भारत विविधताओं का देश है, लेकिन इस विविधता के भीतर एक ऐसी सांस्कृतिक धारा बहती है जो कश्मीर से कन्याकुमारी तक सभी को जोड़ती है। आज, 16 जनवरी 2026 का दिन भारतीय संस्कृति के इतिहास में और विशेष रूप से तमिल विरासत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। पोंगल के पर्व के उल्लास के बीच, आज देश महान संत और कवि तिरुवल्लुवर की जयंती मना रहा है। इस पावन अवसर पर, भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्र के नाम एक ऐसा संदेश दिया है, जो केवल एक औपचारिक शुभकामना नहीं है, बल्कि भारतीय ज्ञान परंपरा को पुनर्जीवित करने का एक आह्वान है। तिरुवल्लुवर जयंती पर PM मोदी की अपील ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि एक सशक्त राष्ट्र के निर्माण के लिए हमें अपनी जड़ों और प्राचीन ग्रंथों की ओर लौटना होगा।
प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन और सोशल मीडिया संदेशों के माध्यम से देश के युवाओं, छात्रों और प्रबुद्ध नागरिकों से आग्रह किया है कि वे जीवन में कम से कम एक बार महान ग्रंथ ‘तिरुक्कुरल’ को अवश्य पढ़ें। 1330 दोहों (कुरल) में सिमटा यह ग्रंथ मात्र तमिल साहित्य की धरोहर नहीं है, बल्कि यह मानवता के लिए एक मार्गदर्शिका है।
1. 16 जनवरी 2026: एक सांस्कृतिक आह्वान
आज सुबह जब देश पोंगल और मकर संक्रांति के उत्सव में डूबा हुआ था, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संत तिरुवल्लुवर को श्रद्धांजलि अर्पित की। उन्होंने कहा कि तिरुवल्लुवर के विचार आज भी उतने ही व्यावहारिक हैं जितने सदियों पहले थे। प्रधानमंत्री ने विशेष रूप से ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ की भावना को रेखांकित करते हुए कहा कि उत्तर भारत के लोगों को दक्षिण भारत की इस महान विरासत को समझना चाहिए।
तिरुवल्लुवर जयंती पर PM मोदी की अपील का मुख्य सार यह है कि भाषा की दीवारें ज्ञान के प्रवाह को नहीं रोकनी चाहिए। प्रधानमंत्री ने कहा, “तिरुक्कुरल केवल एक किताब नहीं है, यह जीवन जीने की कला है। इसमें शासन, समाज, नैतिकता और व्यक्तिगत आचरण के लिए ऐसे सूत्र दिए गए हैं जो आज की जटिल समस्याओं का समाधान कर सकते हैं। मेरी अभिलाषा है कि हर भारतीय युवा अपनी मातृभाषा में या अंग्रेजी अनुवाद के माध्यम से इस ग्रंथ का अध्ययन करे।”
यह अपील इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि केंद्र सरकार पिछले कुछ वर्षों से ‘काशी तमिल संगमम’ और ‘सौराष्ट्र तमिल संगमम’ जैसे आयोजनों के जरिए तमिल संस्कृति को राष्ट्रीय पटल पर मुख्यधारा में लाने का प्रयास कर रही है। आज की अपील उसी कड़ी का एक हिस्सा है।
2. कौन थे संत तिरुवल्लुवर? एक रहस्यमयी युगपुरुष
तिरुवल्लुवर, जिन्हें प्रेम से ‘वल्लुवर’ भी कहा जाता है, भारतीय इतिहास के सबसे रहस्यमयी और प्रभावशाली व्यक्तित्वों में से एक हैं। उनके जन्म का सही समय और स्थान आज भी शोध का विषय है, लेकिन विद्वान उनका काल ईसा पूर्व पहली शताब्दी से लेकर दूसरी शताब्दी के बीच मानते हैं। उन्हें आमतौर पर एक जुलाहे (बुनकर) के रूप में चित्रित किया जाता है, जो चेन्नई के मायलापुर क्षेत्र में रहते थे।
