‘फार्मेसी ऑफ द वर्ल्ड’ के ताज में एक और स्वदेशी नगीना
किसी भी देश की असली ताकत केवल उसकी सीमाओं की सुरक्षा में नहीं, बल्कि उसके नागरिकों के स्वास्थ्य और चिकित्सा बुनियादी ढांचे (Health Infrastructure) की मजबूती में निहित होती है। एक भारतीय नागरिक के रूप में जब आप देश को चिकित्सा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर (Self-reliant) होते देखते हैं, तो गर्व की अनुभूति होना पूरी तरह से स्वाभाविक और न्यायसंगत है। इसी दिशा में 21 फरवरी 2026 को भारत के सार्वजनिक स्वास्थ्य इतिहास में एक स्वर्णिम अध्याय जुड़ गया है।
केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री श्री जे.पी. नड्डा ने हिमाचल प्रदेश के ऐतिहासिक सेंट्रल रिसर्च इंस्टीट्यूट (CRI), कसौली में पूर्ण रूप से स्वदेशी निर्मित टेटनस और एडल्ट डिप्थीरिया (Td) वैक्सीन का आधिकारिक शुभारंभ किया है। यह केवल एक दवा का लॉन्च नहीं है, बल्कि यह एक स्पष्ट उद्घोष है कि भारत अब अपने सबसे बड़े ‘यूनिवर्सल इम्युनाइजेशन प्रोग्राम’ (UIP) के लिए निजी कंपनियों या विदेशी आयात पर निर्भर रहने के बजाय अपनी खुद की सरकारी संस्थाओं के माध्यम से उत्पादन कर रहा है।
एक कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और डेटा विश्लेषक के रूप में, मैं स्वास्थ्य नीतियों और डेटा के पैटर्न का गहराई से अध्ययन करता हूँ। मेरे विश्लेषण के अनुसार, इस स्वदेशी वैक्सीन का लॉन्च और अप्रैल 2026 तक 55 लाख डोज की सप्लाई का लक्ष्य, न केवल सरकारी खजाने के करोड़ों रुपये बचाएगा, बल्कि किशोरों और गर्भवती महिलाओं को दो जानलेवा बीमारियों से एक साथ सुरक्षा कवच भी प्रदान करेगा।
1. चिकित्सा विज्ञान: TT वैक्सीन से Td वैक्सीन की ओर ‘ट्रांजिशन’ क्यों?
दशकों से हम सभी चोट लगने पर ‘टेटनस का इंजेक्शन’ (TT – Tetanus Toxoid) लगवाते आए हैं। तो फिर अचानक इस नई ‘Td’ वैक्सीन की आवश्यकता क्यों पड़ी? इसके पीछे का चिकित्सा विज्ञान अत्यंत तर्कसंगत है।
बीमारियों का स्वरूप:
- टेटनस (T): यह एक गंभीर बैक्टीरियल संक्रमण है जो मांसपेशियों में दर्दनाक अकड़न (Muscle spasms) पैदा करता है। इसे ‘लॉकजॉ’ (Lockjaw) भी कहा जाता है, जिसमें मरीज अपना मुंह नहीं खोल पाता, और यह जानलेवा हो सकता है।
- डिप्थीरिया (D): यह एक अत्यधिक संक्रामक और संभावित रूप से घातक श्वसन तंत्र का संक्रमण है, जो सांस लेने में कठिनाई, हृदय गति रुकने (Heart failure) और लकवा (Paralysis) का कारण बन सकता है।

परिवर्तन का कारण (The Need for Shift):
