अंतरिक्ष… एक ऐसी जगह जहां गुरुत्वाकर्षण (Gravity) नहीं होता, जहां इंसान हवा में तैरता है, और जहां से हमारी पृथ्वी एक नीली गेंद जैसी दिखाई देती है। यह सुनना और देखना जितना रोमांचक लगता है, उसे जीना उतना ही कठिन है। भारतीय मूल की अमेरिकी अंतरिक्ष यात्री और नासा की दिग्गज सुनीता विलियम्स का नाम आज किसी परिचय का मोहताज नहीं है। उन्होंने अंतरिक्ष में सबसे लंबा समय बिताने का रिकॉर्ड बनाया और दुनिया भर की लड़कियों को सपने देखने का हौसला दिया।
लेकिन, क्या आप जानते हैं कि सितारों की दुनिया से लौटने के बाद एक अंतरिक्ष यात्री को किन शारीरिक और मानसिक चुनौतियों से गुजरना पड़ता है? हाल ही में, अपने रिटायरमेंट के बाद के अनुभवों को साझा करते हुए सुनीता विलियम्स ने एक चौंकाने वाला खुलासा किया। उन्होंने बताया कि जब वह लंबे मिशन के बाद धरती पर लौटीं, तो वह “चलना भूल गई थीं”। यह सुनने में अजीब लग सकता है, लेकिन यह अंतरिक्ष यात्रियों के जीवन का एक कड़वा सच है।
आज के इस विस्तृत ब्लॉग में, हम सुनीता विलियम्स के इस अनुभव, अंतरिक्ष में शरीर पर होने वाले प्रभावों और नासा के मिशन्स के पीछे की उन कहानियों को जानेंगे जो अक्सर सुर्खियों में नहीं आतीं। यह कहानी सिर्फ एक महिला की नहीं, बल्कि मानव शरीर की सीमाओं और इच्छाशक्ति की है।
अंतरिक्ष की परी: सुनीता विलियम्स का सफर (The Legend of Sunita Williams)
इससे पहले कि हम उस दर्दनाक अनुभव की बात करें, हमें यह समझना होगा कि सुनीता विलियम्स कौन हैं और उन्होंने अंतरिक्ष विज्ञान की दुनिया में क्या मुकाम हासिल किया है। 19 सितंबर 1965 को जन्मी सुनीता का नाता भारत के गुजरात राज्य से है। उनके पिता दीपक पंड्या एक न्यूरोएनाटॉमिस्ट थे। भारतीय संस्कृति और मूल्यों के साथ पली-बढ़ीं सुनीता ने अपनी मेहनत से अमेरिकी नौसेना (US Navy) में जगह बनाई और बाद में नासा का हिस्सा बनीं।
सुनीता ने अपने करियर में कई बार अंतरिक्ष की यात्रा की।
- अभियान 14/15: उनका पहला बड़ा मिशन, जहां उन्होंने अंतरिक्ष में 195 दिन बिताए।
- स्पेस वॉक: उन्होंने महिलाओं द्वारा सबसे अधिक स्पेसवॉक (Spacewalk) का रिकॉर्ड भी अपने नाम किया।
- स्टारलाइनर मिशन: बोइंग के स्टारलाइनर अंतरिक्ष यान की पहली मानवयुक्त उड़ान का नेतृत्व करना।
जब एक अंतरिक्ष यात्री इतने लंबे समय तक धरती से दूर रहता है, तो उसका शरीर माइक्रोग्रेविटी (Microgravity) का आदी हो जाता है। यही वह मोड़ है जहां से “चलना भूल जाने” की कहानी शुरू होती है।

‘चलना भूल गई’: वापसी का वह खौफनाक पल
सुनीता विलियम्स जब अपने मिशन से वापस लौटीं, तो दुनिया उनके स्वागत के लिए तैयार थी। कैमरे चमक रहे थे, लोग तालियां बजा रहे थे। लेकिन कैप्सूल के अंदर का दृश्य कुछ और ही था। जब सुनीता विलियम्स धरती पर लैंड हुईं, तो उन्हें कैप्सूल से बाहर निकाला गया। नियम के मुताबिक, अंतरिक्ष यात्रियों को तुरंत चलने नहीं दिया जाता, लेकिन सुनीता ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि उस वक्त उनका दिमाग तो चल रहा था, लेकिन पैर जवाब दे चुके थे।
न्यूरोलॉजिकल डिसकनेक्शन (Neurological Disconnection)
