क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि मुंबई के किसी हलचल भरे और प्रतिष्ठित रेस्टोरेंट की रसोई में गैस की नीली लौ न जल रही हो? भारतीय व्यंजनों की जान—तड़का, तेज़ आंच पर सिकती रोटियां और कड़ाही में खदकता खाना—सब कुछ एलपीजी (LPG) गैस पर निर्भर करता है। लेकिन वर्तमान में, पश्चिम एशिया (West Asia) में चल रहे गंभीर भू-राजनीतिक तनाव, विशेषकर ईरान और इज़राइल के बीच बढ़ते युद्ध के कारण ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला बुरी तरह चरमरा गई है। इसका सबसे सीधा और खौफनाक असर भारत की आर्थिक राजधानी और इसके स्वाद के ठिकानों पर पड़ा है। इस ग्राउंड रिपोर्ट में हम गहराई से विश्लेषण करेंगे कि कैसे मुंबई के रेस्टोरेंट्स में एलपीजी संकट ने शहर के सबसे प्रतिष्ठित और दशकों पुराने भोजनालयों को बिना आग के, यानी इलेक्ट्रिक उपकरणों के सहारे अपना अस्तित्व बचाने की जद्दोजहद करने पर मजबूर कर दिया है।
यह सिर्फ गैस की कमी की कहानी नहीं है; यह कहानी है मेनू में हो रहे बदलावों की, रसोइयों के गिरते मनोबल की, और एक ऐसे उद्योग के संघर्ष की जो मुंबई की भागती-दौड़ती जिंदगी का पेट भरता है।
संकट की जड़: वैश्विक युद्ध और 5 मार्च का वह सरकारी सर्कुलर
इस अभूतपूर्व संकट की शुरुआत अंतरराष्ट्रीय सीमाओं से हुई। कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस के मुख्य परिवहन मार्ग, विशेषकर खार्ग द्वीप (Kharg Island) और होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) के आसपास बढ़ते सैन्य हमलों ने गैस शिपमेंट को रोक दिया है। भारत, जो अपनी एलपीजी आवश्यकताओं के एक बड़े हिस्से के लिए आयात पर निर्भर है, इस झटके से अछूता नहीं रह सका।
स्थिति को नियंत्रित करने के लिए, 5 मार्च 2026 को भारत सरकार के पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने एक आपातकालीन सर्कुलर जारी किया। इस निर्देश के तहत ऑयल मार्केटिंग कंपनियों (OMCs) को आदेश दिया गया कि वे देश में उपलब्ध एलपीजी के सीमित स्टॉक को ‘प्राथमिकता के आधार पर’ केवल घरेलू उपभोक्ताओं (Household Consumers) और अस्पतालों जैसे अति-आवश्यक क्षेत्रों के लिए आरक्षित रखें।
इस नीतिगत निर्णय का सीधा अर्थ था—कमर्शियल 19 किलोग्राम वाले एलपीजी सिलेंडरों की आपूर्ति में भारी कटौती। जो रेस्टोरेंट दिन भर में 10 से 15 सिलेंडर इस्तेमाल करते थे, उन्हें अब मुश्किल से एक या दो सिलेंडर मिल रहे हैं। आइए ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की ग्राउंड रिपोर्ट के आधार पर मुंबई के दो प्रतिष्ठित रेस्टोरेंट्स के किचन के अंदर का हाल जानते हैं।
क्रॉफर्ड मार्केट का ‘होटल सदानंद’: मेनू में कटौती और बिजली का सहारा
क्रॉफर्ड मार्केट के भीड़भाड़ वाले इलाके में स्थित ‘होटल सदानंद’ दशकों से अपने प्रामाणिक दक्षिण भारतीय भोजन—इडली, डोसा, सांभर और स्वादिष्ट थाली—के लिए जाना जाता है। यहाँ हर सुबह ग्राहकों की लंबी कतारें लगती हैं। लेकिन पिछले सोमवार से इस रेस्टोरेंट की रसोई का नज़ारा पूरी तरह बदल गया है।
