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प्रस्तावना: मध्य पूर्व में तीसरे विश्व युद्ध की आहट 5 मार्च 2026—यह वह तारीख है जिसने पूरी दुनिया को एक अनिश्चित और विनाशकारी भविष्य की ओर धकेल दिया है। मध्य पूर्व (Middle East) एक बार फिर धधक रहा है, लेकिन इस बार आग की लपटें इतनी ऊंची हैं कि उनकी तपिश वाशिंगटन से लेकर नई दिल्ली और बीजिंग तक महसूस की जा रही है। ईरान, इजरायल और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच जो तनाव दशकों से सुलग रहा था, वह अब एक पूर्णकालिक और विनाशकारी युद्ध में तब्दील हो चुका है। आसमान में अब पक्षी नहीं, बल्कि रॉकेट, बैलिस्टिक मिसाइलें और घातक आत्मघाती ड्रोन उड़ रहे हैं।

1. विनाश की शुरुआत: अयातुल्ला खामेनेई की मौत और युद्ध का शंखनाद

किसी भी युद्ध का एक ‘फ्लैशपॉइंट’ होता है, एक ऐसी चिंगारी जो बारूद के ढेर में आग लगा देती है। इस वर्तमान युद्ध की चिंगारी शनिवार (28 फरवरी 2026) को तब भड़की जब अमेरिका और इजरायल ने ईरान के सर्वोच्च प्रतिष्ठानों पर एक अचूक और घातक हवाई हमला किया। इस हमले का मुख्य लक्ष्य ईरान का नेतृत्व, उनका मिसाइल शस्त्रागार और विवादास्पद परमाणु कार्यक्रम था।

इस भयंकर बमबारी में 86 वर्षीय अयातुल्ला अली खामेनेई, जो 1989 से ईरान के सर्वोच्च नेता थे और देश की हर कूटनीतिक और सैन्य नीति के सूत्रधार थे, मारे गए। उनके साथ इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) के कई शीर्ष कमांडर भी मारे गए। ईरान के लिए यह केवल एक सैन्य हार नहीं थी, बल्कि यह उनकी अस्मिता, उनकी विचारधारा और उनके इस्लामी गणराज्य के अस्तित्व पर सीधा प्रहार था।

रिपोर्ट्स के अनुसार, खामेनेई की मौत ने ईरान की सड़कों पर मातम और गुस्से का एक ऐसा सैलाब ला दिया जो पहले कभी नहीं देखा गया। 1989 में उनके पूर्ववर्ती अयातुल्ला रुहोल्लाह खुमैनी के अंतिम संस्कार में लाखों लोग शामिल हुए थे, और खामेनेई के लिए भी वैसी ही तैयारियां थीं। लेकिन युद्ध की तीव्रता और लगातार हो रहे हवाई हमलों के कारण ईरान के सरकारी टेलीविजन को यह घोषणा करनी पड़ी कि सर्वोच्च नेता का शोक समारोह और अंतिम संस्कार फिलहाल स्थगित कर दिया गया है। यह अपने आप में ईरान के इतिहास की सबसे अभूतपूर्व घटनाओं में से एक है। अब तक ईरान में 1000 से अधिक लोग मारे जा चुके हैं, और पूरा देश प्रतिशोध की आग में जल रहा है।

2. ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ (Operation Epic Fury) और अमेरिकी रणनीति

इस सैन्य अभियान को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प (Donald Trump) के प्रशासन द्वारा ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ (Operation Epic Fury) नाम दिया गया है। यह नाम ही स्पष्ट करता है कि अमेरिका इस बार किसी सीमित कार्रवाई के मूड में नहीं है, बल्कि वह ईरान की सैन्य और आर्थिक रीढ़ को पूरी तरह से तोड़ने के उद्देश्य से मैदान में उतरा है।

