प्रस्तावना: 2026 का नया ट्रेड वॉर और कूटनीतिक उथल-पुथल
फरवरी 2026 के अंतिम सप्ताह में वैश्विक व्यापार और कूटनीति के गलियारों में एक बड़ी हलचल मच गई है। जब से डोनाल्ड ट्रंप ने व्हाइट हाउस में दोबारा वापसी की है, तब से उनकी ‘अमेरिका फर्स्ट’ (America First) 2.0 नीति ने पूरी दुनिया के आर्थिक समीकरणों को हिला कर रख दिया है। हाल ही में अमेरिकी प्रशासन द्वारा आयात पर भारी ‘टैरिफ’ (Tariffs) यानी सीमा शुल्क लगाने के आक्रामक ऐलान के तुरंत बाद, नई दिल्ली और वाशिंगटन के बीच होने वाली महत्वपूर्ण भारत-अमेरिका द्विपक्षीय व्यापार वार्ता (India-US Trade Talks) अनिश्चित काल के लिए टाल दी गई है।
एक आर्थिक और भू-राजनीतिक विश्लेषक के रूप में, व्यापार आंकड़ों और कूटनीतिक बयानों का अध्ययन करने पर यह स्पष्ट होता है कि यह घटना केवल एक बैठक का रद्द होना नहीं है; यह एक नए ‘ग्लोबल ट्रेड वॉर’ (Global Trade War) की शुरुआत का संकेत है। भारत और अमेरिका के बीच द्विपक्षीय व्यापार 200 बिलियन डॉलर के आंकड़े को पार कर चुका है, और अमेरिका भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार है। ऐसे में अचानक टैरिफ की घोषणा और वार्ता का टलना भारतीय निर्यातकों, शेयर बाजार और नीति निर्माताओं के लिए एक गंभीर चिंता का विषय बन गया है।
1. ट्रंप का टैरिफ ऐलान: ‘अमेरिका फर्स्ट 2.0’ का आक्रामक रूप
डोनाल्ड ट्रंप का व्यापार को लेकर नज़रिया हमेशा से ‘लेन-देन’ (Transactional) रहा है। उनके हालिया ऐलान को समझने के लिए हमें उनकी आर्थिक विचारधारा की जड़ों में जाना होगा।

टैरिफ का स्वरूप और उद्देश्य:
- रेसिप्रोकल टैरिफ (Reciprocal Tariffs): ट्रंप प्रशासन का स्पष्ट तर्क है कि यदि कोई देश (जैसे भारत) अमेरिकी उत्पादों (जैसे हार्ले डेविडसन मोटरसाइकिल, कृषि उत्पाद या मेडिकल डिवाइस) पर उच्च आयात शुल्क लगाता है, तो अमेरिका भी जवाबी कार्रवाई करते हुए उस देश के उत्पादों पर समान या उससे अधिक टैरिफ लगाएगा।
- व्यापार घाटा (Trade Deficit) कम करना: अमेरिका का भारत के साथ व्यापार घाटा (अर्थात अमेरिका भारत से खरीदता ज्यादा है और बेचता कम है) लगातार उनके निशाने पर रहा है। ट्रंप का मानना है कि विदेशी उत्पाद अमेरिकी बाजारों को पाट रहे हैं, जिससे अमेरिकी विनिर्माण (Manufacturing) और नौकरियों को नुकसान हो रहा है।
- यूनिवर्सल बेसलाइन टैरिफ: हालिया घोषणाओं में लगभग सभी विदेशी आयातों पर एक ‘बेसलाइन टैरिफ’ लगाने की धमकी दी गई है, जो चीन के साथ-साथ भारत, यूरोपीय संघ और मेक्सिको जैसे मित्र देशों को भी समान रूप से प्रभावित करता है।
2. भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता का टलना: नई दिल्ली का कूटनीतिक रुख
इस टैरिफ घोषणा के तुरंत बाद, वाणिज्य मंत्रालय (Ministry of Commerce) और अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि (USTR) के बीच होने वाली उच्च-स्तरीय वार्ता को टाल दिया गया। यह निर्णय भारत सरकार की एक सोची-समझी कूटनीतिक रणनीति का हिस्सा है।
वार्ता क्यों टाली गई?
