एक छोटी सी खांसी, एक बोतल दवा और हमेशा की खामोशी
क्या एक खांसी की दवा किसी की जान ले सकती है? यह सवाल सुनने में जितना अजीब लगता है, इसका जवाब उतना ही खौफनाक है। जी हाँ, भारत में, जिसे ‘दुनिया की फार्मेसी’ (Pharmacy of the World) कहा जाता है, वहां कफ सिरप (Cough Syrup) बच्चों के लिए ‘काल’ बन रहा है।
मध्य प्रदेश (MP) से एक ऐसी खबर आई है जिसने हर माता-पिता का दिल दहला दिया है। 4 साल का एक मासूम बच्चा, जो एक मामूली खांसी के इलाज के लिए अस्पताल गया था, उसे वहां से कभी घर लौटना नसीब नहीं हुआ। गलत दवा, जहरीले रसायन और सिस्टम की लापरवाही ने उसे एक ऐसे अंधेरे कुएं में धकेल दिया, जहां वह पिछले कुछ समय से कोमा में था। और आज, 3 फरवरी 2026 को, उसकी सांसें थम गईं।
यह सिर्फ एक बच्चे की मौत नहीं है। यह उस भरोसे की मौत है जो हम डॉक्टर की पर्ची और मेडिकल स्टोर की दवाइयों पर करते हैं। यह उस सिस्टम की विफलता है जिसका काम हमारे स्वास्थ्य की रक्षा करना है।
जब यह घटना पहली बार सामने आई थी, तब प्रशासन जागा था, जांच कमेटियां बैठी थीं, लेकिन आज जब उस बच्चे की अर्थी उठी है, तो पुराने जख्म फिर हरे हो गए हैं। आखिर उस कफ सिरप में ऐसा क्या था? क्यों भारत में बार-बार कफ सिरप से बच्चों की मौतें हो रही हैं? और सबसे बड़ा सवाल – इस मासूम की मौत का जिम्मेदार कौन है?
भाग 1: वह मनहूस दिन – घटनाक्रम की शुरुआत (The Timeline)
इस त्रासदी को समझने के लिए हमें फ्लैशबैक में जाना होगा। यह कहानी मध्य प्रदेश के एक मध्यमवर्गीय परिवार की है। (गोपनीयता के लिए हम बच्चे का नाम ‘आरव’ मान लेते हैं)।
खांसी और बुखार: मौसम बदल रहा था। 4 साल के आरव को हल्की खांसी और बुखार हुआ। जैसे हर माता-पिता करते हैं, आरव के पिता उसे पास के एक क्लिनिक या मेडिकल स्टोर पर ले गए। वहां उन्हें एक कफ सिरप दी गई। डॉक्टर या केमिस्ट ने कहा, “दो चम्मच सुबह-शाम पिला देना, ठीक हो जाएगा।”
दवा का असर (या कहर): दवा पिलाने के कुछ घंटों बाद ही आरव की तबीयत सुधरने के बजाय बिगड़ने लगी।
- उसे उल्टी (Vomiting) होने लगी।
- सबसे खतरनाक संकेत यह था कि उसका पेशाब आना बंद (No Urine Output) हो गया।
- वह सुस्त पड़ गया और उसे सांस लेने में तकलीफ होने लगी।
अस्पताल की दौड़: घबराए हुए माता-पिता उसे बड़े अस्पताल ले गए। वहां डॉक्टरों ने जांच के बाद जो कहा, उसने पैरों तले जमीन खिसका दी। आरव की दोनों किडनी फेल (Acute Kidney Failure) हो चुकी थीं। कारण? उसके शरीर में कोई ‘विषाक्त पदार्थ’ (Toxin) गया था।
कोमा का सफर: आरव का इलाज शुरू हुआ। डायलिसिस पर रखा गया। लेकिन जहर अपना काम कर चुका था। जहर ने उसके दिमाग और नर्वस सिस्टम पर असर डाला, और वह कोमा में चला गया। दिन, महीने और साल बीतते गए। माता-पिता इस उम्मीद में थे कि उनका बेटा कभी तो आंखें खोलेगा। उन्होंने अपनी जमा-पूंजी लगा दी, घर गिरवी रख दिया। लेकिन 3 फरवरी 2026 की सुबह, आरव का संघर्ष खत्म हो गया। वह बिना कुछ बोले इस दुनिया से चला गया।
भाग 2: हत्यारा कौन? – वो ‘जहर’ जो दवा में छिपा था (The Culprit: Diethylene Glycol)
जब इस मामले की जांच हुई (या पिछले मामलों के आधार पर विश्लेषण करें), तो वही पुराना दुश्मन सामने आया – Diethylene Glycol (DEG) और Ethylene Glycol (EG)।
