महाराष्ट्र की राजनीति, जो पिछले कुछ वर्षों से लगातार उथल-पुथल, बगावत और सत्ता परिवर्तन का केंद्र बनी हुई है, आज एक बार फिर एक बेहद संवेदनशील और विस्फोटक मुद्दे पर गरमा गई है। राज्य के उपमुख्यमंत्री और भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के कद्दावर नेता देवेंद्र फडणवीस ने आज एक ऐसा दावा किया है जिसने न केवल सियासी गलियारों में हड़कंप मचा दिया है, बल्कि बालासाहेब ठाकरे की विरासत को लेकर चल रही लड़ाई को एक नए और कड़वे मोड़ पर ला खड़ा किया है।
ठाकरे गुट से जुड़े कार्यक्रमों में लगे पाकिस्तान समर्थक नारे
14 जनवरी 2026 की सुबह, मकर संक्रांति के पर्व के बीच, देवेंद्र फडणवीस ने मीडिया को संबोधित करते हुए आरोप लगाया कि ठाकरे गुट से जुड़े कार्यक्रमों में लगे पाकिस्तान समर्थक नारे अब एक सामान्य बात होती जा रही है। उन्होंने एक कथित वीडियो का हवाला देते हुए उद्धव ठाकरे की शिव सेना (यूबीटी) पर तुष्टिकरण की राजनीति के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा और स्वाभिमान से समझौता करने का आरोप लगाया।
1. देवेंद्र फडणवीस का विस्फोटक दावा: आखिर हुआ क्या?
विवाद की शुरुआत तब हुई जब सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल होने लगा। बताया जा रहा है कि यह वीडियो महाराष्ट्र के एक जिले में आयोजित उद्धव ठाकरे गुट की एक रैली या सभा का है। इस वीडियो में भीड़ के बीच से कुछ आवाजें सुनाई दे रही हैं जो कथित तौर पर “पाकिस्तान जिंदाबाद” के नारे लगा रही हैं।
इस वीडियो के सामने आते ही, महाराष्ट्र के गृह मंत्री और उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने आक्रामक रुख अपना लिया। उन्होंने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा:
“यह देखकर अत्यंत वेदना होती है कि जिस शिव सेना की स्थापना हिंदू हृदय सम्राट बालासाहेब ठाकरे ने की थी, आज उसी पार्टी के कार्यक्रमों में पाकिस्तान के समर्थन में नारे लग रहे हैं। ठाकरे गुट से जुड़े कार्यक्रमों में लगे पाकिस्तान समर्थक नारे यह सिद्ध करते हैं कि वोट बैंक की राजनीति के लिए उद्धव जी ने किस स्तर का समझौता कर लिया है। पुलिस ने इस मामले को गंभीरता से लिया है और देशद्रोहियों को बख्शा नहीं जाएगा, लेकिन सवाल उस नेतृत्व से है जो ऐसी ताकतों को अपने मंच पर जगह दे रहा है।”
फडणवीस ने यह भी आरोप लगाया कि जब से उद्धव ठाकरे ने कांग्रेस और एनसीपी के साथ गठबंधन (महा विकास अघाड़ी) किया है, तब से उनकी रैलियों में ऐसे तत्वों की घुसपैठ बढ़ गई है जो भारत विरोधी मानसिकता रखते हैं। उन्होंने इसे “जनाब सेना” की संज्ञा देते हुए तीखा हमला बोला।

2. वीडियो की सच्चाई और जांच का दायरा
जैसे ही यह खबर फैली, पुलिस प्रशासन हरकत में आ गया। स्थानीय पुलिस ने अज्ञात व्यक्तियों के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया है और वीडियो की फॉरेंसिक जांच की जा रही है।
वीडियो का विश्लेषण: अक्सर राजनीतिक रैलियों के वीडियो के साथ छेड़छाड़ (Doctoring) की खबरें आती रहती हैं।
