श्रीनगर/नई दिल्ली, 2 मार्च 2026: मध्य पूर्व (Middle East) में अमेरिका और इज़रायल द्वारा किए गए ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ के तहत ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई (Ayatollah Ali Khamenei) की हत्या ने पूरी दुनिया की कूटनीति को हिलाकर रख दिया है। लेकिन, इस अंतरराष्ट्रीय महा-विस्फोट की गूंज और तपिश हजारों किलोमीटर दूर भारत के ‘धरती के स्वर्ग’ यानी कश्मीर घाटी में सबसे अधिक महसूस की जा रही है।
रविवार सुबह से ही श्रीनगर और उसके आसपास के शिया बहुल इलाकों में भारी रोष, दुख और गुस्से का माहौल है। अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम के कारण घाटी की कानून-व्यवस्था न बिगड़े, इसके लिए जम्मू-कश्मीर प्रशासन और सुरक्षा बलों ने युद्ध स्तर पर एहतियाती कदम उठाए हैं। वर्तमान में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मीडिया में बस एक ही ब्रेकिंग न्यूज़ सबसे ज्यादा सुर्खियां बटोर रही है— कश्मीर अलर्ट: ईरान के सुप्रीम लीडर की मौत के बाद श्रीनगर में लाल चौक सील, इंटरनेट बंद।
1. ग्राउंड ज़ीरो श्रीनगर: लाल चौक सील और शहर में अघोषित कर्फ्यू
जब हम कहते हैं कि कश्मीर अलर्ट: ईरान के सुप्रीम लीडर की मौत के बाद श्रीनगर में लाल चौक सील, इंटरनेट बंद, तो इसका सबसे डरावना और वास्तविक दृश्य श्रीनगर के ऐतिहासिक ‘लाल चौक’ (Lal Chowk) पर देखने को मिलता है। लाल चौक, जो कश्मीर का व्यावसायिक और राजनीतिक हृदय माना जाता है, आज पूरी तरह से छावनी में तब्दील हो चुका है।
- व्यापारिक गतिविधियों पर ब्रेक: रेजीडेंसी रोड, मौलाना आज़ाद रोड और पोलो व्यू मार्केट की सभी दुकानें, शॉपिंग मॉल्स और व्यापारिक प्रतिष्ठान पूरी तरह से बंद करा दिए गए हैं। सड़कों पर सन्नाटा पसरा है, जिसे केवल सुरक्षा बलों के बख्तरबंद वाहनों (Armored Vehicles) के सायरन ही चीर रहे हैं।
- बैरिकेडिंग और कॉन्सर्टिना वायर्स: श्रीनगर को कई सुरक्षा जोन्स में बांट दिया गया है। लाल चौक की ओर जाने वाले सभी मुख्य मार्गों पर भारी लोहे के बैरिकेड्स और कंटीले तार (Concertina coils) बिछा दिए गए हैं। किसी भी नागरिक या निजी वाहन को इस ‘नो-गो ज़ोन’ (No-Go Zone) में प्रवेश करने की अनुमति नहीं है।
- धारा 144 (Section 144) लागू: पूरी कश्मीर घाटी में एहतियात के तौर पर धारा 144 लागू कर दी गई है। एक साथ चार या उससे अधिक लोगों के इकट्ठा होने, जुलूस निकालने या किसी भी प्रकार के सार्वजनिक प्रदर्शन पर सख्त पाबंदी लगा दी गई है।
2. डिजिटल ब्लैकआउट: इंटरनेट और संचार सेवाओं पर पूर्ण प्रतिबंध
आधुनिक दौर में किसी भी विरोध प्रदर्शन को भड़काने या अफवाहें फैलाने का सबसे बड़ा हथियार सोशल मीडिया होता है। इसी खतरे को भांपते हुए प्रशासन ने घाटी में ‘डिजिटल ब्लैकआउट’ कर दिया है।
- मोबाइल इंटरनेट सस्पेंड: श्रीनगर, बडगाम, बांदीपोरा, पट्टन और बारामूला सहित पूरी घाटी में 4G और 5G मोबाइल इंटरनेट सेवाओं को अनिश्चित काल के लिए बंद कर दिया गया है।