उनका व्यक्तित्व धर्म और संप्रदाय से परे था। यही कारण है कि जैन, बौद्ध, शैव और वैष्णव—सभी संप्रदाय उन्हें अपना मानते हैं। उनकी सफेद वेशभूषा, जटाएं और हाथ में ताड़पत्र और लेखनी—यह छवि ज्ञान और सादगी का प्रतीक है। कन्याकुमारी में समुद्र के बीच स्थित उनकी 133 फीट ऊंची विशाल प्रतिमा आज भी उनकी महानता की गवाही देती है। यह प्रतिमा 133 फीट ऊंची इसलिए है क्योंकि उनके ग्रंथ तिरुक्कुरल में 133 अध्याय हैं।
तिरुवल्लुवर ने कभी किसी राजा की चाटुकारिता नहीं की और न ही कभी धन का लोभ किया। उन्होंने गृहस्थ जीवन बिताते हुए यह सिद्ध किया कि मोक्ष प्राप्ति के लिए वन में जाने की आवश्यकता नहीं है; समाज में रहकर और अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए भी संत बना जा सकता है। उनकी यही शिक्षा उन्हें जन-जन का कवि बनाती है।

3. तिरुक्कुरल: विश्व का साझा वेद
प्रधानमंत्री की तिरुवल्लुवर जयंती पर PM मोदी की अपील के केंद्र में जो ग्रंथ है, वह है ‘तिरुक्कुरल’। इसे ‘तमिल वेद’ या ‘विश्व वाणी’ (Universal Veda) भी कहा जाता है। दुनिया की शायद ही कोई ऐसी प्रमुख भाषा होगी जिसमें इसका अनुवाद न हुआ हो। बाइबिल और कुरान के बाद यह दुनिया की सबसे ज्यादा अनुवादित पुस्तकों में से एक मानी जाती है।
ग्रंथ की संरचना: तिरुक्कुरल अत्यंत वैज्ञानिक ढंग से लिखा गया है। इसमें कुल 1330 कुरल (दोहे) हैं, जो 133 अध्यायों में विभाजित हैं। हर अध्याय में 10 दोहे हैं। इस ग्रंथ को तीन मुख्य भागों (मुप्पल) में बांटा गया है, जो मानव जीवन के तीन पुरुषार्थों से मेल खाते हैं:
- अरम (Aram) – धर्म (Virtue): इसमें 38 अध्याय हैं। यह खंड नैतिकता, सदाचार, गृहस्थ जीवन और संन्यास धर्म पर केंद्रित है। वल्लुवर सिखाते हैं कि एक आदर्श मनुष्य कैसे बनें। इसमें सत्य, अहिंसा, कृतज्ञता और आत्म-संयम जैसे विषयों पर चर्चा की गई है।
- पोरुल (Porul) – अर्थ (Wealth/Polity): इसमें 70 अध्याय हैं। यह खंड राजनीति, अर्थशास्त्र, प्रशासन और सामाजिक जीवन पर आधारित है। इसे अक्सर कौटिल्य के अर्थशास्त्र के समकक्ष माना जाता है। इसमें राजा के कर्तव्य, मंत्रियों के गुण, कूटनीति, सेना, किलेबंदी और कर-प्रणाली पर अद्भुत ज्ञान दिया गया है। प्रधानमंत्री मोदी अक्सर अपने भाषणों में इसी खंड के दोहों का उद्धरण देते हैं।
- इनबम (Inbam/Kamam) – काम (Love): इसमें 25 अध्याय हैं। यह खंड प्रेम और दांपत्य जीवन के मनोविज्ञान को दर्शाता है। इसमें संयोग और वियोग दोनों का अत्यंत मानवीय और सूक्ष्म चित्रण है। यह कामसूत्र की तरह तकनीकी नहीं, बल्कि प्रेम की भावनाओं का काव्य है।
तिरुक्कुरल की सबसे बड़ी विशेषता इसकी संक्षिप्तता है। केवल सात शब्दों में वल्लुवर ने जीवन के सबसे गहरे रहस्यों को कह दिया है। यह गागर में सागर भरने जैसा है।
4. प्रधानमंत्री मोदी का तमिल प्रेम और कूटनीति
यह पहली बार नहीं है जब प्रधानमंत्री ने तिरुक्कुरल का उल्लेख किया हो। पिछले एक दशक में, उन्होंने संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) से लेकर संसद भवन तक और लाल किले की प्राचीर से लेकर विदेशी दौरों तक, कई बार तिरुक्कुरल के दोहे सुनाए हैं।