अमेरिका और इजरायल ने स्पष्ट कर दिया है कि उनका लक्ष्य न केवल ईरान के परमाणु ठिकानों को नष्ट करना है, बल्कि “ईरान की सत्ता को उखाड़ फेंकना” (Toppling the government) भी उनके एजेंडे में शामिल हो सकता है। राष्ट्रपति ट्रम्प ने इस युद्ध में अमेरिकी सेना के प्रदर्शन की जमकर तारीफ की है। एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने कहा, “हम युद्ध के मोर्चे पर बहुत अच्छा कर रहे हैं। किसी ने मुझसे पूछा कि 10 के पैमाने पर मैं इसे क्या रेटिंग दूंगा? मैंने कहा लगभग 15।” ट्रम्प का यह अति-आत्मविश्वास भरा बयान दर्शाता है कि वे इस युद्ध को अपने राजनीतिक फायदे और अमेरिकी शक्ति प्रदर्शन के एक बड़े अवसर के रूप में देख रहे हैं।

अमेरिकी घरेलू राजनीति और सीनेट का वोट: हालांकि, अमेरिका के भीतर इस युद्ध को लेकर एकमत नहीं है। अमेरिकी सीनेट में राष्ट्रपति ट्रम्प की सैन्य शक्तियों को सीमित करने के लिए एक ‘वॉर पॉवर्स रेजोल्यूशन’ (War Powers Resolution) लाया गया। डेमोक्रेट्स का तर्क था कि ट्रम्प ने कांग्रेस (अमेरिकी संसद) की मंजूरी के बिना इतना बड़ा युद्ध छेड़ दिया है, जिसकी कोई स्पष्ट रणनीति या ‘एग्जिट प्लान’ नहीं है।

लेकिन रिपब्लिकन पार्टी (GOP) ने एकजुट होकर ट्रम्प का साथ दिया। सीनेट में यह प्रस्ताव 47-53 के अंतर से गिर गया। फॉक्स न्यूज की रिपोर्ट के अनुसार, केवल रिपब्लिकन सीनेटर रैंड पॉल (Rand Paul) ने इस प्रस्ताव के पक्ष में मतदान किया, जबकि जॉन फेटरमैन (Jon Fetterman) एकमात्र डेमोक्रेट थे जिन्होंने पार्टी लाइन पार कर ट्रम्प का समर्थन किया। अमेरिकी जनता में भी इस युद्ध को लेकर गहरा ध्रुवीकरण है—80% रिपब्लिकन इस हमले का समर्थन कर रहे हैं, जबकि लगभग 80% डेमोक्रेट्स इसका विरोध कर रहे हैं। सैन्य पृष्ठभूमि वाले 59% अमेरिकी मतदाता इस युद्ध को सही ठहरा रहे हैं।

ईरान-इजरायल-अमेरिका संघर्ष

3. रॉकेट, मिसाइल और ड्रोन: आसमान से बरसती मौत और ईरान का पलटवार

खामेनेई की मौत के बाद ईरान ने ‘ऑपरेशन ट्रू प्रॉमिस’ (या जो भी उनका जवाबी कोडनेम है) के तहत पूरे मध्य पूर्व में अमेरिका और इजरायल के ठिकानों पर “विशाल मिसाइल हमले” (Massive Missile Strikes) शुरू कर दिए हैं। गुरुवार तड़के, ईरान ने इजरायल के तेल अवीव (Tel Aviv) सहित कई प्रमुख शहरों को निशाना बनाते हुए बैलिस्टिक और क्रूज मिसाइलों की एक नई खेप दागी। सायरन की आवाजें पूरे इजरायल में गूंज रही हैं और लोग बंकरों में छिपने को मजबूर हैं।

ईरान ने केवल इजरायल तक खुद को सीमित नहीं रखा है। उसने अमेरिका की ‘फिफ्थ फ्लीट’ (Fifth Fleet) के मुख्यालय बहरीन (Bahrain) में स्थित अमेरिकी एयरबेस पर भी भारी मिसाइलें दागी हैं। इसके अलावा कुवैत में भी अमेरिकी और मित्र देशों के ठिकानों पर ईरान द्वारा हमले किए जा रहे हैं।

ईरान के पास मध्य पूर्व का सबसे बड़ा और सबसे विविध मिसाइल शस्त्रागार है। इसमें फतेह, गदर, और शहाब-3 जैसी बैलिस्टिक मिसाइलें शामिल हैं जो 2000 किलोमीटर से अधिक की दूरी तय कर सकती हैं। इजरायल का ‘आयरन डोम’ (Iron Dome), ‘डेविड्स स्लिंग’ (David’s Sling) और ‘एरो’ (Arrow) डिफेंस सिस्टम इन मिसाइलों को हवा में ही नष्ट करने के लिए 24 घंटे काम कर रहे हैं। हालांकि कोई तत्काल हताहत की खबर इजरायल से नहीं आई है (इजरायल में लगभग एक दर्जन मौतें रिपोर्ट की गई हैं), लेकिन स्थिति बेहद तनावपूर्ण है।