- सोशल मीडिया पर साइबर नज़र: व्हाट्सएप (WhatsApp), एक्स (X – पूर्व में ट्विटर), टेलीग्राम (Telegram) और फेसबुक जैसी साइट्स पर ईरान से आने वाले भड़काऊ वीडियो और अमेरिका-विरोधी संदेशों को कश्मीर में वायरल होने से रोकने के लिए यह कदम उठाया गया है।
- ब्रॉडबैंड सेवाओं पर भी असर: हालांकि कुछ इलाकों में फिक्स्ड लाइन ब्रॉडबैंड काम कर रहा है, लेकिन उस पर भी सुरक्षा एजेंसियों की कड़ी साइबर निगरानी (Cyber Surveillance) है।
इस इंटरनेट बंदी ने आम कश्मीरियों, छात्रों, ऑनलाइन कारोबार करने वालों और ‘वर्क फ्रॉम होम’ (Work from Home) कर रहे आईटी प्रोफेशनल्स की जिंदगी को एक बार फिर से ठहराव पर ला दिया है।

3. ‘छोटा ईरान’: कश्मीर और ईरान का ऐतिहासिक व धार्मिक नाता
कई लोगों के मन में यह स्वाभाविक सवाल उठता है कि ईरान के एक नेता की मौत पर कश्मीर में इतना मातम क्यों मनाया जा रहा है? इसे समझने के लिए हमें कश्मीर के जनसांख्यिकीय (Demographic) और धार्मिक ढांचे को समझना होगा।
| धार्मिक/सांस्कृतिक जुड़ाव | विस्तृत विवरण |
| शिया आबादी का प्रभाव | जम्मू-कश्मीर (विशेषकर श्रीनगर के ज़ाडीबल, हसनबाद, बेमिना और मध्य कश्मीर के बडगाम में) एक बहुत बड़ी शिया मुस्लिम आबादी निवास करती है। |
| मर्जा-ए-तकलीद (Marja-e-Taqlid) | अयातुल्लाह अली खामेनेई केवल ईरान के शासक नहीं थे। दुनिया भर के करोड़ों शिया मुसलमानों के लिए वे ‘सर्वोच्च आध्यात्मिक और धार्मिक मार्गदर्शक’ (Marja) थे। कश्मीर के शिया मुसलमान उनके धार्मिक फतवों और निर्देशों का अक्षरशः पालन करते थे। |
| ‘लिटिल ईरान’ का खिताब | बडगाम और करगिल (लद्दाख) जैसे क्षेत्रों को उनकी मजबूत शिया संस्कृति, रहन-सहन और ईरान के साथ गहरे वैचारिक जुड़ाव के कारण अक्सर ‘छोटा ईरान’ (Little Iran) कहा जाता है। |
| भावनात्मक जुड़ाव | कश्मीर के हर शिया घर, इमामबाड़े और मस्जिद में अयातुल्लाह खुमैनी और खामेनेई की तस्वीरें सम्मानपूर्वक लगाई जाती हैं। |
यही कारण है कि खामेनेई की नृशंस हत्या को कश्मीर का शिया समुदाय अपनी एक व्यक्तिगत, पारिवारिक और भारी धार्मिक क्षति के रूप में देख रहा है।
4. विरोध का स्वरूप: काले झंडे, मजलिस और अमेरिका विरोधी नारे
सुरक्षा बलों की भारी तैनाती और कर्फ्यू जैसे हालात के बावजूद, डाउनटाउन श्रीनगर और अंदरूनी संकरी गलियों में लोगों ने अपना दुख और गुस्सा जाहिर करने के तरीके ढूंढ लिए हैं।
- छतों पर लहराते काले झंडे: शिया बहुल इलाकों में हर घर की छत, दुकानों, इमामबाड़ों और चौराहों पर शोक के प्रतीक के रूप में काले झंडे (Black Flags) फहरा दिए गए हैं।
- मजलिस और नौहाख्वानी: बड़ी रैलियों पर प्रतिबंध होने के कारण लोग मस्जिदों और इमामबाड़ों के अंदर ही ‘मजलिस’ (शोक सभाएं) आयोजित कर रहे हैं। छाती पीटकर (मातम) और ‘नौहा’ (शोक गीत) पढ़कर महिलाएं, बच्चे और बुजुर्ग अपने सर्वोच्च नेता को अश्रुपूर्ण श्रद्धांजलि दे रहे हैं।
