NEET दबाव में छात्र ने पिता की हत्या

फरवरी 2026: उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से एक ऐसी खौफनाक और रोंगटे खड़े कर देने वाली वारदात सामने आई है, जिसने पूरे समाज, शिक्षा व्यवस्था और पैरेंटिंग के तरीकों पर एक बड़ा और गंभीर सवालिया निशान लगा दिया है। एक बेटे द्वारा अपने ही पिता की हत्या कर देना कोई आम क्राइम न्यूज़ नहीं है; लेकिन जब इस हत्या के पीछे का कारण संपत्ति का विवाद या कोई पुरानी रंजिश नहीं, बल्कि देश की सबसे कठिन मेडिकल प्रवेश परीक्षा ‘NEET’ (National Eligibility cum Entrance Test) का दबाव हो, तो यह घटना एक राष्ट्रीय चिंता का विषय बन जाती है।

लखनऊ के एक पॉश इलाके में हुई इस वारदात ने हर उस माता-पिता को झकझोर कर रख दिया है, जो अपने बच्चों पर डॉक्टर या इंजीनियर बनने का बेतहाशा दबाव डालते हैं। गूगल न्यूज़ और सोशल मीडिया पर यह मामला ‘NEET Pressure Crime’ के हैशटैग के साथ तेजी से वायरल हो रहा है।

1. खौफनाक रात का मंजर: लखनऊ में क्या हुआ? (The Horrific Night of the Crime)

यह रूह कंपा देने वाली घटना लखनऊ के एक शांत और संभ्रांत आवासीय इलाके की है। पुलिस सूत्रों और एफआईआर (FIR) रिपोर्ट के अनुसार, मृतक (पिता) एक सरकारी विभाग में उच्च पद पर कार्यरत थे और उनका 19 वर्षीय बेटा पिछले दो-तीन सालों से मेडिकल एंट्रेंस एग्जाम (NEET) की तैयारी कर रहा था।

वारदात की रात का घटनाक्रम

  • तीखी बहस और ताने: पड़ोसियों और परिवार के अन्य सदस्यों के बयानों के अनुसार, घटना वाली रात पिता और पुत्र के बीच पढ़ाई और आगामी NEET परीक्षा के मॉक टेस्ट (Mock Test) में आए कम नंबरों को लेकर तीखी बहस हुई थी। पिता लगातार बेटे पर ‘पैसा बर्बाद करने’ और ‘परिवार की नाक कटाने’ का ताना मार रहे थे।
  • गुस्से का खौफनाक अंजाम: लगातार मिल रहे तानों और बरसों से संचित मानसिक दबाव (Mental Trauma) के कारण छात्र अपना आपा खो बैठा। आधी रात के करीब, जब पिता अपने बेडरूम में सो रहे थे, तब अवसाद और गुस्से में अंधे हो चुके बेटे ने घर में रखे एक भारी हथियार (क्राइम सीन के अनुसार क्रिकेट बैट या लोहे की रॉड) से पिता के सिर पर ताबड़तोड़ वार कर दिए।
  • मौके पर ही मौत: वार इतने जोरदार और जानलेवा थे कि पिता की मौके पर ही मौत हो गई। कमरे में खून ही खून फैल गया। वारदात को अंजाम देने के बाद छात्र भागने के बजाय घंटों तक पिता के शव के पास ही सदमे की स्थिति (State of Shock) में बैठा रहा।

2. पुलिस इन्वेस्टिगेशन और गिरफ्तारी: कत्ल का इकबालिया बयान (Police Investigation)

सुबह जब परिवार के अन्य सदस्यों ने बेडरूम का खौफनाक मंजर देखा, तो तुरंत लखनऊ पुलिस कंट्रोल रूम (Dial 112) को सूचना दी गई। डीसीपी (DCP) स्तर के अधिकारियों के साथ फॉरेंसिक टीम (Forensic Team) मौके पर पहुंची।

