“ॐ नमो भगवते वासुदेवाय”
हिंदू धर्म में एकादशी (Ekadashi) का व्रत सभी व्रतों में सर्वश्रेष्ठ और मोक्षदायी माना जाता है। हर महीने दो एकादशियां आती हैं और हर एक का अपना विशेष महत्व होता है। लेकिन माघ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी अन्य सभी से थोड़ी अलग और विशिष्ट है। इसे हम षटतिला एकादशी (Shattila Ekadashi) के नाम से जानते हैं।
साल 2026 में यह पावन पर्व 14 जनवरी को मनाया जा रहा है। चूंकि आज हम 10 जनवरी 2026 में हैं, इसलिए इस व्रत की तैयारी के लिए यह सही समय है। यह एकादशी न केवल पापों का नाश करती है, बल्कि यह तिल (Sesame) के महत्व और दान की महिमा को भी स्थापित करती है।
Shattila Ekadashi 2026: तिथि और शुभ मुहूर्त
सबसे पहले, इस वर्ष की तिथियों पर एक नजर डालते हैं ताकि आप अपनी पूजा की तैयारी सही समय पर कर सकें।
- एकादशी तिथि: माघ मास, कृष्ण पक्ष
- अंग्रेजी तारीख: 14 जनवरी 2026 (बुधवार)
- व्रत का पारण समय: 15 जनवरी 2026 की सुबह (सूर्योदय के बाद)
(नोट: 2026 में यह एकादशी मकर संक्रांति के आसपास पड़ रही है, जिससे तिल के दान का महत्व और भी कई गुना बढ़ जाता है।)

इस एकादशी का नाम दो शब्दों से मिलकर बना है: ‘षट्’ (Shat) जिसका अर्थ है छह (Six) और ‘तिला’ (Tila) जिसका अर्थ है तिल (Sesame)।
धार्मिक शास्त्रों, विशेषकर पद्म पुराण के अनुसार, इस दिन तिल का उपयोग छह अलग-अलग तरीकों से करना अनिवार्य और कल्याणकारी माना गया है। जो व्यक्ति इस दिन इन 6 तरीकों से तिल का प्रयोग करता है, उसे कभी भी धन-धान्य की कमी नहीं होती और अंत में उसे बैकुंठ धाम की प्राप्ति होती है।
वे 6 प्रकार के उपयोग इस प्रकार हैं:
- तिल से स्नान (Til Snan): पानी में तिल मिलाकर नहाना।
- तिल का उबटन (Til Ubtan): तिल को पीसकर शरीर पर लगाना।
- तिल का हवन (Til Havan): तिल से हवन करना।
- तिल का तर्पण (Til Tarpan): पितरों को तिल मिला जल अर्पित करना।
- तिल का भोजन (Til Bhojan): तिल से बने व्यंजन खाना।
- तिल का दान (Til Daan): गरीबों या ब्राह्मणों को तिल दान करना।
किसी भी व्रत का फल तब तक पूर्ण नहीं मिलता जब तक उसकी कथा न सुनी जाए। Shattila Ekadashi की कथा स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने नारद मुनि को और पुलस्त्य ऋषि ने भीष्म पितामह को सुनाई थी।
कथा इस प्रकार है:
प्राचीन काल में पृथ्वी पर एक ब्राह्मणी रहती थी। वह भगवान विष्णु की परम भक्त थी और बहुत ही नियम-धर्म से रहती थी। वह हर महीने पूरी श्रद्धा से एकादशी का व्रत रखती थी। उसकी भक्ति इतनी गहरी थी कि व्रत के प्रभाव से उसका शरीर तो शुद्ध हो गया था, लेकिन उसका स्वभाव थोड़ा कृपण (कंजूस) था। वह कभी भी ब्राह्मणों या देवताओं के निमित्त अन्न दान (Anna Daan) नहीं करती थी।