- पक्ष: बीजेपी और शिंदे गुट का दावा है कि वीडियो असली है और इसमें स्पष्ट रूप से “पाकिस्तान जिंदाबाद” सुना जा सकता है।
- विपक्ष: ठाकरे गुट का कहना है कि यह “फेक वीडियो” है और इसमें ऑडियो के साथ छेड़छाड़ की गई है। उनका दावा है कि शायद नारा कुछ और था (जैसे किसी नेता का नाम), जिसे एडिट करके या गलत तरीके से पेश करके “पाकिस्तान” जैसा सुनाया जा रहा है।
हालांकि, सच्चाई फॉरेंसिक लैब की रिपोर्ट के बाद ही सामने आएगी, लेकिन राजनीति रिपोर्ट का इंतजार नहीं करती। सोशल मीडिया पर यह वीडियो आग की तरह फैल चुका है और जनता के बीच धारणा (Perception) बनाने का खेल शुरू हो चुका है।
3. बालासाहेब की विरासत की लड़ाई: हिंदुत्व बनाम सेक्युलरिज्म
इस पूरे विवाद के केंद्र में शिव सेना की मूल विचारधारा है। बाल ठाकरे ने शिव सेना का गठन 1966 में किया था और बाद में उन्होंने कट्टर हिंदुत्व को अपनाया। उनकी राजनीति में पाकिस्तान के प्रति नरम रुख के लिए कोई जगह नहीं थी। वे अक्सर कहते थे कि क्रिकेट हो या कला, पाकिस्तान के साथ कोई संबंध नहीं होना चाहिए जब तक कि वे आतंकवाद बंद नहीं करते।
आज जब ठाकरे गुट से जुड़े कार्यक्रमों में लगे पाकिस्तान समर्थक नारे की बात सामने आती है, तो यह उद्धव ठाकरे के लिए एक बड़ी राजनीतिक चुनौती बन जाती है।
- शिंदे गुट का हमला: मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे, जिन्होंने “असली शिव सेना” होने का दावा किया है, ने इस मुद्दे को तुरंत लपक लिया है। उनका कहना है, “बालासाहेब आज होते तो यह दिन देखने से पहले ही कठोर निर्णय ले लेते। उद्धव जी ने सत्ता के लालच में उन लोगों के साथ हाथ मिला लिया है जो देश के दुश्मन हैं।”
- बीजेपी की रणनीति: बीजेपी इस घटना के जरिए यह साबित करना चाहती है कि उद्धव ठाकरे ने हिंदुत्व छोड़ दिया है। वे उद्धव के “मुस्लिम वोट बैंक” की ओर झुकाव को हिंदुओं के खिलाफ बताकर अपने कोर वोटर को एकजुट (Consolidate) करना चाहते हैं।
4. उद्धव गुट (Sena UBT) का पलटवार: “यह साजिश है”
आरोपों से घिरे उद्धव ठाकरे गुट ने भी तीखी प्रतिक्रिया दी है। पार्टी के फायरब्रांड नेता और सांसद संजय राउत ने फडणवीस के आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है।
राउत ने अपने बयान में कहा:
“यह बीजेपी की डर्टी ट्रिक्स डिपार्टमेंट का काम है। चुनाव नजदीक आ रहे हैं और उनके पास महंगाई, बेरोजगारी और किसानों की आत्महत्या पर बोलने के लिए कुछ नहीं है, इसलिए वे फिर से हिंदू-मुस्लिम और पाकिस्तान का मुद्दा लेकर आए हैं। ठाकरे गुट से जुड़े कार्यक्रमों में लगे पाकिस्तान समर्थक नारे लगाने का सवाल ही नहीं उठता। हमारे खून में राष्ट्रवाद है। अगर किसी ने शरारत की है, तो पुलिस उसे पकड़े, लेकिन पूरी पार्टी और लाखों शिव सैनिकों को बदनाम करना बंद करें।”
ठाकरे गुट का तर्क है कि बीजेपी जानबूझकर अपनी आईटी सेल के माध्यम से ऐसे फर्जी वीडियो वायरल करवाती है ताकि ध्रुवीकरण (Polarization) किया जा सके। उन्होंने चुनाव आयोग से भी इस मामले में हस्तक्षेप करने की मांग की है।