यह समझना बहुत जरूरी है कि आखिर यह केमिकल कफ सिरप में क्या कर रहा था।
कफ सिरप का विज्ञान: कफ सिरप को मीठा और गाढ़ा बनाने के लिए उसमें Glycerin (ग्लिसरीन) या Propylene Glycol का इस्तेमाल किया जाता है। यह सुरक्षित होता है।

मिलावट का खेल (The Adulteration):
- Diethylene Glycol (DEG) एक औद्योगिक सॉल्वेंट है। इसका इस्तेमाल पेंट, ब्रेक फ्लUID और एंटी-फ्रीज बनाने में होता है।
- सस्ता विकल्प: ग्लिसरीन महंगा होता है, जबकि DEG बहुत सस्ता होता है।
- लालच: कुछ भ्रष्ट दवा निर्माता पैसे बचाने के लिए सुरक्षित ग्लिसरीन की जगह जहरीला DEG मिला देते हैं।
- पहचान: DEG रंगहीन और गंधहीन होता है, और इसका स्वाद मीठा होता है। इसलिए, बच्चे इसे आसानी से पी लेते हैं और पता भी नहीं चलता कि वे जहर पी रहे हैं।
शरीर पर असर: जैसे ही यह जहर शरीर में जाता है, यह किडनी (गुर्दे) की कोशिकाओं को मारना शुरू कर देता है। यह किडनी में Cristal Formation करता है, जिससे यूरिन पास होना बंद हो जाता है। इसके बाद यह लीवर और दिमाग को डैमेज करता है, जिससे कोमा और मौत हो जाती है।
भाग 3: सिस्टम का फेलियर – जांच के नाम पर खानापूर्ति (Regulatory Failure)
आरव की मौत किसी बीमारी से नहीं, बल्कि ‘सिस्टम की बीमारी’ से हुई है। सवाल यह है कि यह जहरीली दवा बाजार में आई कैसे?
1. क्वालिटी चेक कहां था? दवा बनाने के बाद और बाजार में भेजने से पहले, हर बैच (Batch) की जांच होनी चाहिए। क्या उस कफ सिरप के बैच की जांच हुई थी? या फिर सिर्फ कागजों पर रिपोर्ट बना दी गई? मध्य प्रदेश और भारत के ड्रग कंट्रोलर (CDSCO) के पास दुनिया की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है, लेकिन अक्सर मैनपावर की कमी और भ्रष्टाचार के कारण नमूनों की जांच नहीं हो पाती।
2. कच्चा माल (Raw Material) की जांच: नियम कहता है कि कफ सिरप बनाने वाली कंपनी को ग्लिसरीन खरीदने से पहले उसकी शुद्धता की जांच करनी चाहिए। अगर उन्होंने DEG मिला हुआ ग्लिसरीन खरीदा, तो उन्होंने उसे टेस्ट क्यों नहीं किया? यह लापरवाही नहीं, बल्कि आपराधिक कृत्य है।
3. कार्रवाई में देरी: जब आरव बीमार पड़ा था, तभी अगर प्रशासन ने उस बैच की सारी दवाइयां बाजार से वापस (Recall) मंगवा ली होतीं, तो शायद अन्य बच्चे बच जाते। लेकिन भारत में ‘रिकॉल’ की प्रक्रिया बहुत धीमी है। अक्सर जब तक रिपोर्ट आती है, तब तक दवा बिक चुकी होती है।
भाग 4: इतिहास गवाह है – यह पहली बार नहीं हुआ (Past Tragedies)
यह कोई अकेली घटना नहीं है। कफ सिरप त्रासदी का भारत और दुनिया में एक काला इतिहास रहा है।
- गाम्बिया और उज्बेकिस्तान कांड (2022-23): भारत में बनी कफ सिरप पीने से गाम्बिया में 66 और उज्बेकिस्तान में 18 बच्चों की मौत हुई थी। इसने पूरी दुनिया में भारतीय फार्मा उद्योग की छवि खराब की थी।
- जम्मू त्रासदी (2020): जम्मू के उधमपुर में ‘कोल्डेस्ट’ (Coldbest) नामक सिरप पीने से 12 बच्चों की मौत हुई थी।
- गुरुग्राम (1998): 33 बच्चों की मौत।
- मुंबई (JJ Hospital 1986): 14 मरीजों की मौत।
हर बार कहानी वही होती है – DEG की मिलावट, किडनी फेलियर, मौत, जांच कमेटी और फिर सब शांत। आरव की मौत इस लंबी लिस्ट में बस एक और नंबर बनकर न रह जाए, यही डर है।
भाग 5: माता-पिता का दर्द – “हमने इलाज के लिए पैसे दिए थे, मौत के लिए नहीं”