क्राइम सीन की पड़ताल

  • कोई बाहरी एंट्री नहीं: पुलिस ने सबसे पहले लूटपाट या बाहरी व्यक्ति के प्रवेश के एंगल से जांच की, लेकिन घर के सारे दरवाजे अंदर से बंद थे और कोई कीमती सामान गायब नहीं था।
  • छात्र का बर्ताव: पुलिस को सबसे ज्यादा शक बेटे पर हुआ क्योंकि उसके कपड़ों पर खून के छींटे थे और वह सवालों के जवाब देने की स्थिति में नहीं था। वह बार-बार बस एक ही बात बुदबुदा रहा था— “मैं डॉक्टर नहीं बन सकता… मुझे डॉक्टर नहीं बनना था।”

पुलिस कस्टडी और कबूलनामा

हिरासत में लिए जाने के बाद और मनोवैज्ञानिक विशेषज्ञों (Psychological Experts) की मौजूदगी में जब पुलिस ने पूछताछ की, तो बेटे ने अपना जुर्म कबूल कर लिया। उसका इकबालिया बयान रोंगटे खड़े करने वाला था। उसने पुलिस को बताया, “पापा मुझे इंसान नहीं, एक मशीन समझते थे। पिछले 3 साल से मैंने टीवी नहीं देखा, दोस्तों से बात नहीं की। मेरे मॉक टेस्ट में 600 से कम स्कोर आते थे तो वह मुझे गालियां देते थे। उस रात उन्होंने कहा कि अगर मैं इस बार फेल हुआ तो वह मुझे घर से निकाल देंगे। मेरे दिमाग की नसें फट रही थीं… मुझे कुछ समझ नहीं आया और मैंने उन्हें मार दिया।”

लखनऊ क्राइम: NEET दबाव में छात्र ने पिता की हत्या की, सनसनी

3. कत्ल की असली वजह: महत्वाकांक्षाओं का बोझ और ‘NEET’ का खौफ (The Real Motive)

कानून की नजर में यह हत्या है, जिसकी सजा उम्रकैद या उससे भी कड़ी हो सकती है। लेकिन मनोवैज्ञानिकों और समाजशास्त्रियों की नजर में यह एक ‘सिस्टमैटिक मर्डर’ (Systematic Murder) है, जिसकी पृष्ठभूमि कई सालों से तैयार हो रही थी।

पिता की ‘ट्रॉफी चाइल्ड’ (Trophy Child) सिंड्रोम

आजकल मध्यमवर्गीय परिवारों में बच्चों को एक ‘प्रोजेक्ट’ या ‘ट्रॉफी’ की तरह देखा जाता है। मृतक पिता खुद एक सफल अधिकारी थे और वह अपने समाज, रिश्तेदारों और सहकर्मियों के बीच अपना रुतबा बढ़ाने के लिए बेटे को हर हाल में एक ‘डॉक्टर’ के रूप में देखना चाहते थे। बेटे की अपनी रुचि (Aptitude) क्या है, वह कला, वाणिज्य या किसी अन्य क्षेत्र में जाना चाहता है या नहीं—इस पर कभी विचार नहीं किया गया।

कोचिंग संस्थानों का क्रूर इकोसिस्टम (The Coaching Ecosystem)

छात्र पहले कोटा (Kota) में तैयारी कर रहा था और बाद में लखनऊ लौट आया था। कोचिंग संस्थानों का जो माहौल 2026 में बन चुका है, वह बेहद जहरीला (Toxic) है।

  • रैंकिंग सिस्टम: हर हफ्ते टेस्ट होते हैं और बच्चों के स्कोर के आधार पर उन्हें ‘एलीट’ (Elite) और ‘लूजर’ (Loser) बैचों में बांट दिया जाता है।
  • नींद की कमी और दवाइयां: पढ़ाई के घंटों को बढ़ाने के लिए कई छात्र एंटी-स्लीप पिल्स (Anti-sleep pills) और अत्यधिक कैफीन का सेवन कर रहे थे। इस छात्र की मेडिकल रिपोर्ट में भी भयंकर अनिद्रा (Insomnia) और डिप्रेशन के लक्षण पाए गए हैं।

4. कोटा से लखनऊ तक: डिप्रेशन और आत्महत्याओं का बदलता स्वरूप (Shifting Trends of Tragedy)

