अंतरिक्ष के झरोखे से प्रकृति का अद्वितीय चमत्कार
ब्रह्मांड हमेशा से ही रहस्यों और अकल्पनीय सुंदर घटनाओं का केंद्र रहा है। जब भी पृथ्वी, चंद्रमा और सूर्य एक सीधी रेखा में आते हैं, तो हमें ग्रहण (Eclipse) जैसी अद्भुत खगोलीय घटनाएँ देखने को मिलती हैं। हाल ही में, 17 फरवरी 2026 को दुनिया ने साल के पहले सूर्य ग्रहण का अनुभव किया। लेकिन इस बार का नज़ारा सिर्फ पृथ्वी से ही नहीं, बल्कि अंतरिक्ष से भी कैप्चर किया गया, जिसने विज्ञान जगत में एक नई हलचल पैदा कर दी है।
यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी (European Space Agency – ESA) ने अपने सैटेलाइट के माध्यम से इस ‘रिंग ऑफ फायर’ (Ring of Fire) यानी वलयाकार सूर्य ग्रहण की कुछ बेहद दुर्लभ और अकल्पनीय तस्वीरें जारी की हैं। पृथ्वी पर यह ग्रहण मुख्य रूप से अंटार्कटिका के बर्फीले और निर्जन इलाकों में ही पूर्ण रूप से दिखाई दिया, लेकिन अंतरिक्ष में बैठे ESA के Proba-2 सैटेलाइट ने इस पूरी घटना को ‘फ्रंट-रो सीट’ (Front-row seat) से रिकॉर्ड किया।
1. ‘रिंग ऑफ फायर’ (वलयाकार सूर्य ग्रहण) के पीछे का खगोलीय विज्ञान
सूर्य ग्रहण तब होता है जब चंद्रमा, पृथ्वी और सूर्य के बीच आ जाता है। लेकिन हर सूर्य ग्रहण में ‘रिंग ऑफ फायर’ नहीं बनता। इसके पीछे कक्षीय यांत्रिकी (Orbital Mechanics) का एक बहुत ही सटीक और सुंदर गणित काम करता है।
वलयाकार (Annular) ग्रहण क्यों होता है? चंद्रमा पृथ्वी की परिक्रमा एक पूर्ण वृत्ताकार कक्षा में नहीं, बल्कि एक अंडाकार (Elliptical) कक्षा में करता है।
- जब चंद्रमा पृथ्वी के सबसे करीब (Perigee) होता है और सूर्य के सामने आता है, तो वह सूर्य को पूरी तरह ढक लेता है, जिसे पूर्ण सूर्य ग्रहण (Total Solar Eclipse) कहते हैं।
- लेकिन 17 फरवरी 2026 को चंद्रमा अपनी कक्षा में पृथ्वी से दूर (Apogee) था। दूर होने के कारण आसमान में चंद्रमा का ‘आभासी आकार’ (Apparent Size) छोटा दिखाई दे रहा था।
जब यह छोटा चंद्रमा सूर्य के ठीक बीचों-बीच आया, तो वह सूर्य की पूरी डिस्क को ढकने में असमर्थ रहा। चंद्रमा ने सूर्य के केंद्र का लगभग 96% हिस्सा तो ढक लिया, लेकिन उसके बाहरी किनारे चमकते रहे, जिसने आसमान में एक सुलगती हुई आग की अंगूठी—‘रिंग ऑफ फायर’—का निर्माण किया।

खगोलीय मापन (The Mathematics of Apparent Size): किसी भी खगोलीय पिंड का आभासी कोणीय व्यास (Angular Diameter) उसके वास्तविक व्यास और पृथ्वी से उसकी दूरी पर निर्भर करता है। इसे निम्नलिखित सूत्र द्वारा समझा जा सकता है:
δ=2arctan(2Dd)
जहाँ d पिंड (चंद्रमा या सूर्य) का वास्तविक व्यास है और D प्रेक्षक (Observer) से उसकी दूरी है। वलयाकार ग्रहण के दौरान, चंद्रमा का D बढ़ जाता है, जिससे उसका कोणीय व्यास δ सूर्य के कोणीय व्यास से कम हो जाता है, और परिणामस्वरूप हमें ‘रिंग’ दिखाई देती है।
2. ESA का Proba-2 सैटेलाइट: अंतरिक्ष का तकनीकी ‘फोटोग्राफर’
जिस सैटेलाइट ने अंतरिक्ष से इन तस्वीरों को दुनिया के सामने रखा, वह यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी (ESA) का Proba-2 (PRoject for OnBoard Autonomy) सैटेलाइट है। आकार में एक वाशिंग मशीन जितना छोटा यह सैटेलाइट सौर अवलोकन (Solar Observation) के लिए एक मास्टरपीस है।
