भारतीय संस्कृति में नदियों का स्थान केवल जल स्रोतों के रूप में नहीं, बल्कि जीवनदायिनी माताओं के रूप में है। और जब बात गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती के मिलन स्थल ‘प्रयागराज’ की हो, तो आस्था का ज्वार अपने चरम पर होता है। आज, 15 जनवरी 2026 का दिन भारत के धार्मिक इतिहास में एक और स्वर्णिम अध्याय जोड़ गया है। कड़ाके की ठंड, घना कोहरा और शीतलहर भी भक्तों के कदमों को रोक नहीं पाई। मोक्ष की कामना और सूर्यदेव के उत्तरायण होने के स्वागत में प्रयागराज में मकर संक्रांति के पावन अवसर पर आस्था का ऐसा जनसैलाब उमड़ा कि रेत के कण भी कम पड़ गए।
सरकारी आंकड़ों और मेला प्रशासन के अनुसार, आज शाम तक लगभग 50 लाख से अधिक श्रद्धालुओं ने पुण्य की डुबकी लगाई है। ब्रह्ममुहूर्त से शुरू हुआ स्नान का यह सिलसिला अनवरत जारी है। ऐसा प्रतीत हो रहा है मानो पूरा भारतवर्ष सिमटकर त्रिवेणी के तट पर आ गया हो। केसरिया वस्त्रों में सजे साधु-संत, गृहस्थ परिवार, और दूर-दराज के गांवों से आए बुजुर्ग—सबकी मंजिल एक ही थी: संगम का पवित्र जल।
1. भोर की पहली किरण और संगम का नज़ारा
15 जनवरी की सुबह, जब सूरज अपनी किरणों को पृथ्वी पर बिखेरने के लिए तैयार हो रहा था, प्रयागराज का संगम तट पहले से ही लाखों दीपों और श्रद्धालुओं की उपस्थिति से जगमगा रहा था। तापमान 6 डिग्री सेल्सियस के आसपास था, लेकिन आस्था की गर्मी ने ठंड को बेअसर कर दिया था।
रात के 3 बजे से ही स्नान का मुहूर्त शुरू हो गया था। जैसे ही घड़ी की सुइयां ब्रह्ममुहूर्त की ओर बढ़ीं, घाटों पर भीड़ का दबाव बढ़ने लगा। प्रयागराज में मकर संक्रांति का सबसे अद्भुत दृश्य तब देखने को मिला जब लाखों लोगों ने एक साथ सूर्य को अर्घ्य दिया। जल में खड़े होकर, हाथों में तांबे का लोटा लिए और मंत्रोच्चार करते हुए श्रद्धालुओं ने सूर्यदेव का मकर राशि में स्वागत किया।
घने कोहरे के बीच नावों की कतारें, घाटों पर जलते अलाव और लाउडस्पीकर पर गूंजते वेद मंत्र—यह दृश्य किसी दूसरी दुनिया का आभास करा रहा था। संगम नोज़ (Sangam Nose), जो स्नान का मुख्य केंद्र है, वहां पैर रखने की भी जगह नहीं थी। एनडीआरएफ (NDRF) की मोटर बोट्स लगातार गश्त कर रही थीं और गोताखोर मुस्तैदी से तैनात थे ताकि सुरक्षा में कोई चूक न हो।

2. 50 लाख का आंकड़ा: आस्था या अनुशासनात्मक चमत्कार?
