जीवन कितना क्षणभंगुर है, इसका अंदाजा हमें तब लगता है जब एक हंसता-खेलता परिवार पल भर में मातम में डूब जाता है। रविवार, 18 जनवरी 2026 का दिन एक परिवार के लिए ऐसा काल बनकर आया, जिसकी भरपाई शायद सात जन्मों में भी नहीं हो सकती। शहर की भागदौड़ और शोरगुल के बीच आज एक दिल दहला देने वाली घटना घटी, जिसने प्रशासन की तैयारियों और हमारी सुरक्षा व्यवस्था की पोल खोलकर रख दी है।
‘बचाओ-बचाओ’ की गूंज के बीच दर्दनाक अंत
एक होनहार युवा इंजीनियर, जिसके कंधों पर पूरे परिवार की उम्मीदें टिकी थीं, वह आज सिस्टम की लापरवाही और दुर्भाग्य का शिकार हो गया। लगभग साढ़े चार घंटे तक चले मौत और जिंदगी के संघर्ष के बाद, मलबे के नीचे से केवल खामोशी बाहर आई। यह ब्लॉग उस काली दोपहर की दास्तान है, जहां ‘बचाओ-बचाओ’ की गूंज के बीच दर्दनाक अंत ने मानवता को शर्मसार कर दिया।
1. 18 जनवरी की मनहूस दोपहर: खुशियों को निगल गया मलबा
दिन की शुरुआत सामान्य थी। 26 वर्षीय सॉफ्टवेयर इंजीनियर (जिसे हम यहां सम्मानपूर्वक ‘रोहन’ कहेंगे, गोपनीयता बनाए रखने के लिए) अपनी छुट्टी के दिन एक निर्माणाधीन साइट के पास से गुजर रहा था। रविवार का दिन होने के कारण वह तनावमुक्त था और शायद शाम की किसी योजना के बारे में सोच रहा था। उसे अंदाजा भी नहीं था कि जिस जमीन पर वह कदम रख रहा है, वह कुछ ही पलों में उसकी कब्र बनने वाली है।
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, दोपहर के करीब 1:30 बजे अचानक एक तेज धमाका हुआ। धूल का एक विशाल गुबार उठा और आसपास अफरा-तफरी मच गई। यह आवाज किसी बम धमाके जैसी थी, लेकिन असल में यह कंक्रीट और लोहे के ढांचे के गिरने की आवाज थी। जब धूल थोड़ी छंटी, तो लोगों ने देखा कि एक बेसमेंट की रिटेनिंग वॉल और छत का हिस्सा भरभराकर गिर गया है। और उस मलबे के नीचे, कहीं गहरे अंधेरे में, रोहन फंस चुका था।
शुरुआती कुछ मिनट सन्नाटे के थे, लोग समझ नहीं पा रहे थे कि क्या हुआ है। लेकिन फिर वह आवाज आई जिसने वहां मौजूद हर शख्स का कलेजा चीर दिया। मलबे के नीचे से एक दर्दनाक और स्पष्ट आवाज आ रही थी। वह आवाज थी जीवन की भीख मांगते एक बेटे की। ‘बचाओ-बचाओ’ की गूंज के बीच दर्दनाक अंत की पटकथा उसी वक्त लिखी जानी शुरू हो गई थी, लेकिन बाहर खड़े लोगों को उम्मीद थी कि उसे बचा लिया जाएगा क्योंकि वह जीवित था और बोल रहा था।
2. वह पहली चीख और मदद की गुहार
हादसे के तुरंत बाद स्थानीय लोग, दुकानदार और राहगीर मदद के लिए दौड़े। वे नंगे हाथों से ईंट और कंक्रीट हटाने की कोशिश कर रहे थे। मलबे के नीचे से रोहन लगातार चिल्ला रहा था। उसकी आवाज में दर्द था, घबराहट थी, और एक अदम्य जिजीविषा (जीने की इच्छा) थी। वह जानता था कि वह फंसा हुआ है, लेकिन उसे विश्वास था कि लोग उसे निकाल लेंगे।