- दबाव की रणनीति का विरोध: भारत ने स्पष्ट संदेश दिया है कि वह ‘बंदूक की नोक’ या एकतरफा दबाव (Unilateral pressure) के तहत बातचीत नहीं करेगा। वार्ता से ठीक पहले टैरिफ का ऐलान करना कूटनीतिक रूप से एक ‘आर्म-ट्विस्टिंग’ (Arm-twisting) रणनीति मानी जाती है, जिसे भारत ने खारिज कर दिया है।
- नई रणनीति की आवश्यकता: ट्रंप के इस अप्रत्याशित कदम के बाद, भारतीय नीति निर्माताओं को अपनी ‘नेगोशिएशन स्ट्रेटेजी’ (Negotiation Strategy) को दोबारा कैलिब्रेट (Recalibrate) करने के लिए समय चाहिए। भारत अब यह आकलन कर रहा है कि अमेरिकी बाजार में उसके कौन से उत्पाद सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे और भारत के पास जवाबी कार्रवाई (Retaliatory Tariffs) के क्या विकल्प हैं।
- घरेलू उद्योगों का संरक्षण: भारत सरकार भी अपने किसानों, डेयरी उद्योग और लघु एवं मध्यम उद्यमों (MSMEs) को सस्ते अमेरिकी आयातों से बचाने के लिए प्रतिबद्ध है। बिना किसी स्पष्ट एजेंडे के वार्ता की मेज पर जाने से भारत के हितों को नुकसान पहुंच सकता था।
3. भारतीय निर्यात पर प्रभाव: कौन से सेक्टर्स हैं सबसे ज्यादा खतरे में? (Sectoral Impact Analysis)
अमेरिका भारतीय सामानों का सबसे बड़ा खरीदार है। यदि ट्रंप के टैरिफ लागू होते हैं, तो भारत के कई प्रमुख निर्यात क्षेत्र गहरे संकट में आ जाएंगे। नीचे दी गई तालिका प्रभावित होने वाले प्रमुख सेक्टर्स का विश्लेषण करती है:

| सेक्टर (Sector) | अमेरिका पर निर्भरता | टैरिफ का संभावित प्रभाव (Impact) |
| फार्मास्यूटिकल्स (दवाइयां) | भारत दुनिया का सबसे बड़ा जेनेरिक दवा आपूर्तिकर्ता है, जिसका बड़ा हिस्सा US जाता है। | हालांकि जीवन रक्षक दवाओं पर टैरिफ कम लग सकता है, लेकिन नॉन-एसेंशियल ड्रग्स महंगे हो जाएंगे, जिससे भारतीय कंपनियों का मार्जिन घटेगा। |
| आईटी सेवाएं (IT Services) | भारत का IT निर्यात मुख्य रूप से अमेरिकी कॉरपोरेट्स पर निर्भर है। | यदि ‘H-1B वीजा’ और डिजिटल सेवाओं पर टैरिफ/टैक्स लगाया जाता है, तो TCS, Infosys जैसी कंपनियों के मुनाफे और रोजगार पर भारी असर पड़ेगा। |
| टेक्सटाइल और परिधान (Textiles) | भारतीय परिधानों के लिए अमेरिका सबसे बड़ा बाजार है। | टैरिफ बढ़ने से भारतीय कपड़े महंगे हो जाएंगे, जिससे वियतनाम और बांग्लादेश (यदि उन्हें छूट मिलती है) को फायदा हो सकता है। |
| रत्न और आभूषण (Gems & Jewelry) | सूरत और मुंबई से तराशे गए हीरों का सबसे बड़ा गंतव्य अमेरिका है। | यह एक ‘लक्जरी’ आइटम है। उच्च टैरिफ से अमेरिकी बाजार में मांग तुरंत गिरेगी, जिससे सूरत के हीरा उद्योग में छंटनी का खतरा बढ़ जाएगा। |