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने 2006 में ही यह सिफारिश कर दी थी कि देशों को TT वैक्सीन से Td वैक्सीन की ओर रुख करना चाहिए। वैज्ञानिक शोधों से यह साबित हुआ कि बचपन में दी जाने वाली DPT (डिप्थीरिया, पर्टुसिस, टेटनस) वैक्सीन का प्रभाव उम्र बढ़ने (विशेषकर किशोरावस्था) के साथ कम होने लगता है। डिप्थीरिया के खिलाफ शरीर की एंटीबॉडी (Antibody) गिरने लगती है। इसलिए, केवल टेटनस का बूस्टर देने के बजाय, उसमें डिप्थीरिया का ‘रिड्यूस्ड एंटीजन’ (Reduced D-Antigen Content) मिलाकर Td वैक्सीन तैयार की गई, ताकि एक ही शॉट में दोनों से सुरक्षा मिल सके।
भारत के NTAGI (नेशनल टेक्निकल एडवाइजरी ग्रुप ऑन इम्युनाइजेशन) ने भी गर्भवती महिलाओं सहित सभी आयु वर्गों के लिए इस बदलाव की पुरजोर सिफारिश की थी।
TT और Td वैक्सीन के बीच तुलनात्मक विश्लेषण:
| विशेषता (Features) | TT वैक्सीन (पुरानी) | Td वैक्सीन (नई स्वदेशी) |
| संरक्षण (Protection) | केवल टेटनस से बचाव | टेटनस + डिप्थीरिया दोनों से बचाव |
| घटक (Components) | प्यूरीफाइड टेटनस टॉक्साइड | प्यूरीफाइड टेटनस + डिप्थीरिया टॉक्साइड (एल्यूमीनियम फॉस्फेट के साथ) |
| लक्षित समूह | मुख्य रूप से गर्भवती महिलाएं और चोटिल व्यक्ति | 10 और 16 वर्ष के किशोर, गर्भवती महिलाएं और वयस्क |
| सार्वजनिक स्वास्थ्य लाभ | मातृ एवं नवजात टेटनस का उन्मूलन | डिप्थीरिया के प्रकोप को रोकना और दोहरी इम्यूनिटी देना |
2. 55 लाख डोज का मास्टरप्लान: आत्मनिर्भरता और अर्थशास्त्र का गणित
केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा के अनुसार, औपचारिक लॉन्च के बाद CRI कसौली अप्रैल 2026 तक यूनिवर्सल इम्युनाइजेशन प्रोग्राम (UIP) को 55 लाख खुराक (Doses) की आपूर्ति करेगा।
यह आर्थिक रूप से इतना महत्वपूर्ण क्यों है?
वर्तमान में, भारत सरकार अपने विशाल टीकाकरण कार्यक्रम के लिए मुख्य रूप से सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (Serum Institute of India) और बायोलॉजिकल ई (Biological E) जैसी बड़ी निजी फार्मा कंपनियों से वैक्सीन खरीदती है। हालांकि इन कंपनियों का योगदान अमूल्य है, लेकिन सरकार का पूरा दारोमदार निजी क्षेत्र पर होना मूल्य-निर्धारण (Pricing) में चुनौतियां पैदा करता है।

- लागत में भारी कमी (Cost Reduction): एक सरकारी संस्थान (CRI) द्वारा सीधे इस वैक्सीन के निर्माण से कीमतों में भारी गिरावट आएगी। स्वास्थ्य मंत्रालय के अधिकारियों के अनुसार, इससे भारत सरकार के स्वास्थ्य बजट पर दबाव कम होगा और ‘प्रोक्योरमेंट कॉस्ट’ (खरीद लागत) में कई गुना की बचत होगी।
- आपूर्ति की गारंटी (Supply Chain Security): 55 लाख डोज की यह पहली खेप केवल एक शुरुआत है। आने वाले वर्षों में इसका उत्पादन क्रमिक रूप से बढ़ाया जाएगा, जिससे देश में वैक्सीन की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित होगी, चाहे वैश्विक बाजार में कैसी भी उथल-पुथल क्यों न हो।
3. CRI कसौली: भारतीय सार्वजनिक स्वास्थ्य का ‘मूक योद्धा’