प्रत्यक्षदर्शी रमेश, जो पास ही चाय की दुकान चलाते हैं और सबसे पहले मौके पर पहुंचे थे, ने बताया, “साहब, उसकी आवाज साफ सुनाई दे रही थी। वह कह रहा था – ‘भैया, मेरा पैर फंसा है, मुझे बाहर निकालो, मुझे बहुत दर्द हो रहा है। मेरे सीने पर पत्थर है।’ हमने उससे बात करने की कोशिश की, उसे हौसला दिया कि बस थोड़ी देर रुक जाओ, मदद आ रही है। उसने अपना नाम भी बताया और अपने पिता का नंबर भी चिल्लाकर दिया।”
यह संवाद करीब आधे घंटे तक चलता रहा। रोहन अपने मोबाइल की फ्लैशलाइट जलाने की कोशिश कर रहा था, लेकिन मलबे के दबाव के कारण वह हिल भी नहीं पा रहा था। वह बार-बार अपने माता-पिता का नाम ले रहा था। यह वो समय था जब स्थानीय पुलिस मौके पर पहुंच चुकी थी, लेकिन भारी भरकम स्लैब को हटाने के लिए उनके पास पर्याप्त उपकरण नहीं थे। समय बीत रहा था और हर गुजरते मिनट के साथ रोहन की आवाज में लड़खड़ाहट आ रही थी, लेकिन उसकी चीखें बंद नहीं हुई थीं।
3. रेस्क्यू ऑपरेशन की शुरुआत: उम्मीद और चुनौतियों का संघर्ष
दोपहर 2:15 बजे के आसपास दमकल विभाग और आपदा प्रबंधन (NDRF/SDRF) की टीमें मौके पर पहुंचीं। सायरन की आवाजों ने भीड़ को चीरते हुए रास्ता बनाया। बचाव कर्मियों ने आते ही मोर्चा संभाला। स्थिति बेहद नाजुक थी। रोहन के ऊपर कंक्रीट का एक विशाल स्लैब गिरा हुआ था, और उसके आसपास लोहे की सरिया का जाल था। एक गलत कदम और बचा-खुचा मलबा भी उसके ऊपर गिर सकता था।
चुनौतियां जो दीवार बन गईं:
- अस्थिर ढांचा: बचाव कर्मियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि बाकी बचा हुआ ढांचा भी हिल रहा था। मिट्टी धंस रही थी। अगर वे तेजी से मलबा हटाते, तो कंपन से और अधिक मलबा रोहन के ऊपर गिर सकता था।
- जगह की कमी: वह जिस जगह फंसा था, वह बहुत संकरी थी। वहां बड़ी क्रेन या जेसीबी मशीन का इस्तेमाल सीधे तौर पर नहीं किया जा सकता था क्योंकि इससे पीड़ित के दबने का खतरा था। सब कुछ मैनुअल कटर और छोटी ड्रिलिंग मशीनों से करना था।
- ऑक्सीजन की कमी: मलबे के नीचे हवा का प्रवाह कम हो रहा था और धूल के कण सांस लेना मुश्किल कर रहे थे।
रेस्क्यू टीम ने सबसे पहले एक छोटा सुराग बनाया ताकि रोहन तक ऑक्सीजन पाइप पहुंचाया जा सके। कैमरे और सेंसर अंदर डाले गए। स्क्रीन पर जो दिखा, उसने बचाव कर्मियों के माथे पर पसीना ला दिया। रोहन का निचला हिस्सा पूरी तरह से कुचला जा चुका था, सरिया उसके शरीर में धंस चुकी थी, लेकिन वह होश में था। उसने टीम को देखा और फिर से धीमी आवाज में गुहार लगाई—”पानी… मुझे बचा लो।” यह ‘बचाओ-बचाओ’ की गूंज के बीच दर्दनाक अंत की ओर बढ़ता एक और कदम था, लेकिन उम्मीद की एक किरण अभी बाकी थी।