| ऑटो पार्ट्स (Auto Components) | भारतीय कंपनियां फोर्ड, जीएम आदि को पुर्जे सप्लाई करती हैं। | सप्लाई चेन महंगी होने से ऑर्डर्स में कटौती हो सकती है। |
4. ‘स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप’ बनाम ‘इकोनॉमिक नेशनलिज्म’: एक भू-राजनीतिक विरोधाभास
वर्तमान परिदृश्य में भारत और अमेरिका के रिश्ते एक अजीबोगरीब विरोधाभास (Paradox) से गुजर रहे हैं।
रणनीतिक मोर्चे पर (The Strategic Hug):
भू-राजनीतिक रूप से, इंडो-पैसिफिक (Indo-Pacific) क्षेत्र में चीन के बढ़ते वर्चस्व को रोकने के लिए अमेरिका को भारत की सख्त आवश्यकता है। ‘क्वाड’ (Quad) संगठन, रक्षा सौदे (जैसे ड्रोन और जेट इंजन निर्माण), और सैन्य अभ्यास यह दर्शाते हैं कि दोनों देश एक-दूसरे के अपरिहार्य रणनीतिक सहयोगी हैं।
आर्थिक मोर्चे पर (The Economic Punch):
लेकिन जब बात अर्थशास्त्र की आती है, तो ट्रंप प्रशासन ‘इकोनॉमिक नेशनलिज्म’ (आर्थिक राष्ट्रवाद) का पालन करता है। ट्रंप के लिए, सामरिक दोस्ती का मतलब यह नहीं है कि व्यापार में छूट दी जाए। यह दृष्टिकोण भारत के लिए चुनौतीपूर्ण है क्योंकि भारत यह मानता रहा है कि उसकी मजबूत रणनीतिक साझेदारी के कारण उसे व्यापारिक मोर्चे पर कुछ रियायतें (जैसे GSP – Generalized System of Preferences की बहाली) मिलनी चाहिए।
यह विरोधाभास साबित करता है कि अमेरिका की विदेश नीति और उसकी व्यापार नीति अक्सर दो अलग-अलग पटरियों पर चलती हैं।

5. ‘चाइना प्लस वन’ (China+1) रणनीति को झटका
कोविड-19 के बाद से कई अमेरिकी और बहुराष्ट्रीय कंपनियां चीन पर अपनी निर्भरता कम करने के लिए ‘चाइना प्लस वन’ रणनीति अपना रही थीं और भारत को एक प्रमुख विनिर्माण गंतव्य (Manufacturing Hub) के रूप में देख रही थीं। Apple (Foxconn) द्वारा भारत में आईफोन का निर्माण इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।
- निवेशकों में असमंजस: यदि अमेरिका भारत से होने वाले निर्यात पर भारी टैरिफ लगाता है, तो जो कंपनियां भारत में सिर्फ इसलिए फैक्ट्रियां लगा रही थीं ताकि वे अमेरिकी बाजार में सस्ता माल निर्यात कर सकें, वे अपना फैसला बदल सकती हैं।
- चीन को अप्रत्यक्ष लाभ: यदि भारत और अमेरिका व्यापार युद्ध में उलझते हैं, तो इसका अप्रत्यक्ष भू-राजनीतिक लाभ चीन को मिल सकता है।
6. भारत की जवाबी रणनीति और आगे का रास्ता (India’s Counter-Strategy)
नई दिल्ली इस स्थिति में असहाय नहीं है। दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी (और जल्द ही तीसरी सबसे बड़ी बनने वाली) अर्थव्यवस्था के रूप में, भारत के पास कई रणनीतिक विकल्प मौजूद हैं:
- जवाबी टैरिफ (Retaliatory Tariffs): यदि अमेरिका पीछे नहीं हटता है, तो भारत भी अमेरिकी उत्पादों (जैसे सेब, बादाम, अखरोट, और अमेरिकी मोटरसाइकिल) पर टैरिफ बढ़ा सकता है। यह ट्रंप के ‘वोट बैंक’ (अमेरिकी किसानों) को सीधे चोट पहुंचा सकता है।