सुनीता बताती हैं कि अंतरिक्ष में पैर सिर्फ तैरने या किसी चीज को फंसाकर खुद को स्थिर रखने के काम आते हैं। वहां चलने की जरूरत ही नहीं पड़ती। महीनों तक जब पैरों का इस्तेमाल चलने के लिए नहीं होता, तो दिमाग और पैरों के बीच का तंत्रिका संपर्क (Neural Connection) कमजोर पड़ जाता है।
जब वह धरती पर लौटीं और गुरुत्वाकर्षण महसूस हुआ, तो उन्हें लगा जैसे उनके पैरों में शीशा भर दिया गया हो। उन्होंने एक साक्षात्कार में कहा, “मैं खड़ी होना चाहती थी, मेरा दिमाग मुझे आदेश दे रहा था कि ‘चलो’, लेकिन मेरे पैर समझ ही नहीं पा रहे थे कि जमीन पर संतुलन कैसे बनाना है। मैं सचमुच चलना भूल गई थी।”
यह सिर्फ कमजोरी नहीं थी; यह शरीर के ‘सॉफ्टवेयर’ का बदल जाना था। अंतरिक्ष में ऊपर और नीचे का कोई मतलब नहीं होता। कान के अंदर का ‘वेस्टिबुलर सिस्टम’ (Vestibular System), जो संतुलन बनाता है, अंतरिक्ष में काम करना बंद कर देता है। धरती पर आते ही जब यह सिस्टम दोबारा चालू होता है, तो व्यक्ति को भयंकर चक्कर आते हैं। सुनीता को ऐसा लग रहा था जैसे पूरी दुनिया घूम रही है और वह किसी भी पल गिर सकती हैं।
माइक्रोग्रेविटी का शरीर पर कहर (The Science Behind The Struggle)
सुनीता विलियम्स का यह अनुभव वैज्ञानिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह हमें बताता है कि अंतरिक्ष वातावरण मानव शरीर के लिए कितना कठोर है। आइए जानते हैं कि लंबे अंतरिक्ष मिशन के दौरान शरीर में क्या बदलाव आते हैं:
1. हड्डियों और मांसपेशियों का क्षय (Bone and Muscle Atrophy)
धरती पर, हम गुरुत्वाकर्षण के विरुद्ध काम करते हैं। हर कदम पर हमारी मांसपेशियां और हड्डियां भार उठाती हैं। लेकिन माइक्रोग्रेविटी में शरीर भारहीन हो जाता है।
- मांसपेशियां: चूँकि उनका इस्तेमाल नहीं होता, वे सिकुड़ने लगती हैं।
- हड्डियां: हड्डियों से कैल्शियम निकलने लगता है, जिससे वे कमजोर और भुरभुरी हो जाती हैं। एक महीने में अंतरिक्ष यात्री अपनी हड्डियों का घनत्व (Bone Density) 1% से 2% तक खो सकता है।
यही कारण है कि वापसी पर सुनीता विलियम्स को अपने ही शरीर का वजन उठाना पहाड़ तोड़ने जैसा लग रहा था।
2. फ्लूइड शिफ्ट (Fluid Shift)
धरती पर गुरुत्वाकर्षण खून और पानी को पैरों की तरफ खींचता है। अंतरिक्ष में यह फ्लूइड छाती और सिर की तरफ चला जाता है। इसी कारण अंतरिक्ष यात्रियों के चेहरे सूजे हुए (Puffy Face) लगते हैं और टांगें पतली हो जाती हैं (Chicken Legs)। जब वे वापस आते हैं, तो सारा खून अचानक पैरों की तरफ भागता है, जिससे बेहोशी आ सकती है।
3. दिशा भ्रम (Spatial Disorientation)
सुनीता ने बताया कि रिटायरमेंट के बाद भी कई बार उन्हें लगता था कि अगर वह पेन छोड़ेंगी तो वह हवा में तैरेगा। अंतरिक्ष में रहने के बाद धरती के नियमों के साथ तालमेल बिठाना मानसिक रूप से थका देने वाला होता है। कॉर्नर पर मुड़ते समय वह अक्सर दीवारों से टकरा जाती थीं क्योंकि उनका शरीर सही कोण (Angle) का अनुमान नहीं लगा पाता था।
पुनर्वास: फिर से बच्चा बनने जैसा अनुभव (Rehabilitation Process)
रिटायरमेंट के बाद के अपने किस्सों में सुनीता विलियम्स ने बताया कि अंतरिक्ष से लौटना, फिर से पैदा होने जैसा था। उन्हें एक बच्चे की तरह दोबारा चलना सीखना पड़ा।
