Rajasthan Rangotsav Unique Tradition

राजस्थान अपनी मरुधरा की रंगीली संस्कृति और अतरंगी लोक परंपराओं के लिए दुनिया भर में मशहूर है। लेकिन क्या आपने कभी ऐसी होली के बारे में सुना है जहाँ जीवित व्यक्ति की शव यात्रा निकाली जाती है? वस्त्रनगरी भीलवाड़ा में शीतला सप्तमी और अष्टमी के अवसर पर एक ऐसा ही विस्मयकारी दृश्य देखने को मिला। यहाँ मेवाड़ की 200 साल पुरानी परंपरा का निर्वहन करते हुए मुर्दे की सवारी निकाली गई, जिसे देखने के लिए जनसैलाब उमड़ पड़ा।

1. चित्तौड़ वालों की हवेली से निकली ‘मुर्दे की सवारी’

भीलवाड़ा के पुराना शहर स्थित चित्तौड़ वालों की हवेली इस ऐतिहासिक उत्सव का मुख्य केंद्र रही। परंपरा के अनुसार, यहाँ एक जीवित व्यक्ति को अर्थी (जिसे स्थानीय भाषा में सनेती कहा जाता है) पर लेटाया गया। उसे सफेद कफन ओढ़ाया गया और बिल्कुल एक शव यात्रा की तरह गाजे-बाजे के साथ हवेली से बाहर निकाला गया।

सवारी का मुख्य आकर्षण:

  • 2000 किलो गुलाल का सैलाब: इस यात्रा के दौरान हवा में गुलाल की ऐसी बारिश हुई कि आसमान भी लाल नजर आने लगा। कार्यकर्ताओं ने 200 कट्टे गुलाल का छिड़काव किया।
  • नकली नोटों की बारिश: शव यात्रा के आगे-आगे लोग नाचते-गाते हुए नकली नोटों की बारिश कर रहे थे, जो इस उत्सव की खुशी और उत्साह को दर्शाता है।
  • जीवंत शव: अर्थी पर लेटा व्यक्ति मृत नहीं बल्कि पूरी तरह जीवित होता है, जो यात्रा के दौरान बीच-बीच में हिलता-डुलता है और पानी भी पीता है, जिससे पर्यटकों और दर्शकों के लिए यह दृश्य कौतूहल का विषय बन जाता है।

2. मुर्दे के कूदकर भागने का रहस्य: आखिर ऐसा क्यों?

इस उत्सव का सबसे रोमांचक मोड़ तब आता है जब यह शव यात्रा अपने अंतिम पड़ाव यानी ‘बड़े मंदिर’ के पास पहुँचती है। जैसे ही अर्थी श्मशान के करीब पहुँचने वाली होती है, अर्थी पर लेटा जिंदा व्यक्ति अचानक अर्थी से कूदकर भागने लगता है

परंपरा का निर्वहन:

भीड़ में शामिल लोग उसे पकड़ने की कोशिश करते हैं और यह लुका-छिपी का खेल दर्शकों का भरपूर मनोरंजन करता है। अंत में, उस जीवित व्यक्ति की जगह एक डमी पुतले को प्रतीकात्मक रूप से जलाया जाता है। लोक मान्यताओं के अनुसार, ऐसा करने से शहर में सुख, शांति और समृद्धि आती है और माता लक्ष्मी का वास होता है।

3. इतिहास: 200 साल पुरानी रियासतकालीन परंपरा

एक सांस्कृतिक विशेषज्ञ के नजरिए से देखें तो इस परंपरा के पीछे एक गहरा ऐतिहासिक कारण छिपा है।

इतिहास की जड़ें:

कहा जाता है कि लगभग 200 साल पहले मेवाड़ के तत्कालीन राजा के किसी करीबी परिजन की होली के दिन मृत्यु हो गई थी। शोक के कारण उस वर्ष होली नहीं मनाई गई। तब से यह परंपरा बन गई कि चैत्र मास की कृष्ण पक्ष की सप्तमी और अष्टमी को ही मेवाड़ अंचल में असली होली खेली जाती है। भीलवाड़ा की यह मुर्दे की होली उसी रियासतकालीन शोक को उत्सव में बदलने का एक तरीका है।

4. मेवाड़ का 13 दिवसीय रंगोत्सव

देश के बाकी हिस्सों में जहाँ धुलंडी (Holi) के अगले दिन रंगों का त्यौहार समाप्त हो जाता है, वहीं भीलवाड़ा सहित पूरे मेवाड़ में यह उत्साह अगले 13 दिनों तक जारी रहता है।

क्षेत्रीय विविधताएं:

  • भीलवाड़ा: यहाँ ‘मुर्दे की सवारी’ और जीनगर समाज की ‘कोड़ा मार होली’ प्रसिद्ध है।
  • मांडल: यहाँ धुलंडी के 13 दिन बाद ‘नाहर नृत्य’ का आयोजन होता है, जहाँ कलाकार शेर का रूप धरकर नृत्य करते हैं।
  • शाहपुरा: यहाँ रामस्नेही संप्रदाय का प्रसिद्ध ‘फूलडोल मेला’ आयोजित किया जाता है।

मुर्दे की होली के दौरान होने वाला यह 13 दिवसीय आयोजन न केवल मनोरंजन है, बल्कि यह मेवाड़ की उस गौरवशाली विरासत का प्रतीक है जो आधुनिकता के दौर में भी अपनी जड़ों से मजबूती से जुड़ी हुई है।

5. सुरक्षा और पर्यटन: भीलवाड़ा पुलिस की चाक-चौबंद व्यवस्था

इस साल 2000 किलो गुलाल और भारी भीड़ को देखते हुए भीलवाड़ा जिला प्रशासन और पुलिस ने कड़े सुरक्षा इंतजाम किए थे।

  • ड्रोन निगरानी: भीड़ को नियंत्रित करने और किसी भी अप्रिय घटना को रोकने के लिए ड्रोन कैमरों का उपयोग किया गया।
  • विदेशी पर्यटकों का आगमन: इस अनूठी मुर्दे की होली को देखने के लिए बड़ी संख्या में विदेशी पर्यटक भी भीलवाड़ा पहुँचे, जो भारतीय लोक संस्कृतियों के इस निराले रंग को देखकर दंग रह गए।

भीलवाड़ा की मुर्दे की होली हमें सिखाती है कि मृत्यु भी एक उत्सव हो सकती है जब उसे लोक कल्याण और परंपराओं के साथ जोड़ा जाए। 2000 किलो गुलाल का उड़ना और अर्थी से जिंदा मुर्दे का कूदकर भागना, यह सब हमारी समृद्ध सांस्कृतिक विविधता का हिस्सा है। ऐसी परंपराएं ही भारत को ‘अतुल्य भारत’ (Incredible India) बनाती हैं।

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