वैश्विक अर्थव्यवस्था और कूटनीति की दुनिया में कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं जो केवल आंकड़ों पर नहीं, बल्कि समय की नजाकत और रणनीतिक जरूरतों पर टिके होते हैं। भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका के संबंध इसी श्रेणी में आते हैं। वर्ष 2026 की शुरुआत के साथ ही वाशिंगटन डी.सी. से जो हवाएं नई दिल्ली की ओर बह रही हैं, वे भारतीय निर्यातकों और नीति निर्माताओं के लिए अत्यंत सुखद संकेत लेकर आई हैं। अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप की वापसी और उनकी ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति के बीच, भारत के लिए एक बड़ी खबर सामने आ रही है। चर्चा यह है कि अमेरिका भारत से 25% टैरिफ (आयात शुल्क) हटाने की तैयारी कर रहा है।
यह खबर न केवल शेयर बाजार के लिए उत्साहजनक है, बल्कि यह भारत के विनिर्माण (मैन्युफैक्चरिंग) और निर्यात क्षेत्र के लिए एक गेम-चेंजर साबित हो सकती है। अमेरिकी वित्त मंत्री (Treasury Secretary) का हालिया बयान इस उम्मीद को और पुख्ता करता है। लेकिन सवाल यह है कि जो ट्रंप अपनी संरक्षणवादी नीतियों और “टैरिफ किंग” जैसे जुमलों के लिए जाने जाते हैं, वे भारत के प्रति इतने नरम क्यों हो रहे हैं? क्या यह केवल दोस्ती है या इसके पीछे कोई गहरी आर्थिक और भू-राजनीतिक रणनीति काम कर रही है? आज के इस विस्तृत ब्लॉग में हम इस संभावित टैरिफ राहत के हर पहलू का गहराई से विश्लेषण करेंगे।
भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों का नया अध्याय
पिछले कुछ दशकों में, भारत और अमेरिका के बीच के रिश्ते संशय से निकलकर रणनीतिक साझेदारी की ओर बढ़े हैं। लेकिन व्यापार हमेशा से इन दोनों देशों के बीच एक कांटेदार मुद्दा रहा है। डोनाल्ड ट्रंप ने अपने पिछले कार्यकाल के दौरान भारत को “टैरिफ किंग” कहा था और भारत से आयातित स्टील और एल्युमीनियम पर भारी शुल्क लगा दिए थे। इसके जवाब में भारत ने भी अमेरिकी उत्पादों पर जवाबी शुल्क लगाए थे। लेकिन 2026 में परिदृश्य बदल चुका है।
अमेरिकी वित्त मंत्री के बयान ने बाज़ारों में हलचल मचा दी है। संकेत साफ हैं कि अमेरिका अब चीन पर अपनी निर्भरता कम करने के लिए भारत को एक प्रमुख आर्थिक भागीदार के रूप में देख रहा है। 25% टैरिफ हटाने का प्रस्ताव केवल एक आर्थिक छूट नहीं है, बल्कि यह इस बात का प्रमाण है कि वाशिंगटन अब नई दिल्ली को एक प्रतिस्पर्धी के रूप में नहीं, बल्कि एक अनिवार्य सहयोगी के रूप में देखता है। यदि यह प्रस्ताव धरातल पर उतरता है, तो इसका सीधा असर भारतीय अर्थव्यवस्था के कई ट्रिलियन डॉलर के लक्ष्य पर पड़ेगा।
इस टैरिफ राहत का सबसे बड़ा कारण वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला (Global Supply Chain) का पुनर्गठन है। अमेरिका समझ चुका है कि चीन से मुकाबला करने के लिए उसे एशिया में एक मजबूत साथी की जरूरत है, और वह साथी भारत के अलावा कोई और नहीं हो सकता। यह संभावित समझौता न केवल व्यापार घाटे को संतुलित करेगा बल्कि दोनों देशों के बीच तकनीक और रक्षा सहयोग को भी नई ऊंचाइयों पर ले जाएगा।