रेस्टोरेंट का संचालन देखने वाले अभिषेक शेट्टी को जब पता चला कि उन्हें उनके सामान्य 7 सिलेंडरों के कोटे के बजाय सिर्फ 2 सिलेंडर मिलेंगे, तो उनके पैरों तले जमीन खिसक गई। हालांकि, शेट्टी का एक अन्य इलेक्ट्रिकल उपकरणों का व्यवसाय भी है, जिसने उन्हें इस संकट में एक लाइफलाइन दी। उन्होंने तुरंत अपने मैनेजर के साथ बैठकर एक नया मेनू डिज़ाइन किया जो गैस के बजाय बिजली के उपकरणों पर पकाया जा सके।
वर्तमान में मुंबई के रेस्टोरेंट्स में एलपीजी संकट का सबसे जीवंत और संघर्षपूर्ण उदाहरण होटल सदानंद की रसोई में देखा जा सकता है। जहाँ पहले गैस की तेज़ आंच पर बड़े-बड़े बर्तन चढ़े रहते थे, वहीं अब कोने में एक डीप फ्रायर रखा है (जिसका इस्तेमाल आमतौर पर मैकडॉनल्ड्स जैसे फास्ट-फूड चेन में फ्रेंच फ्राइज़ तलने के लिए होता है), जिसमें अब पूरी (Puris) तली जा रही हैं।

धीमी कुकिंग और समय की पाबंदी
रसोई में काम करने वाले 26 वर्षीय शेफ चिंटू दास अब गैस की बजाय एक बड़े इलेक्ट्रिक हॉट प्लेट पर मसाला डोसा बना रहे हैं। पुरानी गैस से चलने वाली इडली बॉयलर की जगह अब एक नए इलेक्ट्रिक इडली स्टीमर ने ले ली है। चाय एक ग्लास-टॉप इंडक्शन स्टोव पर उबल रही है।
लेकिन इस नई व्यवस्था की सबसे बड़ी कीमत ‘रफ्तार’ के रूप में चुकानी पड़ रही है। चिंटू दास बताते हैं, “मैं अब एक साथ चार डोसे नहीं बना सकता। इंडक्शन पर केवल एक या मुश्किल से दो डोसे ही बन पाते हैं।” पुराने स्टीमर में एक बार में 48 इडलियां बनती थीं, जबकि नए इलेक्ट्रिक स्टीमर में केवल 27 बन पा रही हैं।
नतीजतन, अभिषेक शेट्टी को भारी मन से अपने मेनू से मैसूर डोसा, रवा डोसा और उत्तपम जैसे व्यंजनों को अस्थायी रूप से हटाना पड़ा है क्योंकि इन्हें पकाने में बहुत अधिक समय लगता है। जो रसोई टीम पहले सुबह 5 बजे आती थी, वह अब बेस ग्रेवी और सांभर को एडवांस में तैयार करने के लिए रात-रात भर काम कर रही है।
दादर पूर्व का ‘ग्रेट पंजाब’: इलेक्ट्रिक कॉइल पर रेंगती हुई कुकिंग
मुंबई के दादर पूर्व इलाके में स्थित 66 साल पुराना ‘ग्रेट पंजाब’ (Great Punjab) रेस्टोरेंट अपने उत्तर भारतीय व्यंजनों, विशेषकर चने की ग्रेवी, दाल तड़का और बटर चिकन के लिए प्रसिद्ध है। लेकिन आज, इस रेस्टोरेंट के 56 वर्षीय हेड शेफ राम प्रसाद शर्मा अपने करियर में पहली बार गैस चूल्हे के बजाय ‘इलेक्ट्रिक कॉइल स्टोव’ (Electric Coil Stove) पर खाना पकाने को मजबूर हैं।
दोपहर का समय है और शेफ शर्मा स्टाफ के लंच के लिए चने की ग्रेवी बना रहे हैं। वह बताते हैं, “गैस पर उबलने के बाद चने की ग्रेवी बनाने में मुझे 20 से 25 मिनट लगते थे। अब इस कॉइल पर मुझे लगभग दोगुना समय (45-50 मिनट) लग रहा है।”
जब टेकअवे (Takeaway) के लिए वेज बिरयानी और दाल तड़का का ऑर्डर आता है, तो शर्मा फिर से इलेक्ट्रिक कॉइल चालू करते हैं। “यह तभी पकना शुरू होता है जब कॉइल लाल हो जाती है, और इसमें कई मिनट लग जाते हैं,” वह निराशा के साथ कहते हैं।
ग्रेट पंजाब के मालिक गांधी बताते हैं कि जब 5 मार्च को सरकारी सर्कुलर आया था, तब वह थाईलैंड में थे। उन्होंने तुरंत अपने जनरल मैनेजर को इंडक्शन और इलेक्ट्रिक स्टोव खरीदने को कहा था, लेकिन देरी होने के कारण अब बाज़ार में कमर्शियल इलेक्ट्रिक स्टोव की भारी कमी (Stock out) हो गई है।
उद्योग की चेतावनी: 50% से 60% रेस्टोरेंट्स पर मंडरा रहा है तालेबंदी का खतरा