जिम नहीं, मेडिकल लैब
वापसी के बाद के 45 दिन उनके लिए किसी सजा से कम नहीं थे। नासा के डॉक्टर और फिजियोथेरेपिस्ट हर दिन उनके साथ काम करते थे।
- स्विमिंग पूल थेरेपी: पानी के अंदर चलना सिखाया गया ताकि जोड़ों पर जोर न पड़े।
- बैलेंस ट्रेनिंग: आंखों को बंद करके एक पैर पर खड़े होने की कोशिश करना, जो शुरुआत में नामुमकिन लगता था।
सुनीता ने हंसते हुए एक किस्सा सुनाया कि कैसे वह अपने घर में ही कई बार गिरते-गिरते बचीं। वह कहती हैं, “मुझे सीढ़ियां चढ़ने से डर लगता था। मुझे रेलिंग को इतनी जोर से पकड़ना पड़ता था कि मेरे हाथ सफेद हो जाते थे। मेरे कुत्ते मुझे अजीब नजरों से देखते थे कि मालकिन को अचानक क्या हो गया है।”
यह संघर्ष दिखाता है कि एक अंतरिक्ष यात्री की जॉब सिर्फ रॉकेट में बैठकर ऊपर जाना नहीं है, बल्कि वापस आकर धरती पर सामान्य जीवन जीने के लिए संघर्ष करना भी है।

अंतरिक्ष में जीवन: जो कैमरे पर नहीं दिखता
अपने संस्मरणों में सुनीता विलियम्स ने सिर्फ दर्द की बात नहीं की, बल्कि अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) पर बिताए उन पलों को भी याद किया जो जादुई थे। उन्होंने बताया कि वहां जीवन कितना अनुशासित होता है।
सोना और जागना
अंतरिक्ष में सूर्योदय और सूर्यास्त हर 90 मिनट में होता है। यानी 24 घंटे में 16 बार दिन और रात। ऐसे में सोने के लिए घड़ी का सहारा लेना पड़ता है। वे अपने स्लीपिंग बैग को दीवार से बांधकर सोते थे ताकि तैरते हुए किसी मशीन से न टकरा जाएं।
टॉयलेट और पानी की समस्या
यह सबसे ज्यादा पूछा जाने वाला सवाल है। सुनीता ने बताया कि वहां पानी की एक-एक बूंद कीमती होती है। यहाँ तक कि उनके पसीने और मूत्र को भी रिसाइकिल करके पीने योग्य पानी में बदला जाता है। उन्होंने मजाक में कहा, “आज की कॉफी, कल की कॉफी बनती है।” यह सुनने में अजीब है, लेकिन अंतरिक्ष में संसाधनों का यही चक्र है।
स्पेस फूड
भारतीय होने के नाते सुनीता को मसालेदार खाना पसंद था। वह अपने साथ समोसे और भारतीय मिठाइयां भी ले गई थीं। लेकिन माइक्रोग्रेविटी में स्वाद कलिकाएं (Taste Buds) बदल जाती हैं। सिर में फ्लूइड जमा होने के कारण हमेशा जुकाम जैसा लगता है, इसलिए तीखा खाना भी फीका लगता है। उन्हें वहां सबसे ज्यादा धरती की ताजी हवा और बारिश की खुशबू याद आती थी।
रिटायरमेंट के बाद का जीवन: अनुभव बांटतीं ‘सुनीता दीदी’
अब जब सुनीता विलियम्स सक्रिय अंतरिक्ष उड़ान से दूर हो चुकी हैं (या रिटायरमेंट के चरण में हैं, जैसा कि संदर्भ है), वह अपना समय अगली पीढ़ी को तैयार करने में बिता रही हैं।
नई पीढ़ी को संदेश
वह स्कूलों और कॉलेजों में जाती हैं और बच्चों को विज्ञान के प्रति प्रेरित करती हैं। उनका मानना है कि मंगल ग्रह (Mars) पर जाने वाला पहला इंसान शायद अभी किसी क्लासरूम में बैठा है। वह लड़कियों को विशेष रूप से प्रोत्साहित करती हैं कि वे STEM (Science, Technology, Engineering, Math) में अपना करियर बनाएं।
‘द ओवरव्यू इफेक्ट’ (The Overview Effect)