5. महाराष्ट्र का बदलता राजनीतिक समीकरण
2026 में महाराष्ट्र की राजनीति एक बहुत ही नाजुक दौर से गुजर रही है। लोकसभा चुनावों के बाद और आगामी स्थानीय निकाय या विधानसभा चुनावों से पहले हर छोटी घटना बड़ा रूप ले रही है।
मुस्लिम मतों का ध्रुवीकरण: पिछले कुछ चुनावों में यह देखा गया है कि महाराष्ट्र का मुस्लिम मतदाता, जो पहले कांग्रेस या एनसीपी को वोट देता था, अब उद्धव ठाकरे की शिव सेना (UBT) के प्रति भी आकर्षित हुआ है। उन्हें लगता है कि उद्धव ही बीजेपी को टक्कर दे सकते हैं। बीजेपी इसी को अपना हथियार बना रही है। वे हिंदू मतदाताओं को यह समझाने की कोशिश कर रहे हैं कि उद्धव अब “बालासाहेब के शिव सैनिक” नहीं रहे, बल्कि वे “तुष्टिकरण की राजनीति” करने वाले नेता बन गए हैं।
मराठा बनाम ओबीसी: महाराष्ट्र में मराठा आरक्षण का मुद्दा भी गर्म है। ऐसे में, “पाकिस्तान और राष्ट्रवाद” का मुद्दा जातिगत समीकरणों को तोड़ने और धार्मिक आधार पर वोटरों को एकजुट करने का एक पुराना और परखा हुआ तरीका है।
6. कानूनी पहलू: देशद्रोह और नारेबाज़ी
भारतीय कानून के तहत, शत्रु देश के समर्थन में नारे लगाना गंभीर अपराध की श्रेणी में आता है।
- धारा 124A (राजद्रोह): हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इस पर कुछ रोक लगाई है, लेकिन भारतीय न्याय संहिता (BNS) की नई धाराओं के तहत “देश की संप्रभुता और अखंडता को खतरे में डालने” वाले कृत्यों पर कड़ी सजा का प्रावधान है।
- धारा 153A: धर्म, जाति या समुदाय के आधार पर नफरत फैलाना।
अगर जांच में यह साबित होता है कि नारे वास्तव में लगे थे, तो पुलिस आयोजकों के खिलाफ भी मामला दर्ज कर सकती है। आयोजकों पर आरोप लग सकता है कि उन्होंने भीड़ को नियंत्रित नहीं किया या ऐसे तत्वों को बढ़ावा दिया। यह उद्धव ठाकरे गुट के स्थानीय नेताओं के लिए बड़ी मुसीबत बन सकता है, क्योंकि उन्हें कानूनी पचड़ों में फंसाया जा सकता है।
7. सोशल मीडिया वॉर: आईटी सेल की भूमिका
आज के दौर में कोई भी राजनीतिक लड़ाई जमीन से ज्यादा मोबाइल स्क्रीन पर लड़ी जाती है। ठाकरे गुट से जुड़े कार्यक्रमों में लगे पाकिस्तान समर्थक नारे वाला वीडियो वाट्सऐप यूनिवर्सिटी से लेकर ट्विटर (X) और फेसबुक तक छाया हुआ है।
- बीजेपी समर्थक: इस वीडियो को “उद्धव की असली सच्चाई” बताकर शेयर कर रहे हैं। वे पुराने वीडियो (बालासाहेब के भाषण) और नए वीडियो की तुलना करके दिखा रहे हैं कि पार्टी कितनी बदल गई है।
- यूबीटी समर्थक: वे उन वीडियो को शेयर कर रहे हैं जिनमें बीजेपी के नेता महबूबा मुफ्ती (जो कभी पाकिस्तान समर्थक मानी जाती थीं) के साथ सरकार बनाते हुए दिखे थे। वे इसे बीजेपी का दोगलापन बता रहे हैं।
यह “नैरेटिव वॉर” अगले कुछ दिनों तक चलता रहेगा। आम जनता के लिए सच और झूठ के बीच अंतर करना मुश्किल हो गया है। डीपफेक और एआई के जमाने में, किसी भी वीडियो की प्रमाणिकता पर तुरंत भरोसा करना जोखिम भरा है।

8. क्या यह इंटेलिजेंस फेलियर है?