- अमेरिका और इज़रायल के खिलाफ आक्रोश: इमामबाड़ों के बाहर छिटपुट प्रदर्शन हुए हैं जहां युवाओं के हाथों में तख्तियां हैं जिन पर “अमेरिका मुर्दाबाद” (Death to America) और “इज़रायल मुर्दाबाद” के नारे लिखे हैं। कुछ स्थानों पर अमेरिका और इज़रायल के झंडे जलाकर भारी विरोध दर्ज कराया गया है।
“यह सिर्फ ईरान का नुकसान नहीं है, यह पूरी इस्लामिक दुनिया का नुकसान है। हमारे रहबर (मार्गदर्शक) को हमसे छीना गया है। हमारा दिल खून के आंसू रो रहा है।” — ज़ाडीबल के एक स्थानीय निवासी का बयान।
5. सुरक्षा बलों का ‘ज़ीरो टॉलरेंस’ और प्रो-एक्टिव दृष्टिकोण
चूंकि हेडलाइन कश्मीर अलर्ट: ईरान के सुप्रीम लीडर की मौत के बाद श्रीनगर में लाल चौक सील, इंटरनेट बंद लगातार टीवी स्क्रीन्स पर फ्लैश हो रही है, इसलिए गृह मंत्रालय (MHA) भी सीधे श्रीनगर की स्थिति पर नजर रखे हुए है। जम्मू-कश्मीर पुलिस और पैरामिलिट्री फोर्सेज एक बहुत ही सोची-समझी रणनीति पर काम कर रहे हैं।
- ड्रोन सर्विलांस (Drone Monitoring): डाउनटाउन (Downtown) के उन इलाकों में जहां पुलिस की गाड़ियां आसानी से प्रवेश नहीं कर सकतीं (जैसे नौहट्टा, खानयार), वहां आसमान से हाई-रेजोल्यूशन ड्रोन्स के जरिए भीड़ की निगरानी की जा रही है। अगर कहीं पत्थरबाजी (Stone Pelting) की जरा सी भी भनक लगती है, तो रैपिड एक्शन फोर्स (RAF) तुरंत वहां पहुंच जाती है।
- फ्लैग मार्च (Flag March): उपद्रवियों को कड़ा संदेश देने और आम नागरिकों में सुरक्षा का अहसास दिलाने के लिए CRPF ने बडगाम और श्रीनगर के संवेदनशील इलाकों में दंगा-रोधी उपकरणों (Riot Gear) के साथ भारी फ्लैग मार्च किया है।
- समुदाय आधारित पुलिसिंग (Community Policing): पुलिस के आला अधिकारी स्थानीय शिया धर्मगुरुओं (Clerics) और मौलवियों के साथ लगातार बैठकें कर रहे हैं। उनसे अपील की गई है कि वे मस्जिदों के लाउडस्पीकर से युवाओं को शांत रहने, उकसावे में न आने और कानून हाथ में न लेने की हिदायत दें। जब तक प्रदर्शनकारी मुख्य सड़कों पर आकर कानून-व्यवस्था नहीं बिगाड़ते, तब तक उन्हें शांतिपूर्ण तरीके से शोक मनाने की मौन स्वीकृति दी गई है।

6. राजनीति और कश्मीरी नेताओं की तीखी प्रतिक्रियाएं
इस अंतरराष्ट्रीय हत्या और उसके बाद कश्मीर में पैदा हुए हालात पर जम्मू-कश्मीर के प्रमुख राजनीतिक दलों और नेताओं ने भी अपनी तीखी प्रतिक्रियाएं व्यक्त की हैं।
- पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (PDP): पीडीपी प्रमुख महबूबा मुफ्ती ने अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की आलोचना करते हुए कहा, “अयातुल्लाह खामेनेई की हत्या मध्य पूर्व को एक अंतहीन युद्ध की आग में धकेल देगी। अमेरिका और इज़रायल की यह मनमानी संप्रभुता का हनन है। आज कश्मीर का एक बड़ा तबका भारी दुख में है, और हम उनके शोक में बराबर के शरीक हैं।”
- नेशनल कॉन्फ्रेंस (NC): जम्मू-कश्मीर के प्रमुख नेता उमर अब्दुल्ला ने भी शांति की अपील करते हुए कहा, “दुनिया पहले ही बारूद के ढेर पर बैठी है। ऐसे ‘टार्गेटेड असैसिनेशन’ (Targeted Assassination) केवल तबाही लाते हैं। मैं कश्मीर के युवाओं से अपील करता हूं कि वे शांति बनाए रखें और ऐसा कोई कदम न उठाएं जिससे हमारी अपनी घाटी को नुकसान पहुंचे।”