4. 4.5 घंटे का महासंघर्ष: एक-एक मिनट का हिसाब
पहला घंटा (उम्मीद और संपर्क): रेस्क्यू टीम ने हाइड्रोलिक कटर से लोहे की सरिया को काटना शुरू किया। रोहन से लगातार संवाद बनाए रखा गया। उसे पानी की एक बोतल पाइप के जरिए दी गई। बाहर उसके परिजन पहुंच चुके थे। मां का रो-रोकर बुरा हाल था। वह हर पुलिसवाले के पैरों में गिरकर अपने बेटे की जान की भीख मांग रही थी। “मेरा बेटा अंदर है, उसे निकालो,” उसकी चीखें सायरन की आवाज से भी ऊंची थीं। पिता की आंखों में एक सूनापन था, जैसे उन्हें किसी अनहोनी का आभास हो गया हो, फिर भी वे हाथ जोड़े खड़े थे।
दूसरा घंटा (तकनीकी जद्दोजहद): कंक्रीट को तोड़ने के लिए ड्रिल मशीनें चलाई गईं। ड्रिल की तेज आवाज और कंपन से रोहन घबरा रहा था। उसने अंदर से कहा, “आवाज से मुझे डर लग रहा है, ये छत मेरे ऊपर गिर जाएगी। धीरे करो।” बचाव कर्मियों ने उसे शांत कराया। इस दौरान डॉक्टरों की एक टीम एंबुलेंस के साथ तैयार थी। वे मलबे के बाहर से ही उसे निर्देश दे रहे थे कि अपनी सांसों को कैसे नियंत्रित करे। उसे ड्रिप लगाने की कोशिश की गई, लेकिन मलबा आड़े आ रहा था।
तीसरा घंटा (संकट गहराया): अब ऑपरेशन जटिल हो गया। रोहन की आवाज बंद हो गई थी। सेंसर बता रहे थे कि उसकी हलचल कम हो गई है। शायद दर्द, सदमे (Shock) और खून ज्यादा बह जाने के कारण वह बेहोश हो रहा था। बाहर भीड़ का गुस्सा बढ़ रहा था। लोग प्रशासन पर सुस्त होने का आरोप लगा रहे थे। “इतनी देर क्यों लग रही है? मशीनें काम क्यों नहीं कर रही?” के सवाल हवा में तैर रहे थे। लेकिन सच्चाई यह थी कि एक गलत कदम रोहन को तुरंत मार सकता था। रेस्क्यू टीम पसीने से तर-बतर थी, वे अपनी जान जोखिम में डालकर अंदर घुसने की कोशिश कर रहे थे।
चौथा घंटा (निराशा का अंधेरा): शाम के 6 बज चुके थे। सूरज ढल रहा था और उसके साथ ही उम्मीदें भी। रोशनी के लिए हैलोजन लाइट्स लगाई गईं। बचाव कर्मी आखिरकार उस भारी स्लैब को हटाने में सफल हुए जिसने रोहन को दबा रखा था। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। जब तक वे उसके शरीर तक पहुंचे, उसकी नब्ज डूब चुकी थी। जिस युवक की आवाज ने पूरे इलाके को हिला दिया था, अब वहां सिर्फ खामोशी थी। ‘बचाओ-बचाओ’ की गूंज के बीच दर्दनाक अंत हो चुका था। 4.5 घंटे का संघर्ष मौत की जीत के साथ खत्म हुआ।
5. जब बाहर आया शव: एक मां की चीख ने आसमान हिला दिया
