद्दे पर अपनी राय रखी है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का प्रहार: पीएम मोदी ने इस घटना को “शर्मनाक और अभूतपूर्व” (Shameful and unprecedented) करार दिया। उन्होंने कहा, “तृणमूल कांग्रेस की सरकार ने सचमुच सारी हदें पार कर दी हैं। यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि पश्चिम बंगाल सरकार संथाल संस्कृति जैसे महत्वपूर्ण विषय को इतनी हल्के में ले रही है। राष्ट्रपति का पद राजनीति से ऊपर है, और इस पद की गरिमा को हमेशा बरकरार रखा जाना चाहिए।”

आंध्र प्रदेश के सीएम चंद्रबाबू नायडू: एनडीए के प्रमुख सहयोगी और आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू ने भी इस ‘प्रोटोकॉल उल्लंघन’ पर गहरी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि देश के सर्वोच्च संवैधानिक कार्यालय की गरिमा को बनाए रखना किसी भी राज्य सरकार का पहला कर्तव्य है।

बहुजन समाज पार्टी (BSP) सुप्रीमो मायावती: दलित और शोषित वर्गों की राजनीति करने वाली उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने भी इस घटना की निंदा की। उन्होंने कहा, “राष्ट्रपति के पद का सम्मान संविधान के आदर्शों और गरिमा के अनुसार किया जाना चाहिए। इस मुद्दे पर राजनीति से बचना चाहिए। जो कुछ भी बंगाल में हुआ, वह देश की लोकतांत्रिक छवि के लिए अच्छा नहीं है।”

एआईएडीएमके (AIADMK) नेता एडापड्डी पलानीस्वामी और टी.टी.वी. दिनाकरण: दक्षिण भारत से भी इस घटना की कड़ी निंदा हुई। तमिलनाडु के पूर्व सीएम पलानीस्वामी ने इसे ‘अस्वीकार्य’ बताया, जबकि एएमएमके नेता टी.टी.वी. दिनाकरण ने ममता बनर्जी से आदिवासी समुदायों से तुरंत माफी मांगने की मांग की है।

7. केंद्र का एक्शन: गृह मंत्रालय ने मांगा पश्चिम बंगाल से जवाब

यह विवाद केवल जुबानी जंग तक सीमित नहीं रहा है। भारत सरकार के गृह मंत्रालय (Ministry of Home Affairs – MHA) ने इस मामले को बेहद गंभीरता से लिया है।

सूत्रों के अनुसार, केंद्र सरकार ने पश्चिम बंगाल सरकार को आधिकारिक नोटिस भेजकर इस “प्रोटोकॉल में हुई भारी चूक” (Protocol Lapses) पर विस्तृत रिपोर्ट तलब की है। केंद्र ने विशेष रूप से यह पूछा है कि:

  • दार्जिलिंग के जिला मजिस्ट्रेट (DM), सिलीगुड़ी के पुलिस कमिश्नर (CP) और अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट (ADM) के खिलाफ क्या कार्रवाई की गई है?
  • जब कार्यक्रम कई महीनों से प्रस्तावित था, तो अंतिम 24 घंटों में कार्यक्रम स्थल क्यों बदला गया?
  • क्या जानबूझकर ऐसा स्थान चुना गया जहां आदिवासी लोग एकत्रित न हो सकें?

यह कदम केंद्र और राज्य (ममता बनर्जी सरकार) के बीच चल रहे स्थायी टकराव (Federal Friction) में एक और नया अध्याय जोड़ता है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि बंगाल के मुख्य सचिव इस नोटिस का क्या कानूनी और प्रशासनिक जवाब देते हैं।

8. संथाल समुदाय का इतिहास और उनका सांस्कृतिक महत्व (The Pride of Santhals)

इस पूरे विवाद के केंद्र में ‘संथाल’ समुदाय है। जब तक हम संथालों के गौरवशाली इतिहास और उनकी संस्कृति को नहीं समझेंगे, तब तक हम यह नहीं समझ पाएंगे कि ओडिशा के सीएम मोहन माझी और राष्ट्रपति मुर्मू को इस घटना से इतनी गहरी ठेस क्यों पहुंची है।

संथाल कौन हैं? संथाल (Santhal) भारत के सबसे बड़े आदिवासी समूहों में से एक हैं। इनकी बहुतायत मुख्य रूप से झारखंड, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, बिहार और असम में पाई जाती है। इसके अलावा नेपाल और बांग्लादेश में भी बड़ी संख्या में संथाल निवास करते हैं।