वैश्विक मंच पर तिरुक्कुरल: जब प्रधानमंत्री पापुआ न्यू गिनी गए थे, तो उन्होंने वहां की स्थानीय भाषा ‘टोक पिसिन’ (Tok Pisin) में अनुवादित तिरुक्कुरल का विमोचन किया था। इसी तरह, उन्होंने गुजराती और अन्य भारतीय भाषाओं में भी इसके अनुवाद को प्रोत्साहित किया है। तिरुवल्लुवर जयंती पर PM मोदी की अपील को अगर हम कूटनीतिक नजरिए से देखें, तो यह भारत की ‘सॉफ्ट पावर’ (Soft Power) को बढ़ाने का एक प्रयास है। दुनिया को यह बताना कि भारत के पास केवल योग और आयुर्वेद ही नहीं, बल्कि तिरुक्कुरल जैसा नैतिक साहित्य भी है जो विश्व शांति का आधार बन सकता है।
प्रधानमंत्री का मानना है कि तिरुक्कुरल भारत की विविधता में एकता का सबसे बड़ा सूत्र है। जब एक उत्तर भारतीय छात्र तमिल संत के विचारों को पढ़ता है, तो भाषिक दूरियां मिट जाती हैं और भावनात्मक जुड़ाव पैदा होता है।
5. आधुनिक समस्याओं का समाधान: तिरुक्कुरल की प्रासंगिकता
आज के दौर में जब दुनिया युद्ध, भ्रष्टाचार, मानसिक तनाव और जलवायु परिवर्तन जैसी समस्याओं से जूझ रही है, तब 2000 साल पुराना यह ग्रंथ हमें क्या सिखा सकता है? प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी अपील में इसी प्रासंगिकता पर जोर दिया है।
राजनीति और सुशासन (Good Governance): आज के दौर में सुशासन एक बड़ा मुद्दा है। वल्लुवर ने सदियों पहले कहा था: “एक राजा (शासक) को चार चीजें कभी नहीं छोड़नी चाहिए: निडरता, उदारता, ज्ञान और उत्साह।” उन्होंने यह भी कहा था कि जिस राजा के राज्य में प्रजा भयमुक्त होकर अपनी बात कह सके, वही राज्य श्रेष्ठ है। आज के लोकतंत्र में भी यह बात उतनी ही सच है। एक कुरल में कहा गया है कि “अन्यायपूर्ण तरीके से एकत्र किया गया धन उस पानी के समान है जो कच्चे मिट्टी के घड़े में रखा गया हो – वह बर्तन को भी गला देगा और पानी भी बह जाएगा।” यह भ्रष्टाचार के खिलाफ एक शाश्वत चेतावनी है।
अर्थव्यवस्था और कृषि: तिरुवल्लुवर ने कृषि को अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना था। उनका एक प्रसिद्ध दोहा है: “किसान ही दुनिया की धुरी हैं, क्योंकि बाकी सब अपने जीवन के लिए उन्हीं पर निर्भर हैं, चाहे वे कोई भी काम करते हों।” आज जब हम खाद्य सुरक्षा की बात करते हैं, तो वल्लुवर के विचार हमें किसानों का सम्मान करना सिखाते हैं।
जल संरक्षण: आज 2026 में जल संकट एक वैश्विक वास्तविकता है। वल्लुवर ने ‘नीतार पेरुमै’ (जल का महत्व) पर पूरा एक अध्याय लिखा है। उनका प्रसिद्ध कथन है: “नीरे इन्द्रि अमैयादु उलकु” (जल के बिना यह संसार चल नहीं सकता, और वर्षा के बिना नैतिकता भी नहीं टिक सकती)। उनका मानना था कि यदि वर्षा विफल हो जाए, तो मानवीय मूल्य भी नष्ट हो जाएंगे क्योंकि भूख मनुष्य को अनैतिक बना देती है।
वाणी और व्यवहार: सोशल मीडिया के युग में जब अभद्र भाषा और ट्रोलिंग आम बात हो गई है, तिरुक्कुरल का यह दोहा हमें आईना दिखाता है: “आग से जला हुआ घाव भर जाता है, लेकिन कटु वाणी से जीभ द्वारा दिया गया घाव कभी नहीं भरता।” यह सीख आज के युवाओं के लिए अत्यंत आवश्यक है।
6. युवाओं के लिए जीवन जीने की कला