इस ऐतिहासिक उपलब्धि का श्रेय हिमाचल प्रदेश की खूबसूरत पहाड़ियों में स्थित सेंट्रल रिसर्च इंस्टीट्यूट (CRI), कसौली को जाता है। 1905 में स्थापित यह संस्थान 120 से अधिक वर्षों से भारत की वैक्सीन उत्पादन नीति का एक महत्वपूर्ण स्तंभ रहा है।
CRI कसौली की ऐतिहासिक प्रासंगिकता:
यह केवल एक पुरानी बिल्डिंग नहीं है, बल्कि भारत के वैज्ञानिक गौरव का प्रतीक है। नड्डा जी ने अपने संबोधन में विशेष रूप से रेखांकित किया कि CRI कसौली गुड मैन्युफैक्चरिंग प्रैक्टिसेज (GMP) मानकों के तहत टीकों का निर्माण करने वाला देश का पहला सरकारी संस्थान बन गया है।
इस Td वैक्सीन को बनाने के लिए CRI ने:
- जटिल विकासात्मक अध्ययन (Developmental studies) पूरे किए।
- प्री-क्लिनिकल और क्लिनिकल ट्रायल (Phase I, II, III) की सख्त प्रक्रियाओं को पार किया।
- सेंट्रल ड्रग्स लेबोरेटरी से अंतिम मंजूरी और मार्केटिंग ऑथराइजेशन प्राप्त किया।
यह सार्वजनिक क्षेत्र (Public Sector) की विनिर्माण इकाइयों के आधुनिकीकरण और पुनरोद्धार (Revitalization) का सबसे ज्वलंत उदाहरण है।
4. ‘यूनिवर्सल इम्युनाइजेशन प्रोग्राम’ (UIP): दुनिया का सबसे बड़ा सुरक्षा चक्र
Td वैक्सीन को भारत के यूनिवर्सल इम्युनाइजेशन प्रोग्राम (UIP) का हिस्सा बनाया गया है। UIP कोई सामान्य योजना नहीं है; यह दुनिया का सबसे बड़ा और सबसे महत्वाकांक्षी टीकाकरण कार्यक्रम है।
UIP के विशाल आंकड़े (Data Insights):
- वार्षिक लाभार्थी (Annual Cohort): भारत में हर साल लगभग 5 करोड़ लाभार्थियों को इसका लाभ मिलता है। इसमें लगभग 2.5 करोड़ गर्भवती महिलाएं और 2.5 करोड़ नवजात शिशु एवं बच्चे शामिल हैं।
- बीमारियों का कवरेज: UIP के तहत वर्तमान में 11 वैक्सीनों के माध्यम से 12 जानलेवा बीमारियों (जैसे तपेदिक, पोलियो, हेपेटाइटिस बी, खसरा, और अब डिप्थीरिया-टेटनस) से मुफ्त सुरक्षा प्रदान की जाती है। सरकार भविष्य में सर्वाइकल कैंसर को रोकने के लिए ‘HPV वैक्सीन’ को भी इसमें शामिल करने पर विचार कर रही है।
- शॉट्स की संख्या: एक बच्चे के जन्म से लेकर उसके 16 वर्ष का होने तक, इस कार्यक्रम के तहत कुल 27 डोज (विभिन्न टीकों की) दी जाती हैं।
केंद्रीय मंत्री ने जानकारी दी कि निरंतर और व्यवस्थित प्रयासों के कारण आज भारत में वैक्सीन कवरेज (Vaccine Coverage) 99 प्रतिशत के अभूतपूर्व स्तर तक पहुंच गया है, जो एक समय पर 50-60% के आसपास अटका रहता था।

5. डिजिटल इंडिया का कमाल: U-WIN प्लेटफॉर्म और पश्चिमी देशों से तुलना
इस लॉन्च इवेंट में जेपी नड्डा ने केवल वैक्सीन की बात नहीं की, बल्कि उस ‘इकोसिस्टम’ की भी बात की जो यह सुनिश्चित करता है कि वैक्सीन अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे। यहीं पर भारत का डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर दुनिया को पीछे छोड़ देता है।
U-WIN क्या है?