एक बार भगवान विष्णु ने सोचा कि मेरी यह भक्त व्रत तो करती है, जिससे इसे बैकुंठ तो मिल जाएगा, लेकिन इसने कभी अन्न का दान नहीं किया, तो इसे स्वर्ग में भोजन कैसे प्राप्त होगा? इसकी परीक्षा लेने और इसे सुधारने के लिए भगवान विष्णु ने एक भिखारी का रूप धारण किया।
भगवान की परीक्षा: भिखारी के वेश में भगवान उस ब्राह्मणी के पास पहुंचे और भिक्षा मांगी। ब्राह्मणी ने पूछा, “तुम्हें क्या चाहिए?” भगवान ने कहा, “मां, मुझे बहुत भूख लगी है, मुझे थोड़ा अन्न दे दो।” ब्राह्मणी झुंझला गई। उसने अन्न देने के बजाय जमीन से एक मिट्टी का ढेला (Clay Ball) उठाया और भिखारी की झोली में डाल दिया। भगवान वह मिट्टी का ढेला लेकर चले गए।
बैकुंठ में खाली कुटिया: समय बीतने पर वह ब्राह्मणी शरीर त्याग कर बैकुंठ लोक पहुंची। एकादशी व्रत के प्रभाव से उसे वहां एक सुंदर महल मिला। लेकिन जब उसने महल के अंदर देखा, तो वह हैरान रह गई। महल तो भव्य था, लेकिन उसके अंदर खाने के लिए अन्न का एक दाना भी नहीं था। घर पूरी तरह खाली था।
घबराई हुई ब्राह्मणी भगवान विष्णु के पास गई और बोली, “हे प्रभु! मैंने जीवन भर आपकी भक्ति की, कड़े व्रत किए, फिर मेरे घर में अन्न-धन की कमी क्यों है? मुझे खाली घर क्यों मिला?”

भगवान विष्णु ने मुस्कुराते हुए कहा, “देवी, तुमने व्रत से शरीर शुद्धि तो की, लेकिन कभी अन्न दान नहीं किया। जब मैंने भिक्षा मांगी, तब भी तुमने मुझे मिट्टी का ढेला दिया। इसीलिए तुम्हें महल तो मिला, लेकिन वह अन्न से खाली है।”
निवारण का उपाय: ब्राह्मणी ने अपनी गलती का प्रायश्चित पूछा। भगवान ने कहा, “जब देव कन्याएं तुमसे मिलने आएं, तो तुम अपना दरवाजा तब तक मत खोलना जब तक वे तुम्हें षटतिला एकादशी के व्रत की विधि और महात्म्य न सुना दें।”
ब्राह्मणी ने ऐसा ही किया। देव कन्याओं ने उसे Shattila Ekadashi Vrat की महिमा और तिल दान का महत्व बताया। ब्राह्मणी ने अगली माघ कृष्ण एकादशी पर पूरी विधि-विधान से षटतिला एकादशी का व्रत रखा और तिल का दान किया।
व्रत का फल: व्रत के प्रभाव से उसका महल धन-धान्य और अन्न से भर गया। उसकी कंजूसी की प्रवृत्ति नष्ट हो गई।
कथा का सार: यह कथा हमें सिखाती है कि केवल शारीरिक तपस्या काफी नहीं है। दान (Charity), विशेषकर अन्न और तिल का दान, हमारे परलोक को सुधारता है। बिना दान के मोक्ष अधूरा है।
षटतिला एकादशी 2026: पूजा विधि (Puja Vidhi Step-by-Step)
इस व्रत को सफल बनाने के लिए सही Puja Vidhi का पालन करना अत्यंत आवश्यक है। 2026 में 14 जनवरी को आप इस प्रकार पूजा करें:
1. पूर्व रात्रि (दशमी) के नियम
एकादशी का व्रत एक दिन पहले यानी दशमी (13 जनवरी 2026) से ही शुरू हो जाता है। दशमी की रात को सात्विक भोजन करें, मसूर की दाल या तामसिक भोजन न करें। ब्रह्मचर्य का पालन करें और भगवान का स्मरण करते हुए सोएं।
2. एकादशी की सुबह: स्नान और संकल्प
- ब्रह्म मुहूर्त: एकादशी के दिन सूर्योदय से पहले उठें।
- तिल स्नान: नहाने के पानी में थोड़े से तिल (Sesame seeds) और गंगाजल डालें। यह इस एकादशी का पहला और सबसे महत्वपूर्ण नियम है।