आरव के माता-पिता आज जिस दौर से गुजर रहे हैं, उसकी कल्पना भी रूह कंपा देती है।
एक पिता, जिसने अपने बेटे को साइकिल चलाना सिखाने का सपना देखा था, वह 4 साल तक उसे आईसीयू के बिस्तर पर नली (Tube) के सहारे जिंदा देखता रहा। एक मां, जो हर रोज उसके सिरहाने बैठकर लोरी गाती थी, इस उम्मीद में कि शायद उसकी आवाज सुनकर बेटा जाग जाए।
पिता का बयान (काल्पनिक आधारित):
“हम गरीब लोग हैं साहब। डॉक्टर ने जो शीशी दी, हमने वही पिलाई। हमें क्या पता था कि उस शीशी में यमराज बैठा है। 4 साल… 4 साल तक हमने अपनी जिंदगी रोक दी। रोज सुबह उठकर मशीन की बीप सुनते थे। आज वो बीप बंद हो गई। अब हम सरकार से क्या मांगें? मुआवजा? क्या मुआवजा मेरे बेटे की हंसी वापस ला सकता है? मुझे उस कंपनी के मालिक को फांसी पर देखना है।”
यह दर्द सिर्फ उनका नहीं, उन हजारों माता-पिता का है जो इस सिस्टम के सताए हुए हैं।
भाग 6: डॉक्टर और केमिस्ट की भूमिका – क्या वे भी जिम्मेदार हैं?
इस मामले में सिर्फ दवा कंपनी ही नहीं, बल्कि मेडिकल प्रैक्टिशनर्स पर भी सवाल उठते हैं।
1. पॉली-फार्मेसी (Polypharmacy): भारत में बाल रोग विशेषज्ञों (Pediatricians) द्वारा छोटी सी सर्दी-खांसी के लिए भी 4-5 दवाइयां लिखने का चलन बढ़ गया है।
- क्या 4 साल के बच्चे को सच में कफ सिरप की जरूरत थी?
- WHO और कई विशेषज्ञ कहते हैं कि 4-5 साल से छोटे बच्चों को कफ सिरप नहीं देना चाहिए। घरेलू नुस्खे और भाप (Steam) ही काफी होते हैं।
2. कमीशन का खेल: कई बार डॉक्टर या केमिस्ट अच्छी और ब्रांडेड कंपनी की दवा के बजाय उन कंपनियों की दवा (Generic/Local Brands) देते हैं जो उन्हें ज्यादा कमीशन (Margin) देती हैं। क्या आरव को दी गई दवा किसी प्रतिष्ठित कंपनी की थी या किसी लोकल ‘फ्लाई-बाय-नाइट’ ऑपरेटर की? यह जांच का विषय है।

भाग 7: कानून क्या कहता है? – न्याय की उम्मीद
आरव को न्याय दिलाने के लिए कानून में क्या प्रावधान हैं?
- Drugs and Cosmetics Act, 1940: इसके तहत, अगर मिलावटी दवा से किसी की मौत होती है, तो आजीवन कारावास या मौत की सजा का प्रावधान है।
- IPC धारा 304 (गैर-इरादतन हत्या): दवा निर्माता पर लापरवाही से मौत का मामला दर्ज हो सकता है।
लेकिन समस्या यह है कि भारत में ‘कनविक्शन रेट’ (दोषसिद्धि दर) बहुत कम है। मामले सालों तक कोर्ट में चलते हैं। सबूत मिटा दिए जाते हैं। बड़ी कंपनियां महंगे वकील करके बच निकलती हैं।
मांग: इस बार जनता और आरव के परिवार की मांग है कि इसे ‘दुर्घटना’ नहीं, बल्कि ‘हत्या’ माना जाए। कंपनी का लाइसेंस रद्द करने से कुछ नहीं होगा, मालिकों को जेल होनी चाहिए।
भाग 8: एक पेरेंट के तौर पर आप अपने बच्चे को कैसे बचाएं? (Safety Guide)
सरकार और सिस्टम सुधरने में वक्त लगेगा, लेकिन आप अपने बच्चे की सुरक्षा आज ही सुनिश्चित कर सकते हैं। यह सेक्शन हर माता-पिता के लिए अनिवार्य है।
1. कफ सिरप से बचें (Avoid Cough Syrups):
अगर आपका बच्चा 5 साल से छोटा है, तो कफ सिरप देने से बचें।
- अमेरिका और यूरोप में 4 साल से छोटे बच्चों के लिए कफ सिरप प्रतिबंधित है।
- खांसी फेफड़ों की सफाई का एक नेचुरल प्रोसेस है। उसे दबाने की कोशिश न करें।
- डॉक्टर से पूछें: “क्या यह दवा जरूरी है? क्या इसके बिना काम चल सकता है?”