एक ही दिन में, एक ही स्थान पर 50 लाख लोगों का इकट्ठा होना और शांतिपूर्ण तरीके से स्नान करके लौटना किसी चमत्कार से कम नहीं है। यह आंकड़ा कई देशों की कुल आबादी से भी ज्यादा है।
इस भीड़ में विविधता देखने लायक थी। दक्षिण भारत से आए श्रद्धालु अपनी पारंपरिक वेशभूषा में थे, तो पंजाब और हरियाणा के किसान अपने उत्साह के साथ मौजूद थे। नेपाल और पड़ोसी देशों से भी बड़ी संख्या में लोग प्रयागराज में मकर संक्रांति मनाने पहुंचे थे।
भीड़ प्रबंधन के लिए मेला प्रशासन ने ‘होल्ड एंड रिलीज’ (Hold and Release) की रणनीति अपनाई थी।
- रेलवे स्टेशनों और बस अड्डों से आने वाली भीड़ को छोटे-छोटे जत्थों में संगम की ओर छोड़ा जा रहा था।
- 18 प्रमुख घाट बनाए गए थे ताकि सारी भीड़ एक ही जगह जमा न हो।
- 5 किलोमीटर लंबी बैरिकेडिंग और रस्सियों के माध्यम से कतारें बनाई गई थीं।
प्रशासन का कहना है कि यह संख्या शाम तक और बढ़ सकती है क्योंकि आस-पास के जिलों से ग्रामीण जनता का आना जारी है। 50 लाख का यह आंकड़ा 2026 के माघ मेले का अब तक का सबसे बड़ा स्नान पर्व बन गया है।
3. मकर संक्रांति का आध्यात्मिक और खगोलीय महत्व
आखिर क्यों करोड़ों लोग इस दिन गंगा स्नान के लिए लालायित रहते हैं? प्रयागराज में मकर संक्रांति का महत्व केवल परंपरा नहीं, बल्कि खगोल विज्ञान से भी जुड़ा है।
सूर्य का उत्तरायण: आज के दिन सूर्य धनु राशि से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करता है। खगोलीय दृष्टि से, यह अंधकार से प्रकाश की ओर गमन है। आज से दिन बड़े होने लगते हैं और रातें छोटी। पुराणों में इसे देवताओं का दिन कहा गया है। मान्यता है कि मकर संक्रांति से लेकर अगले 6 महीने तक (उत्तरायण काल) स्वर्ग के द्वार खुले रहते हैं।
मोक्ष की डुबकी: प्रयागराज को ‘तीर्थराज’ कहा जाता है। मान्यता है कि माघ के महीने में सभी देवी-देवता पृथ्वी पर आकर संगम के अदृश्य लोक में निवास करते हैं। विशेष रूप से मकर संक्रांति के दिन, गंगा, यमुना और सरस्वती के संगम में स्नान करने से जन्म-जन्मांतर के पाप धुल जाते हैं और जीव को मोक्ष की प्राप्ति होती है। महाभारत के अनुशासन पर्व में भी माघ मास में प्रयाग स्नान का विशेष उल्लेख है।
खिचड़ी और तिल का दान: स्नान के बाद दान का विशेष महत्व है। आज पूरे मेला क्षेत्र में ‘खिचड़ी’ (चावल और उड़द दाल का मिश्रण) और ‘तिल’ के दान की धूम रही।
- तिल: शनि दोष को दूर करने के लिए।
- गुड़: सूर्य को प्रसन्न करने के लिए।
- खिचड़ी: ग्रहों की शांति और स्वास्थ्य के लिए। श्रद्धालुओं ने स्नान के बाद घाटों पर बैठे पांडा और गरीबों को अन्न, वस्त्र और कंबल दान किए। कहते हैं कि आज के दिन किया गया दान सौ गुना होकर वापस मिलता है।
4. कल्पवासियों की कठिन तपस्या
प्रयागराज में मकर संक्रांति केवल एक दिन का स्नान नहीं है, बल्कि यह कल्पवासियों के लिए एक महीने की कठिन तपस्या का आरंभ या मध्य चरण है। कल्पवासी वे श्रद्धालु हैं जो पूरा माघ का महीना (लगभग 30-40 दिन) गंगा किनारे तंबू लगाकर रहते हैं।