25% टैरिफ: इतिहास और प्रभाव
इस मुद्दे की गंभीरता को समझने के लिए हमें थोड़ा पीछे जाना होगा। यह टैरिफ विवाद मुख्य रूप से ‘धारा 232’ (Section 232) के तहत शुरू हुआ था, जब अमेरिका ने राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देते हुए स्टील और एल्युमीनियम के आयात पर भारी शुल्क लगाए थे। इसका असर भारतीय धातु उद्योगों पर बहुत गहरा पड़ा था। भारतीय निर्यात महंगा हो गया और अमेरिकी बाजार में उसकी प्रतिस्पर्धा कम हो गई।
जब किसी उत्पाद पर 25% का अतिरिक्त शुल्क लगता है, तो वह उत्पाद विदेशी बाजार में महंगा हो जाता है। उदाहरण के लिए, यदि भारत से अमेरिका जाने वाले 100 रुपये के स्टील पर 25 रुपये का टैक्स लग जाए, तो वह 125 रुपये का हो जाता है। इससे अमेरिकी खरीदार भारतीय स्टील के बजाय स्थानीय या अन्य देशों के सस्ते विकल्पों को चुनना पसंद करते हैं। इस नीति ने भारतीय निर्यातकों के मुनाफे को निचोड़ दिया था।
अब, जब ट्रंप भारत से 25% टैरिफ हटाने पर विचार कर रहे हैं, तो इसका मतलब है कि भारतीय सामान अमेरिकी बाजार में फिर से प्रतिस्पर्धी हो जाएंगे। यह केवल स्टील या एल्युमीनियम तक सीमित नहीं रहेगा। उम्मीद की जा रही है कि इस राहत का दायरा अन्य क्षेत्रों जैसे टेक्सटाइल (कपड़ा), रसायन, और इंजीनियरिंग सामानों तक भी बढ़ सकता है। अमेरिकी वित्त मंत्री के बयान ने यह स्पष्ट कर दिया है कि प्रशासन अब “ट्रेड वार” (व्यापार युद्ध) के बजाय “ट्रेड पार्टनरशिप” (व्यापार साझेदारी) पर ध्यान केंद्रित करना चाहता है।
अमेरिकी वित्त मंत्री का बयान: शब्दों के मायने
कूटनीति में जो कहा जाता है, उससे ज्यादा महत्वपूर्ण वह होता है जो नहीं कहा जाता। अमेरिकी वित्त मंत्री का बयान इस संदर्भ में बहुत महत्वपूर्ण है। उन्होंने संकेत दिया कि अमेरिका उन देशों के साथ व्यापार बाधाओं को कम करना चाहता है जो लोकतांत्रिक मूल्यों को साझा करते हैं और जो अमेरिकी अर्थव्यवस्था के पूरक बन सकते हैं। यद्यपि उन्होंने सीधे तौर पर हर उत्पाद का नाम नहीं लिया, लेकिन संदर्भ स्पष्ट रूप से भारत की ओर था।
इस बयान के पीछे का मुख्य कारण अमेरिका के भीतर बढ़ती मुद्रास्फीति (Inflation) भी है। अमेरिकी उपभोक्ता महंगाई से परेशान हैं। जब आयातित वस्तुओं पर भारी टैरिफ लगता है, तो अंततः उसकी कीमत अमेरिकी उपभोक्ताओं को ही चुकानी पड़ती है। ट्रंप प्रशासन यह समझ रहा है कि महंगाई को काबू में करने के लिए सस्ते और गुणवत्तापूर्ण आयातों की अनुमति देनी होगी। भारत, अपनी कम लागत वाली विनिर्माण क्षमता के साथ, अमेरिका के लिए एक आदर्श समाधान है।
वित्त मंत्री ने यह भी कहा कि “रणनीतिक साझेदारों” को “आर्थिक दंड” से मुक्त रखा जाना चाहिए। यह शब्दावली इस बात का संकेत है कि भारत को अब अमेरिका की ‘मित्र-सूची’ (Friend-shoring list) में सबसे ऊपर रखा जा रहा है। इसका अर्थ है कि अमेरिका अपनी फैक्ट्रियों और सप्लाई चेन को चीन से हटाकर भारत जैसे मित्र देशों में शिफ्ट करना चाहता है, और इसके लिए टैरिफ हटाना पहली शर्त है।