होटल सदानंद और ग्रेट पंजाब कोई अपवाद नहीं हैं; वे मुंबई के हजारों छोटे-बड़े भोजनालयों की वर्तमान स्थिति का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। नेशनल रेस्टोरेंट एसोसिएशन ऑफ इंडिया (NRAI) और आहार (AHAR – Indian Hotel and Restaurant Association) जैसे प्रमुख उद्योग निकायों ने स्थिति को लेकर एक गंभीर ‘रेड अलर्ट’ जारी किया है।
आंकड़े बताते हैं कि मुंबई के रेस्टोरेंट्स में एलपीजी संकट के कारण शहर के लगभग 20% छोटे होटल, ढाबे और रेस्टोरेंट पहले ही आंशिक या पूर्ण रूप से अपने शटर गिरा चुके हैं। घाटकोपर का ‘होटल आनंद’, फोर्ट का ‘पूर्णिमा’ और जैकब सर्कल का ‘होटल फ्री इंडिया’ जैसे कई लोकप्रिय स्थानों ने अस्थायी रूप से अपना काम बंद कर दिया है। माटुंगा के प्रसिद्ध ‘रामाश्रय’ ने अपना मेनू 50% तक कम कर दिया है।
NRAI के अध्यक्ष सागर दरयानी (जो ‘वाओ! मोमो’ के सह-संस्थापक भी हैं) ने चेतावनी दी है कि यदि अगले दो से तीन दिनों में कमर्शियल एलपीजी की आपूर्ति बहाल नहीं की गई, तो कैज़ुअल डाइनिंग, फाइन डाइनिंग और क्लाउड किचन सहित 50% से 60% रेस्टोरेंट्स को पूरी तरह बंद होना पड़ सकता है।
बड़े ब्रांड्स भी हैं लाचार: अक्सर यह माना जाता है कि केवल छोटे ढाबे ही इस संकट से प्रभावित हैं, लेकिन ऐसा नहीं है। बारबेक्यू नेशन, मेनलैंड चाइना, पंजाब ग्रिल और यहां तक कि ताज, आईटीसी और हयात जैसे फाइव-स्टार होटलों की रसोई भी मुख्य रूप से गैस आधारित हाई-फ्लेम कुकिंग के लिए डिज़ाइन की गई है। भारतीय कुज़ीन (Indian Cuisine) में तंदूर और चाइनीज़ कुज़ीन में ‘वोक’ (Wok) को इंडक्शन पर टॉस करना तकनीकी रूप से असंभव है।
कालाबाज़ारी का उदय: 3000 रुपये में बिक रहा है सिलेंडर
अर्थशास्त्र का एक बुनियादी नियम है—जब आपूर्ति कम होती है और मांग चरम पर होती है, तो कालाबाज़ारी (Black Marketing) पनपती है। खाड़ी संकट (Gulf Crisis) के बाद 19 किलो वाले कमर्शियल एलपीजी सिलेंडर की आधिकारिक कीमत लगभग 1,840 रुपये हो गई है।
लेकिन मुंबई, ठाणे और नवी मुंबई के कई होटल मालिकों का आरोप है कि गैस वितरक कृत्रिम कमी पैदा कर रहे हैं। ब्लैक मार्केट (Grey Market) में यही सिलेंडर 3,000 रुपये से लेकर 3,500 रुपये तक में बेचा जा रहा है।
मजबूरी में, रेस्टोरेंट मालिक अपने व्यापार को चालू रखने और अपने कर्मचारियों को दिहाड़ी देने के लिए इस मनमानी कीमत पर गैस खरीदने को विवश हैं। इसका सीधा असर भोजन की गुणवत्ता और मात्रा पर पड़ रहा है। कई स्थानों पर खाने के दामों में 10% से 15% की वृद्धि देखी जा रही है, जो अंततः आम उपभोक्ता की जेब पर भारी पड़ रही है।
‘उज्ज्वला’ और घरेलू गैस का अवैध डायवर्जन
एक और खतरनाक प्रवृत्ति जो सामने आ रही है, वह है घरेलू (14.2 किलो) गैस सिलेंडरों का रेस्टोरेंट्स में अवैध उपयोग (Illegal Divergence)। हालांकि सरकार ने घरेलू आपूर्ति को अबाधित रखने का वादा किया है, लेकिन कमर्शियल गैस की कमी के कारण रेस्टोरेंट मालिक पीछे के रास्ते से ऊंचे दामों पर घरेलू सिलेंडर खरीद रहे हैं, जिससे अंततः आम घरों की आपूर्ति शृंखला भी प्रभावित होने का खतरा बन गया है।

क्या इलेक्ट्रिक कुकिंग और पीएनजी (PNG) इस समस्या का स्थायी समाधान हैं?