अभी तक हम सुनते आए थे कि NEET और JEE के दबाव में छात्र आत्महत्या (Suicide) कर लेते हैं। कोटा (राजस्थान) से अक्सर छात्रों के पंखे से लटकने या बिल्डिंग से कूदने की खौफनाक खबरें आती रहती हैं। लेकिन लखनऊ की यह घटना एक नए और बेहद खतरनाक मनोवैज्ञानिक शिफ्ट (Psychological Shift) की ओर इशारा कर रही है।

‘सेल्फ-हार्म’ (Self-Harm) से ‘वायलेंस’ (Violence) तक का सफर

जब एक किशोर (Teenager) का मानसिक स्वास्थ्य पूरी तरह से चरमरा जाता है, तो उसका गुस्सा या तो खुद पर निकलता है (आत्महत्या) या फिर उस व्यक्ति पर निकलता है जो उस दबाव का मुख्य स्रोत होता है (हत्या)। मनोचिकित्सकों के अनुसार, इस छात्र के मन में पिता के प्रति एक गहरी नफरत (Deep-seated resentment) घर कर गई थी। उसे लगने लगा था कि उसके जीवन की हर खुशी, उसकी आजादी और उसकी पहचान को उसके ही पिता ने ‘NEET’ नाम के एक दानव के सामने बलि चढ़ा दिया है। यह कत्ल अचानक नहीं हुआ; यह सालों तक दबाए गए गुस्से (Suppressed Anger) का ज्वालामुखीय विस्फोट था।

5. मनोचिकित्सकों (Psychiatrists) की राय: ‘रेड फ्लैग्स’ (Red Flags) जिन्हें अनदेखा किया गया

इस केस की स्टडी कर रहे प्रमुख क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट्स का मानना है कि हत्या से पहले छात्र ने मानसिक टूटन के कई स्पष्ट संकेत (Red Flags) दिए होंगे, जिन्हें परिवार ने पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया।

  • अत्यधिक चिड़चिड़ापन और अलगाव: छात्र ने परिवार और बाहरी दुनिया से पूरी तरह कट ऑफ कर लिया था। वह किसी से बात नहीं करता था।
  • भूख और नींद में बदलाव: तनाव के कारण उसका वजन कम हो रहा था और वह रातों को जागकर छत पर या कमरे में चक्कर लगाता रहता था।
  • मौन विद्रोह (Silent Rebellion): पिता की डांट पर कोई प्रतिक्रिया न देना और शून्य में घूरते रहना एक बहुत बड़ा संकेत है कि दिमाग शटडाउन (Shutdown) की स्थिति में जा चुका है।

विशेषज्ञों का कहना है कि अगर समय रहते उसे किसी काउंसलर या थेरेपिस्ट (Therapist) के पास ले जाया गया होता, और उसे यह अहसास दिलाया जाता कि “नीट ही जीवन का अंत नहीं है”, तो आज न पिता की जान जाती और न ही बेटे का भविष्य जेल की सलाखों के पीछे खत्म होता।

6. शिक्षा प्रणाली और मेडिकल एंट्रेंस का ‘अंधाधुंध रेस’ (The Blind Race of the Education System)

इस घटना के लिए केवल पिता या वह छात्र जिम्मेदार नहीं है। भारत की दोषपूर्ण शिक्षा प्रणाली भी उतनी ही दोषी है। 2026 तक, NEET परीक्षा में बैठने वाले छात्रों की संख्या लगभग 25 से 30 लाख तक पहुंच चुकी है, जबकि सरकारी मेडिकल कॉलेजों में सीटें मात्र कुछ हजारों में हैं।

  • सफलता का पैमाना केवल ‘सरकारी सीट’: समाज ने यह तय कर दिया है कि अगर आपको सरकारी मेडिकल कॉलेज में सीट नहीं मिली, तो आप जीवन में असफल हैं।
  • करोड़ों का कोचिंग व्यापार: कोचिंग माफिया अभिभावकों के दिमाग में यह भर देते हैं कि अगर बच्चा 8वीं क्लास से ही फाउंडेशन कोर्स (Foundation Course) नहीं करेगा, तो वह रेस से बाहर हो जाएगा। इसी ‘फियर ऑफ मिसिंग आउट’ (FOMO) का शिकार होकर माता-पिता बच्चों का बचपन छीन लेते हैं।

7. पैरेंटिंग का बदलता परिदृश्य: ‘हेलीकॉप्टर पैरेंटिंग’ का घातक परिणाम (Helicopter Parenting)