- बाजार का विविधीकरण (Market Diversification): भारत को अब यूरोपियन यूनियन (EU), मध्य पूर्व (UAE के साथ CEPA का लाभ), और लैटिन अमेरिका जैसे बाजारों पर अपना ध्यान केंद्रित करना होगा ताकि अमेरिका पर निर्यात निर्भरता कम की जा सके।
- घरेलू मांग को बढ़ावा (Boosting Domestic Consumption): भारत का सबसे बड़ा हथियार उसका 1.4 अरब का विशाल उपभोक्ता बाजार है। यदि निर्यात घटता है, तो सरकार को नीतियां बनाकर घरेलू खपत को बढ़ाना होगा।
- रणनीतिक सौदेबाजी (Leveraging Defense Purchases): भारत अमेरिका का एक बड़ा रक्षा खरीदार है। भारत कूटनीतिक रूप से यह संकेत दे सकता है कि यदि व्यापारिक मोर्चे पर शत्रुतापूर्ण व्यवहार किया गया, तो भविष्य के रक्षा सौदों (Defense Deals) में यूरोपीय देशों (जैसे फ्रांस) को प्राथमिकता दी जा सकती है।
7. विश्व व्यापार संगठन (WTO) की प्रासंगिकता पर सवाल
ट्रंप की नीतियों ने एक बार फिर विश्व व्यापार संगठन (WTO) जैसे बहुपक्षीय संस्थानों के अस्तित्व पर सवाल खड़े कर दिए हैं। जब दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था एकतरफा टैरिफ लगाती है और अंतरराष्ट्रीय नियमों को दरकिनार करती है, तो ‘फ्री ट्रेड’ (Free Trade) का पूरा ढांचा चरमरा जाता है।
भारत हमेशा से नियम-आधारित व्यापार (Rule-based trade) का समर्थक रहा है। वार्ता टलने के बाद, भारत अब अन्य विकासशील देशों के साथ मिलकर WTO के मंच पर अमेरिकी संरक्षणवाद के खिलाफ एक मजबूत ब्लॉक बनाने का प्रयास कर सकता है।
एक नए आर्थिक विश्व युद्ध की आहट
भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता का टलना और डोनाल्ड ट्रंप का टैरिफ ऐलान यह स्पष्ट करता है कि 2026 की वैश्विक अर्थव्यवस्था में ‘मुक्त व्यापार’ (Free Trade) का सुनहरा दौर अब पीछे छूट चुका है। अब हर देश अपने आर्थिक हितों की रक्षा के लिए अपनी दीवारें ऊंची कर रहा है।
हालांकि यह स्थिति भारतीय निर्यातकों के लिए अल्पावधि में एक बड़ा संकट पैदा कर सकती है, लेकिन दीर्घकालिक रूप से यह भारत को अपनी आपूर्ति श्रृंखलाओं को आत्मनिर्भर (Atmanirbhar) बनाने और नए वैश्विक बाजार तलाशने के लिए प्रेरित करेगी। दोनों देशों के नीति निर्माताओं को यह समझना होगा कि ‘शून्य-योग खेल’ (Zero-sum game) यानी एक की हार और दूसरे की जीत वाली व्यापारिक नीति लंबे समय तक नहीं चल सकती। रणनीतिक साझेदारी की नाव तभी पार लग सकती है जब वह मजबूत आर्थिक संबंधों के शांत पानी पर तैर रही हो। आने वाले हफ्तों में यह देखना अत्यंत महत्वपूर्ण होगा कि ‘पर्दे के पीछे’ की कूटनीति (Backchannel Diplomacy) इस व्यापारिक तनाव को कैसे शांत करती है।
