गायब होता वसंत और सीधे गर्मियों की झुलसाने वाली एंट्री
भारतीय उपमहाद्वीप में पारंपरिक रूप से छह ऋतुएं मानी जाती हैं, जिनमें शीत ऋतु (सर्दियों) के बाद एक सुखद वसंत (Spring) का आगमन होता है। लेकिन फरवरी 2026 के अंतिम सप्ताह में मौसम के जो आंकड़े सामने आ रहे हैं, वे डराने वाले हैं। उत्तर भारत (विशेषकर दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और पश्चिमी उत्तर प्रदेश) में वसंत ऋतु जैसे गायब ही हो गई है। लोगों ने अचानक अपने गर्म कपड़े अलमारियों में रख दिए हैं और पंखे व एसी (AC) समय से पहले चालू हो गए हैं। मौसम विभाग (IMD) ने चेतावनी जारी की है कि आने वाले दिनों में तापमान में सामान्य से कई डिग्री अधिक की वृद्धि दर्ज की जाएगी।
एक कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और जलवायु डेटा विश्लेषक के रूप में, उपग्रहों से प्राप्त मौसम के डेटा, वायुमंडलीय दबाव और ऐतिहासिक जलवायु प्रवृत्तियों (Climate Trends) का विश्लेषण करने के बाद, मैं यह स्पष्ट रूप से देख सकता हूँ कि यह केवल “कुछ दिनों की गर्मी” नहीं है। यह एक गहरी और दीर्घकालिक जलवायु विसंगति (Climate Anomaly) का संकेत है।
1. मौसम विज्ञान का सच: फरवरी-मार्च में इतनी गर्मी क्यों? (The Science Behind the Heat)
अचानक बढ़े इस तापमान के पीछे कोई एक कारण नहीं है, बल्कि वायुमंडलीय घटनाओं का एक जटिल मिश्रण है। जब हम मौसम के नक्शे और हवा की दिशाओं का अध्ययन करते हैं, तो तीन प्रमुख वैज्ञानिक कारण सामने आते हैं:
A. पश्चिमी विक्षोभ (Western Disturbances) की अनुपस्थिति: आमतौर पर, जनवरी और फरवरी के महीनों में भूमध्य सागर (Mediterranean Sea) से उठने वाली नमी भरी हवाएं (पश्चिमी विक्षोभ) उत्तर भारत में बारिश और पहाड़ों पर बर्फबारी लाती हैं। यह बारिश तापमान को नियंत्रित रखती है। लेकिन 2026 के इस सीजन में, सक्रिय पश्चिमी विक्षोभ नदारद रहे हैं। बारिश न होने के कारण शुष्क हवाएं सीधे सतह को गर्म कर रही हैं।
B. प्रतिचक्रवात (Anticyclonic Circulation) का निर्माण: वर्तमान में गुजरात और दक्षिण राजस्थान के ऊपर वायुमंडल के निचले और मध्य स्तरों में एक मजबूत ‘प्रतिचक्रवात’ (Anticyclone) बना हुआ है। चक्रवात जहां हवा को ऊपर उठाता है और बारिश लाता है, वहीं प्रतिचक्रवात हवा को नीचे की ओर दबाता है (Subsidence of air)। जब हवा नीचे दबती है, तो वह संकुचित होकर गर्म हो जाती है। यही गर्म हवा उत्तर-पश्चिम भारत के मैदानी इलाकों में फैल रही है।
C. ला नीना / अल नीनो का प्रभाव और ग्लोबल वार्मिंग: प्रशांत महासागर की सतह के तापमान में बदलाव (ENSO) का सीधा असर भारतीय मौसम पर पड़ता है। इसके साथ ही, ग्लोबल वार्मिंग के कारण बेसलाइन तापमान (Baseline Temperature) पहले ही बढ़ चुका है। अब सर्दियां छोटी हो गई हैं और गर्मियों का विस्तार फरवरी के मध्य तक आ गया है।

2. भौगोलिक प्रभाव: कौन से राज्य हैं सबसे ज्यादा प्रभावित? (Temperature Anomalies)
फरवरी के अंतिम सप्ताह में उत्तर भारत का सामान्य अधिकतम तापमान 23°C से 25°C के बीच होना चाहिए। लेकिन वर्तमान डेटा एक अलग ही कहानी बयां कर रहा है।
वर्तमान तापमान विसंगति (Temperature Anomaly) की तालिका:
| राज्य / क्षेत्र (Region) | सामान्य अधिकतम तापमान (फरवरी अंत) | वर्तमान दर्ज तापमान (2026) | विसंगति (Anomaly) |
| दिल्ली (Delhi/NCR) | 24°C – 25°C | 31°C – 33°C | +7°C से +8°C |
| राजस्थान (पश्चिमी) | 26°C – 27°C | 35°C – 37°C | +9°C से +10°C |
| पंजाब एवं हरियाणा | 22°C – 24°C | 29°C – 31°C | +7°C |