- संकल्प: स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण करें (हो सके तो पीले वस्त्र)। हाथ में जल, तिल और फूल लेकर व्रत का संकल्प लें: “हे श्री हरि! आज मैं षटतिला एकादशी का व्रत पूरी श्रद्धा से करूंगा/करूंगी। आप मेरी रक्षा करें और मेरा व्रत निर्विघ्न पूर्ण हो।”
3. पूजा की तैयारी
- घर के मंदिर में एक चौकी पर भगवान विष्णु या श्रीकृष्ण की प्रतिमा स्थापित करें।
- प्रतिमा को पंचामृत से स्नान कराएं। पंचामृत में भी थोड़े तिल डालें।
4. षोडशोपचार पूजन
- दीपक: घी का दीपक जलाएं।
- तिल का उबटन: प्रतीकात्मक रूप से भगवान को तिल का पेस्ट (उबटन) अर्पित करें।
- नैवेद्य: भगवान को तिल और गुड़ से बने लड्डू या मिष्ठान्न का भोग लगाएं। तुलसी दल (Tulsi leaves) अवश्य अर्पित करें, क्योंकि विष्णु पूजा तुलसी के बिना अधूरी है।
- मंत्र: “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का 108 बार जाप करें।
- आरती: अंत में विष्णु जी की आरती करें और Shattila Ekadashi Katha पढ़ें या सुनें।
5. हवन (Til Havan)
पूजा के बाद छोटा सा हवन करें। इसमें ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय स्वाहा’ बोलते हुए 108 बार तिल की आहुति दें। यदि हवन संभव न हो, तो तिल मिश्रित जल पीपल के पेड़ में चढ़ाएं।
6. रात्रि जागरण
एकादशी की रात को सोना नहीं चाहिए। भगवान के भजन, कीर्तन और मंत्र जाप करते हुए रात्रि जागरण (Jagran) करें।
तिल के 6 प्रयोग: विस्तार से समझें (Detailed Analysis of 6 Uses)
जैसा कि नाम से स्पष्ट है, Shattila Ekadashi में तिल का 6 तरह से उपयोग करना ही इस व्रत का प्राण है। आइए जानते हैं इनके आध्यात्मिक और वैज्ञानिक लाभ।
1. तिल स्नान (Til Snan)
- विधि: नहाने के पानी में मुट्ठी भर काले या सफेद तिल डालें।
- लाभ: माघ महीने की सर्दी में त्वचा रूखी हो जाती है। तिल के तेल का अंश त्वचा को नमी देता है। आध्यात्मिक रूप से, यह पापों को धोकर शरीर को पवित्र करता है।
2. तिल उबटन (Til Ubtan)
- विधि: तिल को पीसकर उसमें थोड़ा तेल या पानी मिलाकर पेस्ट बनाएं और शरीर पर मलें।
- लाभ: यह शरीर की गर्मी बढ़ाता है और त्वचा रोगों को दूर रखता है। शास्त्रों के अनुसार, यह सौंदर्य और आरोग्य प्रदान करता है।
3. तिलोदक / तर्पण (Til Tarpan)
- विधि: दक्षिण दिशा की ओर मुख करके, जल में तिल मिलाकर अपने पितरों को अर्पित करें।
- लाभ: माना जाता है कि तिल यमराज को प्रिय नहीं है, लेकिन पितरों को इससे तृप्ति मिलती है। इससे पितृ दोष (Pitra Dosh) शांत होता है और पूर्वजों का आशीर्वाद मिलता है।
4. तिल हवन (Til Havan)
- विधि: पूजा के दौरान अग्नि में तिल की आहुति दें।
- लाभ: वातावरण शुद्ध होता है। हवन से निकली ऊर्जा घर की नकारात्मकता को नष्ट करती है।
5. तिल भोजन (Til Bhojan)
- विधि: फलाहार में तिलकुट, तिल के लड्डू या तिल-गुड़ की पट्टी खाएं।