तुर्की और सऊदी अरब का हवाई क्षेत्र: युद्ध की लपटें अन्य देशों के आसमान तक पहुंच गई हैं। तुर्की के अधिकारियों ने पुष्टि की है कि ईरान से दागी गई एक बैलिस्टिक मिसाइल, जो इराक और सीरिया के रास्ते तुर्की के हवाई क्षेत्र (Turkish Airspace) की ओर बढ़ रही थी, उसे नाटो (NATO) के वायु रक्षा प्रणालियों द्वारा हवा में ही नष्ट कर दिया गया। इसी तरह, सऊदी अरब के रक्षा मंत्रालय ने भी अल-खर्ज (Al-Kharj) शहर के बाहर तीन क्रूज मिसाइलों को सफलतापूर्वक इंटरसेप्ट कर नष्ट करने का दावा किया है। इससे पता चलता है कि यह युद्ध कितनी तेजी से क्षेत्रीय सीमाओं का उल्लंघन कर रहा है।

4. इजरायल का बहुआयामी युद्ध: लेबनान और हिजबुल्लाह पर भीषण प्रहार

इजरायल केवल पूर्व में ईरान से ही नहीं लड़ रहा है, बल्कि उसकी उत्तरी सीमा पर भी घमासान युद्ध छिड़ा हुआ है। ईरान के सबसे मजबूत छद्म संगठन (Proxy Group) ‘हिजबुल्लाह’ (Hezbollah) ने लेबनान से इजरायल पर रॉकेटों की बारिश कर दी है। इसके जवाब में इजरायल ने लेबनान में भारी तबाही मचाई है।

गुरुवार को भोर से पहले ही इजरायल ने लेबनान के दक्षिण बेरूत (South Beirut) में, जो कि हिजबुल्लाह का गढ़ माना जाता है, भीषण हवाई हमले किए। इजरायली सेना ने निवासियों को चेतावनी जारी करने के तुरंत बाद वहां के कई भवनों को मलबे में तब्दील कर दिया। बेरूत के एयरपोर्ट हाईवे पर भी इजरायली स्ट्राइक में तीन लोग मारे गए।

लेबनान के स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार, इस युद्ध के शुरू होने के बाद से अब तक लेबनान में 70 से अधिक लोग मारे जा चुके हैं और 83,000 से अधिक लोग विस्थापित (Displaced) हुए हैं। लेबनान, जो पहले से ही एक भयंकर आर्थिक और राजनीतिक संकट से जूझ रहा था, अब इस युद्ध की आग में पूरी तरह से झुलस रहा है। इजरायल का कहना है कि वह ईरान के ‘अक्ष’ (Axis of Resistance) को पूरी तरह से नष्ट कर देगा, जिसमें हिजबुल्लाह, हमास, और यमन के हूती विद्रोही शामिल हैं। इजरायल ने यह भी दावा किया है कि उसने ईरान की पैरामिलिट्री फोर्स ‘बासीज’ (Basij) से जुड़े भवनों को भी निशाना बनाया है, यह वही बासीज बल है जिसने जनवरी में ईरान में हुए विरोध प्रदर्शनों को बेरहमी से कुचला था।

5. समुद्री संघर्ष: ईरानी युद्धपोत का डूबना और होर्मुज जलडमरूमध्य पर नियंत्रण

यह युद्ध जमीन और आसमान के साथ-साथ समुद्र की गहराइयों में भी लड़ा जा रहा है। टाइम्स ऑफ इंडिया और अमेरिकी रक्षा विभाग के अनुसार, मंगलवार रात हिंद महासागर (Indian Ocean) में एक अमेरिकी पनडुब्बी ने टॉरपीडो दागकर एक ईरानी युद्धपोत को पूरी तरह से डुबा दिया।