संथाल हूल (Santhal Rebellion – 1855): भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में 1857 की क्रांति से भी दो साल पहले, 1855 में संथाल आदिवासियों ने ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी और भ्रष्ट जमींदारों के खिलाफ एक भयंकर विद्रोह किया था, जिसे ‘संथाल हूल’ कहा जाता है। सिदो (Sido), कान्हू (Kanhu), चांद और भैरव मुर्मू नामक भाइयों के नेतृत्व में हुए इस विद्रोह में हजारों संथालों ने अपने तीरों और कुल्हाड़ियों से अंग्रेजों की बंदूकों का सामना किया था और शहादत दी थी। उनका यह अदम्य साहस आज भी आदिवासी अस्मिता का प्रतीक है।

संथाली भाषा और संविधान की 8वीं अनुसूची: संथालों की अपनी एक समृद्ध भाषा है—’संथाली’ (Santhali), जिसकी अपनी एक लिपि है जिसे ‘ओल चिकी’ (Ol Chiki) कहा जाता है। 22 दिसंबर 2003 को भारतीय संसद ने 92वें संविधान संशोधन के माध्यम से संथाली भाषा को संविधान की 8वीं अनुसूची (Eighth Schedule) में शामिल किया था। यह आदिवासी भाषाओं के लिए एक ऐतिहासिक जीत थी।

अंतर्राष्ट्रीय संथाल सम्मेलन की महत्ता: सिलीगुड़ी में आयोजित हो रहा 9वां अंतर्राष्ट्रीय संथाल सम्मेलन इसी संस्कृति, भाषा और इतिहास का जश्न मनाने के लिए था। जब महामहिम राष्ट्रपति, जो खुद संथाल हैं, वहां आ रही थीं, तो यह पूरे विश्व के संथालों के लिए एक गर्व का क्षण था। लेकिन कार्यक्रम स्थल को बदलकर इस पूरे उत्साह पर पानी फेर दिया गया, जिसे संथाल समुदाय ने अपनी विरासत के अपमान के रूप में देखा है।

9. आदिवासी अस्मिता का राजनीतिकरण: बंगाल में वोट बैंक की जंग

इस विवाद के पीछे की राजनीति को समझना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। पश्चिम बंगाल, विशेषकर उत्तर बंगाल (North Bengal – जहां सिलीगुड़ी और दार्जिलिंग स्थित हैं), में आदिवासी वोट बैंक बहुत अहम भूमिका निभाता है।

उत्तर बंगाल का राजनीतिक समीकरण: दार्जिलिंग, जलपाईगुड़ी, अलीपुरद्वार और कूचबिहार जैसे जिलों में चाय बागानों में काम करने वाले आदिवासियों (जिनमें संथाल, मुंडा और उरांव शामिल हैं) की बहुत बड़ी आबादी है। पिछले कुछ लोकसभा और विधानसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने इस क्षेत्र में टीएमसी (TMC) को भारी नुकसान पहुंचाते हुए इन आदिवासी वोटों पर अपनी मजबूत पकड़ बनाई है।

टीएमसी की घबराहट? राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि टीएमसी सरकार को शायद यह डर था कि यदि राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के इस कार्यक्रम में लाखों आदिवासियों की भीड़ उमड़ती है, तो इसका सीधा राजनीतिक लाभ भाजपा को मिल सकता है। यही कारण हो सकता है कि ‘लॉजिस्टिक’ का बहाना बनाकर इस कार्यक्रम को एक छोटे और दूरदराज के इलाके में शिफ्ट कर दिया गया ताकि भीड़ एकत्रित न हो सके।

हालांकि, ममता बनर्जी का यह दांव उल्टा पड़ता दिख रहा है। राष्ट्रपति के अपमान और ओडिशा के मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी के तीखे बयानों ने पूरे देश के आदिवासियों में एक गलत संदेश भेजा है। सीएम माझी का यह बयान कि “टीएमसी सरकार आदिवासियों के प्रति संवेदनहीन है,” आगामी चुनावों में टीएमसी के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकता है।

10. राष्ट्रपति का पद: दलगत राजनीति से ऊपर की संस्था (The Sanctity of the President’s Office)

भारत का संविधान राष्ट्रपति को राज्य का प्रमुख (Head of the State) और देश का प्रथम नागरिक मानता है। राष्ट्रपति किसी राजनीतिक दल का नेता नहीं होता; वह पूरे राष्ट्र की एकता, अखंडता और संप्रभुता का प्रतीक होता है।