- उपराज्यपाल (LG) प्रशासन का रुख: राजभवन से एक स्पष्ट संदेश जारी किया गया है कि किसी भी व्यक्ति या समूह को अंतरराष्ट्रीय घटनाओं की आड़ में कश्मीर की शांति, सद्भाव और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने की इजाजत बिल्कुल नहीं दी जाएगी।
7. अर्थव्यवस्था और पर्यटन पर करारा प्रहार (The Economic Blow)
मार्च का महीना कश्मीर में ‘वसंत’ (Spring) और पर्यटन सीज़न की शानदार शुरुआत का समय होता है। दुनिया भर में मशहूर ‘एशिया का सबसे बड़ा ट्यूलिप गार्डन’ (Tulip Garden) जल्द ही पर्यटकों के लिए खुलने वाला था। लेकिन इस अचानक आए संकट ने कश्मीर की अर्थव्यवस्था पर ब्रेक लगा दिया है।
- पर्यटक होटलों में कैद: हजारों की संख्या में जो घरेलू और विदेशी पर्यटक डल झील (Dal Lake), गुलमर्ग और पहलगाम की सुंदरता निहारने आए थे, वे अब अपने होटलों और हाउसबोट्स में कैद होकर रह गए हैं। इंटरनेट बंद होने के कारण वे अपने चिंतित परिवारों से संपर्क भी नहीं कर पा रहे हैं।
- फ्लाइट्स कैंसिलेशन और पैनिक: डरे हुए पर्यटक अपनी छुट्टियां बीच में ही छोड़कर जल्द से जल्द वापस लौटना चाहते हैं। इसके कारण श्रीनगर इंटरनेशनल एयरपोर्ट (शेख-उल-आलम एयरपोर्ट) पर भारी भीड़ और अफरा-तफरी जमा हो गई है। एयरलाइंस के टिकटों के दाम आसमान छू रहे हैं।
- दिहाड़ी मजदूरों की रोजी-रोटी छिन गई: लाल चौक सील होने और बाजारों के शटर गिरने से सबसे ज्यादा नुकसान उन दिहाड़ी मजदूरों, शिकारा वालों (Shikara owners), टूरिस्ट गाइडों और टैक्सी ड्राइवरों को हो रहा है, जिनका चूल्हा रोज की कमाई से जलता है।
8. करगिल और लद्दाख का हाल: शून्य से नीचे तापमान में भी भारी उबाल
कश्मीर घाटी से सटे केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख (Ladakh) के करगिल जिले में हालात और भी अधिक तनावपूर्ण हैं। करगिल की 90% से अधिक आबादी शिया मुस्लिम है, और उनका ईरान के साथ सीधा आध्यात्मिक जुड़ाव है।
- पूर्ण हड़ताल (Complete Shutdown): करगिल शहर, द्रास और जांस्कर (Zanskar) में पूरी तरह से ‘शटर-डाउन’ हड़ताल है। कोई भी दुकान या व्यापारिक प्रतिष्ठान नहीं खुला है।
- सड़कों पर जनसैलाब: इमाम खुमैनी मेमोरियल ट्रस्ट (IKMT) और इस्लामिया स्कूल करगिल (ISK) के संयुक्त आह्वान पर हजारों लोग शून्य से नीचे के तापमान (Sub-zero temperatures) और भारी बर्फबारी के बीच भी सड़कों पर निकल आए हैं। वे अपने हाथों में खामेनेई की तस्वीरें और बैनर लिए हुए हैं।
- यद्यपि करगिल में प्रदर्शन अभी तक शांतिपूर्ण रहे हैं, लेकिन लोगों का गुस्सा सातवें आसमान पर है। स्थानीय प्रशासन ने यहां भी सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी है और अतिरिक्त अर्धसैनिक बलों को तैनात कर दिया है।
9. फ्लैशबैक: क्या सुलेमानी (2020) की मौत से बड़ा है यह बवाल?