एक महत्वपूर्ण सवाल यह भी उठता है कि अगर किसी सार्वजनिक रैली में देशविरोधी नारे लग रहे थे, तो वहां मौजूद पुलिस और खुफिया विभाग (Intelligence) के अधिकारी क्या कर रहे थे? देवेंद्र फडणवीस राज्य के गृह मंत्री भी हैं। विपक्ष उन पर ही सवाल उठा रहा है कि अगर ऐसा हुआ, तो यह उनकी पुलिस की विफलता है कि वे इसे रोक नहीं पाए या मौके पर ही गिरफ्तारी नहीं कर पाए।
क्या यह संभव है कि कुछ शरारती तत्वों ने (Saboteurs) जानबूझकर भीड़ में घुसकर ऐसे नारे लगाए हों ताकि रैली को बदनाम किया जा सके? राजनीति में ‘प्लांटेड’ (Planted) लोगों का इस्तेमाल कोई नई बात नहीं है।
9. 2026 के चुनावों पर प्रभाव
इस घटना का सीधा असर आगामी चुनावों पर पड़ेगा।
- हिंदू वोट बैंक: बीजेपी और शिंदे गुट इस मुद्दे को भुनाने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे। वे खुद को “राष्ट्रवादी” और उद्धव गुट को “राष्ट्रविरोधी ताकतों का समर्थक” के रूप में पेश करेंगे।
- सहानुभूति लहर: अगर यह वीडियो फर्जी साबित होता है, तो उद्धव ठाकरे को सहानुभूति (Sympathy) मिल सकती है। जनता को लग सकता है कि उन्हें जानबूझकर निशाना बनाया जा रहा है।
- गठबंधन में दरार: महा विकास अघाड़ी (MVA) में शामिल कांग्रेस और एनसीपी (शरद पवार) के लिए भी यह असहज स्थिति है। वे राष्ट्रवाद के मुद्दे पर बीजेपी से सीधे नहीं टकरा सकते। अगर यह मुद्दा बड़ा बनता है, तो वे उद्धव गुट से थोड़ी दूरी बना सकते हैं या बचाव की मुद्रा में आ सकते हैं।
10. मीडिया की भूमिका: आग में घी
मेनस्ट्रीम मीडिया (TV News Channels) ने इस मुद्दे को हाथों-हाथ लिया है। प्राइम टाइम डिबेट्स में ठाकरे गुट से जुड़े कार्यक्रमों में लगे पाकिस्तान समर्थक नारे पर बहस हो रही है। एंकर्स चिल्ला-चिल्लाकर सवाल पूछ रहे हैं। यह मीडिया कवरेज इस मुद्दे को और हवा दे रहा है, जिससे जमीनी स्तर पर तनाव बढ़ने की आशंका है।
जिम्मेदार पत्रकारिता की मांग है कि पहले वीडियो की सत्यता की पुष्टि की जाए। लेकिन टीआरपी की दौड़ में, तथ्य अक्सर पीछे छूट जाते हैं और शोर आगे निकल जाता है।
11. आम शिव सैनिक की मनोदशा
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे ज्यादा दुविधा में वह आम शिव सैनिक है जो बालासाहेब की विचारधारा को मानकर पार्टी से जुड़ा था।
- एक तरफ उसकी निष्ठा ‘मातोश्री’ (ठाकरे परिवार) के प्रति है।
- दूसरी तरफ, उसे यह सहन नहीं होता कि उसकी पार्टी के मंच से पाकिस्तान के समर्थन में नारे लगें। यह वैचारिक द्वंद्व (Ideological Conflict) शिव सेना (UBT) के कैडर को कमजोर कर सकता है। एकनाथ शिंदे का गुट इसी असंतुष्ट कैडर को अपनी ओर खींचने की कोशिश में लगा है।