कैसे देखी Proba-2 ने एक ही ग्रहण की 4 झलकियाँ? पृथ्वी पर मौजूद लोगों को यह ग्रहण सिर्फ एक बार और कुछ ही मिनटों (अधिकतम 2 मिनट 20 सेकंड) के लिए दिखाई दिया। लेकिन Proba-2 अंतरिक्ष में पृथ्वी की सतह से लगभग 700 किलोमीटर ऊपर ‘सन-सिंक्रोनस कक्षा’ (Sun-synchronous orbit) में उड़ रहा है। यह हर 100 मिनट में पृथ्वी का एक चक्कर पूरा कर लेता है। अपनी इस तेज गति और विशिष्ट कक्षा के कारण, Proba-2 ग्रहण के दौरान चंद्रमा की छाया (Moon’s Shadow) के बीच से एक या दो बार नहीं, बल्कि चार बार गुजरा। 11:31 UTC (यूनिवर्सल टाइम) पर इसने सबसे परफेक्ट ‘रिंग ऑफ फायर’ कैप्चर की।
SWAP उपकरण का जादू (The SWAP Imager): Proba-2 ने ये तस्वीरें सामान्य रोशनी (Visible Light) में नहीं ली हैं। इसके लिए सैटेलाइट में लगे SWAP (Sun Watcher using Active Pixel System detector and Image Processing) उपकरण का उपयोग किया गया।
- SWAP सूर्य को 17.4 नैनोमीटर (nm) की ‘एक्सट्रीम अल्ट्रावायलेट’ (EUV) वेवलेंथ पर देखता है।
- इस वेवलेंथ पर देखने का फायदा यह है कि सूर्य की धधकती हुई सतह (Photosphere) के बजाय, हमें सूर्य का बाहरी वायुमंडल यानी कोरोना (Corona) स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। कोरोना का तापमान लाखों डिग्री सेल्सियस होता है और यह अत्यंत अशांत (Turbulent) होता है।
3. 17 फरवरी 2026: पृथ्वी और अंतरिक्ष के नज़ारों का तुलनात्मक विश्लेषण
इस ग्रहण की एक और खास बात यह थी कि इसके दर्शक पृथ्वी पर बहुत सीमित थे। आइए इस खगोलीय घटना के ‘अर्थ व्यू’ और ‘स्पेस व्यू’ की तुलना करें:
| पैरामीटर (Parameter) | पृथ्वी से नज़ारा (अंटार्कटिका / चिली) | अंतरिक्ष से नज़ारा (ESA Proba-2 / EUMETSAT) |
| दृश्यता (Visibility) | केवल अंटार्कटिका, दक्षिणी चिली और नामीबिया के कुछ हिस्सों में। | कोई वायुमंडलीय रुकावट नहीं, 100% स्पष्ट दृश्य। |
| ग्रहण की अवधि (Duration) | अधिकतम 2 मिनट 20 सेकंड (पूर्ण वलयाकार चरण)। | कक्षा की गति के कारण चार अलग-अलग चरणों में देखा गया। |
| रोशनी का प्रकार (Light Spectrum) | विजिबल लाइट (Visible Light) – विशेष चश्मों (Solar Filters) की मदद से। | एक्सट्रीम अल्ट्रावायलेट (EUV) लाइट, जो मानव आंखों को नहीं दिखती। |
| अनुभव (Experience) | तापमान में भारी गिरावट, ठंडी हवाएं और अंधेरा छा जाना। | सूरज के कोरोना की चुंबकीय रेखाओं (Magnetic field lines) और ज्वालाओं की बारीक डीटेलिंग। |
| वैज्ञानिक उपयोग | ग्राउंड-बेस्ड टेलीस्कोप से वायुमंडलीय हस्तक्षेप (Atmospheric interference) का सामना करना पड़ता है। | कोरोना, सोलर फ्लेयर्स (Solar Flares) और अंतरिक्ष मौसम (Space Weather) का सटीक डेटा। |
4. भारत का आदित्य-L1 (Aditya-L1): अंतरिक्ष में एक स्थायी ‘आर्टिफिशियल ग्रहण’
जब ESA का Proba-2 सूर्य ग्रहण को कैप्चर कर रहा था, तब भारत का अपना सौर मिशन आदित्य-L1 (Aditya-L1) पृथ्वी से 1.5×106 किलोमीटर दूर लैग्रेंज बिंदु 1 (Lagrange Point 1 या L1) पर मौजूद था।