यह पहली बार नहीं है जब ईरान की किसी बड़ी घटना का सीधा असर कश्मीर की सड़कों पर देखने को मिला है।
जनवरी 2020 में, जब अमेरिका ने ड्रोन स्ट्राइक में ईरान के शक्तिशाली और लोकप्रिय जनरल कासिम सुलेमानी (Qasem Soleimani) की हत्या की थी, तब भी कश्मीर में ठीक ऐसा ही माहौल बना था। उस समय भी शिया बहुल इलाकों में भारी विरोध प्रदर्शन हुए थे, और पुलिस के साथ छिटपुट झड़पें हुई थीं।
लेकिन, सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इस बार (2026 में) स्थिति 2020 से कई गुना अधिक गंभीर और विस्फोटक है। इसका कारण यह है कि कासिम सुलेमानी एक सैन्य कमांडर थे, जबकि अयातुल्लाह खामेनेई ‘सर्वोच्च धार्मिक नेता’ (Supreme Leader) थे। उनकी अहमियत और दर्जा शिया मुसलमानों के लिए किसी भी राष्ट्रपति या जनरल से बहुत ऊपर है। यही कारण है कि इस बार प्रशासन ने कश्मीर अलर्ट: ईरान के सुप्रीम लीडर की मौत के बाद श्रीनगर में लाल चौक सील, इंटरनेट बंद करने जैसा कठोर और ‘प्रो-एक्टिव’ कदम तुरंत उठाया है।
10. आगामी चुनौतियां और प्रशासन का रोडमैप (The Road Ahead)
वर्तमान तनावपूर्ण स्थिति को देखते हुए यह कहना बेहद मुश्किल है कि कश्मीर में हालात कब तक पूरी तरह से सामान्य हो पाएंगे।
- जुमे की नमाज़ (Friday Prayers) पर कड़ी नज़र: प्रशासन की सबसे बड़ी और असल परीक्षा आगामी शुक्रवार (जुमे की नमाज़) को होगी। अक्सर जुमे की नमाज़ के बाद मस्जिदों से निकलने वाली भीड़ उग्र रूप ले लेती है। इसके लिए जामिया मस्जिद और अन्य बड़ी शिया मस्जिदों के बाहर अभूतपूर्व सुरक्षा ‘ग्रिड’ (Security Grid) तैयार किया जा रहा है।
- ईरान के घटनाक्रम पर निर्भरता: कश्मीर की शांति अब इस बात पर भी निर्भर करती है कि ईरान में 40 दिन के राष्ट्रीय शोक की अवधि कैसे गुजरती है और मध्य पूर्व में युद्ध क्या मोड़ लेता है। यदि ईरान इजरायल पर बड़े हमले करता है और युद्ध बढ़ता है, तो कश्मीर में भी उसका ‘इको’ (Echo) सुनाई देगा।
- स्कूल-कॉलेजों की छुट्टियां: हालात की संवेदनशीलता को देखते हुए प्रशासन ने घाटी के सभी सरकारी और निजी शिक्षण संस्थानों को अगले आदेश तक एहतियातन बंद रखने का फैसला किया है ताकि छात्रों को किसी भी प्रकार के प्रदर्शन से दूर रखा जा सके।
निष्कर्ष: एक अंतरराष्ट्रीय युद्ध की स्थानीय और दर्दनाक कीमत
आज कश्मीर की जो स्थिति है, वह इस बात का एक ज्वलंत और डरावना उदाहरण है कि आधुनिक ‘ग्लोबलाइज्ड दुनिया’ (Globalized World) में भौगोलिक दूरियां कोई मायने नहीं रखतीं। तेहरान के अंडरग्राउंड बंकर में गिरी एक मिसाइल की गूंज और उसका दर्द श्रीनगर की शांत डल झील और लाल चौक की सड़कों पर साफ सुना जा सकता है।
ईरान-इज़रायल के इस महायुद्ध का खामियाजा अंततः कश्मीर के आम नागरिक, निर्दोष व्यापारी और पर्यटन पर निर्भर रहने वाले लोग भुगत रहे हैं। जहाँ एक ओर शिया समुदाय अपने सबसे बड़े और पवित्र धार्मिक रहबर (मार्गदर्शक) को खोने के गहरे और अपूरणीय सदमे में है, वहीं आम कश्मीरी एक बार फिर से कर्फ्यू, इंटरनेट बैन, बंद रास्तों और भारी सुरक्षा बलों की तैनाती वाली उस पुरानी और दर्दनाक जिंदगी को जीने को मजबूर हो गया है, जिससे वे अभी-अभी बाहर निकल रहे थे।
सरकार, खुफिया एजेंसियों और सुरक्षा बलों की सर्वोच्च प्राथमिकता इस समय कश्मीर में किसी भी प्रकार के खून-खराबे (Bloodshed) को रोकना है। यह एक ऐसी जटिल कूटनीतिक और प्रशासनिक चुनौती है जिसमें एक छोटी सी भी चिंगारी पूरे जम्मू-कश्मीर को फिर से अलगाववाद और हिंसा की आग में झोंक सकती है। हम केवल यही उम्मीद कर सकते हैं कि शांति, संयम और भाईचारे की जीत हो, और कश्मीर की खूबसूरत वादियों में जल्द ही कर्फ्यू के इस डरावने सन्नाटे की जगह फिर से पर्यटकों की हंसी और स्थानीय लोगों की चहल-पहल लौट आए।