शाम के करीब 6:30 बजे, स्ट्रेचर पर एक शरीर को बाहर निकाला गया। उसे सफेद चादर से ढका गया था। यह दृश्य वहां मौजूद हजारों लोगों की आंखों को नम करने के लिए काफी था। जैसे ही रोहन की मां ने उस चादर को देखा, वह बदहवास होकर दौड़ पड़ी। “मेरा बेटा उठ जाएगा, उसे बस चोट लगी है, डॉक्टर उसे देखो,” वह पागलों की तरह चिल्ला रही थी। लेकिन डॉक्टरों ने सिर हिलाकर जो संकेत दिया, उसने वहां मौजूद हर शख्स को भीतर तक तोड़ दिया।
वह युवा इंजीनियर, जिसने अपनी पहली सैलरी से मां के लिए साड़ी और पिता के लिए चश्मा खरीदा था, आज बेजान पड़ा था। उसके हाथ अभी भी मुड़े हुए थे, जैसे वह मलबे को धकेलने की कोशिश कर रहा हो। उसके कपड़े धूल और खून से सने थे। वह चेहरा, जिस पर कल तक भविष्य की चमक थी, आज मौत की पीली पड़ चुकी परत से ढका था। लैपटॉप बैग जो उसके पास था, वह भी पिचक चुका था—उसमें शायद उसके नए प्रोजेक्ट्स और सपने थे।
पुलिस ने बड़ी मुश्किल से भीड़ को नियंत्रित किया और शव को पोस्टमार्टम के लिए अस्पताल भेजा। एंबुलेंस चली गई, लेकिन उस जगह पर अब भी रोहन की वो आखिरी पुकार गूंज रही थी।
6. आखिर किसकी गलती? – एक गहन विश्लेषण
इस हादसे ने हमारे सिस्टम, समाज और सुरक्षा तंत्र पर कई गंभीर सवाल खड़े किए हैं। यह कोई प्राकृतिक आपदा (Act of God) नहीं थी; यह पूरी तरह से मानव निर्मित लापरवाही थी।
क. अवैध निर्माण और कमजोर ढांचा: जांच में प्रथम दृष्टया यह सामने आया है कि जिस इमारत या ढांचे के पास यह हादसा हुआ, वह मानकों के अनुरूप नहीं था। या तो वह बहुत पुराना था जिसे गिराया नहीं गया था, या फिर निर्माण में घटिया सामग्री का इस्तेमाल हुआ था। बिना पिलर के बेसमेंट खोदना या कमजोर दीवारों को सहारा न देना—ये सब लागत बचाने के तरीके थे, जिनकी कीमत एक जान देकर चुकानी पड़ी। 2026 में भी अगर हमारे शहरों में ऐसे डेथ ट्रैप (Death Traps) मौजूद हैं, तो विकास का क्या अर्थ है?
ख. सुरक्षा घेरे का अभाव: किसी भी निर्माणाधीन या खतरनाक साइट के चारों ओर बैरिकेडिंग होनी चाहिए। वहां चेतावनी बोर्ड (Warning Signs) होने चाहिए। लेकिन घटनास्थल पर ऐसा कुछ नहीं था। रोहन को पता ही नहीं चला कि वह एक खतरनाक जोन में चल रहा है। अगर वहां एक लाल फीता भी बंधा होता, तो शायद वह उस रास्ते न जाता।
ग. रेस्क्यू टाइम और संसाधन: हालांकि NDRF और फायर ब्रिगेड ने अपना सर्वश्रेष्ठ दिया, लेकिन सवाल यह है कि हमारे शहरों में ‘क्विक रिस्पॉन्स टीम’ (QRT) को पहुंचने में 45 मिनट क्यों लगे? ट्रैफिक और संकरी गलियां आज भी हमारे लिए सबसे बड़ी बाधा हैं। क्या हमारे पास ऐसी तकनीक नहीं होनी चाहिए जो मलबे को बिना हिलाए तेजी से काट सके? क्या हमारे शहरों के पास लिफ्टिंग बैग्स और एडवांस कटर पर्याप्त मात्रा में हैं?