वे सांसारिक सुख-सुविधाओं का त्याग कर देते हैं। जमीन पर सोते हैं, दिन में केवल एक बार सात्विक भोजन करते हैं और अपना पूरा समय भजन-कीर्तन और सत्संग में बिताते हैं। आज मकर संक्रांति पर कल्पवासियों के तंबुओं में विशेष उत्सव का माहौल था। उन्होंने सुबह-सुबह स्नान किया और फिर तुलसी पूजन और कथा श्रवण में लीन हो गए।
कल्पवास को ‘न्यूनतम में जीवन जीने की कला’ (Art of Living with Minimalism) कहा जाता है। 2026 के इस मेले में लगभग 2 लाख कल्पवासी निवास कर रहे हैं। उनकी जीवनशैली आधुनिक समाज के लिए एक उदाहरण है कि शांति बाहरी संसाधनों में नहीं, बल्कि आंतरिक संतोष में है।
5. सुरक्षा का अभेद्य किला: तकनीक और सतर्कता
इतनी विशाल भीड़ की सुरक्षा सुनिश्चित करना एक बड़ी चुनौती थी। हाल ही में जारी खुफिया अलर्ट्स को देखते हुए, प्रयागराज में मकर संक्रांति के लिए सुरक्षा व्यवस्था को अभेद्य किले में तब्दील कर दिया गया था।
त्रिनेत्र की निगरानी: पूरे मेला क्षेत्र पर नजर रखने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) से लैस 5000 सीसीटीवी कैमरे लगाए गए थे। इंटीग्रेटेड कमांड एंड कंट्रोल सेंटर (ICCC) से हर पल की निगरानी की जा रही थी। भीड़ का घनत्व (Crowd Density) बढ़ते ही कंट्रोल रूम से अलर्ट जारी कर दिया जाता था और पुलिस बल को वहां डायवर्ट कर दिया जाता था।
जल पुलिस और एटीएस: संगम के जल में बैरिकेडिंग की गई थी ताकि कोई गहरे पानी में न जाए। जल पुलिस (Jal Police) की 100 से अधिक मोटर बोट्स और स्टीमर्स लगातार सायरन बजाते हुए गश्त कर रहे थे। इसके अलावा, आतंकवादी निरोधी दस्ता (ATS) और रैपिड एक्शन फोर्स (RAF) के जवान घाटों और प्रमुख चौराहों पर तैनात थे।
ड्रोन से निगरानी: आसमान से नजर रखने के लिए दर्जनों ड्रोन्स का इस्तेमाल किया गया। ये ड्रोन न केवल भीड़ को मॉनिटर कर रहे थे, बल्कि संदिग्ध गतिविधियों पर भी नजर रख रहे थे।
6. स्वच्छता और सुविधाएं: बदलता प्रयागराज
पहले कुंभ या माघ मेले की छवि गंदगी और अव्यवस्था की होती थी, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में, और विशेषकर 2026 में, यह तस्वीर पूरी तरह बदल गई है। प्रयागराज में मकर संक्रांति पर आए श्रद्धालुओं ने मेले की स्वच्छता की जमकर तारीफ की।
स्वच्छ भारत का प्रतिबिंब:
- बायो-टॉयलेट्स: मेला क्षेत्र में 20,000 से अधिक सामुदायिक शौचालय और यूरिनल्स लगाए गए थे, जिनकी सफाई हर घंटे की जा रही थी।
- सफाई कर्मी: 10,000 सफाई कर्मियों की फौज (स्वच्छता दूत) तैनात थी जो लगातार घाटों से फूल-मालाएं और पॉलीथिन हटा रहे थे।
- नो प्लास्टिक जोन: पूरे कुंभ क्षेत्र को प्लास्टिक मुक्त घोषित किया गया था। दोना-पत्तल और कुल्हड़ का उपयोग अनिवार्य किया गया था।