विशेषज्ञों का कहना है कि जब तक युद्ध पूरी तरह से समाप्त नहीं हो जाता, तब तक आपूर्ति सामान्य होने में 4 से 8 सप्ताह का समय लग सकता है। ऐसे में मुंबई के रेस्टोरेंट्स में एलपीजी संकट ने उद्योग को वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों, विशेषकर पीएनजी (Piped Natural Gas) और कमर्शियल इंडक्शन कुकटॉप्स (Induction Cooktops) की ओर मुड़ने पर मजबूर कर दिया है, लेकिन यह बदलाव रातों-रात संभव नहीं है।
पीएनजी (PNG) की सीमाएं: महानगर गैस लिमिटेड (MGL) का कहना है कि उनकी पीएनजी आपूर्ति में कोई बाधा नहीं आई है। जिन होटलों में पाइप वाली गैस है, वे बिना किसी परेशानी के चल रहे हैं। लेकिन मुंबई में आज भी 70% से अधिक छोटे और मंझोले रेस्टोरेंट पाइपलाइन नेटवर्क के अभाव या भारी इंस्टॉलेशन लागत के कारण एलपीजी सिलेंडरों पर ही निर्भर हैं। पीएनजी कनेक्शन लेने की प्रक्रिया में महीनों लग जाते हैं, जो इस तत्काल संकट का समाधान नहीं है।
इलेक्ट्रिक कुकिंग में इंफ्रास्ट्रक्चर की बाधा: जैसा कि सागर दरयानी ने बताया, इंडक्शन स्टोव लगाना आसान लग सकता है, लेकिन कमर्शियल इमारतों में इतना ‘इलेक्ट्रिकल लोड’ (Electrical Load Capacity) ही नहीं होता कि 10-15 हाई-पावर कमर्शियल इंडक्शन एक साथ चलाए जा सकें। इससे शॉर्ट-सर्किट और आग लगने का खतरा बढ़ जाता है। इसके अलावा, इलेक्ट्रिक कॉइल पर कुकिंग गैस की तुलना में बहुत अधिक परिवेशी गर्मी (Ambient Heat) पैदा करती है, जिससे किचन का तापमान असहनीय हो जाता है, भले ही उसमें से धुआं न निकलता हो।
आम मुंबईकर, गिग वर्कर्स और रीयल एस्टेट पर प्रभाव
यह संकट केवल उन अमीर लोगों तक सीमित नहीं है जो वीकेंड पर फाइन डाइनिंग के लिए बाहर जाते हैं। मुंबई एक ऐसा शहर है जो ‘स्ट्रीट फूड’ और सस्ते भोजनालयों पर दौड़ता है।
- कार्यबल और छात्र: लाखों प्रवासी मजदूर, कॉर्पोरेट कर्मचारी, और पेइंग गेस्ट (PG) में रहने वाले छात्र अपने दैनिक भोजन के लिए छोटे ढाबों और टिफिन सेवाओं पर निर्भर हैं। मेनू में कटौती और कीमतों में वृद्धि ने उनके बजट को बिगाड़ दिया है।
- गिग इकोनॉमी (Gig Economy): ज़ोमैटो (Zomato) और स्विगी (Swiggy) जैसे प्लेटफार्मों पर काम करने वाले लाखों डिलीवरी पार्टनर्स की आय सीधे रेस्टोरेंट्स के चालू रहने पर निर्भर करती है। 20% रेस्टोरेंट्स के बंद होने का मतलब है ऑर्डर के वॉल्यूम में भारी गिरावट, जिससे इन डिलीवरी पार्टनर्स की रोज़ी-रोटी छिन रही है।
- रीयल एस्टेट पर दबाव: रियल एस्टेट विशेषज्ञों (जैसे क्रेडाई) का मानना है कि ‘फूड एंड बेवरेज’ (F&B) सेक्टर कमर्शियल रियल एस्टेट का एक बड़ा किरायेदार है। रेस्टोरेंट बहुत कम मार्जिन (Thin Margin) पर काम करते हैं। यदि एलपीजी की कमी हफ्तों तक जारी रहती है, तो राजस्व में भारी गिरावट आएगी और कई रेस्टोरेंट मालिक किराया चुकाने में असमर्थ हो जाएंगे। इससे मकान मालिकों के साथ अनुबंध के पुनर्मूल्यांकन (Renegotiation) या बेदखली की नौबत आ सकती है, जैसा कि कोविड-19 महामारी के दौरान देखा गया था।