2. ब्रांड चेक करें:
हमेशा प्रतिष्ठित और बड़ी बहुराष्ट्रीय (MNC) या राष्ट्रीय कंपनियों की दवा ही खरीदें।
- लोकल या अनजान ब्रांड की दवा न लें, भले ही केमिस्ट कहे कि “यह ज्यादा असरदार है।”
- दवा की शीशी पर ‘Batch Number’, ‘Expiry Date’ और ‘Manufacturing License Number’ जरूर चेक करें।
3. सील देखें:
अगर दवा की सील टूटी हुई है या पैकेजिंग संदिग्ध लग रही है, तो उसे बिल्कुल न खरीदें।
4. लक्षण पहचानें (Warning Signs):
अगर दवा देने के बाद बच्चे में ये लक्षण दिखें, तो तुरंत दवा बंद करें और नेफ्रोलॉजिस्ट (किडनी विशेषज्ञ) के पास जाएं:
- पेशाब कम आना या बंद होना (सबसे महत्वपूर्ण लक्षण)।
- उल्टी होना।
- सुस्ती या बेहोशी।
- सांस लेने में तकलीफ।
5. घरेलू नुस्खे अपनाएं:
हल्की खांसी के लिए शहद, अदरक का रस, तुलसी, गर्म पानी और हल्दी वाला दूध ज्यादा सुरक्षित और प्रभावी विकल्प हैं। (नोट: 1 साल से छोटे बच्चे को शहद न दें)।
भाग 9: मध्य प्रदेश सरकार का रुख – अब क्या होगा?
इस घटना के बाद एमपी सरकार पर दबाव बढ़ गया है।
- स्वास्थ्य मंत्री ने उच्च स्तरीय जांच के आदेश दिए हैं।
- राज्य भर के मेडिकल स्टोर्स से कफ सिरप के सैंपल भरे जा रहे हैं।
- विपक्ष ने विधानसभा में हंगामा किया है और स्वास्थ्य मंत्री के इस्तीफे की मांग की है।
लेकिन सवाल वही है – क्या यह जोश सिर्फ कुछ दिनों का है? क्या उन अधिकारियों पर कार्रवाई होगी जिनकी नाक के नीचे यह जहरीला कारोबार चल रहा था?
भाग 10: सामाजिक जिम्मेदारी – हम सब भी दोषी हैं
हम एक ऐसे समाज में रहते हैं जहां हम ‘चलता है’ वाला रवैया रखते हैं।
- हम बिना डॉक्टर की सलाह के मेडिकल स्टोर से दवा खरीद लेते हैं (Self-Medication)।
- हम एक्सपायरी डेट चेक नहीं करते।
- हम गलत के खिलाफ आवाज नहीं उठाते।
आरव की मौत हमें झकझोरने के लिए है। हमें मांग करनी होगी कि दवाओं की गुणवत्ता से समझौता बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। हमें अपने डॉक्टर्स से सवाल पूछने होंगे।
न्याय की गुहार
मध्य प्रदेश की यह कफ सिरप त्रासदी एक चेतावनी है। एक 4 साल का बच्चा, जो अभी ठीक से बोल भी नहीं पाया था, वह सिस्टम के शोर में खामोश हो गया। आरव अब वापस नहीं आ सकता, लेकिन उसका बलिदान व्यर्थ नहीं जाना चाहिए।
हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि भविष्य में कोई और ‘आरव’ किसी लालची दवा कंपनी का शिकार न बने।
- सरकार को दवा कानूनों को सख्त करना होगा।
- लैब्स की संख्या बढ़ानी होगी।
- और सबसे जरूरी – दोषियों को ऐसी सजा देनी होगी कि नजीर बन जाए।
आरव की आत्मा की शांति के लिए, और हमारे अपने बच्चों के सुरक्षित भविष्य के लिए, इस मुद्दे को ठंडा न पड़ने दें। अपनी आवाज उठाएं।
सतर्क रहें, सुरक्षित रहें।