स्वास्थ्य सेवाएं: मेला क्षेत्र में एक अस्थायी 100-बेड का अस्पताल बनाया गया था। इसके अलावा, हर घाट पर एम्बुलेंस और प्राथमिक चिकित्सा केंद्र मौजूद थे। ठंड को देखते हुए रैन बसेरों में हीटर और अलाव की व्यवस्था की गई थी।
7. यातायात प्रबंधन और खोया-पाया केंद्र
शहर के बाहरी इलाकों में ही बड़े वाहनों को रोक दिया गया था। श्रद्धालुओं को घाट तक लाने के लिए 500 ई-रिक्शा और 200 इलेक्ट्रिक बसों की शटल सेवा चलाई गई। यह प्रदूषण मुक्त माघ मेले की दिशा में एक बड़ा कदम था।
भीड़ में अपनों से बिछड़ने का डर हमेशा रहता है। इसके लिए डिजिटल खोया-पाया केंद्र (Lost and Found Centers) बनाए गए थे। चेहरे की पहचान (Face Recognition) तकनीक का उपयोग करके बिछड़े हुए बच्चों और बुजुर्गों को उनके परिवारों से मिलाया गया। लाउडस्पीकर पर लगातार घोषणाएं की जा रही थीं, जो मेले की एक पहचान बन चुकी हैं—“रामपुर के रहने वाले रामदीन, जहां कहीं भी हों, खोया-पाया केंद्र पर आ जाएं।”
8. अखाड़ों का वैभव और साधुओं का स्नान
प्रयागराज में मकर संक्रांति का एक प्रमुख आकर्षण अखाड़ों के साधु-संतों का स्नान होता है। हालांकि शाही स्नान की तिथियां अलग होती हैं, लेकिन मकर संक्रांति पर भी विभिन्न अखाड़ों के महामंडलेश्वर और नागा साधु अपने अनुयायियों के साथ स्नान करने पहुंचे।
राख से सने शरीर, लंबी जटाएं और हाथों में त्रिशूल लिए नागा साधुओं को देखना श्रद्धालुओं के लिए कौतूहल और श्रद्धा का विषय था। ‘हर हर महादेव’ के जयघोष के साथ जब साधुओं ने गंगा में छलांग लगाई, तो पूरा माहौल शिवमय हो गया। विदेशी पर्यटक, जो बड़ी संख्या में प्रयागराज पहुंचे थे, वे इस दृश्य को अपने कैमरों में कैद करते नजर आए।
9. गंगा की अविरलता और निर्मलता
इस बार श्रद्धालुओं ने एक सुखद बदलाव महसूस किया—गंगा का जल पहले से अधिक निर्मल और स्वच्छ था। सरकार की ‘नमामि गंगे’ परियोजना के तहत टेनरियों और नालों को गंगा में गिरने से रोका गया है। इसके अलावा, टिहरी और नरोरा बैराज से अतिरिक्त पानी छोड़ा गया था ताकि संगम में जल स्तर पर्याप्त रहे और जल प्रवाह (Flow) बना रहे।
श्रद्धालुओं ने बताया कि आचमन करने पर जल में दुर्गंध नहीं थी और वे निसंकोच डुबकी लगा पा रहे थे। प्रयागराज में मकर संक्रांति पर गंगा की स्वच्छता आस्था को और गहरा कर देती है।
10. आर्थिक प्रभाव: मेले का अर्थशास्त्र
धार्मिक महत्व के अलावा, यह मेला स्थानीय अर्थव्यवस्था के लिए संजीवनी है।
- नाविक: मल्लाह समुदाय के लिए यह कमाई का सबसे बड़ा दिन था। हजारों नावें गंगा-यमुना की लहरों पर श्रद्धालुओं को संगम तक ले जा रही थीं।
- फूल-माला विक्रेता: घाटों पर फूल, प्रसाद और सिंदूर बेचने वालों की बिक्री लाखों में हुई।
- होटल और ट्रांसपोर्ट: प्रयागराज के सभी होटल, धर्मशालाएं और गेस्ट हाउस पूरी तरह पैक थे। टैक्सी और ई-रिक्शा चालकों ने अच्छी कमाई की।