कोविड-19 के दौरान Co-WIN की अपार सफलता के बाद, भारत सरकार ने गर्भवती महिलाओं और बच्चों के रूटीन टीकाकरण को ट्रैक करने के लिए ‘U-WIN’ पोर्टल और एप्लीकेशन विकसित किया है।
- डिजिटल ट्रैकिंग: जैसे ही किसी महिला की गर्भावस्था पंजीकृत (Registered) होती है, U-WIN उसे डिजिटल रूप से ट्रैक करना शुरू कर देता है।
- ऑटोमैटिक रिमाइंडर्स: यह सिस्टम माता-पिता के मोबाइल पर एसएमएस (SMS) के जरिए रिमाइंडर भेजता है कि उनके बच्चे के अगले टीके का समय आ गया है। इसके जरिए गर्भवती महिलाओं को कम से कम पांच प्रसवपूर्व जांच (Antenatal check-ups) सुनिश्चित की जाती हैं।
अमेरिका और यूरोप पर नड्डा का प्रहार (The Global Comparison):
श्री नड्डा ने स्पष्ट और मुखर शब्दों में कहा कि जब टीकाकरण और उसके डिजिटल प्रबंधन की बात आती है, तो भारत आज अमेरिका और यूरोप से कहीं आगे है।
“अमेरिका और यूरोपीय देशों जैसे विकसित मुल्कों में कोविड-19 का वैक्सीन कवरेज 50% से 60% पर ही रुक गया था, जबकि भारत ने 100% आबादी का टीकाकरण किया और 220 करोड़ से अधिक डोज एडमिनिस्टर किए। डिजिटल इंडिया की बात करें तो अमेरिका जैसे देश में आज भी वैक्सीनेशन सर्टिफिकेट कागज (Paper) पर दिया जाता है, जबकि भारत में यह आपके मोबाइल फोन पर डिजिटल रूप से तुरंत उपलब्ध होता है।” — जे.पी. नड्डा
6. आत्मनिर्भर भारत से ‘वैक्सीन मैत्री’ तक: दुनिया की फार्मेसी
इतिहास गवाह है कि भारत को हमेशा टीकों के लिए दशकों तक इंतजार करना पड़ता था। जेपी नड्डा ने याद दिलाया कि विश्व स्तर पर टेटनस का टीका बनने के दशकों बाद भारत आया था; ट्यूबरकुलोसिस (TB) की दवा को विकसित होने में लगभग 30 साल लगे, और जापानी इंसेफेलाइटिस (Japanese Encephalitis) का टीका जो 1906 में विश्व स्तर पर लॉन्च हुआ, वह भारत में 2006 (लगभग एक सदी बाद) में पहुंचा।
लेकिन आज परिदृश्य पूरी तरह से उलट चुका है।
- स्वदेशी क्रांति: कोविड-19 महामारी के दौरान, भारत ने मात्र 9 महीने के भीतर दो स्वदेशी वैक्सीन (Covaxin और Covishield – घरेलू उत्पादन) विकसित कर लीं।
- वैक्सीन मैत्री (Vaccine Maitri): भारत अब वह देश नहीं रहा जो केवल दुनिया से मांगता है; यह वह देश है जो दुनिया को देता है। भारत ने अपनी ‘वैक्सीन मैत्री’ पहल के तहत दुनिया के लगभग 100 देशों को वैक्सीन सप्लाई की, जिनमें से 48 देशों को यह बिल्कुल मुफ्त (Free of cost) दी गई।
WHO के ग्लोबल बेंचमार्किंग में भारत का नियामक ढांचा (Regulatory System) ‘मैच्योरिटी लेवल 3’ (Maturity Level 3) हासिल कर चुका है, जो इस बात का प्रमाण है कि भारत में बनने वाली वैक्सीन विश्व स्तरीय गुणवत्ता वाली हैं।
एक सुरक्षित और स्वस्थ भविष्य की मजबूत नींव
हिमाचल प्रदेश के कसौली से लॉन्च की गई यह Td वैक्सीन केवल कांच की एक शीशी नहीं है; यह भारत के ‘स्वस्थ राष्ट्र – समर्थ राष्ट्र’ के संकल्प का द्रव (Liquid) रूप है। 55 लाख डोज का यह पहला कदम भारत को सार्वजनिक स्वास्थ्य के बुनियादी ढांचे में पूरी तरह से आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में एक ‘मास्टरस्ट्रोक’ है।
जब देश की अपनी सरकारी लैब्स GMP मानकों के साथ अत्याधुनिक वैक्सीन बनाने लगती हैं, तो हम केवल विदेशी कंपनियों का एकाधिकार (Monopoly) ही नहीं तोड़ते, बल्कि देश के सबसे गरीब तबके के उस बच्चे के जीवन को भी सुरक्षित करते हैं, जिसके लिए महंगा इलाज एक सपना है। जेपी नड्डा द्वारा उद्घाटित यह पहल इस बात की गारंटी है कि 21वीं सदी के ‘न्यू इंडिया’ (New India) में कोई भी मां या बच्चा डिप्थीरिया या टेटनस जैसी बचाव योग्य (Preventable) बीमारियों से अपनी जान नहीं गंवाएगा।