चीन का कोण: “चाइना प्लस वन” रणनीति का विस्तार
इस पूरी कवायद के केंद्र में चीन है। अमेरिका और चीन के बीच चल रहा शीत युद्ध अब केवल बयानों तक सीमित नहीं है, यह आर्थिक नाकेबंदी का रूप ले चुका है। अमेरिका किसी भी कीमत पर चीनी उत्पादों पर अपनी निर्भरता खत्म करना चाहता है। लेकिन समस्या यह है कि अमेरिका की खपत इतनी ज्यादा है कि वह रातों-रात आयात बंद नहीं कर सकता। उसे चीन का विकल्प चाहिए।
वियतनाम, बांग्लादेश और मैक्सिको जैसे देश विकल्प हो सकते हैं, लेकिन उनके पास भारत जैसा विशाल पैमाना (Scale) और कुशल श्रम शक्ति नहीं है। भारत ही एकमात्र ऐसा देश है जो चीन की तरह बड़े पैमाने पर उत्पादन कर सकता है। क्या भारत को मिलेगी टैरिफ राहत? इस प्रश्न का उत्तर चीन के प्रति अमेरिका के डर में छिपा है। यदि अमेरिका भारत से टैरिफ नहीं हटाता है, तो भारतीय उत्पाद महंगे रहेंगे और अमेरिकी कंपनियों के पास चीन से सामान खरीदने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचेगा।
ट्रंप प्रशासन यह सुनिश्चित करना चाहता है कि अमेरिकी कंपनियां जब चीन से बाहर निकलें, तो वे भारत का रुख करें। 25% टैरिफ का हटना इस दिशा में सबसे बड़ा प्रोत्साहन (Incentive) होगा। यह एक भू-राजनीतिक चाल है, जहाँ व्यापार का इस्तेमाल एक रणनीतिक हथियार के रूप में किया जा रहा है। भारत को मजबूत करना अब अमेरिका की मजबूरी भी है और जरूरत भी।
किन क्षेत्रों को होगा सबसे ज्यादा फायदा?
यदि यह प्रस्ताव लागू होता है, तो भारतीय अर्थव्यवस्था के कुछ विशिष्ट क्षेत्रों में बहार आ जाएगी। आइए विस्तार से जानते हैं कि वे कौन से सेक्टर हैं:
1. स्टील और एल्युमीनियम
सबसे पहली राहत धातु उद्योग को मिलेगी। भारत के स्टील निर्माता जैसे टाटा स्टील, जेएसडब्ल्यू और सेल (SAIL) अमेरिकी बाजार में अपनी पकड़ फिर से मजबूत कर पाएंगे। टैरिफ हटने से भारतीय स्टील की कीमतें अमेरिकी बाजार में प्रतिस्पर्धी हो जाएंगी, जिससे निर्यात की मात्रा में भारी उछाल आएगा।
2. टेक्सटाइल और अपैरल (कपड़ा उद्योग)
बांग्लादेश में राजनीतिक अस्थिरता और चीन के खिलाफ बढ़ते अविश्वास के कारण, अमेरिका भारतीय कपड़ों की ओर देख रहा है। 25% की राहत भारतीय कपड़ा निर्यातकों के लिए वरदान साबित होगी। भारत का कपड़ा उद्योग बहुत बड़ा रोजगार प्रदाता है, इसलिए इसका सीधा असर भारत के रोजगार आंकड़ों पर भी पड़ेगा। तिरुपुर, लुधियाना और सूरत जैसे टेक्सटाइल हब में नई जान आ जाएगी।
3. फार्मास्यूटिकल्स (दवा उद्योग)
अमेरिका जेनेरिक दवाओं का सबसे बड़ा उपभोक्ता है और भारत दुनिया की फार्मेसी है। टैरिफ बाधाएं कम होने से भारतीय दवा कंपनियां अमेरिका में और आसानी से प्रवेश कर पाएंगी। इससे न केवल निर्यात बढ़ेगा, बल्कि अमेरिकी नागरिकों को भी सस्ती दवाइयां मिल सकेंगी, जो ट्रंप के हेल्थकेयर एजेंडे के अनुकूल है।

4. इंजीनियरिंग गुड्स और ऑटो कंपोनेंट्स