अमेरिकी रक्षा सचिव पीट हेगसेथ (Pete Hegseth) ने इस हमले की पुष्टि की है। यह घटना श्रीलंका के तट के पास हुई। श्रीलंकाई नौसेना ने 32 ईरानी नाविकों को बचाया है और 87 शव बरामद किए हैं। यह हमला ईरान के सैन्य मनोबल पर एक बहुत बड़ा आघात है और यह दर्शाता है कि अमेरिका ईरान की नौसैनिक संपत्तियों को दुनिया में कहीं भी खोजकर नष्ट करने के लिए प्रतिबद्ध है।

होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) का संकट: समुद्री मोर्चे पर ईरान का सबसे बड़ा हथियार ‘होर्मुज जलडमरूमध्य’ है। ईरान की एलीट ‘रिवोल्यूशनरी गार्ड्स’ (IRGC) ने बुधवार को दावा किया कि “होर्मुज जलडमरूमध्य पूरी तरह से इस्लामिक रिपब्लिक की नौसेना के नियंत्रण में है।” IRGC ने यह भी धमकी दी है कि “अमेरिकियों की शरारत और छल पूरे क्षेत्र के सैन्य और आर्थिक बुनियादी ढांचे के पतन का कारण बन सकती है।”

होर्मुज वह संकरा समुद्री रास्ता है जहां से दुनिया के कुल तेल व्यापार का लगभग 20% और लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG) का एक बहुत बड़ा हिस्सा गुजरता है। मरीन ट्रैफिक डॉट कॉम (MarineTraffic.com) के अनुसार, इस युद्ध के कारण होर्मुज से गुजरने वाले तेल टैंकरों के ट्रैफिक में युद्ध पूर्व के स्तर की तुलना में 90% की भारी गिरावट आई है। कोई भी शिपिंग कंपनी अपने करोड़ों डॉलर के जहाजों और चालक दल की जान को इस युद्धग्रस्त क्षेत्र में जोखिम में नहीं डालना चाहती।

गुरुवार को एक और बड़ी घटना घटी जब कुवैत के तट के पास लंगर डाले एक तेल टैंकर में “बड़ा विस्फोट” (Large Explosion) हुआ। इस धमाके के कारण फारस की खाड़ी (Persian Gulf) में बड़े पैमाने पर तेल फैल गया है (Oil Spill)। ब्रिटिश समुद्री सुरक्षा एजेंसी (UKMTO) के अनुसार, यह घटना मुबारक अल-कबीर क्षेत्र में हुई। हालांकि टैंकर के चालक दल के सभी सदस्य सुरक्षित हैं, लेकिन प्रत्यक्षदर्शियों ने धमाके के तुरंत बाद एक छोटी नाव को वहां से भागते हुए देखा, जो स्पष्ट रूप से ईरानी ‘फास्ट-अटैक बोट्स’ की ओर इशारा करता है।

6. आर्थिक तबाही और वैश्विक तेल संकट (Global Economic Devastation)

मध्य पूर्व में अस्थिरता का सीधा अर्थ है वैश्विक अर्थव्यवस्था में अस्थिरता। होर्मुज जलडमरूमध्य के बंद होने और फारस की खाड़ी में तेल टैंकरों पर हमलों के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतें आसमान छू रही हैं।

ब्रेंट क्रूड (Brent Crude) के दाम रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंच गए हैं। वॉल स्ट्रीट से लेकर टोक्यो और मुंबई के शेयर बाजारों (Global Stock Markets) में भारी बिकवाली (Bloodbath) देखी जा रही है। निवेशकों को डर है कि यदि तेल की कीमतें इसी तरह बढ़ती रहीं, तो पूरी दुनिया एक भयानक मंदी (Recession) की चपेट में आ जाएगी। पेट्रोल-डीजल की कीमतों में उछाल से परिवहन लागत बढ़ेगी, जिससे हर आवश्यक वस्तु की कीमत में आग लग जाएगी। विकसित देश जो मुद्रास्फीति (Inflation) को कम करने का प्रयास कर रहे थे, उनके लिए यह एक बड़ा झटका है।

7. ईरान में नेतृत्व का संकट: कौन होगा अगला सर्वोच्च नेता? (The Succession Crisis)