7. गोल्डन ऑवर (Golden Hour) का महत्व और विफलता
ट्रॉमा और दुर्घटना के मामलों में ‘गोल्डन ऑवर’ यानी घटना के बाद का पहला एक घंटा सबसे महत्वपूर्ण होता है। अगर इस दौरान पीड़ित को निकाल लिया जाता और चिकित्सा सहायता मिल जाती, तो उसके बचने की संभावना 80% तक होती। रोहन के मामले में, वह 4.5 घंटे तक फंसा रहा। इस दौरान उसे क्रश सिंड्रोम (Crush Syndrome) और अत्यधिक रक्तस्राव (Internal Bleeding) का सामना करना पड़ा। जब भारी वजन शरीर के किसी हिस्से पर लंबे समय तक रहता है, तो मांसपेशियों के टूटने से मायोग्लोबिन और पोटेशियम जैसे विषाक्त पदार्थ खून में मिल जाते हैं। जैसे ही वजन हटाया जाता है, ये विषाक्त पदार्थ तेजी से पूरे शरीर में फैलते हैं और दिल (Heart) तथा गुर्दे (Kidney) तक पहुंच जाते हैं, जिससे ‘कार्डियक अरेस्ट’ हो जाता है। शायद रोहन के साथ भी यही हुआ। उसे समय रहते न निकाल पाना ही उसकी मौत का असली कारण बना।
8. एक इंजीनियर का जाना: देश और समाज का नुकसान
रोहन केवल एक बेटा नहीं था, वह इस देश का भविष्य था। एक इंजीनियर बनने में सालों की तपस्या, माता-पिता की गाढ़ी कमाई और खुद की मेहनत लगती है। वह देश के तकनीकी विकास में योगदान देने वाला था। उसका इस तरह जाना ‘ब्रेन ड्रेन’ नहीं, बल्कि ‘ब्रेन डेथ’ है जो सिस्टम की विफलता के कारण हुआ। उसके सहकर्मियों ने रोते हुए बताया कि वह एक बहुत ही प्रतिभाशाली सॉफ्टवेयर डेवलपर था। वह अगले महीने एक बड़े प्रोजेक्ट के लिए विदेश जाने वाला था। उसके सपने बड़े थे—वह अपने माता-पिता के लिए एक नया घर खरीदना चाहता था। लेकिन एक लापरवाही ने उन सपनों को ईंट-पत्थरों के नीचे कुचल दिया।
9. समाज की भूमिका: तमाशबीन या मददगार?
इस हादसे के वक्त एक कड़वी और शर्मनाक सच्चाई भी सामने आई। जब रोहन मलबे के नीचे से चिल्ला रहा था, तो कई लोग मदद करने के बजाय अपने मोबाइल फोन निकालकर वीडियो बना रहे थे। सोशल मीडिया पर लाइव स्ट्रीमिंग की होड़ मची थी। अगर उन सौ हाथों में कैमरा की जगह ईंट-पत्थर हटाने का जज्बा होता, तो शायद कुछ मिनट बच जाते और रोहन आज जिंदा होता। हालांकि, कुछ स्थानीय युवाओं ने पुलिस के आने से पहले ही बचाव कार्य शुरू कर दिया था, जो मानवीयता की मिसाल है। लेकिन हमें एक समाज के रूप में सोचना होगा कि किसी की मौत का तमाशा बनाना कितना जायज है? ‘बचाओ-बचाओ’ की गूंज के बीच दर्दनाक अंत के वीडियो अब वायरल हो रहे हैं, लोग ‘दुखद’ (Sad) इमोजी के साथ शेयर कर रहे हैं, लेकिन क्या ये वीडियो उस मां को उसका बेटा लौटा सकते हैं?
10. प्रशासन की नींद कब टूटेगी?
हर बड़े हादसे के बाद एक रटा-रटाया पैटर्न होता है—मुआवजे का ऐलान, जांच कमेटी का गठन, किसी कनिष्ठ अधिकारी का निलंबन और फिर खामोशी। इस मामले में भी सरकार ने मृतक के परिवार को मुआवजे की घोषणा की है और बिल्डर या ठेकेदार के खिलाफ एफआईआर दर्ज की है। लेकिन क्या यह काफी है? पैसा किसी के बेटे की जगह नहीं ले सकता। हमें सख्त कानूनों और उनके क्रियान्वयन की जरूरत है।
- स्ट्रक्चरल ऑडिट: शहरों में पुरानी और निर्माणाधीन इमारतों का समय-समय पर स्ट्रक्चरल ऑडिट अनिवार्य होना चाहिए।
- सख्त सजा: निर्माण स्थलों पर सुरक्षा मानकों का उल्लंघन करने वालों पर गैर-जमानती धाराएं लगनी चाहिए और फास्ट-ट्रैक कोर्ट में मुकदमा चलना चाहिए।