एक अनुमान के मुताबिक, मकर संक्रांति के इस एक दिन में प्रयागराज की स्थानीय अर्थव्यवस्था में करोड़ों रुपये का कारोबार हुआ।
11. श्रद्धालुओं की कहानियां: विश्वास की जीत
भीड़ में हर चेहरे के पीछे एक कहानी थी। बिहार के सहरसा से आईं 80 वर्षीय रामकली देवी ने कहा, “बेटा, शरीर में जान नहीं है, लेकिन गंगा मैया ने बुला लिया। डुबकी लगाकर ऐसा लग रहा है जैसे नया जन्म हो गया हो। ठंड तो मन का वहम है।”
दिल्ली से आए एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर, जो अपने लैपटॉप बैग के साथ ही घाट पर पहुंचे थे, ने बताया, “मैं अपनी दादी की इच्छा पूरी करने आया हूं। प्रयागराज में मकर संक्रांति का अनुभव अवर्णनीय है। यह भीड़ अराजक नहीं, बल्कि ऊर्जावान है। यहां आकर पता चलता है कि भारत को क्या जोड़कर रखता है।”
12. हेलीकॉप्टर से पुष्प वर्षा
प्रशासन ने श्रद्धालुओं का स्वागत एक अनोखे अंदाज में किया। दोपहर के समय एक सरकारी हेलीकॉप्टर ने संगम क्षेत्र और कतार में खड़े श्रद्धालुओं पर गुलाब की पंखुड़ियों की वर्षा की। आसमान से फूलों की बारिश होते देख श्रद्धालु खुशी से झूम उठे और ‘जय श्री राम’ और ‘गंगा मैया की जय’ के नारे लगाने लगे। यह दृश्य ड्रोन कैमरों में कैद हुआ और सोशल मीडिया पर तुरंत वायरल हो गया।
13. आगे की राह: मौनी अमावस्या की तैयारी
प्रयागराज में मकर संक्रांति का स्नान सफलतापूर्वक संपन्न होना प्रशासन के लिए एक बड़ी राहत है, लेकिन यह लिटमस टेस्ट भी था। अगला बड़ा स्नान पर्व ‘मौनी अमावस्या’ है, जिस दिन मकर संक्रांति से भी दुगुनी भीड़ (अनुमानित 3 से 4 करोड़) आने की संभावना है।
आज की व्यवस्थाओं में जो भी छोटी-मोटी कमियां रह गई होंगी, प्रशासन उनका विश्लेषण करेगा और अगले स्नान के लिए उन्हें सुधारेगा। विशेष रूप से निकास मार्गों (Exit Routes) को और चौड़ा करने पर विचार किया जा रहा है।
14. भारत की आत्मा का दर्शन
शाम ढलते-ढलते संगम तट पर महाआरती का आयोजन हुआ। हजारों दीयों की रोशनी में गंगा की लहरें झिलमिला उठीं। वैदिक मंत्रोच्चार के साथ मां गंगा, यमुना और सरस्वती की आरती उतारते पुजारियों और सामने हाथ जोड़े खड़े लाखों श्रद्धालुओं का दृश्य यह बताने के लिए काफी था कि भारत की आत्मा कहां बसती है।
15 जनवरी 2026 को प्रयागराज में मकर संक्रांति पर उमड़ा यह जनसैलाब केवल भीड़ नहीं थी। यह एक जीवंत सभ्यता का प्रमाण था। यह प्रमाण था उस अटूट विश्वास का जो सदियों से इस देश को एक सूत्र में पिरोए हुए है। चाहे तकनीक कितनी भी आगे बढ़ जाए, चाहे दुनिया कितनी भी बदल जाए, मोक्ष की वह एक डुबकी और आस्था का वह धागा कभी कमजोर नहीं होगा।
आज प्रयागराज ने एक बार फिर सिद्ध कर दिया कि वह ‘तीर्थराज’ क्यों है। 50 लाख डुबकियों के साथ, लाखों पाप धुले, लाखों संकल्प लिए गए और लाखों उम्मीदें जागीं। गंगा बहती रहेगी, और उसके तट पर यह आस्था का मेला युगों-युगों तक ऐसे ही लगता रहेगा।
हर हर गंगे! जय प्रयागराज!