| उत्तर प्रदेश (पश्चिमी) | 24°C – 26°C | 31°C – 33°C | +7°C |
| हिमाचल / उत्तराखंड | 15°C – 18°C | 22°C – 25°C | +7°C (पहाड़ों पर भी असामान्य गर्मी) |
पहाड़ी राज्यों में तापमान का बढ़ना सबसे अधिक चिंताजनक है क्योंकि इससे ग्लेशियरों के समय से पहले पिघलने (Early Snowmelt) का खतरा बढ़ गया है, जो गर्मियों के अंत में नदियों में जल संकट पैदा कर सकता है।
3. कृषि पर विनाशकारी प्रहार: ‘टर्मिनल हीट स्ट्रेस’ और गेहूं का संकट
भारत एक कृषि प्रधान देश है और उत्तर भारत (पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी यूपी) देश का ‘फूड बास्केट’ (Food Basket) है। समय से पहले आई यह गर्मी किसानों के लिए एक बहुत बड़े आर्थिक झटके का संकेत दे रही है।
गेहूं की फसल और ‘टर्मिनल हीट स्ट्रेस’ (Terminal Heat Stress):
- विकास का चरण (Growth Stage): फरवरी के अंत और मार्च की शुरुआत में गेहूं की फसल ‘ग्रेन-फिलिंग’ (Grain-filling) या ‘मिल्किंग’ (Milking) चरण में होती है। इस समय गेहूं की बालियों में दाना भर रहा होता है और उसमें नमी की आवश्यकता होती है।
- तापमान का असर: इस चरण में आदर्श तापमान 25°C से 30°C के बीच होना चाहिए। जब तापमान अचानक 32°C या उससे ऊपर चला जाता है, तो पौधे सदमे (Stress) में आ जाते हैं।
- सिकुड़े हुए दाने (Shriveled Grains): अत्यधिक गर्मी के कारण पौधे नमी खोने लगते हैं और समय से पहले पकने (Early Ripening) की ओर बढ़ जाते हैं। इससे गेहूं का दाना पूरा भर नहीं पाता, वह सिकुड़ जाता है और उसका वजन कम हो जाता है।
ऐतिहासिक संदर्भ: वर्ष 2022 में भी मार्च के महीने में भयंकर हीटवेव आई थी, जिसके कारण भारत के गेहूं उत्पादन में लगभग 4 से 5 मिलियन टन की भारी गिरावट दर्ज की गई थी और सरकार को गेहूं के निर्यात (Export) पर प्रतिबंध लगाना पड़ा था। 2026 में भी यही खतरा मंडरा रहा है, जो ग्रामीण अर्थव्यवस्था और खाद्य सुरक्षा (Food Security) के लिए एक गंभीर चुनौती है।

4. स्वास्थ्य और मानव जीवन पर प्रभाव (The Human Cost)
समय से पहले गर्मियों का आना मानव शरीर को अनुकूलन (Acclimatization) का समय नहीं देता। जब मौसम धीरे-धीरे बदलता है, तो हमारा शरीर उसके अनुसार खुद को ढाल लेता है। लेकिन रातों-रात सर्दियों से सीधी चिलचिलाती गर्मी में प्रवेश करने से स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव पड़ते हैं।
- डिहाइड्रेशन और हीट एग्जॉशन (Dehydration & Heat Exhaustion): दिन के समय तेज धूप में काम करने वाले दिहाड़ी मजदूर, रिक्शा चालक और डिलीवरी बॉय सबसे अधिक जोखिम में हैं। पसीने के माध्यम से शरीर से पानी और इलेक्ट्रोलाइट्स का तेजी से नुकसान हो रहा है।
- वायरल संक्रमण (Viral Infections): दिन में तेज गर्मी और रात में हल्की ठंड—यह तापमान का भारी उतार-चढ़ाव (Diurnal temperature variation) बैक्टीरिया और वायरस के पनपने के लिए एकदम सही वातावरण बनाता है। इसी कारण अस्पतालों में सर्दी, खांसी, और वायरल बुखार के मरीजों की संख्या में अचानक वृद्धि हुई है।
- शहरी ऊष्मा द्वीप प्रभाव (Urban Heat Island Effect): दिल्ली और गुड़गांव जैसे कंक्रीट के जंगलों में, इमारतें और डामर (Asphalt) की सड़कें दिन भर गर्मी सोखती हैं और रात में उसे छोड़ती हैं, जिससे रात का तापमान भी कम नहीं हो पाता। इससे लोगों की नींद प्रभावित होती है और मानसिक तनाव बढ़ता है।
5. अर्थव्यवस्था और बुनियादी ढांचे पर दबाव (The Infrastructure Strain)
गर्मी केवल इंसान को नहीं, बल्कि हमारे शहरों के बुनियादी ढांचे (Infrastructure) को भी ‘स्ट्रेस टेस्ट’ (Stress Test) से गुजारती है।