खामेनेई की मौत ने ईरान के सामने 1979 की इस्लामी क्रांति (Islamic Revolution) के बाद से अपना सबसे बड़ा राजनीतिक और संवैधानिक संकट खड़ा कर दिया है। 37 वर्षों तक सत्ता पर काबिज रहने वाले खामेनेई की जगह लेना आसान नहीं है। ‘असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स’ (Assembly of Experts) के 88 मौलवी अब एक नए सर्वोच्च नेता का चुनाव करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, संभावित उम्मीदवारों में पश्चिम के साथ टकराव की वकालत करने वाले कट्टरपंथियों (Hard-liners) से लेकर वे सुधारवादी (Reformists) तक शामिल हैं जो कूटनीतिक बातचीत के पक्षधर हैं। हालांकि, सबसे प्रमुख नाम जो उभर कर सामने आ रहा है, वह है खामेनेई के बेटे ‘मोज्तबा खामेनेई’ (Mojtaba Khamenei) का। मोज्तबा का आईआरजीसी और खुफिया एजेंसियों पर गहरा प्रभाव माना जाता है, यद्यपि उन्होंने कभी कोई सार्वजनिक या निर्वाचित पद नहीं संभाला है।

ईरान का न्यायपालिका प्रमुख पहले ही चेतावनी दे चुका है कि इस संकट की घड़ी में “जो भी दुश्मन के साथ किसी भी तरह से सहयोग करेगा, उसे दुश्मन ही माना जाएगा।” यह ईरान के भीतर किसी भी संभावित विद्रोह या विरोध प्रदर्शन को दबाने का एक स्पष्ट संदेश है।

इजरायल के रक्षा मंत्री काट्ज़ (Katz) ने ‘X’ (पूर्व में ट्विटर) पर सीधे शब्दों में चेतावनी दी है कि ईरान का अगला सर्वोच्च नेता यदि इजरायल और अमेरिका को धमकाना जारी रखता है, तो वह भी “उन्मूलन का लक्ष्य” (Target for Elimination) होगा।

8. अंतर्राष्ट्रीय प्रतिक्रियाएं और कूटनीतिक प्रयास (International Reactions)

इस महायुद्ध ने दुनिया को दो गुटों में बांटने का काम किया है।

चीन (China) का रुख: चीन, जो ईरान का सबसे बड़ा तेल खरीदार और एक रणनीतिक साझेदार है, ने इस संघर्ष को शांत करने के लिए एक विशेष दूत भेजने की घोषणा की है। चीनी विदेश मंत्री वांग यी (Wang Yi) ने कहा है कि बीजिंग ईरान की संप्रभुता की रक्षा में उसके साथ खड़ा है और उसने अमेरिका तथा इजरायल से तुरंत अपने हमले रोकने का आग्रह किया है। चीन जानता है कि मध्य पूर्व में युद्ध उसकी अपनी ‘बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव’ (BRI) और ऊर्जा सुरक्षा के लिए बेहद खतरनाक है।

स्पेन (Spain) का विरोध: पश्चिमी देशों में भी दरारें दिख रही हैं। स्पेन ने अमेरिका द्वारा ईरान पर बमबारी के लिए अपनी जमीन पर स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकानों के इस्तेमाल का कड़ा विरोध किया है। हालांकि ट्रम्प प्रशासन ने व्यापारिक प्रतिबंधों (Trade Reprisals) की धमकी दी, जिसके बाद व्हाइट हाउस ने दावा किया कि मैड्रिड सहयोग करने के लिए सहमत हो गया है। लेकिन स्पेनिश विदेश मंत्री जोस मैनुअल अल्बरेस (Jose Manuel Albares) ने स्पष्ट किया कि “ठिकानों और मध्य पूर्व में युद्ध पर स्पेन का रुख बिल्कुल नहीं बदला है।”

पाकिस्तान से अमेरिकी निकासी: इस बीच, अमेरिका ने सुरक्षा जोखिमों को देखते हुए पाकिस्तान में अपने गैर-आपातकालीन कर्मचारियों को कराची और लाहौर वाणिज्य दूतावास (Consulates) छोड़ने का आदेश दिया है। इससे संकेत मिलता है कि युद्ध की आंच दक्षिण एशिया तक फैलने का खतरा है।

9. भारत और दक्षिण एशिया पर प्रभाव (Impact on India)