जब कोई व्यक्ति राष्ट्रपति भवन में प्रवेश करता है, तो वह अपनी पिछली सभी राजनीतिक संबद्धताओं (Political affiliations) को पीछे छोड़ देता है। यही कारण है कि भारतीय राजनीति के सबसे कटु विरोधी भी सार्वजनिक मंचों पर राष्ट्रपति के प्रति अगाध सम्मान प्रदर्शित करते हैं।

ममता बनर्जी द्वारा राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को यह कहना कि वह “भाजपा की सलाह पर राजनीति कर रही हैं” या उनसे “मणिपुर की घटनाओं पर सवाल पूछना”, सीधे तौर पर राष्ट्रपति पद को दलगत राजनीति के दलदल में घसीटने के समान है। संविधान विशेषज्ञों का मानना है कि सरकारों को अपनी राजनीतिक लड़ाई आपस में लड़नी चाहिए, लेकिन इस खींचतान में राष्ट्रपति के कार्यालय को शामिल करना एक बहुत ही खतरनाक परंपरा (Dangerous precedent) की शुरुआत है।

11. भविष्य के निहितार्थ: क्या केंद्र और बंगाल के बीच और बढ़ेगी तनातनी?

सिलीगुड़ी की इस घटना ने केंद्र की मोदी सरकार और बंगाल की ममता सरकार के बीच चल रहे ‘कोल्ड वॉर’ (Cold War) में घी डालने का काम किया है।

  • प्रशासनिक टकराव: आने वाले दिनों में हम देख सकते हैं कि गृह मंत्रालय (MHA) बंगाल के कुछ आईपीएस (IPS) और आईएएस (IAS) अधिकारियों (जो उस दिन ड्यूटी पर थे) को कारण बताओ नोटिस जारी कर सकता है या उन्हें केंद्रीय प्रतिनियुक्ति (Central Deputation) पर बुलाने की कोशिश कर सकता है, जैसा कि अतीत में जेपी नड्डा के काफिले पर हमले के समय हुआ था।
  • संसदीय हंगामा: चूंकि वर्तमान में लोकसभा और राज्यसभा का सत्र (Session) चल रहा है, इसलिए इस मुद्दे पर संसद में भारी हंगामा होने की पूरी संभावना है। भाजपा इस मुद्दे को भुनाकर बंगाल सरकार को ‘आदिवासी विरोधी’ (Anti-Tribal) और ‘संविधान विरोधी’ (Anti-Constitution) साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ेगी।
  • ओडिशा-बंगाल संबंध: ओडिशा और बंगाल पड़ोसी राज्य हैं, जिनके बीच गहरे सांस्कृतिक और आर्थिक संबंध हैं। सीएम मोहन माझी के कड़े रुख के बाद, दोनों राज्यों के बीच राजनीतिक संबंधों में भी खटास आना तय है।

7 मार्च 2026 को पश्चिम बंगाल के सिलीगुड़ी में जो कुछ भी हुआ, उसे भारत के लोकतांत्रिक और संवैधानिक इतिहास में एक दुर्भाग्यपूर्ण अध्याय के रूप में याद रखा जाएगा।

ओडिशा के मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी का यह कहना बिल्कुल सही है कि यह “महज एक लॉजिस्टिक समस्या नहीं है।” यह घटना हमारे राजनीतिक परिदृश्य में बढ़ती हुई असहिष्णुता, प्रोटोकॉल की अनदेखी और राजनीतिक लाभ के लिए संवैधानिक संस्थाओं के अवमूल्यन का एक ज्वलंत उदाहरण है।

आदिवासी समुदाय, विशेषकर संथाल, जो सदियों से हाशिए पर रहे हैं और जिन्होंने भारत के निर्माण में अपने खून-पसीने का योगदान दिया है, वे सम्मान और गरिमा के हकदार हैं। जब देश की पहली आदिवासी महिला राष्ट्रपति किसी कार्यक्रम में शामिल होती हैं, तो वह केवल एक सरकारी दौरा नहीं होता; वह करोड़ों वंचितों के लिए एक प्रेरणा और गौरव का क्षण होता है।

उम्मीद की जानी चाहिए कि भविष्य में चाहे केंद्र में या राज्यों में किसी भी दल की सरकार हो, वे संकीर्ण राजनीतिक स्वार्थों को किनारे रखकर राष्ट्रपति भवन की पवित्रता और देश के विविध समुदायों के सांस्कृतिक अधिकारों का पूर्ण सम्मान करना सुनिश्चित करेंगी।

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