सुनीता अक्सर ‘ओवरव्यू इफेक्ट’ की बात करती हैं। यह वह मानसिक बदलाव है जो अंतरिक्ष यात्रियों को तब महसूस होता है जब वे अंतरिक्ष से धरती को देखते हैं। सुनीता कहती हैं, “वहां से मुझे कोई सीमाएं (Borders) नहीं दिखीं। भारत, पाकिस्तान, अमेरिका, चीन – सब एक ही ग्रह का हिस्सा हैं। वहां से लौटने के बाद, धरती पर हो रही लड़ाइयां मुझे बहुत छोटी और बेमतलब लगती हैं।”
उनका यह नजरिया आज की दुनिया के लिए बहुत जरूरी है। रिटायरमेंट के बाद, वह पर्यावरण संरक्षण की भी वकालत कर रही हैं। उनका कहना है कि हमारा ग्रह बहुत नाजुक है और अंतरिक्ष के काले सन्नाटे में यही हमारा एकमात्र घर है।
नासा और भविष्य के मिशन में भूमिका
भले ही वह खुद अंतरिक्ष में न जाएं, लेकिन उनका अनुभव नासा के लिए अमूल्य है। वह ‘आर्टेमिस मिशन’ (Artemis Mission) के लिए सलाहकार की भूमिका निभा रही हैं, जिसका उद्देश्य चांद पर दोबारा इंसानों को भेजना है।
वह नए स्पेस सूट्स की डिजाइनिंग और कैप्सूल की सुरक्षा प्रणालियों पर अपने इनपुट्स देती हैं। उनका “चलना भूलने” वाला अनुभव अब नए अंतरिक्ष यात्रियों के लिए ट्रेनिंग का हिस्सा बन गया है। अब नासा ऐसी कसरत प्रणालियां विकसित कर रहा है जो अंतरिक्ष में भी पैरों को सक्रिय रखें, ताकि भविष्य में मंगल ग्रह पर उतरने वाले यात्रियों को वहां तुरंत चलने में दिक्कत न हो।
भारतीय कनेक्शन और भावनात्मक जुड़ाव
सुनीता विलियम्स भले ही अमेरिकी नागरिक हैं, लेकिन उनका दिल हमेशा भारत के करीब रहा। वह अपने साथ भगवद् गीता और भगवान गणेश की मूर्ति अंतरिक्ष में ले गई थीं। रिटायरमेंट के बाद वह अक्सर भारत आती हैं।
उन्होंने अपने किस्सों में बताया कि कैसे गुजरात के उनके पैतृक गांव के लोग उनकी सलामती के लिए हवन और पूजा करते थे। वह कहती हैं, “अंतरिक्ष में जब मैं भारत के ऊपर से गुजरती थी, तो मुझे एक अलग ही जुड़ाव महसूस होता था। मुझे लगता था कि करोड़ों दुआएं मुझे सुरक्षित रख रही हैं।”
यह भावनात्मक जुड़ाव उन्हें एक मशीन चलाने वाले अंतरिक्ष यात्री से एक संवेदनशील इंसान बनाता है। उनकी कहानी में तकनीक के साथ-साथ परंपरा और आस्था का भी संगम है।
एक योद्धा की कहानी
सुनीता विलियम्स का यह कहना कि वह “चलना भूल गई थीं”, कोई कमजोरी नहीं बल्कि उनकी ताकत का प्रमाण है। यह बताता है कि एक इंसान अपने सपनों को पूरा करने के लिए किस हद तक जा सकता है। उन्होंने अपने शरीर को तोड़ा, उसे बदला, और फिर उसे दोबारा बनाया – सिर्फ इसलिए ताकि मानवता ज्ञान की नई सीमाओं को छू सके।
आज जब हम रात में आसमान की ओर देखते हैं, तो हमें याद रखना चाहिए कि उन सितारों तक पहुंचने की कीमत बहुत भारी होती है। सुनीता विलियम्स जैसे साहसी लोग वह कीमत चुकाते हैं। उनका जीवन हमें सिखाता है कि गिरना बुरा नहीं है, चलना भूल जाना भी बुरा नहीं है; बुरा है कोशिश छोड़ देना।
रिटायरमेंट के बाद सुनीता विलियम्स अब धरती पर चल रही हैं, लेकिन उनके कदमों के निशान हमेशा के लिए सितारों पर अंकित हो चुके हैं। उनकी यह कहानी आने वाली सदियों तक हमें याद दिलाती रहेगी कि आसमान की ऊंचाई छूने के लिए जमीन पर पैर जमाना और फिर से चलना सीखना कितना जरूरी है।
नासा के इतिहास में और अंतरिक्ष विज्ञान की किताबों में, सुनीता विलियम्स का नाम हमेशा एक ऐसी निडर महिला के रूप में दर्ज रहेगा जिसने न सिर्फ अंतरिक्ष को जीता, बल्कि अपनी कमजोरियों को जीतकर फिर से खड़ा होना भी सिखाया।