रेस्टोरेंट्स के लिए सर्वाइवल गाइड (Survival Strategies)
इस अभूतपूर्व स्थिति से निपटने के लिए, आहार (AHAR) और एफएचआरएआई (FHRAI) जैसे निकायों ने रेस्टोरेंट्स के लिए कुछ ‘बेस्ट प्रैक्टिसेज’ (Best Practices) की एडवाइजरी जारी की है:
- नो-कुक और कोल्ड मेनू: सलाद, सैंडविच, कोल्ड कॉफी, लस्सी और ताज़े फलों के जूस जैसे आइटम को प्रमोट करना, जिनमें गैस की बिल्कुल आवश्यकता नहीं होती।
- बैच कुकिंग (Batch Cooking): दिन भर अलग-अलग ऑर्डर पकाने के बजाय, ऑफ-पीक घंटों के दौरान एक ही बार में बेस ग्रेवी, दाल और चावल तैयार कर लेना और उन्हें इंसुलेटेड कंटेनरों में गर्म रखना।
- मेनू को छोटा करना (Menu Rationalization): 60-70 व्यंजनों वाले मेनू को घटाकर शीर्ष 15-20 सबसे अधिक बिकने वाले और कम गैस खपत वाले व्यंजनों तक सीमित करना।
भविष्य की राह और सरकारी हस्तक्षेप की आवश्यकता
भारत दुनिया के सबसे बड़े एलपीजी उपभोक्ताओं में से एक है। हमारी ऊर्जा सुरक्षा में जरा सी भी दरार पूरी अर्थव्यवस्था में ‘डोमिनोज़ इफ़ेक्ट’ (Domino Effect) पैदा कर सकती है। ईरान-इज़राइल युद्ध ने हमें यह कठोर सबक सिखाया है कि हमारी घरेलू खाद्य सुरक्षा और आतिथ्य सत्कार (Hospitality) उद्योग किस हद तक आयातित जीवाश्म ईंधन (Fossil Fuels) पर निर्भर है।
अंततः, मुंबई के रेस्टोरेंट्स में एलपीजी संकट केवल एक व्यावसायिक चुनौती नहीं है, बल्कि यह हमारी वैश्विक निर्भरता और ऊर्जा सुरक्षा की कमजोरियों का एक आईना है। होटल सदानंद के चिंटू दास और ग्रेट पंजाब के शेफ शर्मा जैसे लाखों रसोइए इस उम्मीद में हर दिन अपनी इलेक्ट्रिक कॉइल चालू कर रहे हैं कि जल्द ही उनकी रसोई में गैस की वह नीली लौ फिर से चमकेगी।
सरकार, तेल विपणन कंपनियों (OMCs) और नीति निर्माताओं को यह समझना होगा कि रेस्टोरेंट उद्योग केवल ‘लग्जरी’ नहीं है; यह एक आवश्यक सेवा है जो लाखों लोगों को रोजगार देती है और करोड़ों लोगों का पेट भरती है। कालाबाज़ारी पर सख्त अंकुश लगाना, कमर्शियल सेक्टर के लिए कम से कम 25% ‘सर्वाइवल कोटा’ तय करना और पीएनजी बुनियादी ढांचे को युद्ध स्तर पर विस्तारित करना ही इस संकट का एकमात्र दीर्घकालिक समाधान है। जब तक यह लौ वापस नहीं आती, तब तक मुंबई के रेस्टोरेंट्स अपने जज़्बे और इलेक्ट्रिक हॉट प्लेट्स के सहारे इस तूफ़ान का सामना करने की कोशिश करते रहेंगे।

अंकिता गौतम एक अभिनेत्री, मॉडल और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर हैं। Tez Khabri पर वे मनोरंजन जगत (Entertainment), बॉलीवुड और लाइफस्टाइल से जुड़ी हर छोटी-बड़ी अपडेट साझा करती हैं। अपनी रचनात्मक शैली और सोशल मीडिया पर मजबूत पकड़ के कारण, वे युवाओं के बीच बेहद लोकप्रिय हैं।