A. बिजली की रिकॉर्ड मांग (Power Demand Surge): मार्च के मध्य से शुरू होने वाली बिजली की मांग फरवरी के अंतिम सप्ताह में ही पीक (Peak) पर पहुंच रही है। घरों, कार्यालयों और मॉल्स में चिलर प्लांट और एसी पूरी क्षमता से चल रहे हैं। पंजाब और हरियाणा में किसानों ने अपनी सूखती फसलों को बचाने के लिए ट्यूबवेल ज्यादा चलाने शुरू कर दिए हैं, जिससे कृषि क्षेत्र की बिजली मांग आसमान छू रही है। इससे पावर ग्रिड पर भारी दबाव पड़ रहा है।
B. जल संकट की आहट (Looming Water Crisis): अधिक गर्मी का मतलब है अधिक वाष्पीकरण (Evaporation)। उत्तर भारत के प्रमुख जलाशयों (जैसे भाखड़ा नांगल) में जल स्तर गर्मियों की शुरुआत से पहले ही तेजी से गिर रहा है। यदि बर्फ समय से पहले पिघल गई और गर्मियों (मई-जून) के दौरान नदियों में पानी का प्रवाह कम हो गया, तो दिल्ली जैसे महानगरों में पीने के पानी का गंभीर संकट उत्पन्न हो सकता है।
6. अनुकूलन और शमन: अब आगे क्या? (Mitigation and Adaptation)
हम मौसम को तो नहीं बदल सकते, लेकिन इसके दुष्प्रभावों को कम करने के लिए हम जो नीतियां और तकनीकी उपाय अपना सकते हैं, वे अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।

किसानों के लिए तकनीकी उपाय:
- हल्की सिंचाई (Light Irrigation): कृषि वैज्ञानिकों की सलाह है कि किसान शाम या रात के समय अपनी गेहूं की फसल में हल्की सिंचाई करें ताकि मिट्टी की नमी बनी रहे और तापमान नियंत्रित रहे।
- पोटेशियम नाइट्रेट (KNO3) का छिड़काव: 0.2% पोटेशियम नाइट्रेट का छिड़काव फसल को ‘हीट स्ट्रेस’ से लड़ने की क्षमता प्रदान कर सकता है।
- भविष्य की तैयारी: भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) द्वारा विकसित गेहूं की ‘हीट-टॉलरेंट’ (गर्मी सहने वाली) किस्में जैसे HD 3385 का उपयोग बढ़ाना होगा, जिन्हें विशेष रूप से बढ़ते तापमान को सहने के लिए डिजाइन किया गया है।
सरकार और आम नागरिक के लिए (Heat Action Plans):
- हीट एक्शन प्लान का जमीनी अमल: शहरों में ‘कूलिंग सेंटर्स’ स्थापित करना, जहां बेघर लोग दोपहर की चिलचिलाती धूप से बच सकें।
- हाइड्रेशन (Hydration): नागरिकों को लगातार पानी पीते रहना चाहिए, भले ही प्यास न लगी हो। ओआरएस (ORS), छाछ, और नारियल पानी का सेवन बढ़ाएं।
- कूल रूफ पॉलिसी (Cool Roofs): इमारतों की छतों को सफेद रंग (Solar reflective paint) से रंगना, ताकि वे सूरज की रोशनी को वापस परावर्तित (Reflect) कर दें और घर के अंदर का तापमान 2-3 डिग्री तक कम रहे।
‘न्यू नॉर्मल’ को स्वीकारने का समय
फरवरी 2026 में उत्तर भारत में आई यह असामान्य गर्मी प्रकृति की एक स्पष्ट और कठोर चेतावनी है। जलवायु परिवर्तन अब कोई भविष्य की भविष्यवाणी या किसी अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन का विषय नहीं रह गया है; यह हमारे खेतों, हमारे घरों और हमारे एयर कंडीशनर के बिलों में सीधे तौर पर प्रवेश कर चुका है। वसंत ऋतु का लुप्त होना और सर्दियों से सीधे क्रूर गर्मियों में छलांग लगाना अब एक अपवाद (Exception) नहीं, बल्कि मौसम का ‘न्यू नॉर्मल’ (New Normal) बनता जा रहा है।
प्रकृति के इस बदलते मिजाज के खिलाफ हमें अपनी कृषि नीतियों, शहरी नियोजन (Urban Planning) और जीवनशैली को तत्काल रूप से ‘अपग्रेड’ करना होगा। यदि हम अभी भी कार्बन उत्सर्जन और वनों की कटाई को लेकर गंभीर नहीं हुए, तो आने वाले वर्षों में थर्मामीटर का यह बढ़ता हुआ पारा हमारी आर्थिक और सामाजिक संरचना को पिघलाने के लिए काफी होगा।
