किश्तवाड़ मुठभेड़

आतंक पर प्रहार और चिनाब घाटी में सुरक्षा का संकल्प

जम्मू-कश्मीर में शांति और स्थिरता को बाधित करने के लिए सीमा पार से रची जाने वाली साजिशें कोई नई बात नहीं हैं। लेकिन जब भी आतंकवादियों ने अपनी नापाक हरकतों को अंजाम देने की कोशिश की है, भारतीय सुरक्षा बलों ने उन्हें मुंहतोड़ जवाब दिया है। 22 फरवरी 2026 का दिन भारतीय सेना, जम्मू-कश्मीर पुलिस (JKP) और केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF) के लिए एक ऐसी ही बड़ी रणनीतिक जीत का गवाह बना।

किश्तवाड़ जिले के दुर्गम चतरू (Chatroo) वन क्षेत्र में चले एक बेहद जटिल और सघन अभियान में सुरक्षा बलों ने पाकिस्तान स्थित आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद (JeM) के दो खूंखार आतंकवादियों को मार गिराया है। यह सफलता केवल दो आतंकियों के खात्मे तक सीमित नहीं है, बल्कि यह ‘ऑपरेशन त्राशी-I’ (Operation Trashi-I) के तहत पिछले एक महीने से चल रहे उस महा-अभियान का अहम पड़ाव है, जिसका उद्देश्य चिनाब घाटी को आतंक-मुक्त करना है।

1. 22 फरवरी 2026: मुठभेड़ का ग्राउंड ज़ीरो और घटनाक्रम की टाइमलाइन

कोई भी सफल सैन्य अभियान अचानक नहीं होता; इसके पीछे सटीक खुफिया जानकारी और अचूक योजना (Tactical Precision) होती है। किश्तवाड़ के पासरकुट (Passerkut) इलाके में हुई यह मुठभेड़ इसका उत्कृष्ट उदाहरण है।

  • खुफिया इनपुट (Intelligence Gathering): जम्मू-कश्मीर पुलिस, इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) और सेना के अपने खुफिया सूत्रों से पक्की जानकारी मिली थी कि चतरू बेल्ट के जंगलों में कुछ विदेशी आतंकी छिपे हुए हैं।
  • घेराबंदी (Cordon and Search): जानकारी के आधार पर, सेना की व्हाइट नाइट कॉर्प्स (16 Corps) के तहत आने वाली ‘सीआईएफ डेल्टा’ (CIF Delta) टुकड़ी ने पुलिस और CRPF के साथ मिलकर पूरे इलाके की घेराबंदी शुरू की।
  • आमना-सामना (The Firefight): रविवार सुबह लगभग 10:30 से 11:00 बजे के बीच, आतंकवादियों की लोकेशन को ट्रैक कर लिया गया। ये आतंकी एक पहाड़ी की तलहटी में बने एक कच्चे (मिट्टी के) घर में छिपे हुए थे।
  • कार्रवाई (Neutralization): जब सुरक्षा बल घर के करीब पहुंचे, तो बौखलाए आतंकियों ने अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी। भारतीय जवानों ने “असीम तालमेल और दृढ़ आक्रामकता” (Seamless synergy and resolute aggression) का परिचय देते हुए जवाबी कार्रवाई की और दोनों आतंकवादियों को वहीं ढेर कर दिया।
Kishtwar Encounter

2. क्या है ‘ऑपरेशन त्राशी-I’ (Operation Trashi-I)?

किश्तवाड़ के इस एनकाउंटर को पूरी तरह समझने के लिए ‘ऑपरेशन त्राशी-I’ की पृष्ठभूमि को समझना आवश्यक है। यह कोई एक दिन का ऑपरेशन नहीं है, बल्कि यह एक ‘सतत युद्ध’ (Ongoing Campaign) है।

  • जनवरी 2026 की घटना: इस ऑपरेशन की शुरुआत मुख्य रूप से तब तेज़ हुई जब 18 जनवरी 2026 को इसी चतरू वन क्षेत्र में आतंकियों ने घात लगाकर हमला किया था। उस हमले में सेना के एक हवलदार (पैरा कमांडो) वीरगति को प्राप्त हुए थे और अन्य जवान घायल हुए थे। इसके बाद से ही सुरक्षा बलों ने आतंकियों को उनके बिलों से निकालकर मारने की कसम खाई थी।
  • फरवरी के शुरुआती दिन: सेना के लगातार दबाव के कारण आतंकी एक जगह से दूसरी जगह भागने को मजबूर हुए। 4 फरवरी को भी दिच्छर (Dichhar) इलाके में एक आतंकी मारा गया था।
  • लक्ष्य: इस ऑपरेशन का मुख्य उद्देश्य किश्तवाड़, डोडा और भद्रवाह के ऊंचाई वाले जंगली इलाकों में छिपे विदेशी (पाकिस्तानी) आतंकियों के उस पूरे मॉड्यूल को नष्ट करना है, जो पीर पंजाल के दक्षिण में अपनी जड़ें जमाने की कोशिश कर रहे थे।