तिरुवल्लुवर जयंती पर PM मोदी की अपील विशेष रूप से युवाओं के लिए है। आज का युवा डिप्रेशन, करियर की चिंता और रिश्तों की उलझनों में फंसा है। तिरुक्कुरल उसे मानसिक दृढ़ता प्रदान करता है।
ग्रंथ में ‘इडुक्कन अझियामै’ (मुसीबत में न घबराना) नामक एक अध्याय है। वल्लुवर कहते हैं: “जब मुसीबत आए, तो हंसो। उस मुसीबत को हराने का इससे बेहतर कोई हथियार नहीं है।” यह सकारात्मक मनोविज्ञान (Positive Psychology) का सबसे पुराना उदाहरण है।
दोस्ती कैसी होनी चाहिए? वल्लुवर कहते हैं: “सच्ची मित्रता वह नहीं है जो चेहरे पर मुस्कान लाए, बल्कि वह है जो दोस्त के भटकने पर उसे डांटकर सही रास्ते पर लाए।” आज के दौर में जब ‘फेयर वेदर फ्रेंड्स’ (सुख के साथी) की भरमार है, यह सलाह बहुत कीमती है।

7. शिक्षा व्यवस्था में तिरुक्कुरल का स्थान
प्रधानमंत्री की अपील के बाद, शिक्षाविदों के बीच यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या तिरुक्कुरल को राष्ट्रीय पाठ्यक्रम (NCERT) में और अधिक प्रमुखता से शामिल किया जाना चाहिए। हालांकि यह पहले से ही कई जगह पढ़ाया जाता है, लेकिन इसे केवल साहित्य के रूप में नहीं, बल्कि ‘नैतिक विज्ञान’ (Moral Science) के रूप में पढ़ाने की आवश्यकता है।
नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) में भारतीय ज्ञान परंपरा पर जोर दिया गया है। तिरुक्कुरल इसका एक अभिन्न अंग बन सकता है। मैनेजमेंट स्कूलों (MBA) में भी वल्लुवर के प्रबंधन सूत्रों को पढ़ाया जा सकता है, जैसे निर्णय लेना, सही व्यक्ति का चुनाव करना और समय प्रबंधन। वल्लुवर कहते हैं: “किसी कार्य को शुरू करने से पहले हजार बार सोचो, लेकिन एक बार शुरू कर दिया तो फिर सोचना (हिचकिचाना) मूर्खता है।”
8. कैसे पढ़ें तिरुक्कुरल? शुरुआत कैसे करें?
प्रधानमंत्री की अपील सुनकर यदि आप तिरुक्कुरल पढ़ने के लिए प्रेरित हुए हैं, तो आप सोच रहे होंगे कि शुरुआत कैसे करें। अच्छी खबर यह है कि आज डिजिटल युग में यह ग्रंथ हर जगह उपलब्ध है।
- अनुवाद: यह हिंदी, अंग्रेजी, गुजराती, मराठी, बंगाली सहित लगभग सभी भारतीय भाषाओं में उपलब्ध है।
- ऐप्स: गूगल प्ले स्टोर और ऐप स्टोर पर ‘Thirukkural’ नाम से कई मुफ्त ऐप्स हैं जो अर्थ और व्याख्या के साथ दोहे प्रदान करते हैं।
- वेबसाइट्स: कई वेबसाइट्स पर रोज एक कुरल (Kural of the Day) पढ़ने की सुविधा है।
शुरुआत करने के लिए, आप ‘अरम’ (धर्म) खंड के कुछ सरल अध्यायों को पढ़ सकते हैं, जैसे ‘मीठी वाणी बोलना’ (Sweet Speech) या ‘कृतज्ञता’ (Gratitude)। आप पाएंगे कि ये बातें आपके रोजमर्रा के जीवन से कितनी जुड़ी हुई हैं।
9. एक भारत, श्रेष्ठ भारत की मिसाल
तिरुवल्लुवर जयंती पर PM मोदी की अपील का एक राजनीतिक और सामाजिक आयाम भी है। अक्सर दक्षिण भारत में यह धारणा बनाई जाती है कि उत्तर भारत या केंद्र सरकार उनकी भाषा और संस्कृति को महत्व नहीं देती। प्रधानमंत्री मोदी ने लगातार तमिल संस्कृति का सम्मान करके इस धारणा को तोड़ने का काम किया है।
जब देश का प्रधानमंत्री, जो स्वयं हिंदी भाषी क्षेत्र से आता है और गुजरात से ताल्लुक रखता है, तमिल ग्रंथ के प्रचार-प्रसार के लिए अभियान चलाता है, तो यह राष्ट्रीय एकता को मजबूत करता है। यह बताता है कि रामचरितमानस और तिरुक्कुरल दोनों भारत की ही संतानें हैं। यह सांस्कृतिक सेतु उत्तर और दक्षिण के बीच की खाई को पाटने का सबसे सशक्त माध्यम है।