भारत से निर्यात होने वाले इंजीनियरिंग सामान और वाहनों के कलपुर्जे (Auto Components) अमेरिका में बहुत मांग में हैं। फोर्ड और जनरल मोटर्स जैसी अमेरिकी कंपनियां अपनी लागत कम करने के लिए भारतीय आपूर्तिकर्ताओं पर निर्भर हैं। टैरिफ हटने से इन आपूर्तिकर्ताओं का मार्जिन सुधरेगा और वे नई तकनीकों में निवेश कर पाएंगे।
क्या भारत को भी कुछ देना होगा? (The Quid Pro Quo)
डोनाल्ड ट्रंप अपनी किताब “द आर्ट ऑफ द डील” के लिए जाने जाते हैं। वे एकतरफा रियायतें देने में विश्वास नहीं रखते। अगर ट्रंप भारत से 25% टैरिफ हटाने की तैयारी कर रहे हैं, तो निश्चित रूप से वे बदले में भारत से भी कुछ उम्मीद करेंगे। यह समझौता “कुछ लो और कुछ दो” (Give and Take) की तर्ज पर होगा।
अमेरिका की पुरानी मांग रही है कि भारत अपने कृषि बाजार को अमेरिकी उत्पादों के लिए खोले। अमेरिका चाहता है कि भारत अमेरिकी बादाम, अखरोट, सेब और डेयरी उत्पादों पर लगने वाले आयात शुल्क को कम करे। इसके अलावा, हार्ले डेविडसन जैसी अमेरिकी मोटरसाइकिलों पर लगने वाला टैक्स हमेशा से ट्रंप के लिए एक भावनात्मक मुद्दा रहा है। संभव है कि इस समझौते के तहत भारत को इन क्षेत्रों में कुछ रियायतें देनी पड़ें।
इसके अलावा, डेटा लोकलाइजेशन (Data Localization) और ई-कॉमर्स नीतियां भी बातचीत का हिस्सा हो सकती हैं। अमेरिका की बड़ी टेक कंपनियां (Google, Facebook, Amazon) भारत के डेटा सुरक्षा कानूनों को लेकर चिंतित रहती हैं। टैरिफ राहत के बदले अमेरिका इन नियमों में ढील की मांग कर सकता है। चिकित्सा उपकरणों (Medical Devices) की कीमतों पर नियंत्रण भी एक ऐसा मुद्दा है जिस पर अमेरिका भारत से नरमी की उम्मीद करता है।
हालांकि, भारत सरकार अब पहले से कहीं अधिक आत्मविश्वास में है। भारत यह तर्क दे सकता है कि वह अमेरिका से भारी मात्रा में रक्षा उपकरण और ऊर्जा (तेल और गैस) खरीद रहा है, जिससे व्यापार संतुलन अमेरिका के पक्ष में जा रहा है। इसलिए, भारत पर अतिरिक्त दबाव डालने की गुंजाइश कम है।
भारतीय अर्थव्यवस्था पर व्यापक प्रभाव
इस टैरिफ राहत का असर केवल कुछ कंपनियों की बैलेंस शीट तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह भारत के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) पर भी सकारात्मक प्रभाव डालेगा। निर्यात किसी भी देश की आर्थिक वृद्धि का इंजन होता है। जब निर्यात बढ़ता है, तो विदेशी मुद्रा भंडार बढ़ता है, रुपये की कीमत स्थिर होती है और रोजगार के नए अवसर पैदा होते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अमेरिका 25% टैरिफ हटाता है, तो भारत का अमेरिका को निर्यात अगले दो वर्षों में दोगुना हो सकता है। वर्तमान में, अमेरिका भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार है। टैरिफ हटने से यह साझेदारी और भी मजबूत होगी। इससे भारत के “मेक इन इंडिया” अभियान को वैश्विक मंच पर एक बड़ी सफलता मिलेगी। विदेशी निवेशक (FDI), जो अब तक भारत में निवेश करने से हिचकिचा रहे थे, यह देखकर भारत का रुख करेंगे कि उनके द्वारा बनाए गए उत्पादों को अमेरिकी बाजार में बिना किसी बाधा के बेचा जा सकता है।
ट्रंप 2.0: अनिश्चितता या अवसर?