लखनऊ की यह वारदात भारत के हर घर के लिए एक बहुत बड़ा सबक है। आज के समय में माता-पिता ‘हेलीकॉप्टर पैरेंट्स’ बन गए हैं—जो 24 घंटे अपने बच्चों के सिर पर मंडराते रहते हैं, उनके हर फैसले को कंट्रोल करते हैं और उनकी असफलताओं को अपनी व्यक्तिगत हार मान लेते हैं।

अभिभावकों के लिए 5 सख्त लेकिन जरूरी सबक:

  1. बच्चे का एप्टीट्यूड (Aptitude) पहचानें: यह जरूरी नहीं कि एक डॉक्टर का बेटा डॉक्टर ही बने। बच्चों की रुचि और उनकी मानसिक क्षमता को परखने के लिए करियर काउंसलिंग करवाएं।
  2. सफलता को अंकों से न तौलें: मॉक टेस्ट के नंबर जीवन का सर्टिफिकेट नहीं हैं। कम नंबर आने पर डांटने के बजाय यह पूछें कि “बेटा, तुम्हें कहां परेशानी आ रही है?”
  3. कम्युनिकेशन गैप (Communication Gap) खत्म करें: बच्चों को इतना डरा कर न रखें कि वे अपने मन की बात, अपना डर और अपनी असफलताएं आपसे साझा करने में घबराएं।
  4. प्लान ‘B’ हमेशा तैयार रखें: बच्चों को बताएं कि अगर NEET क्लीयर नहीं हुआ, तो जीवन खत्म नहीं हो जाएगा। बायोटेक्नोलॉजी, जर्नलिज्म, लॉ, आर्ट्स—दुनिया में हजारों ऐसे बेहतरीन करियर हैं जहां वे शीर्ष पर पहुंच सकते हैं।
  5. मानसिक स्वास्थ्य (Mental Health) पर निवेश करें: महंगी किताबों और कोचिंग की फीस भरने से ज्यादा जरूरी है बच्चे के मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान देना। अगर वह उदास या तनाव में है, तो उसे मनोरोग विशेषज्ञ के पास ले जाने में शर्म न करें।

8. कानूनी और सामाजिक : अब आगे क्या? (The Way Forward)

लखनऊ का यह मामला अब न्यायपालिका के हाथों में है। अदालत सबूतों और गवाहों के आधार पर छात्र को सजा सुनाएगी। हालांकि, बचाव पक्ष (Defense) के वकील निश्चित तौर पर इसे ‘अस्थायी विक्षिप्तता’ (Temporary Insanity) और ‘चरम मानसिक उकसावे’ (Extreme Provocation) का मामला बताकर सजा कम कराने की कोशिश करेंगे।

लेकिन, असली फैसला तो समाज की अदालत में होना है। जब तक हम ‘डॉक्टर-इंजीनियर’ की इस जानलेवा रेस से बाहर निकलकर बच्चों को ‘अच्छा इंसान’ और मानसिक रूप से ‘स्वस्थ नागरिक’ बनाने पर ध्यान केंद्रित नहीं करेंगे, तब तक ऐसी डरावनी वारदातें समाज का चेहरा दागदार करती रहेंगी।

यह घटना एक पिता की दुखद मौत और एक बेटे के बर्बाद हुए भविष्य की कहानी है, लेकिन सबसे बढ़कर, यह हमारी ‘परफेक्ट दिखने वाली’ सामाजिक संरचना के मुंह पर एक करारा तमाचा है। हमें तय करना होगा कि हमें घर में मेडिकल की किताबें रटने वाली ‘मशीनें’ चाहिए या मुस्कुराते, खेलते और स्वस्थ दिमाग वाले हमारे ‘बच्चे’।

By Vivan Verma

विवान तेज खबरी (Tez Khabri) के समाचार रिपोर्टर हैं, जो ब्रेकिंग न्यूज़ और राष्ट्रीय स्तर की महत्वपूर्ण खबरों को कवर करते हैं। विवान तथ्यात्मक रिपोर्टिंग और तेज अपडेट के लिए जाने जाते हैं और प्रशासनिक व जनहित से जुड़े मामलों पर नियमित लेखन करते हैं।

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