यद्यपि भारत इस युद्ध में सीधे तौर पर शामिल नहीं है, लेकिन इसके परिणाम नई दिल्ली के लिए बेहद चिंताजनक हैं। टाइम्स ऑफ इंडिया के लाइव अपडेट्स के अनुसार, पश्चिम एशिया के संकट के कारण फारस की खाड़ी में 38 भारतीय वाणिज्यिक जहाज (Indian Ships) फंसे हुए हैं। इससे भी अधिक दुखद खबर यह है कि इस संघर्ष की क्रॉसफायर या किसी हमले में 3 भारतीय नाविकों (Sailors) की मौत हो चुकी है।

भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का लगभग 80% आयात करता है, और इसमें से एक बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से आता है। होर्मुज जलडमरूमध्य का बंद होना भारत की अर्थव्यवस्था के लिए ‘रेड अलर्ट’ है। इसके अतिरिक्त, खाड़ी देशों में लगभग 90 लाख भारतीय काम करते हैं। यदि युद्ध पूरे मध्य पूर्व को अपनी चपेट में ले लेता है, तो भारत को इतिहास का सबसे बड़ा ‘इवैक्युएशन ऑपरेशन’ (निकालने का अभियान) चलाना पड़ सकता है, जो लॉजिस्टिक रूप से एक दुःस्वप्न (Nightmare) होगा।

हिंद महासागर में ईरानी युद्धपोत के डुबाए जाने से भारत के समुद्री प्रभाव क्षेत्र (Backyard) की सुरक्षा पर भी सवाल उठे हैं। भारत ने हमेशा इस क्षेत्र में शांति और ‘नेविगेशन की स्वतंत्रता’ (Freedom of Navigation) की वकालत की है। नई दिल्ली कूटनीतिक रूप से एक बेहद पतली रस्सी पर चल रही है—एक ओर अमेरिका और इजरायल जैसी मजबूत रणनीतिक साझेदारियां हैं, तो दूसरी ओर ईरान जैसा पुराना मित्र और ऊर्जा प्रदाता है।

क्या यह तीसरे विश्व युद्ध की आहट है?

5 मार्च 2026 की यह सुबह दुनिया को यह बताने के लिए काफी है कि हम एक ऐसे युग में प्रवेश कर चुके हैं जहां कोई भी गलती एक वैश्विक तबाही को जन्म दे सकती है। ईरान का प्रतिशोध, अमेरिका की आक्रामकता, इजरायल का अस्तित्व का संघर्ष और इन सबके बीच पिस्ते आम लोग—यह मध्य पूर्व की सबसे डरावनी तस्वीर है।

‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ ने केवल ईरान की सत्ता को ही नहीं हिलाया है, बल्कि उसने वैश्विक व्यवस्था की नींव में ही डायनामाइट लगा दिया है। अब यह देखना है कि क्या अंतर्राष्ट्रीय समुदाय, संयुक्त राष्ट्र और कूटनीतिक प्रयास (जैसे चीन की मध्यस्थता) इस महाविनाश को रोकने में सफल होंगे, या दुनिया होर्मुज जलडमरूमध्य के काले तेल और आसमान से बरसती मिसाइलों की आग में पूरी तरह से भस्म हो जाएगी।

यह केवल ईरान और इजरायल का युद्ध नहीं रह गया है; यह मानव जाति के विवेक, संयम और कूटनीति की सबसे बड़ी परीक्षा है। और फिलहाल, इस परीक्षा में दुनिया बुरी तरह से फेल होती नजर आ रही है। आसमान में जो रॉकेट और ड्रोन उड़ रहे हैं, वे केवल इमारतें नहीं गिरा रहे हैं, वे उस वैश्विक शांति के ढांचे को ध्वस्त कर रहे हैं जिसे द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से बड़ी मुश्किल से खड़ा किया गया था। भविष्य अनिश्चित है, और आने वाले दिन और भी अधिक अंधेरे और खूनी होने की आशंका है।

By Meera Shah

मीरा तेज खबरी (Tez Khabri) के साथ जुड़ी एक समाचार लेखिका हैं। वे सामाजिक मुद्दों, शिक्षा, महिला संबंधित विषयों और जनहित से जुड़ी खबरों पर लेखन करती हैं। मीरा का उद्देश्य पाठकों तक सरल भाषा में सत्यापित, उपयोगी और भरोसेमंद जानकारी पहुंचाना है।

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