डोनाल्ड ट्रंप की वापसी को लेकर दुनिया भर में मिली-जुली प्रतिक्रियाएं हैं। कुछ लोग उन्हें अनिश्चितता का प्रतीक मानते हैं, तो कुछ उन्हें एक व्यावहारिक व्यवसायी। भारत के संदर्भ में, ट्रंप का पिछला कार्यकाल खट्टा-मीठा रहा था। लेकिन व्यक्तिगत स्तर पर, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और डोनाल्ड ट्रंप के बीच की केमिस्ट्री शानदार मानी जाती है। “हाउडी मोदी” और “नमस्ते ट्रंप” जैसे कार्यक्रमों ने दोनों नेताओं के बीच की घनिष्ठता को दुनिया के सामने रखा था।
2026 में, ट्रंप प्रशासन यह समझ रहा है कि दुनिया बदल चुकी है। अब अमेरिका अकेले दम पर अपनी अर्थव्यवस्था को नहीं चला सकता। उसे बाजारों की जरूरत है, और भारत दुनिया का सबसे तेजी से बढ़ता हुआ बड़ा बाजार है। ट्रंप की नीतियां भले ही आक्रामक हों, लेकिन वे व्यावहारिक भी हैं। वे जानते हैं कि भारत के साथ व्यापार युद्ध छेड़ना अमेरिका के हित में नहीं है। इसलिए, अमेरिकी वित्त मंत्री के बयान से बढ़ी उम्मीद बिल्कुल जायज है। यह ट्रंप की नई विदेश नीति का हिस्सा है, जहाँ वे “दुश्मन के दुश्मन को दोस्त बनाने” की नीति पर चल रहे हैं।
डब्ल्यूटीओ (WTO) और अंतरराष्ट्रीय नियम
इस द्विपक्षीय समझौते का एक पहलू विश्व व्यापार संगठन (WTO) से भी जुड़ा है। अक्सर, जब दो देश आपस में विशेष व्यापार समझौता करते हैं, तो अन्य देश इसका विरोध कर सकते हैं। लेकिन अमेरिका ने हाल के वर्षों में WTO की कार्यप्रणाली को काफी हद तक नजरअंदाज किया है। अमेरिका का मानना है कि द्विपक्षीय समझौते (Bilateral Agreements) बहुपक्षीय समझौतों (Multilateral Agreements) से ज्यादा प्रभावी होते हैं।
भारत के लिए भी यह एक अच्छा अवसर है। WTO में चल रहे विवादों को सुलझाने के लिए यह टैरिफ राहत एक मास्टरस्ट्रोक हो सकती है। भारत और अमेरिका ने पहले भी WTO में अपने कई विवादों को आपसी सहमति से सुलझाया है। यह नया कदम उस दिशा में अंतिम मुहर साबित हो सकता है। यह दुनिया को संदेश देगा कि दो बड़े लोकतंत्र नियमों के जाल में फंसने के बजाय आपसी समझ से व्यापार को बढ़ावा दे रहे हैं।
भारत के निर्यातकों के लिए सलाह
इस खबर के बीच, भारतीय निर्यातकों के लिए यह समय तैयारी करने का है। यदि टैरिफ हटते हैं, तो मांग में अचानक वृद्धि होगी। क्या भारतीय उद्योग उस मांग को पूरा करने के लिए तैयार हैं? गुणवत्ता नियंत्रण (Quality Control) और समय पर डिलीवरी (Timely Delivery) वे मानक हैं जिन पर अमेरिकी बाजार कभी समझौता नहीं करता।
निर्यातकों को अपनी उत्पादन क्षमता बढ़ानी होगी और अंतरराष्ट्रीय मानकों का पालन करना सुनिश्चित करना होगा। सरकार को भी लॉजिस्टिक्स और इंफ्रास्ट्रक्चर को और बेहतर बनाना होगा ताकि बंदरगाहों पर भीड़भाड़ न हो और सामान समय पर अमेरिका पहुंच सके। यह अवसर बार-बार नहीं आता। यह वह समय है जब भारतीय ब्रांड्स को अमेरिकी सुपरमार्केट के शेल्फ पर अपनी जगह पक्की करनी होगी।
आम आदमी पर असर
अब आप सोच रहे होंगे कि इस कूटनीतिक और आर्थिक खबर का भारत के आम आदमी पर क्या असर पड़ेगा? जवाब सीधा है—रोजगार और महंगाई। जब निर्यात बढ़ता है, तो फैक्ट्रियां अधिक उत्पादन करती हैं, जिसके लिए उन्हें अधिक श्रमिकों की आवश्यकता होती है। इससे नौकरियों के नए अवसर पैदा होते हैं।