12. इतिहास के आईने में: पहले भी हुए हैं विवाद
यह पहली बार नहीं है जब भारत में किसी राजनीतिक रैली में “पाकिस्तान जिंदाबाद” के नारे लगने के आरोप लगे हों।
- कर्नाटक विधानसभा चुनाव के दौरान भी कांग्रेस की रैली में ऐसे आरोप लगे थे, जो बाद में फॉरेंसिक जांच में गलत साबित हुए थे (वहां नारा कुछ और था)।
- जेएनयू (JNU) के मामले में भी वीडियो डॉक्टर्ड होने की बात सामने आई थी।
इतिहास गवाह है कि चुनाव से ठीक पहले ऐसे भावनात्मक और राष्ट्रवाद से जुड़े मुद्दे जानबूझकर उठाए जाते हैं। यह मतदाता का ध्यान बुनियादी मुद्दों (सड़क, पानी, बिजली, रोजगार) से हटाने का सबसे कारगर तरीका है।
13. समाज पर प्रभाव: बढ़ता वैमनस्य
राजनीतिक लाभ के लिए किए गए ऐसे दावे समाज में जहर घोलने का काम करते हैं। महाराष्ट्र, जो अपनी प्रगतिशील सोच और औद्योगिक विकास के लिए जाना जाता है, वहां इस तरह का धार्मिक और राष्ट्रीय ध्रुवीकरण सामाजिक ताने-बाने को नुकसान पहुंचाता है। पड़ोसियों के बीच अविश्वास की भावना पैदा होती है।
एक जिम्मेदार नागरिक के तौर पर, हमें किसी भी वीडियो या दावे पर आँख मूंदकर विश्वास करने से बचना चाहिए। हमें कानून और जांच एजेंसियों पर भरोसा रखना चाहिए।
14. सच्चाई की प्रतीक्षा और राजनीति का कड़वा सच
अंत में, ठाकरे गुट से जुड़े कार्यक्रमों में लगे पाकिस्तान समर्थक नारे का मुद्दा अभी शांत होने वाला नहीं है। देवेंद्र फडणवीस ने तीर कमान से छोड़ दिया है, और यह तीर कितना नुकसान पहुंचाएगा, यह आने वाला वक्त बताएगा।
अगर वीडियो असली है, तो यह उद्धव ठाकरे गुट के लिए आत्मचिंतन का समय है। उन्हें अपने कैडर और समर्थकों की छंटनी करनी होगी और यह सुनिश्चित करना होगा कि उनकी पार्टी का मंच राष्ट्रविरोधी तत्वों का अड्डा न बने। लेकिन, अगर यह वीडियो फर्जी या डॉक्टर्ड निकलता है, तो यह भारतीय लोकतंत्र के लिए एक खतरनाक संकेत है। यह बताता है कि सत्ता प्राप्ति के लिए राजनीतिक दल किस हद तक नीचे गिर सकते हैं।
फिलहाल, महाराष्ट्र की राजनीति में ‘जय हिंद’ और ‘जय महाराष्ट्र’ के साथ-साथ आरोपों और प्रत्यारोपों का शोर सबसे ऊंचा है। 14 जनवरी 2026 का यह दिन याद रखा जाएगा जब राजनीति ने फिर एक बार राष्ट्रवाद को अपने स्वार्थ की कसौटी पर कसने की कोशिश की।
हम पाठकों से अपील करते हैं कि वे धैर्य बनाए रखें और किसी भी अफवाह का हिस्सा न बनें। जांच रिपोर्ट का इंतजार करें और अपने विवेक का इस्तेमाल करें।