- रेस्क्यू इंफ्रास्ट्रक्चर: शहरों में हर 5 किलोमीटर पर एक एडवांस रेस्क्यू यूनिट होनी चाहिए जो 10 मिनट में पहुंच सके और जिसके पास आधुनिक उपकरण हों।
11. परिवार का भविष्य: अंधेरे में उम्मीद
रोहन अपने घर का एकमात्र कमाने वाला सदस्य था। उसके पिता हाल ही में रिटायर हुए थे और एक छोटी पेंशन पर निर्भर थे। उसकी छोटी बहन की पढ़ाई की जिम्मेदारी भी उसी पर थी। उसके जाने से परिवार की आर्थिक रीढ़ पूरी तरह टूट गई है। भावनात्मक नुकसान तो अपूरणीय है ही। अब उस बूढ़े पिता को, जिसे आराम करना चाहिए था, फिर से काम की तलाश में निकलना पड़ेगा। उस बहन को अपनी पढ़ाई शायद बीच में छोड़नी पड़े। एक लापरवाही ने पूरे परिवार का भविष्य अंधकारमय कर दिया है। यह एक सामूहिक हत्या है जिसमें बिल्डर, प्रशासन और समाज सब भागीदार हैं।
12. सुरक्षा संस्कृति (Safety Culture) का अभाव
भारत में हम अक्सर सुरक्षा को ‘जुगाड़’ के भरोसे छोड़ देते हैं। “अरे कुछ नहीं होगा” वाला रवैया हमारी मानसिकता में बस गया है। चाहे वह हेलमेट पहनना हो, सीट बेल्ट लगाना हो या कंस्ट्रक्शन साइट पर सेफ्टी नेट लगाना। यह हादसा हमें चेतावनी देता है कि सुरक्षा कोई विकल्प नहीं, बल्कि प्राथमिकता होनी चाहिए। इंजीनियरिंग कॉलेजों में हम छात्रों को पुल और इमारतें बनाना सिखाते हैं, लेकिन हम उन्हें यह नहीं सिखाते कि खुद की सुरक्षा कैसे करें या असुरक्षित ढांचों को कैसे पहचानें।
13. मीडिया रिपोर्टिंग और संवेदनशीलता
इस घटना की कवरेज के दौरान मीडिया की भूमिका भी मिली-जुली रही। जहां कुछ पत्रकारों ने प्रशासन पर दबाव बनाने का काम किया, वहीं कुछ ने टीआरपी के लिए पीड़ित परिवार के दुख को भुनाने की कोशिश की। माइक लेकर रोती हुई मां के मुंह के सामने करना और पूछना “आपको कैसा लग रहा है?” पत्रकारिता नहीं, क्रूरता है। ऐसे समय में मीडिया को संयम और संवेदनशीलता बरतने की जरूरत है।
14. हम सब जिम्मेदार हैं
अंत में, 18 जनवरी 2026 की यह घटना केवल एक अखबार की हेडलाइन नहीं है, यह एक आईना है जिसमें हम अपना चेहरा देख सकते हैं। ‘बचाओ-बचाओ’ की गूंज के बीच दर्दनाक अंत सिर्फ रोहन का नहीं हुआ, बल्कि हमारी सामूहिक चेतना (Collective Conscience) का हुआ है। जब तक हम अपनी सड़कों, इमारतों और सार्वजनिक स्थानों को सुरक्षित नहीं बनाएंगे, तब तक ऐसे रोहन मरते रहेंगे। जब तक हम वीडियो बनाने के बजाय हाथ बढ़ाना नहीं सीखेंगे, तब तक मानवता हारती रहेगी।
आज रात, जब आप अपने सुरक्षित घरों में सोएंगे, तो एक पल के लिए उस रोहन के बारे में सोचिएगा जो 4.5 घंटे तक अंधेरे में, धूल और दर्द के बीच लड़ता रहा, इस उम्मीद में कि हम उसे बचा लेंगे। हमने उसे निराश किया। सिस्टम ने उसे निराश किया।
ईश्वर दिवंगत आत्मा को शांति प्रदान करे और उनके परिवार को इस वज्रपात को सहन करने की शक्ति दे। लेकिन प्रार्थनाओं से आगे बढ़कर हमें प्रण लेना होगा कि हम अपने आसपास सुरक्षा को लेकर सतर्क रहेंगे, अवैध निर्माणों के खिलाफ आवाज उठाएंगे और कभी भी किसी की पुकार को अनसुना नहीं करेंगे, ताकि फिर किसी बेटे की चीखें मलबे में दबकर खामोश न हो जाएं।
यह हादसा हमें सोने नहीं देना चाहिए। यह एक जागने की घंटी है।
ओम शांति।