दूसरी ओर, जब भारत और अमेरिका के बीच व्यापार सुगम होता है, तो भारत में भी अमेरिकी उत्पाद आसानी से उपलब्ध होते हैं। टेक्नोलॉजी, गैजेट्स और कुछ कृषि उत्पाद सस्ते हो सकते हैं। इसके अलावा, मजबूत अर्थव्यवस्था का मतलब है मजबूत रुपया, जो अंततः पेट्रोल-डीजल और अन्य आयातित वस्तुओं की कीमतों को नियंत्रित रखने में मदद करता है। इसलिए, वाशिंगटन में लिया गया यह फैसला भारत के हर घर को किसी न किसी रूप में प्रभावित करेगा।
चुनौतियां अभी बाकी हैं
हालांकि तस्वीर बहुत सुनहरी लग रही है, लेकिन हमें चुनौतियों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। अमेरिकी राजनीति में बदलाव बहुत तेजी से होते हैं। ट्रंप के फैसले कई बार अप्रत्याशित होते हैं। यदि अमेरिकी अर्थव्यवस्था में मंदी आती है या बेरोजगारी बढ़ती है, तो संरक्षणवादी आवाजें फिर से उठ सकती हैं।
इसके अलावा, भारत में श्रम कानून, भूमि अधिग्रहण और नौकरशाही की बाधाएं अभी भी विदेशी कंपनियों के लिए चिंता का विषय बनी हुई हैं। टैरिफ हटने के बाद भी, यदि भारत “ईज ऑफ डूइंग बिजनेस” (व्यापार सुगमता) में सुधार नहीं करता, तो इस अवसर का पूरा लाभ नहीं उठाया जा सकेगा। साथ ही, हमें यह भी ध्यान रखना होगा कि अमेरिका पर्यावरण और श्रम मानकों (Labour Standards) को लेकर बहुत सख्त है। भारतीय कंपनियों को इन मानकों पर खरा उतरना होगा, अन्यथा “नॉन-टैरिफ बैरियर्स” (Non-tariff barriers) उनके रास्ते का रोड़ा बन सकते हैं।
एक नई सुबह की उम्मीद
अंत में, “क्या भारत को मिलेगी टैरिफ राहत?” का उत्तर अब ‘शायद’ से ‘हाँ’ की ओर बढ़ता दिख रहा है। ट्रंप प्रशासन का 25% टैरिफ हटाने पर विचार करना और वित्त मंत्री का सकारात्मक बयान इस बात का सूचक है कि भारत-अमेरिका संबंध एक नए दौर में प्रवेश कर रहे हैं। यह दौर आपसी विश्वास, रणनीतिक आवश्यकता और आर्थिक लाभ पर आधारित है।
यह प्रस्तावित छूट भारत के लिए एक ट्रिलियन डॉलर की डिजिटल इकोनॉमी और 5 ट्रिलियन डॉलर की जीडीपी के सपने को पूरा करने में उत्प्रेरक का काम करेगी। यह भारत को वैश्विक विनिर्माण मानचित्र पर चीन के वास्तविक विकल्प के रूप में स्थापित करने का सुनहरा मौका है। लेकिन, इसके लिए भारत को अपनी गुणवत्ता और क्षमता पर काम करना होगा।
गेंद अब अमेरिका के पाले में है, लेकिन तैयारी भारत को करनी है। 2026 भारत के लिए अंतरराष्ट्रीय व्यापार में लंबी छलांग लगाने का वर्ष हो सकता है। वाशिंगटन से आने वाली ये खबरें बता रही हैं कि दुनिया की सबसे पुरानी और दुनिया की सबसे बड़ी डेमोक्रेसी अब साथ मिलकर दुनिया की सबसे मजबूत इकोनॉमी पार्टनरशिप बनाने की ओर अग्रसर हैं। अगर यह टैरिफ दीवार गिरती है, तो जो रास्ता खुलेगा, वह भारत को आर्थिक महाशक्ति बनने की मंजिल तक ले जाएगा।
आने वाले महीने बहुत महत्वपूर्ण होने वाले हैं। हर बयान, हर बैठक और हर समझौते पर दुनिया की नजर होगी। लेकिन एक बात तय है—हवा का रुख भारत के पक्ष में है, और इस बार भारत इस मौके को हाथ से नहीं जाने देगा।