10. विश्व के विचारकों की नजर में तिरुक्कुरल
तिरुक्कुरल की महानता केवल भारतीयों तक सीमित नहीं है। विश्व के महान विचारकों ने इसकी भूरी-भूरी प्रशंसा की है।
- लियो टॉलस्टॉय: महान रूसी लेखक टॉलस्टॉय ने महात्मा गांधी को लिखे अपने पत्र में तिरुक्कुरल के ‘अहिंसा’ के सिद्धांत का उल्लेख किया था, जिससे गांधीजी बहुत प्रभावित हुए थे।
- अल्बर्ट श्वाइत्जर: नोबेल शांति पुरस्कार विजेता ने कहा था, “दुनिया के साहित्य में शायद ही कोई ऐसा संग्रह हो जिसमें इतने उच्च आदर्श इतनी सादगी से कहे गए हों।”
- जी.यू. पोप: जिन्होंने सबसे पहले इसका अंग्रेजी अनुवाद किया, उन्होंने इसे “The Bard of Universal Man” (वैश्विक मानव का कवि) कहा था।
प्रधानमंत्री मोदी चाहते हैं कि आज की पीढ़ी यह जाने कि हमारा साहित्य कितना समृद्ध है। हम अक्सर पश्चिमी दार्शनिकों को पढ़ते हैं, लेकिन हमारे घर में ही ज्ञान का ऐसा खजाना मौजूद है जिससे हम अनजान हैं।
11. तिरुक्कुरल और धर्मनिरपेक्षता
आज के ध्रुवीकृत माहौल में तिरुक्कुरल की सबसे बड़ी खासियत इसका धर्मनिरपेक्ष (Secular) होना है। वल्लुवर ने अपने ग्रंथ में किसी विशेष देवता का नाम नहीं लिया है, बल्कि ‘आदि भगवन’ (आदि ईश्वर) शब्द का प्रयोग किया है, जिसका अर्थ कोई भी अपनी आस्था के अनुसार निकाल सकता है। इस ग्रंथ में कर्मकांड या पूजा-पाठ पर जोर नहीं है, बल्कि ‘मानवीय मूल्यों’ पर जोर है। सत्य बोलना, चोरी न करना, परस्त्री गमन न करना, क्रोध न करना—ये ऐसे मूल्य हैं जो हर धर्म का सार हैं। इसीलिए, तिरुवल्लुवर जयंती पर PM मोदी की अपील हर भारतीय के लिए है, चाहे वह किसी भी धर्म या संप्रदाय का हो।
12. एक संकल्प लेने का दिन
अंत में, 16 जनवरी 2026 का यह दिन हमें आत्मचिंतन का अवसर देता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक दीया जलाया है, अब उस रोशनी को फैलाने की जिम्मेदारी हम सब की है। तिरुवल्लुवर जयंती पर PM मोदी की अपील को केवल एक समाचार मानकर नहीं छोड़ देना चाहिए।
आइए, आज हम संकल्प लें कि हम अपने व्यस्त जीवन में से कुछ समय निकालकर इस महान ग्रंथ के कुछ पन्नों को जरूर पलटेंगे। इसे अपनी बुकशेल्फ की शोभा नहीं, बल्कि अपने जीवन का हिस्सा बनाएंगे। चाहे हम छात्र हों, व्यापारी हों, नेता हों या गृहणी—तिरुवल्लुवर के पास हम सबके लिए कोई न कोई संदेश जरूर है।
तिरुक्कुरल पढ़ना अपने आप से संवाद करने जैसा है। यह हमें एक बेहतर इंसान, एक बेहतर नागरिक और अंततः एक बेहतर भारतीय बनाता है। प्रधानमंत्री का सपना है ‘विकसित भारत 2047’ का, और विकसित भारत का निर्माण केवल आर्थिक प्रगति से नहीं, बल्कि नैतिक और सांस्कृतिक उत्थान से होगा। और उस उत्थान की कुंजी संत तिरुवल्लुवर के इन 1330 दोहों में छिपी है।
तो, क्या आप तैयार हैं ज्ञान के इस महासागर में डुबकी लगाने के लिए? जैसा कि वल्लुवर ने कहा है: “सीखा हुआ ज्ञान ही असली नेत्र है, बाकी तो चेहरे पर सिर्फ दो घाव हैं।”
आइए, ज्ञान के नेत्र खोलें और एक श्रेष्ठ भारत का निर्माण करें।
तिरुवल्लुवर जयंती की हार्दिक शुभकामनाएं