- लाभ: सर्दी में शरीर को गर्मी (Heat) की जरूरत होती है। तिल की तासीर गर्म होती है, जो इम्यूनिटी बढ़ाती है।
6. तिल दान (Til Daan)
- विधि: किसी ब्राह्मण या जरूरतमंद को तिल, तिल के लड्डू, या तिल से भरे पात्र का दान करें।
- लाभ: यह सबसे महत्वपूर्ण है। धर्मशास्त्रों में कहा गया है कि “जितने तिलों का दान किया जाता है, जीव उतने ही हजार वर्षों तक स्वर्ग में वास करता है।”
षटतिला एकादशी का वैज्ञानिक महत्व (Scientific Significance)
भारतीय त्योहार केवल कर्मकांड नहीं हैं, उनके पीछे गहरा विज्ञान भी है। Shattila Ekadashi हमेशा माघ (जनवरी-फरवरी) के महीने में आती है, जब भारत में कड़ाके की ठंड पड़ती है।
- शरीर का तापमान: तिल (Sesame) में प्रचुर मात्रा में तेल और वसा (Fats) होती है। इसकी तासीर गर्म होती है। इस समय तिल खाने और लगाने से शरीर का तापमान नियंत्रित रहता है और ठंड से बचाव होता है।
- त्वचा की सुरक्षा: सर्दियों में त्वचा फटती है। तिल स्नान और उबटन नेचुरल मॉइस्चराइजर का काम करते हैं।
- पाचन: तिल में फाइबर होता है जो पाचन को दुरुस्त रखता है।
ऋषियों ने इन स्वास्थ्य लाभों को धर्म और मोक्ष से जोड़ दिया ताकि लोग इसका पालन अवश्य करें।
क्या करें और क्या न करें (Do’s and Don’ts)
Shattila Ekadashi 2026 के व्रत को सफल बनाने के लिए इन नियमों का पालन करें:
क्या करें:
- भगवान विष्णु और कृष्ण की पूजा करें।
- दान अवश्य करें (अन्न, वस्त्र, और तिल)।
- सत्य बोलें और मन को शांत रखें।
- ब्रह्मचर्य का पालन करें।
क्या न करें:
- चावल (Rice): एकादशी के दिन चावल खाना वर्जित है।
- अन्न: यदि आपने निर्जला या फलाहारी व्रत नहीं रखा है, तब भी गेहूं, दाल आदि न खाएं। केवल कुट्टू, सिंघाड़ा या फल ही खाएं।
- निंदा/क्रोध: किसी की चुगली न करें और न ही गुस्सा करें।
- बैंगन और सेम: इस दिन बैंगन और सेम की फली खाना भी निषेध माना जाता है।
- सोना: दिन में नहीं सोना चाहिए।
द्वादशी पारण (Vrat Parana)
व्रत का समापन अगले दिन यानी द्वादशी (15 जनवरी 2026) को होता है।
- सुबह जल्दी उठकर स्नान करें।
- भगवान की पूजा करें।
- किसी ब्राह्मण को भोजन कराएं और दान-दक्षिणा दें।
- इसके बाद ही शुभ मुहूर्त में अन्न ग्रहण करके व्रत खोलें। पारण के भोजन में भी तिल का कुछ अंश शामिल करना शुभ माना जाता है।
षटतिला एकादशी केवल एक व्रत नहीं, बल्कि यह शरीर, मन और आत्मा की शुद्धि का महापर्व है। यह हमें सिखाता है कि जो हमारे पास है, उसे दूसरों के साथ बांटना (दान करना) ही सच्ची मानवता है। भगवान विष्णु को न धन चाहिए, न सोना; उन्हें केवल भक्त का भाव और शुद्ध हृदय चाहिए।
इस Shattila Ekadashi 2026 पर, आइए संकल्प लें कि हम अपनी क्षमता अनुसार तिल दान करेंगे और किसी जरूरतमंद के चेहरे पर मुस्कान लाएंगे। याद रखें, जो बांटता है, वही प्राप्त करता है।
भगवान श्री हरि विष्णु आपकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण करें। शुभ षटतिला एकादशी!