3. जैश-ए-मोहम्मद और खूंखार कमांडर ‘सैफुल्ला’ का अंत

इस मुठभेड़ की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक जैश-ए-मोहम्मद के शीर्ष कमांडर ‘सैफुल्ला’ का मारा जाना माना जा रहा है।

  • सैफुल्ला कौन था? सैफुल्ला जम्मू-कश्मीर में सबसे अधिक वांछित (Most Wanted) आतंकवादियों में से एक था। वह पिछले कुछ वर्षों से इस क्षेत्र में सक्रिय था और सुरक्षा बलों पर हुए कई हमलों का मास्टरमाइंड था। वह पहले भी कई बार सर्च ऑपरेशनों के दौरान घने जंगलों और खराब मौसम का फायदा उठाकर भाग निकलने में सफल रहा था।
  • पाकिस्तानी कनेक्शन: मारे गए दोनों आतंकी पाकिस्तानी नागरिक थे। यह स्पष्ट करता है कि सीमा पार से घुसपैठ करके आए इन आतंकवादियों को स्थानीय स्तर पर अशांति फैलाने का सीधा जिम्मा सौंपा गया था।
  • हथियारों की बरामदगी: मुठभेड़ स्थल से दो AK-47 राइफलें और बड़ी मात्रा में ‘वॉर-लाइक स्टोर्स’ (गोला-बारूद, ग्रेनेड और अन्य रसद) बरामद किए गए हैं। यह जखीरा साबित करता है कि वे किसी बड़े आतंकी हमले की फिराक में थे।

4. किश्तवाड़ और चतरू (Chatroo) बेल्ट का भौगोलिक और सामरिक महत्व

किश्तवाड़ जिला चिनाब घाटी का हिस्सा है और यह अपनी अत्यंत कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के लिए जाना जाता है। आतंकवादी अक्सर कश्मीर घाटी के मैदानी इलाकों से बचकर इन दुर्गम जंगलों को अपनी शरणस्थली (Safe Haven) बनाते हैं।

  1. बर्फ से ढके पहाड़ और प्राकृतिक गुफाएं: चतरू का इलाका ऊंची पहाड़ियों और घने देवदार के जंगलों से घिरा है। सर्दियों में यहां भारी बर्फबारी होती है। प्राकृतिक गुफाएं और मिट्टी के घर आतंकियों को छिपने के लिए आदर्श स्थान प्रदान करते हैं।
  2. रणनीतिक मार्ग (Transit Route): ऐतिहासिक रूप से, आतंकवादी किश्तवाड़ के जंगलों का उपयोग दक्षिण कश्मीर (अनंतनाग/कुलगाम) और जम्मू संभाग (डोडा/उधमपुर) के बीच आने-जाने के लिए एक ‘ट्रांजिट रूट’ के रूप में करते रहे हैं। यहां नियंत्रण स्थापित करना सेना के लिए कश्मीर और जम्मू दोनों की सुरक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण है।
  3. कम्यूनिकेशन ब्लैकआउट: इन सुदूर इलाकों में मोबाइल नेटवर्क बहुत कमजोर होता है, जिससे आतंकियों के लिए स्थानीय ओवरग्राउंड वर्कर्स (OGWs) के बिना टिकना मुश्किल हो जाता है, लेकिन साथ ही सुरक्षा बलों को भी खुफिया जानकारी जुटाने में भारी मशक्कत करनी पड़ती है।
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5. ‘सीमलेस सिनर्जी’: सेना, JKP और CRPF का अचूक समन्वय

आतंकवाद विरोधी अभियानों में सफलता केवल हथियारों से नहीं, बल्कि विभिन्न एजेंसियों के बीच तालमेल (Synergy) से मिलती है।

  • जम्मू-कश्मीर पुलिस (JKP): JKP और उसका स्पेशल ऑपरेशंस ग्रुप (SOG) स्थानीय इंटेलिजेंस का मुख्य स्रोत होते हैं। उन्हें गांव-गांव की जानकारी और मानवीय खुफिया (Human Intelligence – HUMINT) तंत्र में महारत हासिल है।
  • भारतीय सेना (White Knight Corps): ‘व्हाइट नाइट कॉर्प्स’ के पैरा कमांडोज और राष्ट्रीय राइफल्स (RR) के जवान अपनी आक्रामक रणनीति, कॉम्बैट स्किल्स और दुर्गम इलाकों में ऑपरेशन को अंजाम देने की विशेषज्ञता के लिए जाने जाते हैं।
  • CRPF: केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल बाहरी घेरा (Outer Cordon) स्थापित करने और कानून-व्यवस्था बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, ताकि कोई आतंकी घेरा तोड़कर न भाग सके।

इस ऑपरेशन में इन तीनों बलों ने जिस तरह से एक यूनिट के रूप में काम किया, उसने आतंकवादियों को संभलने का एक भी मौका नहीं दिया।

6. शहरी बनाम वन क्षेत्र की मुठभेड़ (एक तुलनात्मक विश्लेषण)