आदित्य-L1 क्यों है खास? भले ही पृथ्वी और चंद्रमा की लुका-छिपी के कारण हमें ग्रहण दिखाई देते हों, लेकिन आदित्य-L1 एक ऐसी जगह (Halo Orbit) पर बैठा है जहाँ न कभी रात होती है और न कभी ग्रहण लगता है। यह 24×7 सूर्य को निर्बाध रूप से देखता है।
लेकिन सूर्य के कोरोना (बाहरी वायुमंडल) का अध्ययन करने के लिए एक ‘ग्रहण’ जैसी स्थिति जरूरी होती है, ताकि सूर्य की मुख्य चकाचौंध को रोका जा सके।
- VELC (Visible Emission Line Coronagraph): आदित्य-L1 में लगा यह पेलोड सैटेलाइट के भीतर ही एक ‘कृत्रिम ग्रहण’ (Artificial Eclipse) बनाता है। यह सूर्य की मुख्य डिस्क को एक काले गोले (Occulter disk) से ढंक देता है, ताकि किनारे का कोरोना साफ-साफ दिख सके।
- जबकि दुनिया 17 फरवरी के ग्रहण का इंतज़ार कर रही थी, आदित्य-L1 हर सेकंड सूर्य का ‘रिंग ऑफ फायर’ जैसा दृश्य अपनी वेधशाला में बना रहा है और ‘ग्राउंड ट्रुथ’ (Ground Truth) डेटा इसरो (ISRO) को भेज रहा है।

5. अंतरिक्ष की इन तस्वीरों का महत्व और ‘स्पेस वेदर’ (Space Weather)
वैज्ञानिकों के लिए ‘रिंग ऑफ फायर’ सिर्फ एक सुंदर दृश्य नहीं है, यह अंतरिक्ष के मौसम को समझने की एक चाबी है।
- कोरोना का रहस्य (The Coronal Heating Problem): सूर्य की सतह का तापमान लगभग 5,500 °C होता है, लेकिन जैसे-जैसे हम सतह से दूर उसके कोरोना में जाते हैं, तापमान आश्चर्यजनक रूप से 10 से 20 लाख °C तक पहुँच जाता है। भौतिकी के अनुसार गर्मी स्रोत से दूर जाने पर कम होनी चाहिए, लेकिन यहाँ उल्टा होता है। ग्रहण के दौरान कोरोना की जो स्पष्ट EUV तस्वीरें मिलती हैं, वे इस रहस्य को सुलझाने में वैज्ञानिकों की मदद करती हैं।
- कोरोनल मास इजेक्शन (CMEs): सूर्य अक्सर अपने कोरोना से प्लाज्मा और चुंबकीय क्षेत्र के विशाल बादलों को अंतरिक्ष में फेंकता है। यदि यह तूफान पृथ्वी की ओर आ जाए, तो यह हमारे नेविगेशन सिस्टम, सैटेलाइट्स और पावर ग्रिड्स (Power Grids) को ठप कर सकता है। अंतरिक्ष से ली गई ग्रहण की तस्वीरें इन ‘सोलर फ्लेयर्स’ के उत्पन्न होने की जगहों को चिन्हित करने में मदद करती हैं।
अंतरिक्ष अन्वेषण के नए आयाम
17 फरवरी 2026 का ‘रिंग ऑफ फायर’ हमें इस बात का एहसास कराता है कि हम एक ऐसे युग में जी रहे हैं जहाँ हम न केवल अपनी धरती पर खड़े होकर सितारों को देखते हैं, बल्कि अंतरिक्ष में अपनी आँखें (सैटेलाइट्स) स्थापित करके प्रकृति के इन चमत्कारों को एक बिल्कुल नए परिप्रेक्ष्य से निहार रहे हैं।
यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी (ESA) के Proba-2 द्वारा कैप्चर की गई यह वलयाकार सूर्य ग्रहण की तस्वीरें खगोल विज्ञान और अंतरिक्ष मौसम (Space Weather) अनुसंधान के लिए एक खजाना हैं। यह भारत के आदित्य-L1, NASA के पार्कर सोलर प्रोब (Parker Solar Probe) और ESA के सैटेलाइट्स का सामूहिक प्रयास है जो हमें हमारे निकटतम तारे यानी सूर्य के उन रहस्यों को समझने में सक्षम बना रहा है, जो सदियों से मानव जाति के लिए एक पहेली बने हुए थे।
Annular solar eclipse seen from space by European satellite यह वीडियो आपको 17 फरवरी 2026 को यूरोपीय सैटेलाइट द्वारा अंतरिक्ष से कैप्चर किए गए वलयाकार सूर्य ग्रहण (रिंग ऑफ फायर) का शानदार दृश्य दिखाता है, जिससे आप इस खगोलीय घटना की भव्यता को एकदम स्पष्टता से समझ सकते हैं।