अक्सर हम कश्मीर के श्रीनगर या पुलवामा में होने वाले एनकाउंटर्स की खबरें सुनते हैं, जो किश्तवाड़ जैसे वन क्षेत्रों के एनकाउंटर से बिल्कुल अलग होते हैं। नीचे दी गई तालिका इन दोनों के बीच के अंतर को स्पष्ट करती है:

युद्ध का पहलूशहरी क्षेत्र (Urban Warfare)वन/पहाड़ी क्षेत्र (Jungle Warfare)
भौगोलिक स्थितिघनी आबादी वाले मोहल्ले और कंक्रीट के घर।ऊंचे पहाड़, घने पेड़, बर्फ और खराब मौसम।
नागरिकों का जोखिम (Collateral Damage)बहुत अधिक। नागरिकों को सुरक्षित बाहर निकालना पहली प्राथमिकता होती है।बहुत कम। मुठभेड़ अक्सर बस्तियों से दूर पहाड़ों या प्राकृतिक गुफाओं में होती है।
लॉजिस्टिक्स और विजिबिलिटीबैकअप और रसद जल्दी पहुंचती है। ड्रोन से नज़र रखना आसान।विजिबिलिटी कम होती है। भारी हथियारों को पैदल पहाड़ों पर चढ़ाना पड़ता है।
ऑपरेशन की अवधिआमतौर पर कुछ घंटों या एक दिन में समाप्त।दिनों या हफ्तों तक चल सकता है (जैसे ऑपरेशन त्राशी-I)।

7. सीमा पार से प्रायोजित आतंकवाद (Cross-border Terrorism) और भविष्य की चुनौतियां

किश्तवाड़ की यह घटना एक बार फिर इस कड़वे सच को उजागर करती है कि पाकिस्तान स्थित आतंकी आका (Handlers) अभी भी जम्मू-कश्मीर में शांति को अस्थिर करने के अपने एजेंडे से पीछे नहीं हटे हैं।

Kishtwar Encounter
  • रणनीति में बदलाव: हाल के महीनों में आतंकियों ने कश्मीर घाटी में भारी सुरक्षा तैनाती से बचते हुए, जम्मू संभाग (पुंछ, राजौरी, रियासी, डोडा और किश्तवाड़) के पहाड़ी इलाकों को निशाना बनाना शुरू किया है। J&K Kishtwar Encounter: Security Forces Re-engage Jaish Terrorists.
  • प्रॉपर्टी कुर्की (Attachment of Property): आतंकवाद से लड़ने के लिए प्रशासन केवल गोलियों का इस्तेमाल नहीं कर रहा है, बल्कि उनके वित्तीय ढांचे (Terror Financing) पर भी प्रहार कर रहा है। हाल ही में बडगाम पुलिस ने गुलाम नबी नजार जैसे आतंकी सहयोगियों की संपत्तियों को कुर्क किया है, जो इस बात का स्पष्ट संदेश है कि राष्ट्र-विरोधी गतिविधियों में शामिल होने वालों को बख्शा नहीं जाएगा।

शांति स्थापना की दिशा में एक और मजबूत कदम

किश्तवाड़ के चतरू वन क्षेत्र में रविवार, 22 फरवरी 2026 को मिली यह सफलता भारतीय सुरक्षा बलों के अदम्य साहस और दृढ़ इच्छाशक्ति का परिचायक है। जैश-ए-मोहम्मद के दो पाकिस्तानी आतंकियों (विशेषकर कमांडर सैफुल्ला) के सफाए से न केवल उस इलाके में आतंक की एक बड़ी साज़िश को नाकाम किया गया है, बल्कि हमारे उन वीर जवानों की शहादत का भी बदला लिया गया है जिन्होंने मातृभूमि की रक्षा में अपने प्राण न्योछावर कर दिए थे।

हालांकि ‘ऑपरेशन त्राशी-I’ अभी भी जारी है और सुरक्षा बल इलाके में किसी भी अन्य संभावित खतरे को नष्ट करने के लिए सघन तलाशी अभियान चला रहे हैं। जब तक सीमा पार से आतंकवाद की फैक्ट्रियां चलती रहेंगी, तब तक चुनौतियां बनी रहेंगी, लेकिन हमारी सेना की यह ‘टैक्टिकल प्रिसिजन’ (रणनीतिक सटीकता) यह आश्वस्त करती है कि घाटी में शांति और सुरक्षा से समझौता करने वालों के लिए अब कोई सुरक्षित पनाहगाह (Sanctuary) नहीं बची है।

By Vivan Verma

विवान तेज खबरी (Tez Khabri) के समाचार रिपोर्टर हैं, जो ब्रेकिंग न्यूज़ और राष्ट्रीय स्तर की महत्वपूर्ण खबरों को कवर करते हैं। विवान तथ्यात्मक रिपोर्टिंग और तेज अपडेट के लिए जाने जाते हैं और प्रशासनिक व जनहित से जुड़े मामलों पर नियमित लेखन करते हैं।

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